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पहचानें इन पागलों को - डॉ. दीपक आचार्य

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पागलों के बारे में कहा जाता है कि हर युग के अनुरूप पागलों का जन्म होता रहता है जो अपनी युगानुकूल अजीबोगरीब हरकतों के कारण उस युग में चर्चित रहते हैं। 

पागलों की कुछ किस्में ऎसी होती हैं जो कि हर क्षेत्र में समान रूप से पायी जाती हैं और इस किस्म के पागलों की संख्या दूसरे सारे पागलों से अधिक हुआ करती है।

वर्तमान युग में पागलों की एक उम्दा किस्म है जिसे हम लोग रोजाना देखते और भुगतते हैं। खासकर हर शहर में इन पागलों की आजकल भरमार है। और बड़ी बात यह कि ये सारे पागल अमीरों और अभिजात्यों की औलादें हैं। 

शहरों में लोग अब चोर-उचक्कों, घोषित पागलों और मच्छरों से उतने परेशान नहीं हैं जितने इन पागलों से। दिन हो या रात, इन पागलों को लगता है जैसे कोई काम ही नहीं है। 

बहुधा ये पागल समूहों में ही रहते हैं और सरे राह धींगामस्ती मचाते रहते हैं। पिछले कुछ समय से शहरों में बाइकर्स की जबर्दस्त धमाल मच रही है। कोई सा रास्ता हो बाइकर्स तेज रफ्तार में सरपट भागते रहते हैं जैसे कि कोई विश्वस्तर की बाईकर्स दौड़ हो रही हो और ये लाडसाहब बहुत बड़ा पुरस्कार जीतने ही जा रहे हों।

इस तरह बाइक भगाते हुए जाते हैं जैसे यह संदेश दे रहे हों कि कोई रोके नहीं, वरना दुनिया के महान खिताबों से वे चूक ही जाएंगे। हमें यह  देखना हो कि अपने इलाके में कौन-कौन लोग हैं जो उन्मुक्त मनोरंजन और बिना मुहूर्त की उपज हैं, वर्णसंकर दोष वाले हैं या किसी न किसी रूप में पागलपन के शिकार हैं, तो इन बाइकर्स को देख लीजियें, अपने आप पता चल जाएगा कि ये बिगडैल औलादें कैसी हैं।

इनके माँ-बाप और घरवाले भी इनके पागलपन से परेशान हैं लेकिन अपनी औलाद या घर वालों को कौन खराब कहे। यह संस्कारहीनता मुखर होकर इनके पारिवारिक संस्कारों, कुटुम्ब की मर्यादाओं और परंपराओं का मखौल उड़ाती रहती है।

जोरों से बाईक भगाते हुए समूहों में बेतरतीब चिल्लाते हुए शोर मचाना, जोरों से हॉर्न बजाते हुए शांति भंग करना और आवारा पशुओं के झुण्ड की तरह तेज रफ्तार भाग-दौड़ करते इन पागलों ने तकरीबन तमाम शहरों में लोगों का जीन हराम कर दिया है।

फिर बहुत से ऎसे हैं जो अपने बाप की हराम की कमाई से दारू पीकर वाहन चलाते हैं। कई स्थानों पर तो यह मनचलों की बारात से कम नहीं होते।  सड़कों पर चलने वाले राहगीरों तक में इस बात की आशंका बनी रहती है कि पता नहीं कब कोई ठोंक जाए और गई कई महीनों तक खटिया में पड़े रहने की, फ्रेक्चर या मौत हो जाए वो अलग।

अब इन पागलों की इस नई बाइकर्स कल्चर ने जन्म ले लिया है जिसका क्या हश्र होगा भगवान जाने। अपने आस-पास भी  ऎसे तेज रफ्तार और चिल्लपों मचाते हुए गुजरने वाले बाइकर्स की धींगामस्ती और आतंक आसानी से दिख जाता है।

यह सब देख कर लगता है जैसे हम संस्कारहीनता के उस भयानक दौर में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ आदमी को देखकर कहीं से नहीं लगता कि आदमी है। कभी वह शैतान की तरह चिल्लाता रहता है, कभी बाइकर्स के रूप में हायतौबा मचाने लगता है, कभी तेज रफ्तार का आनंद लेता हुआ अपने आपको किसी नरपिशाच से कम नहीं समझता।

और अब तो  नए जमाने की लड़कियां भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं। पता नहीं यह संस्कारहीनता हमें कहां ले जाएगी। इन बाइकर्स के माता-पिता और घर वालों की भी जिम्मेदारी है कि इन उन्मादियों को किसी मनोरोग विशेषज्ञ को दिखाएं, समय पर ईलाज करवाएं अन्यथा कहीं ऎसा न हो जाए कि यह मर्ज बढ़ता ही चला जाए और बाद में पछताना पड़े।

इन पागलों पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो देश के लिए बहुत बड़ा खतरा बनकर सामने आ सकते हैं। समय आ गया है कि हम जागरुक रहें और अपनी इस मेधावी पीढ़ी को समझाएं, संस्कारवान बनाएं और इनकी प्रतिभाओं का उपयोग समाज तथा देश के लिए करने में ठोस प्रयास करें।  इनके माँ-बाप के भरोसे न रहें क्योंकि या तो वे भी ऎसे ही होंगे अथवा ये बच्चे उनके नियंत्रण से बाहर होंगे।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

www.drdeepakacharya.com

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