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बोध के वाहक हैं ‘संभव है’ संग्रह के निबंध / समीक्षा / आचार्य बलवन्त

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‘निबंध’ संस्कृत भाषा का शब्द है। संस्कृत की कोई भी मौलिक रचना चाहे वह गद्य में रही हो या पद्य में, निबंध या प्रबंध कही जाती रही है। हिंदी में निबंध लेखन की परंपरा का आरंभ उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध (भारतेन्दु युग) से माना जाता है। निबंध गद्य-रचना का वह रूप है, जिसमें किसी विशेष अनुभव अथवा विचार को सहज, सरल, सटीक व सारगर्भित ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। इसकी भाषा गद्य की अन्य विधाओं से अधिक प्रांजल, प्रौढ़ और परिमार्जित होती है। साहित्य मनीषियों ने इसे कहानी और उपन्यास आदि के विकास के उपरान्त की विधा बताया है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने निबंध को गद्य की कसौटी कहा है। बाबू गुलाब राय ने सीमित आकार की उस गद्य रचना को निबंध की संज्ञा दी है, जिसमें किसी विषय का वर्णन एक विशेष निजीपन, स्वच्छता, सौष्ठव, सजीवता तथा आवश्यक संगति और संबद्धता के साथ किया गया हो।

साहित्य जगत में ज्ञानचंद मर्मज्ञ उन गिने-चुने साहित्यकारों में एक हैं जो अनूठे प्रतीक तथा अभिव्यक्ति की सहज और सुबोध शैली के लिए जाने जाते हैं। मर्मज्ञ का कथालोक कल्पना की भित्ति पर खड़ा न होकर यथार्थ की वास्तविकताओं पर आधारित है। आपके सद्यः प्रकाशित संग्रह “संभव है” के निबंध जीवन के विभिन्न आयामों से संबंधित हैं। इनके कथ्य रोचक, रोमांचक, रमणीय और शिक्षाप्रद हैं। जीवन के विविध रंगों का इतना विशद, विहंगम व हृदयस्पर्शी चित्रण बहुत ही कम देखने को मिलता है। प्रख्यात गीतकार नीरज ने ‘संभव है’ की उपादेयता को सराहते हुए कहा है- विषयों पर आपके वैचारिक निबंधों की यह श्रृंखला काव्य की गरिमा से कहीं कम नहीं है। आपका ‘सृजनात्मक लेखन’ साहित्य की आगामी पीढ़ी को भावोन्मुख लेखन की ओर प्रेरित करेगा। कवि उदय प्रताप सिंह ने निबंधों में निहित मार्मिकता को महसूस करते हुए ही इन्हें बिहारी के दोहों की भाँति मर्मभेदी बताया है।

मर्मज्ञ जी ‘अपनी बात’ भी कुछ इस तरह से करते हैं कि उनकी बात मनुष्यता की बात हो जाती है। मनुष्य की श्रेष्ठता का बखान करती ‘अपनी बात’ की ये पंक्तियाँ हृदय को गहराई तक स्पर्श करती हैं-‘हृदय बनाया तो ढेर सारा स्नेह भर दिया, कंठ बनाया तो सुर से भर दिया, मन बनाया तो संवेदना भर दी और आँखें बनाई तो उनमें अनगिनत सपने भर दिए।’

मन की आँखों से देखे जाने वाले सपनों की विशेषता का अत्यंत प्रभावोत्पादक रूप ‘सपने सच भी होते हैं’ निबंध की निम्न पंक्तियों में देखा जा सकता है। ‘ये चिंतन की आग में तपे होते हैं, इनसे समर्पण की रश्मियाँ प्रस्फुटित होती हैं और कुछ करने की चाहत इन्हें बेचैन किए रहती है।’ संस्कृति और सभ्यता के सपनों को बचाए रखने की ललक भारतीय संस्कृति के प्रति लेखक की गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाती है। ‘संभावनाएं अभी भी बाकी हैं’ निबंध-रचना मनुष्य और प्रकृति के अन्तर्संबंधों को रेखांकित करती हुई इस तथ्य की ओर इशारा करती है कि जीवनदायी वृक्षों, नदियों, आकाश एवं उसके तारों से संपृक्त हुए बिना अनंत के विस्तार में स्वयं को ढूँढ पाना कठिन ही नहीं, बल्कि असंभव है। ‘शहर के छोर पर बसने वाले गाँवों को इस डर से नींद नहीं आती कि कहीं शहर उन्हें लील न जाए का इंगितार्थ शहरी जीवन शैली से सावधान रहने की जरूरत पर बल देता है।’

