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भवानी भाई की कविता और जीवन-दृष्टि ; गांधी प्रसंग / डा. सुरेन्द्र वर्मा

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रचना और रचनाकार (३)

भवानी भाई की कविता और जीवन-दृष्टि ; गांधी प्रसंग

डा. सुरेन्द्र वर्मा

नाम नहीं याद आरहा है लेकिन हाल ही में एक समालोचक ने गांधी जी के कर्म और जीवन को एक कविता के रूप में निरूपित किया है क्योंकि उसके पीछे उनकी सम्वेदनशीलता परिलक्षित होती है. भवानी भाई भी गांधी जी की इस सम्वेदनशीलता के ही क़ायल थे. उन्होंने अपने जीवन और साहित्य में ,खास तौर पर अपने कविता-कर्म में, गांधी-मूल्यों को न केवल प्रस्तुत किया बल्कि आत्मसात किया है.

गांधी जी का व्यक्तित्व ही ऐसा था. जो भी उनके सम्पर्क में आता वह बस उनका ही होकर रह जाता. उस समय का, और आज का भी, बहुत सारा साहित्य गांधी जी से प्रेरित रहा है. गांधी व्यक्तित्व और दर्शन पर अनेकानेक स्फुट कविताएं तो लिखी ही गईं, अनेक खंड-काव्यों में भी गांधी जी के जीवन और मूल्यों तथा तत्कालीन सामाजिक और राजनैतिक घटनाओं को बांधने का प्रयास किया गया. अनेक काव्य-संग्रहों – “सूत की माला”, ”खादी के फूल”, “हिम किरीटनी”, “पर आंखें नहीं भरीं,” आदि, - में शतशः भाव-भीनीं रचनाओं का प्रकाशन हुआ. कभी गांधी के अहिंसा भाव ने कवियों के मन को उद्वेलित किया, कहीं सत्य के प्रति उनका आग्रह और विश्वास छंद बन बैठा, तो कहीं स्वदेशी और स्वराज्य की हुंकार काव्य का मेरुदंड बनी.

आभुनिक हिंदी काव्य में गांधी जी के संदर्भ में मुख्य रूप से तीन तरह के परिदृश्य हैं. कुछ तो वे रचनाएं हैं जो प्रायः प्रशस्ति एवं श्रद्धांजलि परक हैं और जिनमें गांधीजी के मूल्यों को काव्यात्मक रूप दिया गया है. दूसरी कोटि के अंतर्गत वे तमाम रचनाएं आती हैं जिन्हें प्रभाववादी वर्ग में रखा जा सकता है. कहानी, उपन्यास, काव्य एवं नाटक आदि, हिंदी की अन्यान्य विधाओं में ऐसी असंख्य रचनाओं का प्रणयन हुआ है जो गांधी जी के जीवन के किसी प्रसंग से सीधे न जुड़कर जीवन और समाज के प्रति गांधी मूल्यों से प्रेरित होकर लिखी गईं. पंत जी की “ग्राम्या”,“लोकायतन”, निराला जी की “राम की शक्ति पूजा”, फणीश्वरनाथ रेणु का “मैलाआंचल” प्रेमचंद की “रंग भूमि” “सेवासदन” “निर्मला” आदि रचनाएं उन शाश्वत जीवन मूल्यों से प्रेरित हैं जो व्यावहारिक रूप में गांधी जी के चिंतन और उनकी कार्य प्रणाली में घट रहे थे. तीसरे वर्ग में कुछ ऐसी रचनाएं देखनेको मिलती हैं जहां शंका-विशंका का भाव भी व्यक्त हुआ है.

डॉ. निर्मला अग्रवाल ने भवानी प्रसाद मिश्र को पहली कोटि में रखा है. गांधीजी के प्रति भवानी भाई की सारी कविताएं आदि, प्रशस्ति काव्य ही है. वस्तुतः, जैसा कि डॉ. अग्रवाल लिखती हैं, तत्कालीन सामाजिक और राजनैतिक पृष्ठभूमि में गांधीजी के प्रभाव का आलम यह था कि निष्काम, पवित्र और उच्च मानवीय ध्येय से प्रेरित उनकी वाणी से निसृत शब्दमात्र जनता के लिए मंत्र और छंद बन जाता था. वे सर्वजन सुखाय, सर्वजन हिताय की भावना से प्रेरित थे. मानवमात्र को सत्यस्वरूप और प्रेमस्वरूप देखना चाहते थे, यहां तक कि दमनकारी प्रतिपक्षी के प्रति भी उनमें विद्वेष का कोई भाव नहीं था. ऐसे महामानव के प्रति उस युग के कवि भवानी भाई का मन यदि समर्पित था तो आश्चर्य क्या?

