आत्मनिर्भर बनाएं आधे आसमाँ को / डॉ. दीपक आचार्य

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महिला दिवस पर कल हर तरफ आयोजनों की धूम रही। आज अखबारों में धूम मची हुई है। स्त्री महिमा के नारों की गूंज बनी रही और सारे के सारे लोग साल भर में इस एक दिन स्त्री के विकास, उत्थान और संरक्षण की बातें करते हुए दिखे। पता नहीं हम सभी लोग स्त्रियों के प्रति आदर-सम्मान, श्रद्धा और प्रेम इस एकमात्र दिन ही क्यों दर्शाते हैं, साल भर हमें क्या हो जाता है। एक दिन खूब प्रशंसा, सामर्थ्य की सराहना और अगले दिन से फिर वही ढाक के पात।

बरसों से हम सब यही करते आ रहे हैं। कुछ विभागों से लेकर एनजीओ और संस्थाओं के लिए यह दिन उल्लास पर्व रहा। औपचारिकताओं का निर्वाह करने से लेकर वास्तविक धरातल तक हर साल एक कुछ न कुछ ऎसा होता रहा है जिससे कि लगता है कि इस देश की महिलाओं को अब भी आवश्यकता है अपने लिए बहुत कुछ करने की।

समाज और व्यवस्था सभी को मिलकर हकीकत में अभी बहुत कुछ करना बाकी है। यह तब तक करना है जब तक हर एक महिला अपने आपके विकास से संतुष्ट न हो ले। महिला दिवस पर भाषणों में यही सब कुछ तो दिखा जिसने यह दर्शा दिया कि महिलाओं के सशक्तिकरण और कल्याण का संदेश देने और इस बारे में भाषण झाड़ने में हम कितने माहिर हैं। और कोई हमारे दिल-दिमाग की थाह पाने के यंत्र का आविष्कार कर ले तो हमारी सारी कलई ही खुल जाए।

स्त्री के लिए प्रेम, ममता, करुणा और धैर्य मौलिक रूप से प्रकृतिप्रदत्त हैं। उसे इनसे भी अधिक दरकार होती है संरक्षण और सुरक्षित पल्लवन-विकास की। वह ऎसा आश्रय चाहती है जिसकी छाँव में वह अपने अरमान पूरे कर सके और मुक्ताकाशी पंछी की तरह मस्ती और मुक्ति के साथ जीवन जी सके, जीवन व्यवहार और जगत का भरपूर आनंद ले सके।

यह संरक्षण जिन्हें प्राप्त हो जाता है वे अपने आप मस्त होकर अपने कर्मक्षेत्र और घर-परिवार से लेकर समाज और देश की सेवा में भागीदारी निभाती हैं। यह संरक्षण सुरक्षित भविष्य को लेकर सर्वाधिक चिन्तित करता है।

इस सुरक्षित भविष्य को पाने के जतन में ही स्त्रियां धोखाधड़ी और शोषण का शिकार होती हैं। इस दृष्टि से दूसरे सारे प्रयासों को जारी रखते हुए स्त्रियों की शिक्षा और रोजगार का प्रबन्ध सुनिश्चित हो जाने पर स्त्री सशक्तिकरण अपने आप हो जाना संभव है।

यह हो जाने पर उनके स्वाभिमान, इज्जत और स्व विकास के मामले में आड़े आने वाली तमाम प्रकार की बाधाओं का कोई अस्तित्व ही नहीं रहेगा। इस दिशा में गंभीरता से सोचे जाने की जरूरत है।

स्त्री शिक्षा के साथ अब स्त्री मात्र के लिए रोजगार के लिए स्थायी प्रबन्धों का होना जरूरी है। यह कार्य चरणबद्ध रूप से किया जा सकता है। सभी निःशक्त महिलाओं, विधवाओं, परित्यक्ताओं और विपन्न महिलाओं को क्रमशः किसी न किसी सेवा या स्वरोजगार से जोड़कर उनमें आत्मनिर्भरता लायी जा सकती है।

इससे बेटी बचाओ के आन्दोलन को भी गति प्राप्त होगी। कितना अच्छा हो कि समाज या राज के स्तर पर हरेक बेटी के नाम दस-दस लाख की एफडी हो जाए, जो उनके लिए जीवन भर काम आती रहे। बेटी बचाने के लिए हम चाहे कितने जतन करें, इसमें आशातीत सफलता तभी पायी जा सकती है जबकि हम बेटियों को आत्मनिर्भर बनाएं, उनके विकास में सहयोग दें और वे सारी सहूलियतें उन्हें आसानी से प्राप्त हों जो कि बेटों को देने में हम उत्सुकता दिखाते हैं।

बेटियों के प्रति हमारी पूर्वाग्रही भावनाओं का ही परिणाम है कि हम घर-परिवार में बरकत की कल्पना तो करते हैं मगर संतोष और खुशहाली हमसे दूर से दूर भागती रहती है। संसार में शिव और शक्ति, नारायण और नारायणी, ब्रह्मा और ब्रह्माणी, देवियों और देवताओं का संतुलन बनाए रखना जरूरी है वरना कहीं भी, कभी भी और कैसा भी संकट आ सकता है।

वर्तमान युग भौतिकवादी है जिसमें आर्थिक आत्मनिर्भरता के मामले में जो आगे बढ़ गया वह उपेक्षा और हीनता से उपर उठ जाता है। इसलिए स्त्री सशक्तिकरण के लिए यह जरूरी है कि हम हरेक स्त्री को आत्मनिर्भर बनाएं और जब तक खुद के पैरों पर खड़ा नहीं हो जाए, तब तक समाज आगे आए, सामाजिक स्तर पर वृहत कोष इकट्ठा हो, जिससे स्त्री शिक्षा और रोजगार का स्थायी प्रबन्ध किया जाए।

इससे स्त्री सशक्तिकरण को भी संबल प्राप्त होगा और स्त्री शक्ति मुक्तमना रहकर समाज और देश के समग्र विकास में पूरे मन से भागीदारी अदा कर पाएगी।  महिला दिवस पर महिलाओं के बारे में हम सभी को सोचना होगा, महिलाओं को अपने बारे में सोच कर कुछ रास्ते तलाशने होंगे, तभी महिला सशक्तिकरण के हमारे प्रयासों को सार्थक माना जा सकता है।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

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