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जयचन्द प्रजापति की कविताएँ

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(१) मेरा सफर

मेरा सफर
ट्रेन का सफर है
रोज खाता हूँ धक्के
पीड़ा व दर्द से
कराहती जिन्दगी
हर स्टेशन पर
उतरती जिन्दगी
रात भर
करूण गीत गाती जिन्दगी

(2) वह स्त्री

वह स्त्री
विधवा हो गई है
समाज से दुत्कार दी गई है
रात भर करवटें
ले ले कर
सोचती आगे की जिन्दगी
कैसे कटेगी
समाज के दरिन्दे
नोंचना चाहते हैं
उसके गालों को
बेबस व लाचार ने
आत्महत्या कर ली.

(3) हमारा देश

हमारा देश
कैसा देश हो गया है
जहाँ चोरी
घूसखोरी
से कराह रहा है
बेटियों को बेचा जा रहा है
निष्ठुरता से भर गया है
दया,करूणा के गीत
अब कहाँ चले गये हैं
देश के लिये
फाँसी पर झूलने वाले
कब जन्म लेंगे

(4) सच्चा दिल

सच्चा दिल
मिलना कठिन हो रहा है
कई खोज के बाद
नहीं मिला
सच्चा दिल
अविश्वसनीयता के दौर में
शायद
मिलना मुश्किल है

(5) इस बाजार में

इस बाजार में
सब कुछ मिलता है
झूठ,फरेब,
बिकती है
सच्चाई
सस्ते दरों पर
रात भी रंगीन करने के लिये
बिकती है इज्जत
घूँघट भी बिक रहा है

(6)  कवि

कवि लिखते लिखते
अब थक गया हैं
कोई सुधरनें को तैयार नहीं है
लिखनें से क्या फायदा
और भी हालत
अब समाज की जर्जर हो गई है
कवि को
तोड़ देनी चाहिये
खूबसूरत कलम को

(7) रात

रात आराम की चीज है
पर
अब रात में शोर होता है
रात भी जागने लगी है
मँहगाई ने रातों को तोड़ दिया है
रात भी बेचैन है

(8) सतत

सतत
कार्य करने वाला
निराश नहीं होता है
बढ़ता जाता है
अपने पथ पर
बिना रूके
गीत गाता हुआ
मंजिल की तलाश में
नया इतिहास लिखता है

(9) करूण हृदय

करूण हृदय
सरलता,सादगी
में लिपटा रहता है
उदारता प्रथम गुण है
दया,मानवता
बहती है रगों में
सच्चाई के लिये लड़ता है
जान की परवाह नहीं करता है
भीड़ में
अपना स्थान बनाता है

(10) मेरा बचपन

मेरा बचपन
ऐसा बीता
पता न चला
रात भर
पूरे दिन
रोटी के लिये लड़ता रहा
मुस्काने का समय नहीं आया
कलम से मुलाकात नहीं हुई
मेरा बचपन
शोषण का शिकार रहा
 

             जयचन्द प्रजापति
             जैतापुर,हंडिया,इलाहाबाद
             यूपी २२१५०३
             मो. 07880438226

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