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विचारधारा तो नहीं मरती : भगत सिंह - वीणा भाटिया / मनोज कुमार झा

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23 मार्च, भगत सिंह के शहादत-दिवस पर विशेष आलेख

शहीदे आजम भगत सिंह इस देश के ऐसे क्रांति-नायक रहे हैं, जिनका नाम बच्चा-बच्चा जानता है। अल्प आयु में ही भगत सिंह ने इस देश के क्रांतिकारियों को जैसा नेतृत्व प्रदान किया, वह दुनिया के इतिहास में अभूतपूर्व है। भगत सिंह एक ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने ‘स्व’ को ‘जन’ के लिए समग्रत: अर्पित कर दिया था। उन्होंने क्रांति की परिभाषा दी थी – “प्रगति के लिए परिवर्तन की भावना और आकांक्षा।“ आगे चल कर अपने प्रसिद्ध लेख ‘बम का दर्शन’ में उन्होंने क्रांति के संबध में लिखा – “क्रांतिकारियों का विश्वास है कि देश को स्वतंत्रता क्रांति से मिलेगी। वे जिस क्रांति के लिए प्रयत्नशील हैं और जिस क्रांति का रूप उनके सामने स्पष्ट है, उसका अर्थ केवल यह नहीं है कि विदेशी शासकों तथा उनके पिट्ठुओं से क्रांतिकारियों का केवल सशस्त्र संघर्ष हो, बल्कि इस सशस्त्र संघर्ष के साथ-साथ नवीन सामाजिक व्यवस्था के द्वार देश के लिए मुक्त हो जाएं। क्रांति पूंजीवाद, वर्गवाद तथा कुछ लोगों को ही विशेषाधिकार देने वाली प्रणाली का अंत कर देगी, यह राष्ट्र को अपने पैरों पर खड़ा करेगी, उससे नवीन राष्ट्र और नये समाज का जन्म होगा। क्रांति में सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि वह मज़दूरों तथा किसानों का राज्य कायम कर उन सब अवांछित तत्वों को समाप्त कर देगी जो देश की राजनीतिक शक्ति को हथियाए बैठे हैं।“ इससे स्पष्ट है कि भगत सिंह देश के लिए कैसी स्वतंत्रता चाहते थे। वे देश के लिए ऐसी स्वतंत्रता चाहते थे जिसमें देश के मज़दूर-किसान खुल कर सांस ले सकें। वे स्वतंत्र भारत में मज़दूरों-किसानों का राज स्थापित करना चाहते थे और एक शोषणविहीन समाज बनाना चाहते थे।

बहुत से लोग भगत सिंह को एक स्वप्नदर्शी रोमांटिक क्रांतिकारी मानते हैं जिन्होंने क्रांतिकारिता को महिमामंडित करने के लिए अपने जीवन का उत्सर्ग कर दिया। वैसे देखा जाए तो हर क्रांतिकारी स्वप्नदर्शी होता है। लेकिन भगत सिंह ने अपने देश के इतिहास के साथ दुनिया के इतिहास का भी गहन अध्ययन किया था और इससे उन्हें जो अंतर्दृष्टि मिली थी, उससे उन्होंने अपने समय और समाज के मूल अंतर्विरोधों को काफी गहराई से समझा था। आज़ादी से उनका मतलब देश से सिर्फ़ अंग्रेज़ों को भगाना ही नहीं था, वरन् एक ऐसी समाज व्यवस्था की नींव डालनी थी जिसमें वर्गीय शोषण का खात्मा हो सके। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा था – “भारत सरकार का मुख्य लार्ड रीडिंग की जगह यदि सर पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास हों, यदि लार्ड इरविन की जगह सर तेजबहादुर सप्रू आ जाएं तो जनता को इससे क्या फ़र्क पड़ेगा? तो राष्ट्रीय भावनाओं की अपील बिल्कुल बेकार है। उसे आप अपने काम के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकते। आपको गंभीरता से काम लेना होगा और उन्हें (जनता को) समझाना होगा कि क्रांति उनके हित में है और उनकी अपनी है।“ उन्होंने लिखा था – “क्रांति करना बहुत कठिन काम है। यह किसी एक आदमी के वश की बात नहीं है। और न ही किसी निश्चित तारीख को आ सकती है। यह तो विशेष सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से पैदा होती है और एक संगठित पार्टी को ऐसे अवसर को संभालना होता है और जनता को इसके लिए तैयार करना होता है। इस सबके लिए क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं को अनेक कुर्बानियां देनी होती हैं। ...हम तो लेनिन के अत्यंत प्रिय शब्द ‘पेशेवर क्रांतिकारी’ का प्रयोग करेंगे। पूरा समय देने वाले कार्यकर्ता, क्रांति के सिवाय जीवन में जिनकी और कोई ख्वाहिश ही न हो। जितने अधिक ऐसे कार्यकर्ता पार्टी में संगठित होंगे, उतने ही सफलता के अवसर अधिक होंगे।“

