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रचना और रचनाकार (१२) / नए पथ और नई दिशा के अन्वेषी - धर्मवीर भारती / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में 1950 में बी.ए.(प्रथम-वर्ष) में दाख़िला लिया था. 1949 में धर्मवीर भारती का उपन्यास “गुनाहों का देवता” प्रकाशित हो चुका था और उसकी गूंज इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उन दिनों स्पष्ट सुनी जा सकती थी. मेरा विषय हिंदी नहीं था. लेकिन “गुनाहों का देवता” की चर्चा ने मुझे इस उपन्यास को पढ़ने के लिए मानों बाध्य ही कर दिया था. ज़ाहिर है मैं उन दिनों किशोर वय की आख़िरी सीढियां पार कर रहा था. ऐसे में यह उपन्यास मेरे मन को छू गया. उसकी रूमानी भावुकता मेरे दिलो-दिमाग़ पर छा गई. धर्मवीर भारती से इस उपन्यास के ज़रिए मेरा प्रथम परिचय हुआ. इस उपन्यास ने भारती को एक उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया था. लेकिन आज जब धर्मवीर भारती का ज़िक्र होता है तो उनकी छबि साप्ताहिक पत्रिका, “धर्मयुग” के सम्पादक के रूप में मानो उनके हर क़दम को पीछे ढकेलती हुई सी सामने आती है. एक समय ऐसा भी आया था जब धर्मवीर भारती और “धर्मयुग” एक दूसरे से इतने जुड़े हुए थे कि धर्मयुग धर्मवीर भारती हो गया था और स्वयं धर्मवीर भारती साक्षात धर्मयुग बन गए थे. मज़े की बात तो यह है कि धर्मवीर भारती “धर्मयुग” में इस शर्त पर आए थे कि धर्मयुग में रहते हुए उन्हें अपनी साहित्यिक रचना-धर्मिता छोड़ने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा. वस्तुतः “टाइम्स आफ इंडिया” समूह ने नियमों के विपरीत धर्मवीर भारती की ज़िद पर उन पर धर्मयुग में काम करने के दौरान उनके अपने रचनात्मक लेखन पर बंदिश लगाने की शर्त उठा ली थी.

धर्मवीर भारती (25 दिसम्बर 1926 – 4 सितम्बर 1997) आधुनिक हिंदी-साहित्य के प्रमुख लेखक, कवि, नाटककार, सामाजिक विचारक और अपने समय की प्रख्यात पत्रिका “धर्मयुग” के संपादक थे. उनका जन्म प्रयाग में हुआ था और उन्होंने शिक्षा भी इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की थी. प्रथम श्रेणी में एम. ए. करने के बाद डॉ. धीरेंद्र वर्मा के निर्देशन में उन्होंने पीएच.डी प्राप्त की. लेकिन अध्यापन छोड़ कर उन्होंने पत्रकारिता को ज़्यादह तरजीह दी. धर्मयुग में पत्रकारिता के लिए धर्मवीर भारती का आना अप्रत्याशित नहीं था. इससे पहले वे पद्मकांत मालवीय के साथ “अभ्युदय” में काम कर चुके थे और इलाचंद जोशी के साथ “संगम” से भी जुड़े रहे थे. “संगम” के दिनों में मुझे याद है कि मैं एक छोटे से कस्बे, मैनपुरी, में हाई स्कूल का विद्यार्थी था. जहाँ पर “संगम” पत्रिका के नए अंक की हम बेसब्री से प्रतीक्षा किया करते थे. दो वर्ष यहां काम करने के बाद भारतीजी हिदुस्तानी अकादमी, इलाहाबाद, में अध्यक्ष नियुक्त हुए. सन् 1960 तक यहां कार्य किया “धर्मयुग” में जाने से पूर्व धर्मवीर भारती साहित्यिक रूप से प्रतिष्ठित हो चुके थे और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में एक अध्यापक की तरह उनकी नियुक्ति भी हो चुकी थी. यहां अध्यापन के दौरान “हिंदी साहित्य कोष” के संपादन में सहयोग दिया. “निकर्ष” पत्रिका निकाली तथा ‘आलोचना’ का संपादन किया. लेकिन साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में अपनी पहुँच बना लेने के बाद भी पत्रकारिता के लिए उन्होंने मुम्बई जाना अधिक श्रेयस्कर समझा. उनके शुभेच्छुकों को यह अच्छा नहीं लगा. पर भारती जी धर्मयुग में प्रधान संपादक के पद पर 1987 तक रहे. उनके धर्मयुग में आने से हिंदी साहित्य और पत्रकारिता का परिदृश्य ही बदल गया. “इलस्ट्रेटेड वीकली” की तर्ज़ पर निकाले गए “धर्मयुग” ने पूरे भारत में अपनी एक अलग पहचान बना ली. धर्मवीर भारती ने इसे नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं.

