विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

रचना और रचनाकार (६) / अज्ञेय - कविता में उत्तम पुरुष की तलाश / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

रचना और रचनाकार (६)

अज्ञेय - कविता में उत्तम पुरुष की तलाश

डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

आधुनिक हिंदी के महान साहित्यकार, कवि, कथाकार और विचारक सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ’अज्ञेय’ को उनकी जन्म शताब्दी पर हम बहुत श्रद्धा और निष्ठा के साथ स्मरण करते हैं. इस महान रचनाकार ने अपने जीवन काल में ही अपने समकालीन लेखकों/कवियों को बहुत कुछ लिखने और सोचने की दिशा प्रदान की, और आज भी उनसे जानने और सीखने की ज़रूरत हमारे लिए बनी हुई है. अज्ञेय के चिंतन के पीछे मनुष्य और मनुष्यता की मुक्ति का दर्शन था. परम्परा और आधुनिकता का यथार्थ दर्शन यदि हमें जानना और समझना है तो अज्ञेय के ही पास हमें जाना होगा.

अज्ञेय को हम अनेक रूपों में जानते हैं. लेकिन उनका चिंतनशील कवि का रूप सम्भवतः सबसे अधिक आकर्षक रूप है. अपने निबंध, ‘शब्द मौन और अस्तित्व’ में वे एक लेखक आखिर क्यों लिखता है, इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयत्न करते हैं. मुझे लगता है इस सम्बंध में उन्होंने तीन बातें विशेष रूप से कही हैं. एक तो यह कि कला कोई भी हो वह हमें सृजन के लिए, कुछ नया कर दिखाने के लिए, प्रेरणा देती है और इस प्रेरणा से उत्पन्न तनाव हमें सृजन की यात्रा की ओर ढकेल देता है. रचनाकार की रचनाएं इस तनाव को हल करने का प्रयत्न करती हैं. निःसंदेह यह हल अंतिम नहीं हो सकता क्योंकि हर बार नया अनुभव नया तनाव पैदा करता है और इस प्रकार रचनाकार की रचनात्मक यात्रा कभी न समाप्त होने वाली यात्रा बन जाती है.

दूसरे, रचनाकार स्वयं को इस यात्रा में केवल अपने तक ही सीमित नहीं रखना चाहता. उसका सहज ज्ञान उसे यह आस्था देता है कि दूसरों तक पहुँचा जा सकता है. अज्ञेय का विश्वास है कि अन्य लोगों से सम्पर्क स्थापित किया जा सकता है और समालाप सम्भव है. सर्जनात्मक सम्पर्क के लिए भाषा चाहिए, “सही शब्द मिल जाए तो” ऐसे में आंगन के पार द्वार खुल जाते हैं. भवन के ओर-छोर सभी मिल जाते हैं और भवन कहीं खो जाता है. तब कौन द्वारी और कौन अगारी है, कोई नहीं जानता.

यूं तो हम सभी भाषा का उपयोग करते हैं, लेखक भी और अन्य लोग भी, लेकिन साधारण सामाजिक व्यवहार में हम भाषा को निरंतर दूषित और संस्कार-च्युत करते रहते हैं. एक कवि इसी भाषा का अपने ढंग से कुछ इस प्रकार प्रयोग करता है कि वह “नए प्राणों से दीप्त” हो उठे. ऐसा करने के लिए कवि को भाषा पर नहीं, कदाचित शब्द पर अपना ध्यान केंद्रित करना आवश्यक हो जाता है. तभी वह सामान्य भाषा को काव्य भाषा के लिए वेध्य कर पाता है.

कविता के लिए शब्द का नए अर्थों में आविष्कार अज्ञेय की रचनात्मकता को पंख देता है. इतना ही नहीं, वह कविता में शब्दों के बीच नीरवता को भी तोड़ने का प्रयत्न करते हैं. अज्ञेय के अनुसार कविता वस्तुतः भाषा में नहीं होती, वह शब्दों में भी नहीं होती. कविता शब्दों के बीच की नीरवताओं में होती है. कवि अपने सहज बोध से जानता है कि यह नीरवता उसे दूर तक पहुँचा सकती है, इससे संलाप की स्थिति पाई जा सकती है. मौन के द्वारा भी सम्प्रेषण हो सकता है. अज्ञेय अपनी कविताओं में इस प्रकार शब्द के बीच के मौन को तोड़ते हैं और नीरवता को अर्थ प्रदान करते प्रतीत होते हैं.