भवानी प्रसाद मिश्रका जन्म होशंगाबाद (म.-प्र.) के एक छोटे से गांव टिगरिया में हुआ था. उनकी जन्म तिथि सर्वसम्मति से 19 मार्च मान ली गई है. लेकिन इसे लेकर काफी अनिश्चय की स्थिति रही. अपनी डायरी में स्वयं भवानी भाई ने लिखा है कि 23 या 28 मार्च उनका जन्म दिन होता है. अज्ञेय द्वारा सम्पादित “दूसरा सप्तक”, जिसके एक कवि भवानी भाई भी हैं, में भवानी भाई के केवल जन्म-वर्ष का ही उल्लेख है. इसे 1914 बताया गया है. पर बाद के संस्करणों में यह 1913 बताई गई है. अब इस प्रकार 19 मार्च 1913 ही उनकी जन्म-तिथि स्वीकार कर ली गई है.

कवि भवानी प्रसाद के पिता का नाम पं. सीताराम मिश्र था. वे परिवार के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने मैट्रिक तक शिक्षा प्राप्त की थी. मैट्रिक के बाद वे ज़िला स्कूल में शिक्षा-निरीक्षक के पद पर कार्य करने लगे और नौकरी के दौरान अधिकांश समय वे सोहागपुर, नरसिंहपुर, बैतूल और होशंगाबाद नियुक्त रहे. भवानी भाई ने इन्हीं स्थानों पर रहकर मैट्रिक की शिक्षा प्राप्त की. बाद में उन्होंने हिंदी, अंगरेज़ी तथा संस्कृत विषयों से स्नातक परीक्षा पास की.

भवानी भाई होश संभालने के बाद से ही स्वाधीन भारत के सपने देखने लगे थे. हाईस्कूल के आखिरी साल में उन्हें होशंगाबाद से नरसिंहपुर जाना पड़ा. कारण यह था कि होशंगाबाद के हैडमास्टर ने उनके पिता, जो उस समय नरसिंहपुर में थे, लिखा कि आप भवानी प्रसद को अपने पास रखिए, वह आंदोलनों में दिलचस्पी लेता है और यह ठीक नहीं है. उन दिनों असहयोग आंदोलन चल रहा था. पिता ने अपने पुत्र को अपने पास बुला लिया. पर भवानी भाई ने अपने पिताश्री को स्पष्ट कह दिया, मुझे प्रभात फेरी आदि, में जाना अच्छा लगता है. पिता ने भी उन्हें अभय दान दे दिया. भवानी भाई कहते हैं, सरकारी नौकर होते हुए भी उन दिनों ऐसी इजाज़त देना, और सो भी सहज भाव से, पिता के मन को ज़ाहिर करता है.

1942 के आंदोलन में भवानी भाई ने बैतूल में झंडा लेकर जुलूस का नेतृत्व करने का दृढ इरादा कर लिया. छोटा शहर था. सद्भावना का अभाव नहीं था. रात को कलैक्टर साहब, भवानी भाई के बड़े भाई को "समझदार" मानकर उन्हें समझाने आए. बोले, फायरिंग वगैरह की गुंजाइश है. भवानी को जुलूस के नेतृत्व के लिए मना कर दो तो अच्छा है. पर कलैक्टर की समझाइश काम न आई. दूसरा दिन आया तो गोलियां भी चलीं, गिरफ्तारियां भी हुईं. एक गोली भवानी भाई के कान के पास से निकल गई. "यानी जिस गोली का लिहाज़ पिताजी ने नहीं किया उस गोली ने पिता जी का लिहाज़ किया." (ऐसा बाद में भवानी भाई के योग्य पुत्र अमिताभ मिश्र ने अपने एक संसमरण में लिखा.) भवानी भाई को जेल हो गई. उनके पुत्र अमिताभ तब केवल 2 साल के थे और छोटे पुत्र अनुकूल का जन्म भवानी भाई के जेल जाने के एकाध दिन आगे-पीछे ही हुआ था. गिरफ्तारी के बाद सरकार ने उस स्कूल को जो उनके परिवार की आजीविका का एकमात्र साधन था अपने क़ब्ज़े में ले लिया. बहरहाल परिवार किसी तरह लस्टम-पस्टम गुज़ारा करता रहा.

