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होना चाहिए खात्मा होलिकाओं और हिरण्यकश्यपों का - डॉ. दीपक आचार्य

उस जमाने में दानवी संस्कृति के परिचायक हिरण्यकश्यप भी थे और सत्ता के मद भरी फायरप्रूफ होलिकाएं भी। अंधे मोह और मद भरी कुर्सियों का वजूद तब भी था और अब भी है। अन्तर सिर्फ इतना भर हो गया है कि तब एक हिरण्यकश्यप था, एक होलिका थी। आज कई शक्लों और लिबासों में हिरण्यकश्यपों की जमातें हैं, कुर्सी को शाश्वत और अनश्वर मानने वाली होलिकाएं भिन्न-भिन्न रूपों में हमारे सामने हैं।

इनके रंग अलग-अलग हैं जो होली पर ही नहीं बल्कि पूरे साल भर गिरगिटों को भी छकाते लगते हैं। वो जमाना था जहाँ दैत्यों से लेकर देवताओं तक की कथनी और करनी में कोई अन्तर नहीं हुआ करता था।

छल-फरेब तो था ही लेकिन इससे भी आगे बढ़कर सच यह था कि जो जैसा है वैसा दीखता भी था और होता भी था। आज सब कुछ उलटा-पुलटा हो चला है। आदमी अन्दर से कुछ और है, बाहर से कुछ और, यहाँ तक कि दाँये से कुछ और है, और बाँये से कुछ और।

जो सामान्य हैं वे भी, और असामान्य हैं वे भी, सारे के सारे जाने कितने चेहरों, चाल और चलन से एक साथ नॉन स्टॉप कुलाँचे भरते जा रहे हैं। जाने कितने रंगों के एक साथ घालमेल ने आदमी के मन को इतना बदरंग बना डाला है कि पता ही नहीं चलता कि असली रंग कौन सा है।

सच कहें तो आदमी का अपना रंग कहीं खो चला है और आयातित रंगों और रसों के सहारे वह शिखरों को छू लेने का स्वप्न संजोये कभी किसी को पछाड़ देता है, कभी किसी को रुला देता है। इस अंधी दौड़ में उसे न अपनों का बोध है, न परायों का। 

हर कोई लगता है जैसे जीवंत अभिनय का महारथी बहुरुपिया ही हो। रोजाना ढेरों किरदारों को जीते हुए, लोगों को मुगालते में रखते हुए आदमी खुद को भी नहीं समझ पा रहा है कि आखिर वह है क्या, और क्या होता जा रहा है।

पॉवर फुल और पॉवरलेस दोनों तरह के आदमी बहुरुपियों को भी उन्नीस ठहराने लगे हैं। सत्ता की होलिकाओं की गोद में एकदम निर्भय बन बैठे उन लोगों के लिए कुर्सिया अभेद्य सुरक्षा कवच ही हो गई हैं जिनमें धंसे रहकर वे जमाने पर कुछ भी सितम ढाने के आदी हो गए हैं।

अपने अस्तित्व को पाने जब आदमी सारे नैतिक मूल्यों और आदर्शों को स्वाहा करते हुए आगे बढ़ने का भ्रम पाल लेता है तब उसके लिए मनुष्य होने का बोध जगने का कभी प्रश्न ही पैदा नहीं होता।

अपने आस-पास नज़र घुमाएं तो दिखेगा कि लोग कितनी दोहरी-तिहरी या बहुरुपिया जिन्दगी जीते हैं। उच्चाकांक्षाओं के फेर में लगातार मानवीय मूल्यों को रौंदते हुए आगे बढ़ते हुए दीखने वाले इन लोगों के लिए भ्रम में जीना और भ्रम फैलाते हुए आगे निकल जाना ही उनका एकमेव जीवन लक्ष्य है।

इन लोगों के हर कर्म और व्यवहार मेें साफ झलकता है दिखावा। कहते कुछ हैं, करते कु और होता है कुछ और। षड़यंत्रों और फरेब की बुनियाद पर टिके इन लोगों की सारी खिड़कियाँ और दरवाजे अन्दर की ओर ही खुलते हैं।

इन्हें कोई सरोकार नहीं जमाने की प्रतिक्रिया का। कुर्सी की होलिकाओं के फायर प्रूफ आवरण ने इन्हें इतना निर्भय बना दिया है कि इनके लिए कुछ भी करना अस्पृश्य नहीं है। जो जिस रंग के लिबास में बैठा है उस रंग की वाह-वाह करते हुए जनमानस को भ्रमित करता हुआ अपने उल्लू सीधा कर रहा है। जनता की आह-कराह कि उसे फिकर है ही कहाँ।

अब बहुत हो चुका है। होलिकाओं को दिया वरदान क्षीण होने लगा है, प्रह्लाद की पुकार अब ताकत पाने लगी है, हर कोने-कोने से आहट आनी शुरू हो गई है, हिरण्यकश्यपों को चेत जाना चाहिए वरना अब समय करीब आ गया है, कितना कुछ हजम कर चुकने के बाद भी डकार तक नहीं लेने वाला उनका पेट अब ज्यादा दिन सुरक्षित नहीं है, जनशक्ति के रूप में हौले-हौले बढ़ चला है कोई उनकी तरफ.......।

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