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खुद को छुपाऊँ कहाँ / कहानी / गीता दुबे

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- उज्ज्वला, आज का अखबार पढ़ा तुमने? हरियाणा में आठ वर्ष की बच्ची के साथ बलात्कार वाली खबर...मुझे तो लगता है 16 दिसंबर की रेप कांड के बाद बलात्कार की घटनाएं और बढ़ गई हैं, चाय की चुस्की लेते हुए देवांशी ने उज्ज्वला से कहा.

- नहीं देवांशी, मुझे ऐसा बिल्कुल नहीं लगता, बलात्कार की घटनाएं पहले भी हुआ करती थीं लेकिन बंद दरवाजों के भीतर बंद ही रह जाती थीं, महिलाएँ शर्म के मारे कुछ बोलती न थी, चुप रह जाती थी. अब ऐसा नहीं है, जागरूकता आई है, अपने पर हो रहे अत्याचार को महिलाएँ खुलकर बोल रहीं हैं और खबर आग की तरह फैल जाती है-- उज्ज्वला ने चाय के प्याले को मेज पर रखते हुए कहा.

- मैं तुझसे सहमत नहीं हूँ उज्ज्वला, यह कलयुग है कलयुग, नहीं तो क्या आठ वर्ष की बच्ची के साथ... छी छी छी... मुझे तो घिन आती है पुरुषों से. सभी पुरुष एक जैसे होते हैं, महिलाओं को बस एक ही नजर से देखते हैं.

- नहीं देवांशी, सभी पुरुष एक जैसे नहीं होते. कुछ मुट्ठी भर लोगों  की वजह से पूरे पुरुष समाज को दोषी मानना गलत है. हमारा देश ऋषि- मुनियों का देश रहा है, बड़े-बड़े साधु संत हमारे देश में ही हुए हैं, क्या वे पुरुष नहीं थे?

- फिर तू चली गई रामायण काल में, किसने देखा है उन ऋषियों को बता? वे सब कल्पनाएँ है, यथार्थ में रहना सीख उज्ज्वला और यथार्थ यह है कि आज आठ वर्ष की बच्ची से लेकर सत्तर साल की महिला तक के साथ बलात्कार हो रहे हैं. फिर कुछ रूककर देवांशी ने कहा, अच्छा छोड़ उज्ज्वला यह टॉपिक खत्म होने वाली नहीं है, कल संडे है अतुल और बच्चों को लेकर आ जा घर पे, सारा दिन साथ बिताएंगे.

- नहीं देवांशी कल तो पॉसिबल नहीं है, इस संडे हम अपने ग्रीन अर्थ वाले फ्लैट में शिफ्ट हो रहे हैं, अतुल ने सुबह दस बजे मूवर्स एंड पैकर्स को बुलाया है. अगली संडे तू ही आ जाना भाई साहब और ऋचा को लेकर मेरे नए फ्लैट में.

- ठीक है फिर हम ही पहुँचते हैं तेरे नए फ्लैट ... कहकर देवांशी चली गई.

  उज्ज्वला अतुल और बच्चों के साथ अपने नए फ्लैट में शिफ्ट हो चुकी थी. चार बजते बजते मूवर्स एंड पैकर्स का ट्रक सारा सामान लेकर उनके फ्लैट पहुँच चुका था. वह और अतुल  सामान उतरवा रहे थे और उतनी ही जिम्मेदारी के साथ रामधन भी सामान उतरवाने और रखवाने में उनकी मदद कर रहा था.

- जरा संभाल के, इसमें नाजुक सामान है— रामधन ने सामान का बॉक्स रखवाते हुए उस व्यक्ति से कहा फिर अतुल को आवाज लगाते हुए कहा,

- साहब, यह बॉक्स बड़ा भारी है इसे किस कमरे में रखवा दू?

- हाँ, उसे मास्टर बेड रूम में रखवा दो. रामधन सारा सामान ऊपर आ चुका?