भवानी भाई तीन वर्ष बाद 1945 में जेल से छूटे. लेकिन जेल में उन्हें अनेक वर्धा निवासियों और महापुरुषों का, जो गांधीजी के सहयोगी थे, साथ मिला. नागपुर से वर्धा की दूरी केवल 50 मील थी. वर्धा तब तक एक अघोषित राष्ट्रीय तीर्थ बन गया था. वह सरकार के भय का मुख्य केंद्र था. ऐसे में बहुत से वर्धा के नागरिक नागपुर जेल के निवासी बन गए. आश्रम से आए इन लोगों ने नागपुर जेल को भी आश्रम बना दिया. खाना खाने से पहले वे सभी वैदिक मंत्र, " ओं, सहनाववतु सह नौ भनक्तु सह वीर्यं करवावहै तेजस्विनावधीत मस्तु मा विद्विषा वहै... ओं शांतिः शांतिः शांतिः ." का पाठ कर सामूहिक और सहयोग बल के लिए प्रार्थना करते. जेल तब जेलवासियों के लिए शिक्षा का मानों एक केंद्र बन गया था. विनोबा भावे वहां शास्त्रों और उपनिषदों की शिक्षा देते , डॉ. वामनराव बारलिंगे होम्योपैथी और ज्योतिष सिखाते, काका कालेलकर नक्षत्रों का ज्ञान देते. जेल के दरवाज़े बंद थे पर ज्ञान के दरवाज़े दिन-रात खुले रहते थे. न शिक्षक बाहर जाते न विद्यार्थी.

भवानी भाई की कुछ श्रेष्ठ रचनाएं जेल में ही लिखी गईं. जेल में उन्होंने अनेक भाषाएं सीखी. मराठी और गुजराती भाषा का ज्ञान उन्हें वहीं मिला. खलील जिब्रान के “प्रोफेट” का उन्होंने वहां काव्यानुवाद किया. उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि वहां बांगला का ज्ञान अर्जित करना था. इसकी स्वीकारोक्ति उन्होंने दूसरे सप्तक के वक्तव्य में भी की है. भवानी भाई 1945 में जेल से छूटे और महिलाश्रम वर्धा में शिक्षक के रूप में काम करने लगे. वहां 4-5 साल बिताए. उनके वर्धा जाने के कुछ ही समय बाद भारत के विभाजन से उत्पन्न परिस्थितियों को संभालने के लिए गांधी जी ने वर्धा छोड़ दिया. इस प्रकार भवानी भाई का गांधी जी से प्रत्यक्ष संबंध बहुत कम रहा. किंतु उनका प्रभाव बहुत अधिक पड़ा. अप्रत्यक्ष रूप से गांधी जी निरंतर ही भवानी भाई के साथ रहे.

दुनियादारी की दृष्टि से एक सफल व्यक्ति बनने की कामना भवानी भाई में कभी नहीं रही. उनकी इच्छाएं सीमित थीं. वे जहां भी रहे आनंद से रहे. ज़्यादह पढ-लिखकर पैसा कमाने की लालसा उनमें नहीं थी. उन्होंने एक छोटे से पारिवारिक स्कूल को चलाकर आजीविका आरंभ की थी और जब ब्रिटिश सरकार ने वह स्कूल छीन लिया तो वे गांधी जी की छत्रछाया में चले गए. वे 4 साल तक प्रेम और स्वाधीनता की भावना से भरपूर वर्धा के वातावरण में रहे. कुछ समय राष्ट्रभाषा प्रचार सभा में भी कार्य किया. आकाश वृत्ति का आनंद भी लिया. एक कवि सम्मेलन में हैदराबाद गए और वहां बद्री विशाल (प्रका- शक, “कल्पना”) का स्नेह पाकर 3 साल वहीं बिता दिए. बम्बई में आकाशवाणी के प्रोड्यूसर हो गए. वहां से दिल्ली आए. दिल्ली में सम्पूर्ण गांधी वांड.मय के संपादन को अंजाम दिया. गांधी-मार्ग का संपादन किया. और अंत तक “गांधी शांति प्रतिष्ठान” में रहे.

