गुरुवार, 17 मार्च 2016

मुकेश कुमार की ग्यारह कविताएँ...

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1.
बिखर गयी क़िताबें
अलमारी से एक एक करके
ख़तों को ढूढ़ने में उनक़े...

ज़र्द उड़ती गयी पन्नों से
झड़काते झड़काते...
सम्भालें हुए उनके...

खतायें उनकी, उनमें
शिकायत एक थीं उनकी...

2.

आदमी उजड़ जाता हैं क़ि
उसका घर उजड़ जाता हैं।
बाग़ उजड़ जाता हैं
क़ि पंछी उड़ जाते हैं
क़ुदरत की शके-नज़र  में
हर शख्श उजड़ जाता हैं।

3.

क्यूँ बेरुखी सी छा जाती हैं मुझ पर
तेरे जाने के बाद मेरे मरने से पहले
वो दिन भुला नहीं पाया जब तुम चली गयी
मेरे गमो सितम के साथ छोड़ गयी.....
एक साल गुजर गया तुम्हारे बिना जिये
एक साल हो गया तड़पते तड़पते
आज ही के दिन...
शिकायत नहीं रहती अब किसी से तुम्हारे बिना
सवाल भी तू जवाब भी तू हर निकला शब्द तू,
तेरी यादों के सहारे जीने लगें हम
अब दूर दूर तक किनारा नज़र नहीं आता।
मेरी दूनिया तुम से शुरू तुम पे खत्म होती।
अब सिमट सा गया तेरी क्रब तक...
आते आते अश्कों में सैलाब सा उमड़ गया।

4.

मेरा वो चाँद आसमां में दिखाई नहीं देता
टूटते है तारें रोज रोज पर....
खाली किताब कैसे लगें
ज़िन्दगी अब मुझे वैसी लगे
तेरे बिन जीना गवारा लगें
ये ख्वाहिशें अनकही लगें
5.

बन्द कमरे के अंधेरे में
ढूँढता हूँ खुद को...
तलाशीयां लेता हूँ जेबों की
कुछ मिल जाये रखने को...
हाल बेहाल होने लगा बेफ़िक्र
जमी को चादर ओढ़ सोने लगा
लफ्ज़ों को बाँधकर सन्दुक में
अब धीमे धीमे मरने लगा...

6.
न तुम्हें पढ़ना आता हैं
न हमें पढ़ना आता हैं।

न तुम्हें लिखना आता हैं
न हमें लिखना आता हैं।

न तुम्हें झूठ बोलना आता हैं
न हमें झूठ बोलना आता हैं।

चलो अदब से तुम ओर हम
निगाहों से दिल को बयां करें।

7.

ग़म ना राहों का होता हैं
ना किनारों का होता हैं
बस यही होता हैं...
चलता मुसाफ़िर दें देता हैं।
8.

अनजान बेख़बर हैं
इन खताओं से तुम्हारी
मुझें मालूम न था क़ि
तेरी बातों का मुझ पर
ये तेरा हस्र होगा...
ये सोच कर क़ि हम भी
ग़र से ग़र कों चलें...
9.

अल्फाज़ो की तरह रह गया
बेवक़्त ही काश! रह गया
सोचो ना सोचता रह गया
ग़मों की कश्ती में बहकर
किनारों को ढूँढ़ने निकला
बीच दरिया कश्ती में बह गया
लिबास में लिपटे हुए से थे
आजकल शायद! बन कर गया
अल्फ़ाज़ों की तरह बनकर रह गया।

10.
दो वक़्त की रोटी के लिए....

छोड़ चले जाते हैं अपने अपने घरों को
दो वक़्त की रोटी के लिए....
दो पल के सुकुन के लिए.....
जिनमें जीती थी असल में ज़िंदगी
जहाँ बीता था उनका बचपन जवानी
वहाँ आज आकड़ों के सिवा रंजो गम रहते।

छोड़ चलें जाते हैं अपने अपने घरों को
कोई बेटी के ब्याह के लिए
कमाने निकल जाता हैं।
तो क़ोई निकल जाता हैं
अपने बेटों को अच्छी परवरिश के लिए।

शहरों में चाहें वो रहने लगें
अमन चैन से जीने लगें
पर घूमते रहते हैं...
आधे आधे मुर्दे समां,
असल ज़िन्दगी उन्हीं घरों में नज़र आती हैं।

वो लौट तो आते हैं...
अक़्सर पर वो जिन्दा नहीं रहते
कफ़न में लिपटा हुआ...
लकड़ी के लढ्ढो पर डाल कर
उनके गाँव में अंतिम मन्ज़िल को पा जाता।

पर वो आते तो हैं सब मिलकर उसे
छोड़ चलें जाते हैं अपने ही उस गाँव में,
जब निकला था घर चौबारे से अपने गाँव की गलियों से...
छोड़ चलें जाते हैं अपने अपने घरों को
दो वक़्त की रोटी के लिए
दो वक़्त के सुकून के लिए

11.

हां मैंने ख़ुशी को खुदकुशी करते देखा
बेबसी की चीखों को दम भरते देखा।
अब वो मंजर नहीं रहा जिसे मैं कह सकूँ
हर तरफ बर्बाद-ए-मंजर लूटते देखा

अब वो नहीं रहा जो पहले था।
जो पहले था अब वो नहीं रहा।
खूब देखा आसमाँ तले सिकन्दर को
सियासत के दम पर हुकुम चलाने वाले को
अब वो रहा नहीं जमीं पे हर इंसान का
अब तो खुदा भी झूठ लगता है हर एहसान का

जब रोज रोज ख़बरें आ रही की
वहां सब कुछ था की टूट रहा है,
जमीं चादरों ने मासूमियत खोयी हैं
हमने देखा हैं इंसान को टूटते

इंसान की आंखों में दर्द था
शांति शील धारा गूंज रही थी
मानो किसी हाहाकार में डूब रही थी
ये हादसा था , ना किसी ने पहले देखा
हां! इंसान हमने तुझे टूटते देखा

रोने को दर्द नहीं ये मंजर काफ़ी हैं
हँसने बहाने सही एक जख्म काफ़ी हैं।
हँसने को हँसी नहीं, रोने के आँसू नहीं
दर्द इतना है की मरहम भी काफी नहीं।

Email:- mukeshkumarmku@gmail.com

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