तीसरे, जिस तरह एक ज़िम्मेदार समाज के सदस्य के नाते कोई भी व्यक्ति स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और मानव व्यक्तित्व की प्रतिष्ठा जैसे बड़े उद्देश्यों की सिद्धि के लिए आग्रहशील और प्रयत्नशील होता है. अज्ञेय का कवि भी अपने इस कर्तव्य से मुक्ति नहीं चाहता. अज्ञेय की कविताएँ भी इन्हीं मूल्यों के लिए आग्रहशील रही हैं और मूल्यों के प्रति कोई भी रोक या नियंत्रण उन्हें गवारा नहीं है. साथ ही किसी भी लेखक या कवि को अज्ञेय अपने परिवेश से असंपृक्त नहीं मानते. उनके अनुसार एक रचनाकार वस्तुतः दो मोर्चों पर अपनी लड़ाई लड़ता है. एक मोर्चा तो मूल्यों की प्रतिष्ठा का है और दूसरा परिवेश के प्रति जागरूकता है. यह जागरूकता उसे अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए साधन और उपकरणों का बोध कराती है. भारतीय समाज के लिए सबसे बड़ा मूल्य वे व्यक्ति की स्वतंत्रता को मानते हैं और अज्ञेय उन साधनों को सतत खोजते हैं जिनसे यह प्राप्त की जा सके. इसे उपलब्ध कर पाना कोई सरल काम नहीं है. हम जिन परिस्थितियों में जी रहे हैं वे भयावह हैं. संकटपूर्ण और अप्रीतिकर हैं. लेकिन जिसने भी और जैसे भी स्वातंत्र्य-उपलब्धि की थोड़ी भी बूंद ऐसी परिस्थितियों में चखी है, वह उसके लिए अनिर्वचनीय है. इस प्रसंग में अज्ञेय मानव-दुर्दशा (प्रिडिकामैंट) से सम्बंधित एक पौराणिक दृष्टांत प्रस्तुत करते हैं. उन्हीं के शब्दों में –

बाघ से बचने के लिए एक मनुष्य पेड़ पर चढ जाता है और उसकी दूरतम शाखा

तक पहुँच जाता है. उसके बोझ से शाखा झुककर उसे एक अंधे कुए में लटका देती

है. ऊपर दो चूहे शाखा को काट रहे हैं. नीचे कुएं में अनेक सांप फुफुकारते हुए

उसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं. इस अत्यंत संकटापन्न स्थिति में वह देखता है कि

कुए की जगत से घास की एक पत्ती उसकी ओर झुकी हुई है और उसकी नोक पर

मधु की एक बूंद कांप रही है. वह जीब बढाकर मधु चाट लेता है – और कितना

सुस्वाद है वह मधु..!

यह मधु वस्तुतः हमारा जीवन है. प्रत्येक ने अलग-अलग ढंग से इस मधु का स्वाद चखा है और मधु के साथ-साथ अपनी अवस्थिति का भी जो मधु के साथ जुड़ी हुई है. महत्व की बात यह है कि इसके प्रति हम जागरूक हों. यह हमारी चेतना में रहे. अज्ञेय इसी चेतना के कवि हैं. व्यक्ति बेशक तमाम तमाम बन्धनों से जकड़ा हुआ है लेकिन साथ ही अपने स्वतंत्र वरण का स्वाद भी लेता है. वह निश्चित ही मृत्यु के मुख में समा ही जएगा पर जीवन का अनिर्वचनीय आस्वादन वह क्यों न करे !

भीतर ही भीतर पत्तों के साथ गलता

और जीर्ण होता रहता हूं

नए प्राण पाता हूं.