वर्धा जाने के बाद भवानी भाई ने खादी पहनना आरंभ कर दिया था. खादी में उनकी निष्ठा अंत तक बनी रही. खादी की आर्थिक दृष्टि उन्हें खरी लगती थी. मगर बाद में वे कात नहीं पाते थे. एक समय तो उनके कातने की गति और काते हुए सूत की गुणवत्ता देखने लायक़ थी. खादी के प्रति उनकी दृष्टि बुद्धि और भावना दोनों से जुड़ी थी. वे खादी को राष्ट्रीय प्रतीक न मानकर मानवीयता का प्रतीक मानते थे. गांधीवादी जीवन को जीते हुए कवि भवानी प्रसाद मिश्र का निधन 20 फरवरी 1985 में हुआ.

गांधीवाद की इमानदारी भवानी भाई के व्यक्तित्व का अभिन्न अंग बन गई थी. उनकी कविता में भी जो निष्कपट बेबाकी है, रहस्योद्घाटन की जो अदम्य क्षमता है, काव्य और साहित्य में मर्यादा अनुपालन का जो जज़्बा है, पाठक से संवाद करने की जो क्षमता है, जो सहज और सरल अभिव्यक्ति है, उसे हम गांधी के प्रति उनकी निष्ठा में ही सरलता से ढूंढ सकते हैं.

संपूर्ण गांधी वांड.मय का संपादन करते हुए भवानी प्रसाद मिश्र गांधी जी के लेखन के समीप आकर उसे (लेखन को) निकट से जान सके. उनके मूल्यों और जीवन दर्शन से तो वे वाकिफ थे ही, भवानी भाई ने गांधी जी के लेखन की कुछ विशेषताएं भी नोट कीं. इतना ही नहीं, गांधी जी की कतिपय शैली और भाषागत विशेषताओं को उन्होंने जाने-अनजाने अपने स्वरचित साहित्य में समाविष्ट किया. गांधी जी के लेखन में भवानी भाई ने कहीं न कहीं एक काव्यगुण का भी आस्वादन किया. इस संदर्भ में गांधी जी के जीवन का एक प्रसंग वे बताते हैं (“गांधीजी एक लेखक के रूप में”, गांधी-मार्ग, अप्रेल, 1979). एक बार मीरा बहिन ने गांधी जी से कहा मै चाहिती हूं कि आप मेरे लिए कोई प्रार्थना लिखकर दें. मैं रोज़ आपके ही मन की प्रार्थना करना चाहिती हूं. तब गांधीजी ने अंगरेज़ी में एक कवितानुमा प्रार्थना उन्हें लिखकर दी. उस प्रार्थना का भवानी भाई ने कुछ इस प्रकार हिंदी में काव्यानुवाद किया है -

हे नम्रता के सम्राट / भंगी की जीर्ण-क्षीर्ण कुटिया के निवासी / हमें इस योग्य बना कि हम / गंगा ब्रह्मपुत्र यमुना के जल में सिंचित / इस देश में / सब जगह तेरा अनुभव कर सकें / कि हम ग्रहण शील बन सकें / हमें उदार बना और खुला दिल दे / ऐसी दया कर कि हम भारत के हर आदमी से / एक रूप होने की शक्ति पा जाएं / और सदा उसकी सेवा के लिए तत्पर रहें. हे प्रभु, जब आदमी / समर्पित होकर / स्वयं शून्य बन जाता है / तब तू उसे अपना हाथ देता है / हमें इसलिए समर्पित होने की शक्ति / और जनता की सेवा में स्वयं आ जाने की / भक्ति दे. हमें उसका अंतरंग सखा / और सेवक बना / हमें अपनी विभूतियों का पात्र / और भाजन बना कि हम निस्व होकर साकार अकिंचनता बनें / और समझ कर प्यार कर सकें / इस देश को, इस धरती को.

