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प्रेरक भारतीय वैज्ञानिक : अरदासिर कुरसेत्जी / अरविन्द गुप्ता

अतीत के

प्रेरक भारतीय वैज्ञानिक

 

अरविन्द गुप्ता

 

चित्रांकनः कैरन हैडॉक

 

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अरदासिर कुरसेत्जी

(1808 . 1877)

बहुत कम भारतवासियों ने ही अरदासिर कुरसेत्जी का नाम सुना होगा। बहुत कम लोग इस बात से अवगत होंगे कि बम्बई का यह मरीन इंजिनियर 27 मई 1841 को रॉयल सोसायटी का पहला भारतीय सदस्य बना। रॉयल सोसाइटी की अगली फेलोशिप 75 वर्ष बाद प्रख्यात गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन को प्रदान की गई।

अंग्रेजी शासक भारत में अपने व्यापारिक और राजनैतिक प्रभुत्व को कायम रखना चाहते थे। इसके लिए उन्होंनें विज्ञान और उभरती नई तकनीकों का सहारा लिया। उन्होंनें भाप-चलित जहाजों द्वारा इंग्लैंड और भारत के बीच यात्रा के समय को कम किया। रेल और टेलीग्राफ का ताना-बाना बुनकर अंग्रेजों ने कानून और व्यवस्था की पकड़ और मजबूत की। संचार के इन माध्यमों से लगान और टैक्स की वसूली भी ज्यादा हुई। मुट्ठी भर अंग्रेजों के लिए इतने बड़े हिंदुस्तान को नियंत्रण में रखना एक असंभव कार्य था। यह काम हिंदुस्तानियों की मदद के बिना कर पाना नामुमकिन था। शुरु में अंग्रेजों ने कुछ हिंदुस्तानियों को नौकरियां दी - उद्देश्य साफ था - हिंदुस्तान और उसकी जमीं को समझना। बाद में अंग्रेजों ने क्लर्की और मुंशीगिरी की ट्रेनिंग देने के लिए कुछ स्कूल भी स्थापित किए। इस नई शिक्षा से कुछ भारतीयों में राष्ट्रीय मुक्ति की भावना भी जागृत हुई।

कुरसेत्सी के परिवार ने एक लम्बे अर्से से अंग्रेजों की जहाज बनाने में मदद की थी। उनके एक पुरखे लाओजी नुसरवानजी (वाडिया) सूरत के बन्दरगाह में बढ़ई थे। बाद में अंग्रेज उन्हें नए बन्दरगाह का निर्माण करने के लिए बम्बई लाए। शुरु में अंग्रेज जहाजों के निर्माण के लिए बांझ (ओक) के पेड़ों का उपयोग करते थे। परंतु तेजी से फैलते ब्रिटिश साम्राज्य में जल्द ही ‘ओक’ के पेड़ों का सफाया हो गया। उन्हें ‘ओक’ का विकल्प ‘मलाबार टीक’ में मिला। टीक यानी सागौन की लकड़ी मजबूत होती है और पानी में सड़ती नहीं है। प्रचुर मात्रा में सागौन और कुशल बढ़ईयों की उपलब्धता के कारण बम्बई जहाज बनाने के प्रमुख केन्द्र के रूप में उभरा। जहाज बनाने के काम में लगे कुरसेत्जी परिवार को बहुत प्रतिष्ठा मिली।

उन्नीसवीं शताब्दी के शुरुआत में स्टीम-चलित जहाजों का उद्गम हुआ। लगभग उसी समय कुरसेत्जी का भी जन्म हुआ। कुरसेत्जी की रुचि जहाज निर्माण में कम परंतु स्टीम-चलित मशीनों में ज्यादा थी। उन्होंने जल्द ही 1-हार्सपॉवर के इन्जन का निर्माण कर अपनी कुशलता का परिचय दिया। यह भारत में बना पहला इन्जन था। 1833 में कुरसेत्जी ने इंग्लैंड से एक 10-हार्सपॉवर का इन्जन मंगाया और उसे ‘इंड्स’ नाम के जहाज में फिट किया। उसी साल उन्हें मझगांव बन्दगाह में नौकरी मिली। कुरसेत्जी ने अपने घर पर लोहा ढलाई की एक छोटी ‘फाउंड्री’ स्थापित की। यहां वो जहाजों की टंकियां ढालते थे।