अज्ञेय पार्थिव जगत की समग्रता को ग्रहण करते हैं जहां मृत्यु के साथ जीवन भी जुड़ा हुआ है और बंधन से जकड़ी स्थितियों में स्वतंत्रता का आस्वादन भी है. इसीलिए –

भीड़ में

जब-जब जिस-जिस से आंखें मिलती हैं

वह सहसा दिख जाता है

मानव -/अंगार सा – भगवान सा

अकेला.

अज्ञेय की तलाश यही अकेला अंगार सा, भगवान सा मानव है. ऐंठी मिट्टी का स्निग्ध धाम में धीरे-धीरे रिसना, सन्नाटे की बांक नदी की जगी चमक, भीतर की किरण, मानव को भाप बना कर सोखने वाला मानव का रचा हुआ सूरज, चिड़िया के उड़ जाने पर पत्ती का कांपना –ये सभी बिम्ब इसी अकेले मानव की ओर ही तो संकेत करते हैं. पर इतना ही नहीं, अज्ञेय इस उत्तम-पुरुष को अंततः अन्य-पुरुष में विसर्जित भी कर देना चाहते हैं.

यह दीप अकेला स्नेह भरा

है गर्व भरा मदमाता, पर

इसको भी पंक्ति को दे दो

अज्ञेय पर प्रायः अहंवादी होने का आरोप लगा है. लेकिन सच तो यह है कि वे अहं –नाश से रचनात्मकता की ओर उन्मुख हो जाते हैं. वे उत्तम-पुरुष और अन्य-पुरुष की स्थिति में विरोध न देखकर इन दोनों की एकता में अनेकता भी विसर्जित न हो, इसका भी ध्यान रखते हैं, ‘मै अनन्य /एकाकार /जैसे प्यार’

उनका ‘मैं’ अन्य के लिए बाधक नहीं है. साधक ही है –ठीक उसी तरह जैसे अन्य की धूप को (अर्थात्, लोक-जीवन के प्रकाश को) वह समय-समय पर आमंत्रित करते दिखाई देते हैं.

अज्ञेय को विद्वेष पसंद नहीं है. वह चाहे उत्तम-पुरुष और अन्य-पुरुष के बीच हो, चाहे शब्द और सत्य के बीच हो. ‘अरी ओ करुणा प्रभामय’ में वे कहते हैं-

कवि जो होंगे हों, जो कुछ करते हों करें

प्रयोजन बस मेरा इतना है-

ये दोनो जो सदा एक-दूसरे से तनकर रहते हैं

कब किस आलोक के स्फुरण में

इन्हें मिला दूं

दोनो जो हैं बंधु, सखा, चिर सहचर मेरे

शब्द और सत्य

एक रोचक चलन सा हो गया है कि अज्ञेय को केवल एक प्रयोगवादी कवि कहकर ख़ारिज कर दिया जाय. लेकिन उनकी कविताएं यों आसानी से निर्मूल नहीं की जा सकतीं बेशक अज्ञेय कविता के शिल्प पर, भाषाके संस्कार पर और कथन की अपनी ठसक पर खूब मार्जन-परिमार्जन करते हैं. पर उनकी कविता का सत्य किसी भी सहृदय को अलग ही खड़ा दिखाई दे जाएगा. इसमें आत्मान्वेषण है, और सत्यान्वेषण भी. राग और सौंदर्य तो है ही. करुणा और मानवीय सम्वेदना का भी अभाव नहीं है. आदर्शों के प्रति सम्वेदन और निवेदन भी है.

दुःख सबको मांजता है/और

चाहे स्वयं सबको मुक्ति देना वह न जाने

किंतु जिसको मांजता है

उन्हें यह सीख देता है कि सबको मुक्त रखे

-------------------------------------

महाशून्य

वह महाशून्य

अविभाज्य, अनाप्त, अद्रवित, अप्रमेय

जो शब्द हीन सबमें गाता है---

अज्ञेय उसी में विलीन हो गए. लेकिन उनके आदर्श और भाव उनके साहित्य में सदा-सदा प्रतिबिम्बित रहेंगे. पर ‘याद/कसक बन जाती है’.

(हिंदुस्तानी पत्रिका, इलाहाबाद. जुलाई-सितम्बर, 2011)

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget