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कष्टकारी है मुखौटों के बीच जीना - डॉ. दीपक आचार्य

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भगवान का दिया हुआ चेहरा आदमी पर नज़र नहीं आता। जिधर देखें उधर आदमी का वह चेहरा नज़र नहीं आता जो उसका अपना हुआ करता था, जिसे देख कर उसे प्रसूत करने वाली माँ खुश हुआ करती थी, पिता भी बार-बार मचलता था उसे देखने। उसे देखते ही घर-परिवार के लोगों को भी भरोसा हो जाता था कि यह अपना ही है, अपने लिए है।

पास-पड़ोस के लोग भी उस चेहरे को पहचानते हुए फख्र महसूस  किया करते थे कि अपना होनहार अपने गाँव-शहर और देश के लिए कुछ न कुछ करेगा ही करेगा। यह सारी बातें अब हवा हो गई हैं, बेमानी लगने लगी हैं, क्योंकि आदमी में अब वो चेहरा नज़र नहीं आता जो आदमी का होना चाहिए।

जब इंसानियत गायब हो जाती है तब चेहरा धुंधला पड़ने लगता है। ऎसे इंसान के पास जाने और दर्शन करते ही पता चल जाता है कि आदमीयत की गंध कम होने लगी है और इसकी बजाय दूसरी गंध छाने लगी है। यह गंध पैशाचिक और आसुरी हो सकती है, किसी हिंसक जानवर की हो सकती है या ऎसी-वैसी गंध भी हो सकती है कि जिसे सूंघ कर दूसरों को घृणा आने लगे।

कुल मिलाकर आज के हालातों में आदमियों की विस्फोटक भीड़ में वे लोग कम ही नज़र आते हैं जिन्हें वाकई आदमी कहा जा सकता है। लोग याचक होते जा रहे हैं, चूहे-बिल्लियों, श्वानों की तरह लपक रहे हैं, लोमड़ों की तरह लोभी-लालची होकर रिश्वत खाने और भ्रष्टाचार में रमने लगे हैं, बहुत से पकड़े जा रहे हैं, ढेरों बचे या छूटे हुए हैं, हिंसक व्यवहार करते जा रहे हैं, आँखें और दाँत दिखा रहे हैं, इस तरह पेश आ रहे हैं कि जैसे पंजे, नाखून और सिंगों से हमला करने ही वाले हों।

तरह-तरह के बाड़ों में ऎसे-ऎसे लोग जमा हैं जिन्हें देख कर कहीं नहीं लगता कि ये इंसान भी हो सकते हैं। इनकी शक्लें देखकर हर कोई विधाता के विधान पर आश्चर्य व्यक्त करता है कि आखिर क्यों इन्हें इंसान बना डाला है।

आदमी के चेहरे अजीब होते जा रहे हैं, किसी की नाक लम्बी हो गई है या खींच-खींच कर लम्बी कर दी गई है, और इतनी लम्बी कि सामने वाले दिखाई नहीं देते। दिख भी जाते हैं तो नाक भाला बनकर चुभने लगती है। आँखों में बहुरूपिये तैरते नज़र आते हैं। कोई किसी के सामने गिड़गिड़ाता रहता है, कोई आँखें लाल कर औरों को डराने लगा है। बहुत से लोग तो यों लगते हैं कि जैसे जमाने भर को खा जाने के लिए ही पैदा हुए हों।

ये लोग हमेशा इसी खूंखार मुद्रा में नज़र आते हैं। बहुत सारे लोग ऎसे हैं जिन्हें हिंसक और खौफनाक मानकर लोग उनसे भयभीत रहते हुए पास जाने से डरते हैं, पता नहीं कब किस बात को लेकर भौं-भौं करने लगें, चिल्लाने लगें और श्वानों तथा मगरमच्छों की तरह पेश आ जाएं।

अधिकांश इंसान मुखौटों को लिए घूम रहे  हैं। बहुत बड़ी संख्या उन लोगों की है जो कि एक साथ कई मुखौटे रखते हैं, जहाँ जैसा मौका पड़ जाए, वहाँ वैसा ही कामयाबी देने वाला मुखौटा पहन लिया करते हैं।

मुखौटों के फसल उगाते-उगाते लोग शातिर हो चुके हैं। उन्हें पता है कि कब कौनसा मुखौटा सामने वालों को आकर्षित करता है और किसका इस्तेमाल लाभकारी रहेगा। मुखौटा संस्कृति  का झण्डा गाड़ने वालों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है।

सब तरफ मुखौटों का अजीबोगरीब संसार दिखने लगा है। हर कोई न अपने आप में है न अपने आपे में। मुखौटों का पूरा का पूरा नेटवर्क है जो चला रहा है मुखौटों को । अजीब-अजीब मुखौटे हैं इधर-उधर, सब तरफ।

बड़ा और प्रभावशाली मुखौटा जब कभी मंच पर उतरता है, दूसरे सारे छोटे मुखौटे उसकी हर तरह खातिरदारी में जुट जाते हैं, परिक्रमा और जयगान करने लग जाते हैं। शेर का मुखौटा धारण करने वाले बिल्लियों वाले मुखौटों को डराते रहते हैं मगर अपने से बड़े बब्बरों और बब्बरियों के आ जाने के बाद खुद चूहों के मुखौटे धारण कर लिया करते हैं।

हर किस्म के मुखौटे अब हमारे पास हैं, जब जिसकी जरूरत पड़ जाए, धारण कर लिया करते हैं, फिर बदल-बदल कर आगे बढ़ते रहते हैं। शुरू-शुरू में कहा जाता था कि आदमी मुखौटा धारण कर जिन्दगी भर उसी के सहारे जीता है। पर अब आदमी केवल एक-दो मुखौटे धारण करने वाला नहीं रहा बल्कि मुखौटे की दुकान या छोटा-मोटा कियोस्क होकर रह गया है। 

सबसे ज्यादा समस्या तो उन अच्छे और सच्चे लोगों की है जो इनके साथ काम करते हैं। हममें से बहुत से लोग हैं जिनकी यह समस्या है। कितना अजीब, कितना वीभत्स, दारुण, पीड़ादायी और दुःखद लगता है ऎसे लोगों के साथ काम करना।

इन बिकाऊ बहुरूपियों, वृहन्नलाओं और नचैयों की तरह हर आँगन में नच जाने, नुच जाने और लुट जाने वाले लोगों के साथ काम करना सचमुच में कितना कष्टकारी होता है, इसे वही जान सकते हैं जो इन्हें झेलते हैं। ईश्वर सज्जनों की रक्षा करे।

 

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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