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झाडू के दिन फिरे / व्यंग्य / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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झाडू कहें या बुहारी, कूचा कहें या झाड़न – सब एक ही परिवार के सदस्य हैं. इस परिवार के दिन कभी न फिरे. यह हमेशा तिरस्कृत ही रहा. दूसरों को साफ़-सुथरा करता रहा लेकिन स्वयं कूड़े से भी बदतर समझा जाता रहा. पर झाडू के दिन अब फिर रहे हैं. जब से एक नव-निर्मित राजनैतिक दल को झाडू का चुनाव-चिह्न मिला है, झाडू इतराने लगी है. इतराने की बात ही है. वैसे झाडू एक छोटा सा उपकरण है. पर है यह बड़े काम का. जहां जहां धूल और गर्द है, वहां वहां इसकी मांग है. इसी मांग के चलते वह राजनीति में घुसपैठ कर सका. राजनीति में भ्रष्टाचार बुहारने का काम अपने सिर ले लिया और इस तरह भ्रष्टन की पोल खोलते-खोलते पोलिंग बूथ तक पहुँच गया.

झाडू चाहे नारियल की हो, चाहे सींकों की, चाहे वह फूल-झाडू ही क्यों न हो – जहां भी गंदगी हो, उसे साफ़ करने में सक्षम है. सुबह उठकर घर-घर में झाडू लगाई जाती है. घर का सारा गर्द इस तरह जनपथ पर आ जाता है. दूकानों और घरों की गंदगी सड़क पर फ़ैल जाती है. यहाँ तक कि महात्मा गांधी मार्ग भी इससे बच नहीं पाया है. कूड़ा तो कूड़ा है, जहां भी जाएगा गंदा ही करेगा.

एक बार मैं अपने एक मित्र के यहाँ गया. काम था, सुबह ही सुबह पहुँच गया. वह सोफे पर धंसे बैठे थे. पास की कुरसी पर इशारा करते हुए बोले, बैठिए. मैं बैठ गया. कहने लगे, आज हमारा सफाई -कर्मी अभी तक नहीं आया है सो कमरे की डस्टिंग नहीं हो पाई. आप कुरसी पर बैठे तो कम से कम कुर्सी तो साफ़ हो गयी. हंसते हुए यह भी जोड़े बिना नहीं रहे कि डर है अगर आप की झाडू राजनीति की कुर्सी पर बैठ गयी तो कहीं राजनीति ही गायब न हो जाए !

जहां तक मुझे याद पड़ता है झाडू का सामाजिक-राजनैतिक उपयोग सबसे पहले भोपाल में हुआ था. वहां घटित गैस-त्रासदी पर अंतर्राष्ट्रीय जागरूकता पैदा करने के लिए तब एक चम्पा देवी और राशिद बी को अमेरिका का प्रतिष्ठित ‘गोल्ड-मैन’ पुरस्कार दिया गया था. यह पुरस्कार पर्यावरण के क्षेत्र में “नोबेल” का दर्जा रखता है. इन दोनों महिलाओं ने ‘डाड’ एक दिचास्प अभियान छेड़ा था जिसका नाम था, ‘झाडू मारो डाड को ! इसके लिए भोपाल के घरों से पांच हज़ार इस्तेमाल की गई झाडूएँ जमा की गईं थीं और यूनियन कार्बाइड के दफ्तर में दाखिल कर दी गईं थीं. संकेत था, अगर तुम त्रासदी पीड़ितों की ज़िम्मेदारी नहीं लोगे तो हम धरती पर से तुम्हारे कारोबार को भी बुहार देंगे.

झाडू काव्य-क्षेत्रे भी अपनी धमाकेदार उपस्थिति दर्ज कर चुकी है. भारत भूषण स्मृति पुरस्कार (२००४) में जिस कविता को सम्मानित किया गया था वह प्रेमरंजन अनिमेष की कविता थी. शीर्षक था, “इक्कीसवीं सदी की सुबह झाडू देती स्त्री”. कविता की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार थीं –

सुबह सुबह उठकर झाडू देने में जुट गई है स्त्री/ क्या उसे ख्याल है कि यह इक्कीसवीं शताब्दी की सुबह है/ और जिसे वह घर की धूल समझकर/ बुहार रही है उसमें दरअसल है/ एक पूरी शताब्दी... या समूची सहस्राब्दी की धूल.. . सदियों से जमी आखिर इस धूल को कौन बुहारेगा? लगता है जबतक लोग झाडूवाली राजनीति नहीं करेंगे यह धूल साफ़ होने वाली नहीं है! होशियार, झाडूवाली राजनीति शुरू हो गई है. और दिल्ली से आरम्भ हुई है. कूड़े और झाडू में परस्पर शक्ति परीक्षण चालू आहे. देखना है, झाडू कूड़े को हटाती है या कूडा झाडू को कूडा कर देता है. जो भी हो, कूड़े के दिन ही नहीं फिरते, झाडू के दिन भी फिर गए हैं.

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