उनका अगला करिश्मा था - गैस से जलने वाली सड़क बत्ती का निर्माण। 1834 में कुरसेत्जी ने मझगांव स्थित अपने बंगले और बगीचे को गैस की बत्तियों से रोशन किया।

जल्द ही उन्हें ‘प्रैक्टिकल’ क्लासेस लेने के लिए एलीफेंस्टन इंस्टिट्यूट में बुलाया गया। उन्होंने वहां भारतीय छात्रों को यांत्रिकी और रासायनिक विज्ञान सिखाया। तीन साल बाद वो इंग्लैंड स्थित रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के अप्रवासी सदस्य चुने गए।

कुरसेत्जी ने अब एक साल इंग्लैंड में गुजारने की सोची। वहां वो पानी के जहाजों में लगने वाले इंजनों की नवीनतम जानकारी हासिल करना चाहते थे। इस यात्रा में कुरसेत्जी अपने नौकरों को भी साथ ले गए क्योंकि वो केवल पारसियों के हाथ का पका खाना ही खाते थे। धार्मिक मामलों में कुरसेत्जी काफी कट्टरवादी थे। इंग्लैंड में उन्हें एक नौजवान पारसी मिला जो पारसी टोप नहीं पहने था। कुरसेत्जी को यह बात आपत्तिजनक लगी। इंग्लैंड में कुरसेत्जी को वहां की संसद - हॉउस ऑफ कॉमन्स की बैठक में भी आमंत्रित किया गया। व्यस्त रहने के बावजूद कुरसेत्जी लंदन से ज्यादा प्रभावित नहीं हुए। इंग्लैंड की रॉयल टकसाल उन्हें बम्बई की टकसाल की तुलना में कहीं गई-गुजरी लगी। उन्हें बम्बई की तुलना में लंदन की सड़कें भी ज्यादा गंदी लगीं।

व्यवसासिक शिक्षण के लिहाज से कुरसेत्जी का यह दौरान बहुत सफल रहा। वो कई ब्रिटिश नामी-गिरामी संस्थाओं के सदस्य भी बने जिनमें - इंस्टिट्यूशन ऑफ सिविल इंजिनियर्स, सोसाइटी ऑफ आट्ॅस एन्ड साइन्स और ब्रिटिश एसोसिएशन फॉर द एडवांसमेंट ऑफ साइन्स शामिल थीं। वापस लौटने पर कुरसेत्जी की नियुक्ति अंग्रेजों की स्टीम कम्पनी और फाउंड्री में, चीफ इंजिनियर और इंस्पैक्टर के पद पर हुई। उनकी तनख्वाह अब 600 रुपए महीना थी, जो पहले की तनख्वाह से छह गुना ज्यादा थी।

1841 में जब कुरसेत्जी इंग्लैंड में थे तब उन्हें प्रख्यात रॉयल सोसाइटी की फेलोशिप से नवाजा गया। उनका नाम कई प्रभावशाली लोगों ने प्रस्तावित किया। इनमें से दो लोग बाद में इंस्ट्टियूशन ऑफ सिविल इंजिनियर्स के अध्यक्ष बने, एक ईस्ट इंडिया कम्पनी का चेयरमैन बना और एक अन्य रॉयल सोसाइटी का अध्यक्ष बना।

रॉयल सोसाइटी की वर्तमान में छवि, प्रख्यात वैज्ञानिकों के एक संगठन के रूप में है। परंतु बीसवीं शताब्दी के शुरु में रॉयल सोसायटी सम्भ्रांत लोगों का महज एक क्लब था। यह लोग प्रकृति, गणित और इंजिनियरिंग के अलावा ‘प्रायोगिक’ विज्ञान की तमाम शाखाओं में भी रुचि रखते थे। उस समय की मान्यताओं के अनुसार वहां के समाज ने कुरसेत्जी को एक कुशल इंजिनियर और विज्ञान के प्रसारक के रूप में देखा।