‘भारतीयता’ संग्रह का एक विचारोत्तेजक और सारगर्भित निबंध है, जो जीवन में व्याप्त विद्रूपता और नैतिक मूल्यों के ह्रास को उजागर करता है। ‘नैतिक मूल्यों का क्षरण हमारे संस्कार को निगलता जा रहा है और हम हैं कि अपाहिज व्यवस्था को गले लगाये अपने स्नेह की पूँजी और विश्वास का गंगाजल उन्हें सौंप देते हैं, जो देश के साथ विश्वासघात करने में थोड़ा भी नहीं हिचकिचाते।’ जैसी आक्रोशपूर्ण उक्तियाँ राजनेताओं की मंशा को ठीक से भापने की जरूरत पर बल देती हैं ताकि हम उनके झाँसे में आने से बच सकें। परन्तु ऐसा तभी संभव है जब हमें अपने अधिकारों का ज्ञान, कर्तव्यों की समझ और जिम्मेदारियों का भान हो। ‘हिंदी का वनवास’ स्वतंत्र भारत में हिंदी की यथा स्थिति का अत्यन्त कारूणिक चित्रण है। स्वतंत्रता के अड़सठ वर्ष बाद भी हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा न दिये जाने पर लेखक के अन्तर्मन का उद्वेलन फूट-सा पड़ा है। ‘जिस भाषा ने स्वतंत्रता सेनानियों के अधरों को भारत माँ के जयघोष से संवारा, आज वह भाषा अपने ही देश में अनुवाद की भाषा की जिन्दगी जीने पर मजबूर है और जोगन की तरह अपनी पहचान के लिए दर-ब-दर भटक रही है।’ हिंदी हिन्दुस्तान के हृदय की धड़कन है। हिंदी की उपयोगिता और भारतीय जनमानस में उसकी गहरी पैठ को देखकर ही जर्मन विद्वान लोठार लुत्से ने कहा था- हिंदी सीखे बिना भारत के दिल तक नहीं पहुँचा जा सकता।

मनुष्य की बाल प्रकृति का यथार्थ और मनोहारी निरूपण ‘वो बच्चा’ निबंध का मुख्य लक्ष्य है, जिसे साधने में लेखक को अपेक्षित सफलता प्राप्त हुई है। ‘हर दिन भोर की पहली किरण की लालिमा उसके (बच्चे) चेहरे को स्पर्श कर अपने सौंदर्य को निखारा करती थी।’ की प्रतीकात्मकता बाल रूप के अनूठे लावण्य को व्यंजित करती है। ‘उसकी मुस्कराहट इतनी बड़ी कि देखने वाले उसमें समा जाते थे’ की शब्द, शिल्प और शैलीगत सहजता देखते बनती है। उक्ति के इंगितार्थ भी अद्भुत हैं। बच्चे की निश्छल हँसी के परिप्रेक्ष्य में रामचरितमानस की जगह मानस होता तो उसकी व्यंजना अपेक्षाकृत अधिक बलवती हुई होती। इसके प्रथम अनुच्छेद में वर्णित बचपन की प्रस्तावना अत्यन्त प्रभावोत्पादक है। इसमें लयात्मकता इतनी है कि पूछिए मत! सच्चाई की तुलसी रोपना, जीवन की थाप ढूँढना, भीड़ का चेहरा बनना, अधरों पर मुस्कान की सुनहरी नदी का बहना, जीवन बनकर लोगों में प्रवाहित होने जैसी अलंकारिक उक्तियाँ शब्द- सौन्दर्य को नई दीप्ति से भर देती हैं। बाल जीवन की महत्ता को प्रतिपादित करती निम्न पंक्तियाँ हमारा ध्यान आकृष्ट करती हैं- ‘काश! वो बच्चा हम सबके अंदर जीवित होता तो सब कुछ कितना अलग होता। हर तरफ खुशियाँ ही खुशियाँ चहक रही होतीं। द्वेष, घृणा और नफरत के लिए कोई स्थान नहीं होता।’ हालाँकि तितली से भी हल्के होने की परिकल्पना काव्य के प्रचलित मानदण्डों से बिल्कुल अलग लगती है।

‘मम्मी! पापा गंदे तो नहीं’ रिश्ते की पवित्रता के ताने-बाने को तार-तार करने वाली घृणित सोच पर सवाल खड़े करता एक विचारात्मक निबंध है। ‘कब, क्यों, कहाँ और कैसे’ निबंध मनुष्य की मानसिक वृत्तियों का मनोवैज्ञानिक विशेलेषण प्रस्तुत करता है। मुस्कराहट को संतुलन का श्रेष्ठ उदाहरण कहें तो गलत न होगा, बशर्ते कि वह किसी स्वार्थसिद्धि के लिए चेहरे पर थोपी न गई हो। ‘जब प्यासे अधरों से मुस्कराहट की चौपाइयाँ झरना बनकर फूटेंगी तब इन्हें स्वतः खुशियों के रामायण का रसपान होने लगेगा’ की लयात्मकता आकृष्ट करती है। ‘कबूतर की व्यथा’ भी अत्यन्त विचारोत्तेजक और सारगर्भित निबंध है। शांति के संदर्भ में प्रयुक्त कबूतर की प्रतीकात्मकता अनूठी है। सर्वविदित है कि भौतिक संसाधन हमें सुख-सुविधाएं तो उपलब्ध करा सकते हैं, पर मन की शांति नहीं दे सकते। शांति की तलाश के परिप्रेक्ष्य में शांति के लिए सीमा पर तैनात सिपाहियों की जगह सुरक्षा के लिए तैनात सिपाहियों.....उपयुक्त होता।