धर्मवीर भारती विविध विधाओं के एक सधे हुए साहित्यकार हैं. उनके व्यक्तित्व में कवि, उपन्यासकार, कहानीकार, नाटककार –सभी “रोल्ड इंटू वन” हैं. उन्होंने दो उपन्यास लिखे, एक तो “गुनहों का देवता’ जो प्रकाशित होते ही अपनी रूमानियत से तत्काल लोकप्रिय हो गया. इस उपन्यास में आदर्शात्मक और वासनात्मक प्रेम के बीच संतुलन की तलाश दिखाई देती है. उनका दूसरा उपन्यास “सूरज का सातवां घोड़ा” शैली और शिल्प की दृष्टि से एक अनूठी रचना है. डॉ. धर्मवीर भारती के चार कहानी संग्रह भी प्रकाशित हुए. मुरदों का गांव, स्वर्ग और पृथ्वी, चांद और टूटे हुए लोग, तथा बंद गली का आख़िरी मकान. इनमें संकलित सभी कहानियों में सामाजिक विसंगतियाँ सहज ही उभरती हैं. इनमें आज के व्यक्ति का अकेलापन, आत्मनिर्वासन, ऊब, कुंठा, संत्रास और टूटन है. भारती ने वैचारिक और समीक्षात्मक लेखन भी ख़ूब किया है. रंगमंचीय रोचक एकांकी भी लिखे. रिपोर्ताज़, इंटरव्यू, डायरी के पन्ने तथा ठेले पर हिमालय जैसे यात्रा संस्मरण भी उनके खाते में इंदराज हैं.

धर्मवीर भारती की “कनुप्रिया” और “अंधायुग”, दो ऐसी रचनाएँ हैं जो गीत-नाट्य विधा में लिखी गई हैं और जो पौराणिक संदर्भों में नई संवेदनाओं को अभिव्यक्त करती हैं. इन दोनों रचनाओं से भारती का क़द्दावर काव्य-व्यक्तित्व पता चलता है. “अंधायुग” में यह स्पष्ट किया गया है कि आज भी वही अंधी संस्कृति विराजमान है जो द्वापर में महाभारत के समय थी. नीति-अनीति, विवेक, मर्यादा आज भी वहीं की वहीं अपने खोखले और दिखावटी रूप में मौजूद हैं. आज भी मनुष्य बर्बर पशुमात्र है. विश्वत्थामा के समान वह विवेक-बुद्धिहीन व कुंठा से ग्रस्त है. “अंधायुग” की तरह “कनुप्रिया” में भी पौराणिक संदर्भ में नई संवेदना को अभिव्यक्ति मिली है. इसमें राधाकृष्ण के प्रणय प्रसंग के सहारे आधुनिक मनुष्य की युद्धोत्तर विवश स्थिति को कुरेद-कुरेद कर सामने रखा गया है. इस प्रकार राधा-कृष्ण कथा के राग-संबंधों को एक वैचारिक पृष्ठ-भूमि प्रदान की गई है.

अंधायुग और कनुप्रिया तो धर्मवीर भारती के काव्य शिखर पर स्थित रचनाएँ हैं किंतु उन्होंने जो स्फुट कविताएँ लिखी है उन्हें भी हम नज़र-अंदाज़ नहीं कर सकते. ठंडा लोहा, सात गीत वर्ष, सपना अभी भी, आद्यांत आदि, कविता संग्रहों में उनके अभिनव काव्य प्रयोग बिखरे पड़े हैं. कविता और उपन्यास दोनों में ही धर्मवीर भारती एक सार्थक प्रयोगकर्ता के रूप में दिखाई देते हैं. शिल्प की दृष्टि से इतने सफल प्रयोग तत्कालीन किसी भी कवि में नहीं दिखाई देते. सामान्यजन के भय को समाप्त करके, उसकी अस्मिता को प्रतिष्ठित करने वाली भारती की कविता “मुनादी” उत्पीड़न से मुक्ति, वास्तविक स्वतंत्रता और लोकतंत्र की रक्षा के लिए सदैव याद की जाएगी.

डॉ. धर्मवीर भारती को 1972 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया. उनका उपन्यास “गुनाहों का देवता” सदाबहार रचना मानी जाती है. “अंधायुग” को लेकर इब्राहीम अल्का जी, राम गोपाल बज़ाज, अर्विंद गौड़, रतन थियम, एम के रैना, मोहन महर्षि और कई अन्य भारतीय रंगमंच निर्देशकों ने इसका मंचन किया है. 1999 में युवा कहानीकार उदय प्रकाश के निर्देशन में साहित्य अकादमी, दिल्ली, के लिए डॉ. भारती पर एक वृत्त-चित्र का निर्माण भी हुआ. धर्मवीर भारती को अपने जीवनकाल में अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए. इनमें भारतभारती पुरस्कार, १९९०, भी सम्मिलित है जो उत्तर-प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा उन्हें प्रदान किया गया था. भारती जी को पद्मश्री से अलंकृत किया गया. वे व्यास सम्मान व केके बिडला फाउन्डेशन पुरस्कार से भी सम्मानित किए गए.

-डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद (उ.प्र.) -२११००१

मो. ९६२१२२२७७८

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