- जी साहब, ठीक है साहब चलता हूँ

- रुको, रुको रामधन यह लो ... अतुल ने रामधन को 100 रुपए देते हुए कहा, भई बहुत काम किया तुमने रामधन, यह रखो. इतने में उज्ज्वला वहां आ टपकी और रामधन से बोली-

- बाबा, एक कामवाली बाई खोज दीजिए न हमारे लिए.

- ठीक है मेमसाहब, कहकर रामधन चला गया.

उस सोसाईटी में कुल आठ ब्लाक थे, A- ब्लॉक, B- ब्लॉक, C- ब्लॉक, D…. उनका फ्लैट C- ब्लॉक के थर्ड फ्लोर पर था. रामधन वहां का सिक्यूरिटी गार्ड था. हमेशा मेन गेट पर तैनात मिलता, उम्र 56-57  के बीच होगी, पांच फीट सात या आठ इंच से ज्यादा लम्बाई नहीं होगी, थुलथुला शरीर, पैंट पर लगा बेल्ट निकली तोंद पर टिक नहीं पाता और सरक कर नाभि के नीचे आ जाता. घनी सफेद मूछें, चेहरे पर एक अजीब आध्यात्मिक शांति, देखकर ऐसा लगता मानो किसी ने जबरन उसे सिक्यूरिटी गार्ड का यूनिफार्म पहना दिया हो. उज्ज्वला के फ्लैट में दो बालकनी थे. एक आगे की ओर और एक पीछे की ओर, किचन से सटी हुई. पिछली बालकनी से मेन गेट पर साफ साफ नजर पड़ती थी जहाँ हमेशा रामधन मुस्तैद  मिलता.

- यह सिक्यूरिटी गार्ड बड़ा अच्छा लगा मुझे, इसी ने सारा सामान रखवाया, मैंने तो कुछ किया ही नहीं---- सोफे पर बैठते हुए अतुल ने उज्ज्वला से कहा.

- मुझे भी अच्छा लगा, मुझे तो इसे देखकर इसके प्रति आदर का भाव आता है, अच्छा किया तुमने उसे पैसे दे दिए, बेचारा खुश हो गया होगा.

- हूँ देखने से बड़ा शांत लगता है, अतुल ने धीरे से कहा.

अगली सुबह रामधन एक कामवाली बाई को साथ में लेकर उनके घर आया.

- मेमसाहब यह आपके यहाँ काम करना चाहती है, शान्ति नाम है इसका, रामधन ने शान्ति की ओर इशारा करते हुए उज्ज्वला से कहा.

कामवाली बाई को देखकर उज्ज्वला ने चैन की सांस ली और रामधन से बोली,

- थैंक यू सो मच बाबा, बाबा अब एक और काम कर दीजिए, एक गाड़ी धोने वाले की व्यवस्था कर दीजिए.

- ठीक है मेमसाहब हो जाएगा, कहकर रामधन चला गया और अगले दिन एक गाड़ी धोने वाले को लेकर हाजिर हुआ.

   उज्ज्वला और अतुल को अपने नए फ्लैट में आए हुए दो महीने से ज्यादा हो चुके थे. अब वे पूरी तरह से वहां सेट हो चुके थे. बच्चों को स्कूल और अतुल को ऑफिस भेजकर उज्ज्वला फटाफट लंच तैयार कर लेती और फिर अपनी फेवरेट पुस्तक लेकर पिछली बालकनी में बैठ पति और बच्चों के आने का इन्तजार करती रहती. उस दिन भी वह अपनी पुस्तक में खोई हुई थी कि यकायक मधुर आवाज ने उसका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया....

‘ हंसी हंसी पनवा खीयल  ...

उज्ज्वला ने नजरे दौड़ाई तो देखा, रामधन राग छेड़े हुए है. उज्ज्वला को देखते ही वह चुप हो गया. उज्ज्वला ने वहीँ से आवाज लगाई,

- बाबा एक बार और .. बाबा एक बार और..

रामधन फिर शुरू हो गया,

‘हंसी हंसी पनवा खीयल बेइमनवा….