भगत सिंह के लिए आज़ादी का मतलब था एक शोषणविहीन समाज की स्थापना और वे राष्ट्रवाद के भुलावे से दूर थे। अपने अध्ययन, चिंतन और मनन से उन्होंने समझ लिया था कि देश की आज़ादी के लिए अंग्रेज़ों से संघर्ष और समझौते करने वाली पार्टी कांग्रेस का चरित्र क्या है? वे अच्छी तरह समझ चुके थे कि कांग्रेस आज़ादी के नाम पर देश में पूंजीपतियों के शासन की स्थापना करना चाहती है। इसीलिए भगत सिंह ने अपने लेखन में बराबर कांग्रेस की नीतियों की पोल खोली। उन्होंने बार-बार यह चेतावनी दी कि कांग्रेस के नेतृत्व में देश की मेहनतकश जनता को मुक्ति नहीं मिल सकती। इसके लिए एक क्रांतिकारी पार्टी के निर्माण पर उन्होंने शुरू से जोर डाला।

भगत सिंह ने लिखा – “क्या यह अपराध नहीं है कि ब्रिटेन ने भारत में अनैतिक शासन किया? हमें भिखारी बनाया, हमारा समस्त ख़ून चूस लिया। एक जाति के लिहाज से हमारा घोर अपमान तथा शोषण किया गया है। क्या जनता अब भी चाहती है कि इस अपमान को भुलाकर हम ब्रिटिश शासकों को क्षमा कर दें। हम बदला लेंगे, जो जनता द्वारा शासकों से लिया गया न्यायोचित बदला होगा...हमारा युद्ध विजय या मृत्यु के फैसले तक चलता रहेगा। क्रांति चिरंजीवी हो।“

क्रांति से अपने अभिप्राय को और भी स्पष्ट करते हुए भगत सिंह ने लिखा कि “इस शताब्दी में इसका सिर्फ़ एक ही अर्थ हो सकता है – जनता के लिए जनता की राजनीतिक शक्ति हासिल करना। वास्तव में यही है क्रांति, बाकी सभी विद्रोह तो सिर्फ़ मालिकों के परिवर्तन द्वारा पूंजीवादी सड़ांध को ही आगे बढ़ाते हैं। किसी भी हद तक लोगों से या उनके उद्देश्यों से जतायी हमदर्दी जनता से वास्तविकता नहीं छिपा सकती, लोग छल पहचानते हैं। भारत में हम भारतीय श्रमिक वर्ग के शासन से कम कुछ नहीं चाहते। भारतीय श्रमिकों को भारत में साम्राज्यवादियों और उनके मददगारों को हटा कर जो उस व्यवस्था के पैरोकार हैं, जिसकी जड़ें शोषण पर आधारित हैं, आगे आना है। हम गोरी बुराई की जगह काली बुराई को लेकर कष्ट नहीं उठाना चाहते। बुराइयां एक स्वार्थी समूह की तरह एक-दूसरे का स्थान लेने को तैयार हैं।“

अंग्रेज़ साम्राज्यवादियों के लिए भगत सिंह की विचारधारा अत्यंत ही ख़तरनाक थी। यही कारण है कि आनन-फानन में अंग्रेज़ों ने भगत सिंह को फांसी के फंदे से लटका दिया और यह समझने लगे कि एक बड़े ख़तरे से वे मुक्त हो चुके हैं। लेकिन वे इस बात को भूल गए कि व्यक्ति को तो मारा जा सकता है, पर उसकी विचारधारा का कैसे अंत किया जाएगा? विचारधारा तो नहीं मरती। समय के साथ वह और भी मजबूत और प्रासंगिक होकर उभरती है।

आज़ादी मिलने के बाद हमारे देश के शासकों ने पूरी कोशिश की कि नई पीढ़ी को भगत सिंह और उनके क्रांतिकारी साथियों के बारे में कम से कम बताया जाए। उनके असली विचारों को जनता से छिपाया जाए। शासक वर्ग ने भगत सिंह को ‘शहीदे आजम’ घोषित कर दिया और उनकी तस्वीरों पर फूलमाला चढ़ाई जाने लगी। उन्हें किसी अवतार की तरह स्थापित किया जाने लगा। पर विचारधारा को छुपाना या दबाना संभव नहीं है। विचारधारा तो एक ऐसी आग़ है जो निरंतर सुलगती रहती है। आज जब भगत सिंह से संबंधित तमाम दस्तावेज़ सामने आ चुके हैं, तो पता चलता है कि भगत सिंह की विचारधारा कितनी गहन और गंभीर थी तथा उतनी कम उम्र में उन्होंने कितना व्यापक अध्ययन और कितना गहरा चिंतन किया था।