‘सृजनात्मक लेखन’ लेखन के औचित्य पर प्रकाश डालते हुए उसकी विशेषताओं का विवेचन करता एक हृदयस्पर्शी निबंध है। स्नेह, सद्भाव, समानता और विश्वबंधुत्व की अवधारणा को पुष्ट करने वाले साहित्य को ही सृजनात्मक लेखन की श्रेणी में रखा जा सकता है। युगीन चेतना को प्रबुद्ध करने के लिए सृजनात्मक लेखन आवश्यक ही नहीं अपरिहार्य भी है। ऐसा न होने की स्थिति में हमारी पहचान की गरिमा पर पड़ने वाले प्रभाव को निम्न पंक्तियों में देखा जा सकता है- ‘लेखन स्वयं में ऐसी घटना है जिसके न होने की स्थिति में न केवल हमारे विचार, हमारी भावनाएं, हमारी संस्कृति और हमारा ज्ञान-विज्ञान आनेवाली पीढ़ियों को संप्रेषित होने से वंचित रह जाते हैं, बल्कि हमारी पहचान की गरिमा भी धूमिल पड़ने लगती है।’

16 जून, 2013 को उत्तराखण्ड के केदारनाथ में आई भीषण बाढ़ से हुई जन-धन की क्षति को प्राकृतिक असंतुलन का प्रमुख कारण बताना युक्ति संगत है। प्रकृति की प्रकृति को बदलने की मनुष्य की दूषित मंशा ही इस विभीषिका के लिए उत्तरदायी है। प्रकृति के कोप का हृदयविदारक दृश्य ‘प्रकृति’ की निम्न पंक्तियों में पूरी जीवंतता के साथ उभरा है-‘आस्था के वो रास्ते जिन पर चलकर लोग अपने ईष्ट देव के चरणों तक पहुँचने का विश्वास रखते थे, अचानक बहने लगे। देखते ही देखते पहाड़ों की आँखों से इतने आँसू बहे कि मिट्टी और पत्थर के रास्ते पानी के सैलाबों में तब्दील हो गये।’ ‘भूकंप’ आत्मकथात्मक शैली में लिखा गया विमर्शपरक निबंध है, जो प्रकृति के प्रति हमारे गैर जिम्मेदार रवैये को रेखांकित करता है।

‘मैं हिंदी बोल रही हूँ’ निबंध हिंदी भाषा और उसकी संस्कृति के अन्तर्संबंधों को प्रकट करता है। इसका कथ्य ‘हिंदी का वनवास’-सा ही मार्मिक व हृदयग्राही है। हिंदी भाषा के अस्तित्व पर मंडराते संकट से रू-ब-रू कराती ये पंक्तियाँ हमें ठहरकर सोचने के लिए बाध्य कर देती हैं। ‘आपके अधरों पर उगकर मैं यह भी भूल जाती हूँ कि जिन स्पर्शों को मैं अपनी प्यास की अन्तिम अभिलाषा समझ रही हूँ, वह उस छलावे का रेतीला तट मात्र है, जहाँ मैं पिछले कई वर्षों से प्यासी भटक रही हूँ। आपकी खुशिया मुझे अभिभूत तो करती हैं मगर दुःख का गहन अंधकार मेरा हाथ पकड़कर उस ओर खींच ले जाता है, जहाँ किसी ने सूरज का बीज तो बोया पर अभी तक प्रकाश का कोई पौधा नहीं उगा।’

माँ, शब्द निःशब्द, भूकंप, लौट आते तो अच्छा होता शीर्षक निबंध भी निबंध कला की कसौटी पर खरे प्रतीत होते हैं। संग्रह के अधिकांश निबंधों के कलेवर कसे हुए हैं। शब्द संयोजन लयात्मक आरोह-अवरोह से इस तरह आबद्ध है कि कदम-कदम पर काव्यात्मक छवियाँ सजीव हो उठी हैं। मर्मज्ञ जी के निबंध जीवन की सकारात्मकता को बल देते हुए बोध के वाहक बनकर मानवीय मूल्यों की स्थापना में सहायक सिद्ध होंगे, ऐसा मेरा विश्वास है।

समीक्षक : आचार्य बलवन्त

पुस्तक : संभव है (निबंध संग्रह)

लेखक : ज्ञानचंद मर्मज्ञ

हिंदी विभागाध्यक्ष

कमला कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज

450, ओ.टी.सी.रोड, कॉटनपेट,

बेंगलूर-560053, कर्नाटक

मो. 9844558064 Email- balwant.acharya@gmail.com

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