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रचना और रचनाकार (१५) - सुभाष दशोत्तर की कविताओं में मृत्यु-बोध / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

रचना और रचनाकार (१५) सुभाष दशोत्तर की कविताओं में मृत्यु-बोध

डा. सुरेन्द्र वर्मा

सुभाष दशोत्तर मध्य-प्रदेश का एक उदीयमान हिंदी कवि था जो एक स्कूटर दुर्घटना में असमय ही मृत्यु का शिकार हो गया. उसके लिए

शाम और रात का प्रश्न / पैदा ही नहीं हुआ

रोज़ सुबह उसे / एक-एक क़तरा /

आल्पिन से / गिराती रहती थी

और वह / दोपह्रर को / मर गया (पैवस्त यातना, पृ.7)

सुभाष ने मानों मौत को अपनी ज़िंदगी में ही देख लिया था. यही कारण है कि उसके एक मात्र संग्रह, पैवस्त यातना (आरक्त प्रकाशन, उज्जैन, 1976), की अधिकांश कविताएं इसी मृत्यु-बोध को सर्वाधिक रेखांकित करती प्रतीत होती हैं. कवि कहता है –

आकाश कब / इद्र धनुष के रंगों को

लील जएगा / हमें इसका भान नहीं होता

क्योंकि मौत का कोई / मनोविज्ञान नहीं होता (पृ.38)

आदमी का क़तरा-क़तरा मरना और फिर मानों मौत का अचानक घटित हो जाना- सुभाष दशोत्तर ने मृत्यु सम्बंधी इन दोनो ही तथ्यों को अलग-अलग पकड़ा था और उसकी ये दोनो ही अनुभूतियां विरोधाभासी होते हुए भी वैध अनुभूतियां थीं जो मृत्यु की द्वैधवृत्ति का सही वर्णन करती हैं.

मृत्यु सम्बंधी चिंतन भारतीय विचारकों का सदैव ही एक प्रिय विषय रहा है तथा मृत्यु-बोध की एक लम्बी परम्परा है. किंतु इस परम्परा के दो पक्षों में स्पष्ट भेद किया जा सकता है. प्राचीन परम्परा स्वयं जीवन को ही मृत्यु का कारण समझती है और मृत्यु से छुटकारा पाने के लिए भाव-चक्र से ही मुक्त होने का प्रयत्न करती है. न जन्म होगा, न मृत्यु का प्रश्न ही उठेगा. यह परम्परा न चाहते हुए भी जीवन और जगत का निषेध करती है और संन्यास के नाम पर अकर्मण्यता को जन्म देती है. किंतु मृत्यु चिंतन की आधुनिक परम्परा जीवन और जगत का निषेध किए बिना ही मृत्यु की विभीषिका को कम करना चाहती है. मृत्यु इस परम्परा में एक प्राकृतिक सम्वृत्ति न होकर मानव निर्मित दशा है जो अनेक रूपों में अभिव्यक्त हुई है. मृत्यु- दुःख और यातना का दूसरा नाम है और जिस हद तक मनुष्य स्वयं मनुष्य के दुःख का कारण होता है, उस हद तक वह मृत्यु का कारण भी होता है. आज की सबसे बड़ी समस्या यही है कि मनुष्य अब स्वयं ही मृत्यु का कारण बन गया है क्योंकि अभाग्यवश –

--- वक्त / उन लोगों के हाथ में

पड़ गया है / जिन्हें

उसकी पहचान नहीं है. (पृ.9)

और यही कारण है कि

...हम / अपने ही जिस्म के बाहर

खून की तरह / फैलते जा रहे हैं (पृ.14)

मनुष्य अपने निजी और व्यक्तिगत दुःख को झेल पाने में स्पष्ट ही मृत्यु का अनुभव नहीं करता, किन्तु जब प्रश्न सामाजिक दुःख के बर्दाश्त का आता है तो मनुष्य दिन में कई बार मरता है. नहीं तो क्या कारण है कि –

घूंट भर पानी मेरे गले में

बर्फ बन गया... (पृ.16)

शोषण और अन्याय का हर उदाहरण और उससे मुक्त न हो पाने की मजबूरी ही मनुष्य की वास्तविक मृत्यु है. शोषण की इस अवस्था में

अलग-अलग बिखरे हुए हम / शायद

सुबह के लिए छटपटा रहे हों

और हम सभी के / झुके हुए कंधों पर

रात पसरी हुई है... (पृ.58)

कंधों पर पसरी हुई इस रात को – मृत्यु की इस व्यापक छाया को – उतार फेंकना कठिन नहीं. ज़रूरत सिर्फ इस बात की है कि हम अलग-अलग बिखरे न रहें. शोषित शक्तियों का इकट्ठा होना ज़रूरी है. अकेले व्यक्ति का शब्द बहुत दूर नहीं ले जा सकता -

मैंने शब्द जला लिया / मगर उससे / रोशनी

उतनी नहीं होती / जितना अंधेरा है

तीलियों की तरह / बहुत जल्दी जलते हुए शब्द

सिरे की तरफ आ जाते हैं / जहां

आंच तीखी हो जाती है / और हम उसे

अपनी पकड़ से / आज़ाद कर देने के लिए

बेबस हो जाते हैं... (56)

शब्दों से आग का एक निरंतर सिलसिला चाहिए. इसीलिए सुभाष को लगता है कि-

एक लम्बी यात्रा की शुरूआत हो गई (है)

जिसका अंत / देह धर्म के साथ नहीं होगा (43)

सुभाष दशोत्तर का कवि मुख्य्तः मृत्यु का गायक है और मृत्यु उसके लिए शोषण और अन्याय से प्रसूत यातनानुभूति है जिसके निराकरण के लिए उसकी

कविता / रेत में छटपटाती हुई

मछली है जो सरोवर की आस्था को

जन्म देना चाहती है...

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(नया-प्रतीक,)

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