भवानी भाई गांधी जी के लेखन में जिन गुणों से प्रभावित उनमें से एक तो है, उनकी “रचनात्मक बेचैनी”. वस्तुतः गांधी जी के लेखन में यह रचनात्मकता हम हर जगह पाते हैं. वे जब अनुवाद कर रहे होते हैं, जैसे “अण्टू दिस लास्ट” का, तो वे पुस्तक का केवल भाषागत अनुवाद नहीं कर रहे होते हैं बल्कि पुस्तक के भाव को आत्मसात कर उसे बिल्कुल नया रूप दे रहे होते हैं. पुस्तक के शीर्षक को ही देखें - उसे पूरी तरह रूपांतरित करके नाम दिया, सर्वोदय. गांधी जी की कई कृतियों का भवानी भाई ने भी अनुवाद किया है और उनमें भी आपको यही रचनात्मकता, यही मौलिकता. मिलेगी. एक दूसरा तथ्य जो भवानी भाई ने गांधी जी के लेखन में पाया वह था शब्दों का सत्य के हित में सीधा-सच्चा उपयोग. अपनी बात घुमा-फिराकर करने की बजाय, साक्षात् कथन में वे विश्वास करते थे और बोलचाल की भाषा में वे उसे कह डालते थे. भवानी भाई ने अपनी कविताओं में ऐसी ही भाषा का प्रयोग किया है. बल्कि इसी तरह की भाषा के प्रयोग की सलाह तक दी है –

जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख.

शब्द (कविता और साहित्य) सदैव सत्य के हित में होना चाहिए. जब वे सत्य के हित में होते हैं तभी नकारात्मक तथ्यों में परिवर्तन की संभावना बन सकती है.

भवानी भाई कविता के लिए कविता नहीं लिखते. वे कविता के मारफत सत्य को उद्घाटित करते हैं और असह्य तथ्यो के स्वरूप को बदलना चाहते हैं. उनके अनुसार कवि ही एक ऐसा प्राणी है जो दूसरों की पीड़ा और उससे उपजी संवेदना का भागीदार होता है. तभी तो वे कह पाते हैं कि –

बनिए और व्यापारी / और शास्त्री न रहें / कवि हो जाएं / रहें कवि की तरह / और सहें कवि की तरह – दूसरोंके लिए / कहता हूं सहें कवि की तरह / सिपाही की तरह / किसान की तरह / कामगर की तरह.... (मै क्यों लिखता हूं)

भवानी भाई मूलतः “उद्बोधन और आत्मोद्बोधन” (रमेश चद्र शाह) के कवि हैं. उनके काव्य में शायद आपको उस सूक्ष्म काव्य गुण का रसास्वादन न मिल सके जिसकी अपेक्षा कविता में शास्त्रीय रूप से की जाती है, किंतु अपने कथ्य और संप्रेषणीयता में आह्वाह्न करते हुए वे अद्भुत हैं. उन्होंने अपने कथ्य में कभी दूर की कौड़ी लाने की कोशिश नहीं की और न ही उन्होंने सामान्य बोलचाल की भाषा और काव्य की भाषा में अंतर किया. आज के दार्शनिक मुहावरे का यदि इस्तेमाल करें तो कहा जा सकता है कि वे सामान्य-बोध (कॉमन सैंस) और साधारण भाषा ( ऑर्डिनरी लैंगुएज) के कवि हैं. और यही कारण है किउनकी कविताओं में एक ज़बर्दस्त अपील है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता. उनकी कविता “गीत- फरोश” की ख्याति के पीछे कोई अदृश्य कारण ढूंढने की ज़रूरत नहीं है. साधारण बोलचाल की भाषा में जिस कौशल से इसे लिखा गया है वह जहां एक ओर गुदगुदाता है वहीं दूसरी ओर हमारे विचार को झकझोरता है, अपने व्यंग्यात्मक स्वर में !