और उज्ज्वला खड़ी हो गाने का आनंद लेती रही. फिर तो रामधन जब भी उज्ज्वला को बालकनी में देखता, कुछ न कुछ राग छेड़ ही देता. उज्ज्वला कभी तो रूककर सुनती और कभी व्यस्त होने के कारण न भी सुन पाती.

  आज शांति काम खत्म कर जब जाने लगी तो उसने उज्ज्वला से कह दिया था कि किचन का नल खराब है, बहुत मुश्किल से उसे उसने बंद किया है, प्लंबर से दिखवा ले लेकिन यह बात उज्ज्वला के दिमाग से उतर चुका था और जैसे ही किसी काम से उसने किचन का नल खोला पानी हरहरा कर गिरने लगा और बंद होने का नाम ही नहीं ले रहा था. उज्ज्वला ने तुरंत पलम्बर को फोन लगाया लेकिन पलम्बर ने फोन नहीं उठाया. उज्ज्वला दौड़ी दौड़ी रामधन के पास गई. रामधन उस समय खाना खा रहा था, उज्ज्वला ने एक नजर उसके टिफिन पर डाला तो देखा उसकी टिफिन में सिर्फ सादी रोटी और आम का अचार था जिसे रामधन बड़े प्रेम से खा रहा था. रामधन बीच में ही खाना छोड़कर उज्ज्वला के साथ चल पड़ा, और फिर उसने नल को कुछ इस तरह घुमाया कि नल बंद हो गया. रामधन जाने लगा तो उज्ज्वला उसे एक कटोरी सब्जी थमाते हुए बोली,

- बाबा इसे लेते जाइए, यह आपके लिए है, फिर उसने कहा बाबा आप तो बड़ा अच्छा गाते हैं, बड़ा मधुर कंठ है आपका.

रामधन मुस्कुराते हुए चला गया. अगले दिन उज्ज्वला ने फिर रामधन को बुलाकर सब्जी  दी और उससे कहा कि वह हर रोज आकर सब्जी ले लिया करे. उज्ज्वला हर रोज उसे सब्जी  या दाल या कढ़ी, कुछ न कुछ उसे दे दिया करती.

उस रोज रामधन को देखते ही उज्ज्वला ने हैरान होकर कहा,

- यह क्या बाबा आप ने मूछें कलर करवा ली? काली मूंछे तो बिलकुल अच्छी नहीं लग रहीं है, सादी मूंछें ही अच्छी लगती थीं.

- ठीक है, आप कहती हैं तो अब नही कलर करूँगा.   

- अरे नहीं नहीं बाबा आप कलर करना चाहें तो कर सकते है, मैंने तो बस यूँ ही कह दिया, रामधन को दाल की कटोरी देते हुए उज्ज्वला ने कहा. कटोरी लेते समय रामधन की निगाह उज्ज्वला के बाएं हाथ के अंगूठे पर पड़ी जिसपर उज्ज्वला ने पट्टी बाँध रखी थी. रामधन ने चिंता जताते हुए उज्ज्वला से पूछा,

- मेमसाहब यह क्या हो गया आपको?

- कुछ नहीं, सब्जी काटते वक्त चाकू से अंगूठा कट गया.

- गहरी कटी है मेमसाहब?

- नहीं, नहीं बस थोड़ी सी

- बहुत खून निकला होगा?

- अरे नहीं बाबा,

- शान्ति से क्यूँ नहीं कहती सब्जी काटने के लिए... अपना ख्याल रखियेगा मेमसाहब

- हा हा हा हा अरे बाबा जरा सा अंगूठा ही तो कटा है... कौन सी बड़ी बात हो गई....हा हा हा

रामधन के चले जाने के बाद उज्ज्वला काफी देर तक रामधन की बातें याद कर हंसती रही, मुस्कुराती रही, रामधन ने मुझे ऐसा क्यूँ कहा... क्या जरुरत थी उसे मुझे सलाह देने की... रोज उसका हाल-चाल पूछ लेती हूँ तो क्या वह मुझे अपनी बराबरी का समझने लगा है... नहीं ऐसा तो नहीं लगता... वह अपनी औकात जानता है...मेमसाहब, मेमसाहब कहकर ही पुकारता है... बड़ा स्वाभिमानी है, कुछ लेना नहीं चाहता...वो तो मैं उसे बुलाकर देती हूँ...अरे क्या हुआ उसने सलाह दे दी तो ... बुजुर्ग है ... मन में आया कह दिया ... कौन सी बड़ी बात हो गई ... मैं भी न बस यूँ ही फालतू बातें सोचती रहती हूँ.

