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बुरे लोगों को न मानें रोल मॉडल - डॉ. दीपक आचार्य

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जबसे इंसान अपने मौलिक लक्षणों और इंसानियत के गुणधर्म से बेखबर होने लगा है तब से वह अनुकरण और अंधानुकरण को अपनाने लगा है।

आदर्शों और सिद्धान्तों से बेपटरी हुए सारे के सारे लोग यही तो कर रहे हैं। जो लोग जीवन मूल्यों और शाश्वत मर्यादाओं से अनभिज्ञ हैं उन्हें पता ही नहीं है कि वे पैदा क्यों हुए हैं, और उनके जीवन का लक्ष्य क्या है।

अधिकांश की जिन्दगी ऎशा-आराम करना और पैसे की नॉन स्टॉप मशीन से अधिक कुछ नहीं है। जहाँ न बचपन का आनंद है, न प्रौढ़ावस्था और बुजुर्गियत का।

आदमी मशीन की तरह आने और जाने लगे हैं। कोई कबाड़ जमा कर जाता है, कोई भोग-विलास के उन्मुक्त पोखरों में नहाता हुआ।

हम जिसे ज्ञान और अनुभव कह रहे हैं वे गलियारों से ज्यादा कुछ नहीं। हमारे सर्वांग व्यक्तित्व विकास के सभी पक्षों का नीर-क्षीर मूल्यांकन किया जाए तो यही सामने आएगा कि हम किसी एक या दो विषयों के बारे में ही कुछ-कुछ जानकारी रखते हैं और वह भी इतनी कि इसका इस्तेमाल कर हम अपनी झोली भरने लायक जुगाड़ कर सकें।

भारतीय जीवन मूल्यों और लोक व्यवहार की परंपरा के अनुरूप जीवन निर्माण अपना भी कल्याण करता है और सृष्टि के लिए भी कल्याणकारी सिद्ध होता है। जीवन केवल अपने ही लिए नहीं, जगत भर के लिए है।

जो इस भावना से काम करता है उसका जीवन परोपकारी और पुण्यदायी हो जाता है । फिर ऎसे इंसान के लिए पूरा जगत अपना होता है।

जो लोग अपने आप में सिमटे हुए हैं, जो पुरुषार्थहीन और अनैतिक हैं, हराम की कमाई और खान-पान से अपने शरीर को बना रहे लोगों की आयु, धन-सम्पत्ति, प्रभाव और लोकप्रियता चाहे कितनी अधिक हो जाए, कितने ही पूजे जाने लगें लेकिन इन लोगों के भीतर से आत्म तत्व का क्षरण हो जाता है और व्यक्तित्व कलंकित होने लगता है।

आम तौर पर लोग पूंजीपतियों और प्रभावशालियों को ही सफल मानते हैं लेकिन इसके पीछे कि असलियत उन्हें पता नहीं होती इसलिए बाहरी चमक-दमक को ही आदर्श मानकर उनका अंधानुकरण करना शुरू कर देते हैं।

फिर समाज की स्थिति बड़ी विचित्र हो गई है। जो दुष्ट, नालायक और राक्षसी लोग हैं उनके प्रभाव में आकर दूसरे लोग भी उन्हें अपना रोल मॉडल समझने लगते हैं, उनके आगे-पीछे घूमने लगते हैं, उनकी हर गतिविधि का अनुकरण करना शुरू कर देते हैं।

इन लोगों की संख्या बढ़ने की वजह से श्रेष्ठीजन अब चुप रह जाते हैं अन्यथा कुछ दशक पहले तक बुरे को बुरा कहने का साहस लोगों में था जिस कारण से सभी को यह पता रहता था कि क्या बुरा है और क्या अच्छा है।

जीवन में भोग-विलास, संसाधन और दौलत पा लेना सफलता का लक्षण नहीं है, न इसे लक्ष्मी की प्रसन्नता ही माना जा सकता है।  ऎश्वर्य का संबंध आनंद से है जिसमें जो वस्तु अपने पास है उसका अनिर्वचनीय आनंद प्राप्त हो, मन मे प्रसन्नता रहे, उद्विग्नता, असन्तोष और हड़बड़ी का नामोनिशान न रहे, चित्त में परम प्रसन्नता का भाव हो,मस्तिष्क शांत हो, शरीर स्वस्थ और मस्त हो, तथा अपने पास आने वाले हर इंसान को आनंद का अनुभव हो, तभी माना जा सकता है कि एक इंसान के रूप में हम सफल हैं।

हमारे आस-पास से लेकर दुनिया भर में बहुत से लोग हैं जिनके पास अनाप-शनाप पैसा है, सारे भोग-विलासी उपकरण और आनंद देने वाले कारक मौजूद हैं, पद-प्रतिष्ठा, लोकप्रियता और सब  कुछ है मगर इनके चेहरों पर प्रसन्नता नहीं है, शक्ल और सूरत मलीन है, मन काले हैं और मस्तिष्क में खुराफातों के जाने कितने महासागर रोजाना ज्वार-भाटा करते रहते हैं। इस हालत में वह सब नाकारा और व्यर्थ है जिसके बल पर हम अपने आपको अहंकार के गुब्बारों के साथ फूले नहीं समा रहे हैं।

हमसे अच्छे तो वे गरीब लोग हैं जो कम से कम संतोषी हैं और हमेशा उनके चेहरों पर हंसी-खुशी दिखाई देती है। बहुत से लोग बड़े कहे जाते हैं मगर श्वानों, लोमड़ों और सूअरों से भी ज्यादा खराब हैं। ये कहीं दिख भी जाते हैं तो लगता है किसी की शोक सभा में मुँह लटकाए बैठे हों।

ऎसी भी क्या जिन्दगी जहां हम अपने आपको इतना बड़ा मान लें कि हंसी-खुशी और आत्मिक आनंद हमसे कोसों दूर चला जाए। अपने आपके लिए मौलिक चिन्तन करें और व्यक्तित्व को ऎसा बनाएं कि जो खुद भी प्रसन्नता का ज्वार उमड़ाने वाला हो तथा सृष्टि की भलाई के काम आने वाला हो।  कबाड़ियों और  सदा शोकाकुलों, महाविधुरों और महाविधवाओं की तरह हर क्षण शोकमग्न न रहें।

व्यक्ति की बजाय विचारों और आदर्शों का अनुगमन करें। तभी जीवन को सुखी, समृद्ध एवं शाश्वत आनंद देने वाला बनाया जा सकता है।

- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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