भगत सिंह ने लिखा ही था कि क्रांति कोई आसान चीज़ नहीं है। उन्हें इस बात का अहसास जरूर रहा होगा कि क्रांतिकारी ताकतों की कमजोरी के कारण देश पर पूंजीपतियों का राज कायम हो जाएगा। गोरे अंग्रेज़ काले अंग्रेज़ों को सत्ता सौंप कर चले जाएंगे और भविष्य में उन्हें कैसे लूटना जारी रखें, इसका इंतज़ाम करके जाएंगे। हुआ भी यही। यहां से जाने से पहले अंग्रेज़ों ने देश का विभाजन कर दिया जो दुनिया के आधुनिक इतिहास की सबसे त्रासद घटना मानी जाती है। अपने लूट का साम्राज्य कायम रखने के लिए अंग्रेज़ों के लिए यह जरूरी था कि वे देश के दो टुकड़े कर दें। इसके लिए बाकायदा साजिश रची गई।

ब्रिटिश साम्राज्यवादी अपने मकसद में कामयाब हो गए। देश को आज़ादी नहीं मिली, वरन् सत्ता का हस्तांतरण हुआ। किसी तरह का कोई व्यवस्थगत बदलाव नहीं हुआ। सेना, पुलिस, अदालत, कानूनी ढांचा, सब पहले की तरह ही बरकरार रहा।

अंग्रेज़ों ने इस देश को अंतिम हद तक लूटा था। उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को खोखला बना दिया था। परिणामत: आज़ादी मिलने के बाद देश के शासकों को कर्ज लेने के लिए अमेरिका और सोवियत संघ जैसी महाशक्तियों के आगे हाथ फैलाना पड़ा।

जनवाद के आवरण में जनता की लूट-खसोट जारी रही। गत सदी के आखिरी दशक में सोवियत संघ का अवसान हो जाने के बाद अमेरिका दुनिया भर में अपनी दादागिरी दिखाने लगा। उसने एकध्रुवीय विश्व की घोषणा कर दी। अमेरिका के दबाव में भारत के शासकों ने नई आर्थिक नीति अपना ली जो पूरी तरह साम्राज्यवादियों और बड़े पूंजीपतियों के पक्ष में थी। इस नीति के अपना लेने के बाद सरकार ने जनकल्याण की मामूली यानी ऊंट के मुंह में जीरे के समान योजनाओं से भी मुंह मोड़ लिया। हर चीज का निजीकरण किया जाने लगा। जनता के पैसे से खड़ी की गई पब्लिक सेक्टर की कंपनियों को कौड़ियों के मोल देशी और विदेशी पूंजीपतियों के बेचा जाने लगा। देशी-विदेशी पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए सरकार ने किसानों की ज़मीन का जबरदस्ती अधिग्रहण करना शुरू कर दिया, जिसका भारी विरोध हुआ। देश की अपार खनिज संपदा पर विदेशी साम्राज्यवादी कंपनियों की नज़र लगी हुई थी। उस संपदा की लूट की खुली छूट उन्हें देने के लिए सरकार ने पहाड़ों और जंगलों से आदिवासियों को बेदखल करना शुरू कर दिया। इसका भारी विरोध हुआ और हो रहा है, पर सरकार दमन की नीति पर चल रही है।

यह व्यवस्था अब इतनी सड़ांधपूर्ण हो चुकी है कि इसमें सारी चीजें बिकाऊ माल बन कर रह गई हैं। शिक्षा का खुला व्यापार हो रहा है। स्वास्थ्य सुविधाओं का भी वही हाल है। बड़े-बड़े अफ़सरों और मंत्रियों ने ग़रीब जनता का धन लूट कर अरबों रुपए बना लिए हैं। इस व्यवस्था में न्याय भी बिक रहा है। कृषि व्यवस्था इतनी बदहाल हो चुकी है कि देश के लाखों किसान कर्ज के मकड़जाल में फंस कर आत्महत्या कर चुके हैं।

भगत सिंह ने तमाम समस्याओं की जड़ पूंजीवादी व्यवस्था को माना था। यह व्यवस्था भांति-भांति के मुखौटे लगा कर जनता को गुमराह करने की कोशिश करती है। यह स्वतंत्रता और जन कल्याण का झूठा राग अलापती है। पर वास्तव में, हृदयहीन और निर्मम होती है। भगत सिंह के विचारों से इस बात को समझा जा सकता है कि इस व्यवस्था में मनुष्यता का कोई भविष्य नहीं है।

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