यूँ नहीं रीझने वाले भगवान भोलेनाथ / डॉ. दीपक आचार्य

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आज शिवरात्रि है। हम सभी लोग भगवान भोलेनाथ को रिझाने में पूरी ताकत लगा रहे हैं।  उनकी उपासना में फल-फूल, भंग-धतूरा, शहद, बिल्वपत्र से लेकर जल धाराओं और दूध से अभिषेक, पंचाक्षरी और महामृत्युञ्जय मंत्र जप, रूद्राभिषेक, शिवमहिम्नस्तोत्र और जाने कैसे-कैसे स्तोत्रों, मंत्रों और स्तुतियों के गान में रमे रहने वाले हैं।
भगवान भोलेनाथ के बारे में कहा जाता है कि वे आशुतोष हैं, जल्दी ही प्रसन्न होने वाले देवता हैं लेकिन ऐसे भी नहीं हैं कि हम उन्हें भ्रमित या गुमराह कर सकें। जैसा कि आजकल हम शिव उपासना के नाम पर ढोंग और पाखण्ड करते हुए औपचारिकता का निर्वाह कर रहे हैं।


शिव उपासना के नाम पर कुछ समर्पित और शुचितापूर्ण साधकों को छोड़ कर हम सभी लोग आडम्बर ही कर रहे हैं। असल में शिव का अर्थ कल्याण है और शंकर का अर्थ है शमन करने वाला। यह शिव और शंकर नाम केवल अपने व्यक्तिगत कल्याण या आनंद से नहीं है अपितु  इसका संबंध पूरे ब्रह्माण्ड से है।
इसलिए शिव उपासक केवल अपने ही लिए नहीं जीता, अपने ही स्वार्थ की बात नहीं करता। शिव भक्त होने का ही मतलब है विश्व भर के लिए मंगलकारी और प्राणी मात्र के लिए उपकारी। इस दृष्टि में हम अपनी तुलना करें तो हम कहीं नहीं ठहरने वाले।


हम अपने कुटुम्बियों, साथ रहने वालों, पड़ोसियों और मित्रों तक को लांघ कर, उनके कंधों पर सवार होकर तथा षड़यंत्रपूर्वक् उनका गला घोंट कर भी अपने स्वार्थ पूरे करने के लिए कुछ भी कर गुजरते हैं। और हम बात करते हैं शिवभक्त होने की।


हमारी शिवभक्ति बाहरी आडम्बर से अधिक कुछ नहीं। हम शिवभक्त होने के नाम पर भंग पीने को तो अपना धर्म मानते हैं, लेकिन हमें यह भी पता होना चाहिए कि भोलेनाथ विष भी पिया करते थे तभी उनका नाम नीलकण्ठ हुआ। और एक हम हैं जो दुनिया में सिर्फ मीठा ही मीठा गड़प करना चाहते हैं, दूसरों की रक्षा के लिए विष पीने की बात तो दूर है। जो अपने आपको परम शिव भक्त मानते हैं क्यों न एक बार शिवभक्ति के नाम पर जहर तो पी कर दिखाएं।


सच तो यह है कि हमने धर्म के नाम पर वही सब कुछ अंगीकार किया है जिससे हमारा फायदा होता है, हमारे उल्लू सीधे होते हैं और उल्टे-सीधे काम कर लेने के बावजूद धर्म का अभेद्य सुरक्षा कवच हमें सुरक्षा भी दे, दूसरों से अलग पहचान दे और प्रतिष्ठा भी प्राप्त होती रहे।


धर्म के मूल मर्म को समझने वाले अब बचे ही कितने हैं। यही कारण है कि ढोंगियों के पाखण्डों को ही भक्ति माना जाने लगा है । शिव को पाने की कामना करने वाले लोगों को यह समझना होगा कि शिव की प्रसन्नता पाने के लिए त्रिपुण्ड, जटा-दाढ़ी, भस्म, भंग, गांजा, चरस, रूद्राभिषेक, जलाभिषेक, स्तोत्र और वैदिक स्तुतिगान और मंत्रों का उच्चस्वर में गान, बोल बम, हर-हर महादेव, जय महादेव आदि जोर-जोर से बोलते हुए शिव मन्दिरों में जमे रहना ही शिव भक्ति नहीं है।


