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जरूरी हैं धर्मशालाएँ - डॉ. दीपक आचार्य

किसी जमाने में लोग कम हुआ करते थे और दानी-मानी लोगों की संख्या भी कोई कम नहीं थी। वे लोग गांवों-शहरों और कस्बों में धर्मशालाएं बनवाते थे जो आम लोगों के लिए काम आती थी।

यह काम सेवा-परोपकार को साकार करने के साथ ही पीढ़ियों तक पुण्य भी देता था। निष्काम सेवा भावना से किया गया यह परोपकार इतना कालजयी होता था कि दशकों से लेकर सदियों तक ये धर्मशालाएं उनके संस्थापकों व निर्माणकर्ताओं के नाम से मशहूर रहती थीं और इनके प्रति आम लोगों में भी अच्छा भाव हुआ करता था।

कम से कम खर्च में ठहरने और कहीं-कहीं खाने-पीने की सुविधाओं की उपलब्धता से जनजीवन को कई मायनों में राहत और बहुविध सुकून का अहसास होता था। वास्तव में यही धर्म का वह साकार स्वरूप है जो कि अक्षयकीर्ति और श्रेय दिलाता है वहीं पीढ़ियों तक याद रखा जाता है।

आज भी कई जगह दानी-मानियों के नाम से बड़ी-बड़ी धर्मशालाओं का संचालन हो रहा है जिनसे आमजन को सुकून मिल रहा है। जनसंख्या विस्फोट और प्रवृत्तियों के व्यापक विस्तार के आधुनिक दौर में आम इंसान के लिए धर्मशालाओं की संख्या में बढ़ोतरी समय की आवश्यकता थी लेकिन हमारी स्वार्थी और संकीर्ण मनोवृृत्ति ने सेवा-परोपकार और आतिथ्य सत्कार को धत्ता दिखाकर धंधेबाजी मानसिकता को अंगीकार कर लिया।

इसका परिणाम यह हुआ कि धर्मशालाओं का रूपान्तरण होटलों में होता चला गया, पुरानी धर्मशालाओं का अस्तित्व समाप्त हो गया और जो बची-खुची धर्मशालाएं थीं वे जीर्ण-शीर्ण होकर वजूद खो बैठी।

आज सम्पन्न लोगों के लिए सभी जगह आलीशान होटलें, सर्किट हाउस, रेस्ट-गेस्ट हाउस और दूसरे बहुत सारे स्थान उपलब्ध हैं। लेकिन  गरीब आदमी के लिए गांवों-कस्बों-शहरों से लेकर महानगरों तक में ऎसा कोई स्थान नहीं है जहां वह  रात भर रुक कर विश्राम पा सके, नहाने-धोने, पीने के पानी और कम दरों पर भोजन तथा रात गुजारने के लिए बिस्तर की सुविधा उपलब्ध हो।

लोक जीवन में परंपरा में इन धर्मशालाओं ने आम आदमी को ठहरने का सुकून दिया है लेकिन हाल के वर्षों में सदियों पुरानी यह परंपरा खत्म सी हो चली है। होना यह चाहिए था कि गरीब और आम इंसान की  इस जरूरत को ध्यान में रखकर सभी स्थानों पर आवश्यकता के अनुसार धर्मशालाएं होती जहां एक सामान्य इंसान को ठहरने से लेकर रात गुजारने तक की जरूरी सुविधाएं सुलभ होती जिससे कि वह अपनी जिन्दगी के कामों के और अधिक सहूलियतों से पूरा कर सके। पर ऎसा हो नहीं पाया।

हम लोग दुकानदारी और व्यावसायिक मानसिकता में इस कदर उलझते चले गए कि हमने धर्मशालाओं के महत्व को भुला दिया अथवा उनकी जगह होटलें बना डाली या धर्मशालाओं का नामोंनिशान मिटा डाला।

सम्पन्न और अभिजात्य कहे जाने वाले, प्रजा के पैसों पर मौज उड़ाने वाले तरह-तरह के लोगों को यह बात कभी समझ में नहीं अ सकती कि आम इंसान के लिए धर्मशालाओं का महत्व कितना अधिक है।

इसे वह आम इंसान अच्छी तरह समझ और अनुभव कर सकता है जो सामान्य परिवार से संबंधित है अथवा मध्यमवर्गीय परिवार का बाशिन्दा है। आज लोग धर्मस्थलों और भगवान के नाम पर अनाप-शनाप पैसा बहा रहे हैं और धर्म के नाम पर सभी स्थानों पर इतना अधिक कर रहे हैं कि कुछ कहा नहीं जा सकता।

पर गरीबों, सामान्य वर्ग के लोगों और जरूरतमन्दों के लिए धर्मशालाओं के निर्माण की दिशा में कुछ नहीं हो पा रहा। कलियुग का ही प्रभाव कहा जा सकता है कि जब वास्तविक धर्म ही संकट में हो वहाँ धर्मशालाओं की बात बेमानी ही है।

आज हम चाहे कितना कुछ कर लें, मानवीय संसाधनों की सेवा और परोपकार, आतिथ्य भाव आदि की दिशा में कुछ न कर पाएं तो इस धर्म का कोई मूल्य नहीं है।

हम नर सेवा नारायण सेवा के केवल नारे ही लगाते रहते हैं, असल में हमने इंसान में भगवान को देखना बंद कर दिया है। या यों कहें कि हमारी आँखों के आगे स्वार्थ का इतना अधिक मोटा काला परदा छा गया है कि हमें अब इंसान की बजाय अपने  स्वार्थ ही दिखने लगे हैं और इसी वजह से हम न इंसान के प्रति सहिष्णु रहे हैं, न धर्म के मूल मर्म को ही समझ पाए हैं।

हम सभी को सोचना होगा कि वास्तव में हम यदि जनसेवा का भाव रखकर मानवता का उत्थान चाहते हैं, आम मानव को सुकून देना चाहते हैं तो हमें अन मानवों के लिए जगह-जगह धर्मशालाओं की स्थापना करनी होगी, इन धर्मशालाओं में बहुत ही कम दरों पर लोक को स्थान देना होेगा ताकि लोक अपने सामान्य जीवन व्यवहार और यात्राओं के अभीष्ट को प्राप्त कर सके।

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