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लोकस्पर्शी हस्ताक्षर - प्रो. करणसिंह डिण्डोर - कल्पना डिण्डोर

नवम् पुण्यतिथि पर विशेष

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लोकस्पर्शी हस्ताक्षर - प्रो. करणसिंह डिण्डोर

कल्पना डिण्डोर

दुनिया में कई हस्तियां ऎसी जन्म लेती हैं जो अपने अनूठे और प्रेरक व्यक्तित्व की गंध से जमाने भर को महका जाती हैं और उनकी गंध अर्से तक महसूस की जाती है। वागड़ अंचल से लेकर प्रदेश भर में उच्च शिक्षा जगत, जनजाति कल्याण और लोक सेवा के तमाम आयामों में श्री करणसिंह डिण्डोर ने जिस विशिष्ट कर्मयोग का परिचय दिया है वह अपने आपमें विलक्षण और प्रेरणा जगाने वाला है।

अमर हैं उनका व्यक्तित्व

करणसिंह डिण्डोर....एक मशहूर शख्सियत जिसने शिक्षा, समाज सेवा और राजनीति के क्षेत्र में अपने अनूठे कर्मयोग और सर्वस्पर्शी व्यक्तित्व की गंध बिखेरी और अमर हो गए। डिण्डोर साहब के नाम से प्रसिद्ध यह हस्ती सादा जीवन और उच्च विचार की प्रतिमूत्रि्त थी।  वागड़ अंचल की पावन धरा में जन्म लेने वाली विभूतियों में प्रो. करणसिंह डिण्डोर का नाम अग्रणी पंक्ति में लिया जाता है जिन्होंने शून्य से शिखर तक की यात्रा पूर्ण कर यह अच्छी तरह जता दिया कि बुद्धि और विवेक की बदौलत संघर्षों के पहाड़ों से लोहा लेते हुए व्यक्ति यदि चाह ले तो सफलता के शिखरों को छू लेना कोई कठिन कार्य नहीं।

आज यद्यपि उनकी स्मृति शेष है किन्तु शिक्षा जगत को दी गई उनकी सेवाएं आज भी हर किसी को उनके प्रति सम्मान और श्रृद्धा से नतमस्तक होने को प्रेरित करती हैं। स्वर्गीय डिण्डोर ने जनजाति क्षेत्र में शैक्षणिक जागृति लाने तथा राज्य स्तर पर एक कुशल शिक्षा प्रशासक के रूप में अमिट छाप छोडी है।

उन्होंने संघर्षमयी जीवन से सफलता के शिखर तक पहुंच कर यह भी साबित किया है कि गुदड़ी का लाल भले ही अभावों में जन्मा और पला-बढ़ा हो किन्तु बाधाएं उसकी प्रतिभा को रोक नहीं सकती। डिंडोर ने उच्च शिक्षा क्षेत्र में सर्वोच्च पद पहुंच कर यह भी साबित किया कि बांसवाड़ा की वसुधा को रत्नगर्भा की उपाधि क्यों दी जाती है।

स्व. डिण्डोर का जन्म बांसवाड़ा तहसील के लोधा गांव में 24 नवम्बर 1939 को हुआ। आदर्श कर्मयोगी श्री डिण्डोर का महाप्रयाण 19 मार्च 2007 को  हुआ। वागड़ अंचल आज उनकी नवम् पुण्यतिथि मना रहा है।

शैक्षिक विकास के भगीरथ के रूप में उनका शैक्षिक सफर उल्लेखनीय रहा है। कई विश्वविद्यालयों को आपका मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। शिक्षार्थी के रूप में उन्होंने कई संगोष्ठियों, पत्रवाचनों, परिचर्चाओं, वाद विवाद प्रतियोगिताओं आदि गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी अदा की।श्री डिण्डोर को जनजाति बहुल बांसवाड़ा जिले से जनजाति के सर्वप्रथम एम.ए. होने का गौरव प्राप्त है।

अध्यापन अनुभव के लिहाज से राजस्थान के विभिन्न राजकीय महाविद्यालयों में कला संकाय के अंतर्गत समाज विज्ञान/ राजनीति विज्ञान विषयाध्यापन का उन्होंने दीर्घ अनुभव पाया। राजस्थान शिक्षा सेवा केडर में प्रथम जनजाति प्राध्यापक के रूप में समग्रतः स्नातक एवं स्नातकोत्तर कक्षाओं के अध्यापन का श्रेष्ठ अनुभव श्री डिण्डोर के खाते में ही रहा है। शिक्षा जगत में कई प्रशासनिक और अकादमिक पदों को उन्होंने सुशोभित किया और अपनी कर्तव्य  परायणता की छाप छोड़ी।  निदेशक कॉलेज शिक्षा राजस्थान के रूप में अपनी सेवाएं आपने प्रदान कर बांसवाड़ा और आदिवासी अंचल को गौरवान्वित किया। रचनात्मक कर्मयोग के मामले में प्रो. डिण्डोर का व्यक्तित्व कमाल का था। उन्होंने अपने पूरे जीवन में सामाजिक, शैक्षिक और रचनात्मक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी अदा की।

बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी प्रो. डिण्डोर की बांसवाड़ा की सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक आदि गतिविधियों में सहभागिता किसी न किसी रूप में रही है। सक्रिय सहभागिता निभाते हुए विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं में गौरवशाली पदों पर रहते हुए स्व. डिण्डोर ने जो काम किए वे समाज सेवा के क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के लिए प्रेरणा संचरित करने में समर्थ हैं।  कुछ वर्ष पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे की मौजूदगी में स्व. श्री राजसिंह जी डूंगरपुर ने उन्हें सम्मानित किया।

उनका समग्र व्यक्तित्व हर विचारधारा पर भारी रहा। उदारमना श्री डिण्डोर वह अज़ीम शखि़्सयत थे जो हर क्षेत्र और हर वर्ग में लोकप्रिय थे। दलों की सीमाओं से ऊपर उठकर जनता की सेवा करने वाले बिरले लोगों में स्व. डिण्डोर का नाम गर्व से लिया जाता है।

आज वे हमारे बीच नहीं है मगर जीवट कर्मयोग के साथ निभाया गया उनका जीवन-सफर नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ सदियों तक प्रेरणा के स्वर गुंजाता रहेगा। उनकी नवम् पुण्यतिथि पर शत शत नमन एवं भावभीनी श्रद्धांजलि....।

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