बल्कि असली शिवभक्त वह है जो शिव तत्व को जानता है, शिव की प्रतिष्ठा के लिए उनके अनुकूल वातावरण बनाता है और शिवानुकूल जलवायु तथा परिवेश एवं शैव कार्यों के लिए तत्पर रहता है।
आज हमने अपनी ऐषणाओं को पूरी करने, अपने पापों और अपराधों के दण्ड से बचने, बीमारियों से मुक्ति पाने, संतान, मोटर-गाड़ी, बंगला और अकूत धन संपदा पाने भर के लिए शिवजी को भजने का रास्ता पकड़ लिया है। शिवत्व पाने की हमें कोई चाह नहीं है।

हमें अपने स्वार्थ पूरे करने से सरोकार है और अपने स्वार्थ के आगे न हमें धर्म से मतलब है न संसार से। शिवभक्ति के नाम पर हम आजकल जो कुछ कर रहे हैं वह ढोंग के सिवा कुछ नहीं है। शिव वहीं रहते हैं जहां पंच तत्वों का भरपूर समावेश, खुला भाग, जलस्रोत, विस्तृत परिसर हो, भरपूर प्राकृतिक वातावरण हो, और इससे भी अधिक यह जरूरी है कि एकान्त व चरम शांति हो। 
हमने शिवालयों को किसी कियोस्क की तरह बनाकर रख दिया है जहां एक कोने में शिवलिंग पड़ा हुआ रहे और उनके दर्शन होते रहें। शिवालयों के प्राचीन स्वरूप को मिटा कर हमने उस परिक्रमा स्थल को समाप्त कर दिया जहां शिव के गणों का स्थान था, उन कूओं-बावड़ियों और नदी-तालाबों की दुर्दशा कर दी, मन्दिर के चारों तरफ की जमीन पर दुकानें बना डाली, पुजारियों रहने के घर बना डाले या धर्मशालाएं।  न खुला भाग रहा, न प्राकृतिक रमणीयता।


और तो और शिवालयों का एकान्त और शांति भी उन मूर्ख पुजारियों और शिवभक्तों ने छीन ली दिन-रात मंत्र-स्तुतियों की कैसेट चला-चला कर। सदियों से जिस शांति के लिए मन्दिर प्रसिद्ध थे वे अब नासमझों की अशांति की भेंट चढ़ चुके हैं। आखिर असली भक्त जाए तो कहाँ?


पण्डितों और धर्म के ठेकेदारों ने भी शिवालयों की अस्मिता पर संकट की परवाह नहीं की, न मन्दिरों के महत्व से परिचित कराया, न खुद सुधर पाए। इन लोगों को धर्म के नाम पर धंधे चलाने और चाँदी कूटने से ही फुरसत नहीं है।


शिवरात्रि पर चारों प्रहर की पूजा का प्रावधान है। लेकिन शिवालयों में दर्शन के नाम पर पैसे उगाहने के चक्कर में दिन में एक ही प्रहर ही पूजा-अभिषेक हो पाता है शेष तीनों प्रहर शिवलिंग को श्रृंगार के आवरण में नज़रबंद कर दिया जाता है। इस तरह न पूजा हो पाती है, न जलाभिषेक। भगवान पूजनीय नहीं, बल्कि दर्शनीय ही बने रहते हैं। यही स्थिति श्रावण मास में होती है। 


शिवरात्रि पर हम संकल्प लें कि वही करेंगे जो शिव को पसंद है। शिवालयों के आस-पास पानी, खुले भाग, परिक्रमा स्थल, पेड़-पौधों आदि का संरक्षण करें तभी शिव वहां रह सकते हैं अन्यथा कितना ही चिल्लाते रहो, माईक पर शिवमहिम्नस्तोत्र, रूद्री और शिव ताण्डव स्तोत्र आदि कुछ भी जोर-जोर से गाते रहो, शिव सुनने वाले नहीं। असली शिवभक्ति अपनाएं, इसका मर्म समझें, केवल कर्मकाण्ड में ही न रमे रहें। हर-हर महादेव।
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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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