      अगले महीने अतुल के भाई विपुल की शादी है, उज्ज्वला परिवार सहित दस दिनों के लिए शादी               में शरीक होने चली गई. रामधन ने जब घर पर ताला देखा तो बेचैन हो चला. हर रोज उनकी कामवाली बाई शान्ति, जो उस सोसाइटी में दूसरे के घर काम करने आया करती थी, उसे रोककर पूछता – कहाँ गई है तेरी मालकिन? कब वापस आएगी? और उनके फ्लैट की ओर ताकता रहता. दस दिनों बाद विवाह समारोह में शामिल होकर वे लोग वापस लौट आए. शान्ति ने उज्ज्वला से कहा कि,

- मालकिन आप लोग नहीं थीं न तो ये सिक्यूरीटी गार्ड तो मुझे आपलोगों के बारे में पूछ- पूछकर परेशान कर देता था.

- अच्छा! क्या पूछता था बाबा? उज्ज्वला ने हँसते हुए कहा.

- कब आएगी, तुम्हारी मालकिन कब आएगी?

- वो इसलिए शान्ति कि मैं हर रोज उसे सब्जी या दाल दिया करती थी, इतने दिन तो उसे  रुखा खाना ही खाना पड़ता होगा न, इसलिए मुझे याद कर रहा होगा, मैंने ही उसकी आदत खराब कर दी है.

- बड़ा लालची है बुड्ढा -- शान्ति ने हँसते हुए कहा.

- शान्ति जाते समय कुछ मिठाइयाँ, दालमोठ और फल लेती जाना घर के लिए, अम्मा ने इतनी सारी मिठाइयाँ और फल रखवा दी हैं कि न बाटूँ तो दो दिन में सारे खराब हो जाएँगे. और हाँ वो रामधन को भी भेज देना, उसे भी कुछ दे दूंगी.

- ठीक है मालकिन – कहकर शान्ति चली गई.

कुछ ही देर में रामधन थैला लेकर हाजिर हो गया. उज्ज्वला को देखते ही बोल उठा

- मेमसाहब आपलोग नहीं थीं न तो बड़ा सन्नाटा लग रहा था.

- हाँ बाबा घर में शादी थी, यह लीजिए शादी की मिठाइयाँ, दालमोठ और कुछ फल. आप भी खाइए और अपने परिवार को भी खिलाइए, फिर उज्ज्वला ने रामधन से कहा,

- जरा थैला को खोलिए बाबा मैं सारी चीजें उसमें डाल देती हूँ.

रामधन ने दोनों हाथों से थैला पकड़ा था और उज्ज्वला थैले में एक –एक कर मिठाइयाँ, दालमोठ और फल डाल रही थी. रामधन की मुस्कुराती निगाहें उज्ज्वला के चेहरे से हटकर गले से उतरते हुए उसके सीने पर जा टिकीं. उज्ज्वला ने रामधन की भेदती नजरों को भाप लिया ... क्या करूँ...खुद को कहाँ छुपा लूँ... क्या करूँ... क्रोध और अपमान की ज्वाला में जलती उज्ज्वला ने जोर के झटके से दरवाजा बंद कर लिया ... सभी मर्द एक जैसे होते हैं...पर स्त्री को बस एक ही नजर से देखते हैं.

मामूली सा सिक्यूरिटी गार्ड रामधन, जिस बेचारे के प्रति उज्ज्वला के मन में सहानुभूति और श्रद्धा का भाव था, आज उसने उज्ज्वला को अपने मर्द होने का परिचय दे दिया.

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गीता दुबे

जमशेदपुर, झारखंड         

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