भवानी भाई ने अपने जीवन और काव्य में गांधी जी के प्रभाव को पूरी तरह सहजते हुए भी अपनी मौलिकता को अक्षुण्य रखा है. गांधी जी के प्रेम और अहिंसा के संदेश को तो उन्होंने आत्मसात किया ही, उनकी समत्व दृष्टि को भी उन्होंने अपनी ही तरह से काव्य में पिरोया है –

तुम कागज़ पर लिखते हो / वह सड़क झाड़ता है / तुम व्यापारी / वह धरती में बीज गाढता है / एक आदमी घड़ी बनाता है / एक बनाता चप्पल / इसलिए यह बड़ा वह छोटा / इसमें क्या बल /

सूत कातते थे गांधी जी / कपड़ा बुनते थे / और कपास / जुलाहों के जैसा ही धुनते थे / चुनते थे अनाज के कंकर / चक्की पीसते थे / जिल्द बांध लेना पुस्तक की / उनको आता था / भंगीकाम सफाई से / नित करना आता था / ऐसे थे गांधीजी / ऐसा था उनका आश्रम / गांधीजी के लेखे / पूजा का सामान था श्रम /

एक बार उत्साह ग्रस्त / कोई वकील साहब / जब पहुंचे मिलने / बापू जी पीस रहे थे तब / बापू जी ने कहा – बैठिए / पीसेंगे मिलकर / जब वे झिझके / गांधी जी ने कहा / और खिलकर / सेवा का हर काम / हमारा ईश्वर है भाई / बैठ गए वे दुबसट में / पर अक़्ल नहीं आई.

भवानी भाई के लिए मनुष्य एक समग्र अस्तित्व है. इसमें उसका भौतिक और सामाजिक अस्तित्व उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उसका वह अस्तित्व जो दोनो का अतिक्रमण कर जाता है. कवि की तलाश एक आदम क़द आदमी की तलाश है. एक ऐसे आदमी की तलाश जिसके अस्तित्व में कविता के मारफत सारा संघर्ष – चाहे वह मन और शरीर का हो या व्यक्ति और समाज का, दुख और सुख का हो या भावना और विवेक का, समाप्त हो जाता है. –

अचल है कुछ /हमारे भीतर भी पहाड़ की तरह तरल है कुछ / नदी की तरह

लेकिन यह अचल और तरल विरोध की मुद्रा में खड़ा नहीं होता. भवानी भाई समन्वय की बात करते हैं और इस समन्वय का अंतिम छोर “विवेक” में देखते हैं. वह न तो मन की सुनते हैं न शरीर की. “सुनूंगा विवेक की”! किंतु कवि का यह विवेक सामान्य रूप से तर्क-बुद्धि न होकर, वह जिसे वे “स्नेह-बुद्धि” कहते हैं, है. कवि स्थितप्रज्ञता का पक्ष लेते हुए कहता है – “समवेत रहो, समुद्र भी रहो और चुप फैली हुई रेत भी”. क्योंकि यदि हम स्थितप्रज्ञ न हुए तो

गड़ेगा / हमारा तुम्हारा / इनका उनका होना / हमें तुम्हें इनको उनको / सबको

व्यक्ति के लिए शरीर और मकान और उपयोग में आने वाली वस्तुएं निःसंदेह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन भौतिक उपकरणों से भी अधिक महत्वपूर्ण हैं वे सारी संभावनाएं जो मनुष्य को महज़ एक वस्तु बनने से रोकती हैं –

हम तप करें / कि चिपके रहें हम / केवल ठोस से / या बहें तरल सपनों में भी / अधिकार हमारा भी / माना जाए /हमारे शरीरों पर / और मन पर / सागरों और वनों पर / शक्ति प्रेम की भी / पहचानी जाए ... कि सिवा / द्वेष और लोभ के भी / अर्जनीय है कुछ / (विनाश के आशय में)

यह “अर्जनीय कुछ” हम शायद केवल कविता के माध्यम से ही पा सकते हैं. आख़िर कविता ही तो हमें बताती है यह मामूली सी बात कि ‘’नुकसानदेह है आदमी का आदमी से टूट कर/केवल चीजों से जुड़ते जाना’’ (विनाश के आशय में)

* - डॉ सुरेंन्द्र वर्मा

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