रॉयल सोसाइटी की सदस्यता कुरसेत्जी के लिए महज एक व्यक्तिगत उपलब्धि ही रही। इस खिताब से न तो उनके देशवासी प्रभावित हुए और न ही उनकी कोई पेशेवर उन्नति हुर्ई। जब 1 अप्रैल 1841 को कुरसेत्जी भारत लौटे तो कई यूरोपीय अफसर उनके अधीन थे। कुरसेत्जी पहले भारतीय थे जिनके नीचे गोरे लोगों ने काम किया। उनके स्टाफ में चार गोरे फोरमैन, 100 गोरे बॉयलर-मेकर और इंजिनियर थे। साथ में 200 हिन्दुस्तानी कारीगर भी थे। उनकी नियुक्ति से कई गोरे नाराज भी हुए। अंग्रजों की तरफदारी करने वाले अखबार बॉम्बे टाइम्स ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए लिखा, ‘चाहें वो कितना भी पढ़ा-लिखा और काबिल क्यों न हों फिर भी बॉम्बे स्टीम फैक्ट्री जैसी कम्पनी की कमान एक हिन्दुस्तानी को सौंपना गलत है। एक हिन्दुस्तानी बहुत से यूरोपीय लोगों पर नियंत्रण करे यह बात ठीक नहीं है।’

परंतु कुरसेत्जी ने अपनी इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया। 1849 में कुरसेत्जी अमरीका गए और वहां उन्होंनें लकड़ी का काम करने वाली कुछ मशीनें खरीदीं और उन्हें बम्बई भेजा। उस समय अमरीकी लोग भारतीयों के बारे में क्या सोचते थे वो इस विवरण से स्पष्ट होता हैः

उस समय के विदेशी मेहमानों में हमें सबसे ज्यादा आश्चर्य तब हुआ जब हमारा मित्र एक जीवित पारसी को अपने साथ चाय पर हमारे घर लाया। उसके सिर पर एक ऊंची टोपी थी। मुझे बहुत ताज्जुब हुआ जब उस अग्नि के उपासक ने साधारण लोगों के साथ चाय पीना स्वीकार किया। पर वो कोई हानिकारक शेर नहीं था। वो बहुत हल्के दहाड़ा। उसने औरों के साथ आराम से डबलरोटी मक्खन खाया और चाय भी पी। उसने बम्बई में अपनी जिंदगी के बारे में हमें कई रोचक कहानियां भी सुनाईं। मुझे साफ याद है - वो बहुत धीरे-धीरे और स्पष्ट शब्दों में बोला जैसे कि वो किसी छोटे बच्चे से बात कर रहा हो। उसने हमारे प्रश्नों का उत्तर बहुत सधी हुई आवाज में दिया। उसकी अंग्रेजी हम लोगों की अंग्रेजी से कहीं बेहतर थी।

फरवरी 1851 में कुरसेत्जी ने एक स्टीमर लांच किया जिसका नाम ‘लाओजी फैमिली’ था। स्टीमर का हरेक कल-पुर्जा देसी था और कुरसेत्जी के घर में लगे कारखाने में बना था। बम्बई शहर का परिचय सिलाई मशीन, फोटोग्राफी और एलक्ट्रो-प्लेटिंग से कराने वाले कुरसेत्जी पहले व्यक्ति थे।

1861 में उन्होंने इंड्स फ्लोटिला कम्पनी में चीफ सुपरिंटेंडेन्ट का पद सम्भाला और इस कम्पनी की कोटरी, सिंध स्थित सभी फैक्ट्रियों की बागडोर सम्भाली। फ्लोटिला कम्पनी उस समय भारतीय नौसेना के अधीन थी और 1863 में उसका विघटन हुआ। कम्पनी बन्द होने के बाद कुरसेत्जी ने उससे इस्तीफा दिया और उसके बाद वो रिचमंड, इंग्लैंड में जाकर बस गए जहां 18 नवम्बर 1877 को उनका देहान्त हुआ।

यह आश्चर्य की बात है कि तमाम उपलब्धियों के बावजूद कुरसेत्जी गुमनाम ही रहे। भारतीय वैज्ञानिक शोध का केन्द्र बम्बई से हट कलकत्ता चला गया था। कलकत्ते के लोगों को कुरसेत्जी के काम के बारे में कुछ पता नहीं था। शायद इसी वजह से भारत का पहला आधुनिक इंजिनियर कभी भी हमारे देशवासियों के लिए एक रोल-मॉडल नहीं बन पाया। भारत सरकार ने देश के इस महान पुत्र की स्मृति में एक डाक टिकट अवश्य जारी किया।

(अनुमति से साभार प्रकाशित)

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