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हरकतों से दूर हसरतों की होली खेलें / डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

23/24 मार्च होली पर्व पर विशेष

हरकतों से दूर हसरतों की होली खेलें

होली का जुनून किसके सिर चढक़र नहीं बोलता, यह पर्व ही ऐसा है, जो छोटे-बड़ों, गरीब-अमीर, अधिकारी-अर्दली और नौकर-चाकरों तक को रंग गुलाल में सराबोर कर उत्सव का इजहार कर दिखाता है। जुनून को हद से पार न होने देने का संदेश भी इस पर्व में छिपा हुआ है। वैसे तो इस पर्व को देवर-भाभी के हंसी ठिठोली वाले रिश्ते से जोडक़र देखा जाता है। अब बदले हुए समय में होली का सबसे अधिक रंग जीजा-साली पर चढ़ता देखा जा सकता है। इस नाजुक रिश्ते पर रंगों की मिठास कड़वाहट में तब्दील न हो जाए इसे दोनों पक्षों को बड़ी ही सावधानी के साथ समझने और निभाने की जरूरत है। पवित्र अग्नि में सारी कलुषता को भष्म करने के बाद रंगों की बौछार में स्नान करना और एक-दूसरे के साथ प्रेम स्नेह का संचार इस पर्व का उद्देश्य है। सवाल यह उठता है कि समाज के सभी वर्गों को समानता के करीब लाते हुए रंगों में डुबा देना इतना जुनूनी न बने कि इसके चिरस्थाई पर सवालिया निशान लगा जाए। ढोल मजीरों और नगाड़ों की कर्ण प्रिय थाप के बीच मनाई जाने वाली खुशी क्षणिक न होकर दीर्घ जीवंतता पा सके इस हेतु बच्चों से लेकर उम्र दराज और रिश्तों की हर कसौटी को प्रतिज्ञ होना पड़ेगा।

पवित्र रिश्तों की होली खेलें

होली का त्यौहार बड़ा ही रसीला पर्व माना जाता है। इस पर्व में व्यवहार और रिश्तों की पवित्रता हमारे चरित्र की पवित्रता का प्रमाण बनकर हमारे सामने आती है। समझदारी के साथ रिश्तों का गुणा भाग और जोड़ घटाव करते हुए एक लंबी कड़ी तैयार करना कोई कठिन काम नहीं है, किंतु कम्प्युटर की, की की-बोर्ड सभी कुछ ठीक करने के बाद गलती से डिलीट का बटन दब जाने पर सब कुछ साफ हो जाता है। ठीक इसी तरह अच्छा करते करते कहीं गलत राह हमारे संबंधों को ही न तोड़ दे इस बात की पवित्रता इस त्यौहार पर जरूरी है। हमने समाज में जीवन यापन करते हुए इस बात का अहसास किया है हमारा जीवन, रहन-सहन, आचार-विचार, खान-पान क्रियाकलाप, व्यापार-व्यवसाय हर क्षेत्र में उस चरित्र की मांग करता है जो सामाजिक रूप से सभी को स्वीकार्य हो। इसी चरित्रावली में हमारी सोच और विचारों की बगिया फलीभुत होती है। पश्चिमी हवा के चलते बदलते वातावरण में हमारी इसी पवित्रता को कलंकित करना श्ुारू कर दिया है। हम देख रहे है कि हमारे सबसे अच्छा पर्व दोस्ती की जगह दुश्मनी भंजाता दिखाई पड़ रहा है, तो कहीं नशे की नदी बहाई जा रही है, महिलाओं और युवतियों पर व्यंग्य के बाण छोड़े जा रहे है। इन सारी असामाजिक गतिविधियों को ही होलिका दहन का हिस्सा बनाकर एक अच्छे समाज की स्थापना होली का संदेश है।

ऐसा करें कि बन जाए अविस्मरणीय

यह तो हम सभी जानते है कि प्रत्येक त्यौहार अपना सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व रखता है। होली का पर्व हम सबके लिए अविस्मरणीय बन जाए इसके लिए हमें कुछ खास करने तैयार रहना चाहिए। यह एक ऐसा त्यौहार है जो महंगाई को भी आईना दिखाता रहा है। महज कुछ रूपयों के पक्के रंग हर अमीर-गरीब को पर्व की खुशियां बांट आता है। हम संकल्पित हो कि रंगों के पर्व को हम ऐसी यादगार घटना से जोड़ जाएंगेें जो सभी के लिए न भुलने वाली घटना बन जाए। तब क्या किया जाए कि इस पर्व का हमें बेसब्री से इंतजार हो। जहां तक मैं समझता हूं मलीन बस्तियों में जहां रंगों के अभाव में कीचड़, गोबर और जले हुए काले तेल एक दूसरे पर फेंके जाते हो, वहां रंगों की बिसात बिछाई जाए। लाल, नीले, हरे, पीले गुलाबी, नारंगी, जामुनी इन सातरंगी रंगों को उन बस्तियों में रहने वालों के बीच ड्रमों में घोलकर एक दूसरे को डाले जाने की एक अच्छी शुरूआत की जाए। इससे समाज को दो बड़े फायदे हो सकते है। पहला यह कि गंदगी के साथ खेली जाने वाली होली का अंत होगा और दूसरा यह कि उन बस्तियों में रहने वाले लोगों की सोच में सकारात्मक परिवर्तन निश्चित रूप से प्रेम और सद्भाव को बढ़ाने वाला होगा। ऐसा करने से पूर्व सामाजिक संस्थाओं और एनजीओ से जुड़े लोगों को त्यौहार से पूर्व उन तक पहुंचकर अपना मंतव्य स्पष्ट करने की जहमत उठानी होगी। मैं नहीं समझता कि कोई बड़ा कठिन काम है।

बच्चों को संस्कारित करने उड़ाएं रंग गुलाल

हमारे देश और प्रदेशों का पारिवारिक चित्रण बहुत तेजी के साथ बदल रहा है। अब संयुक्त परिवारों की परंपरा दम तोडऩे लगी है। एकल परिवार में रहकर एक बच्चा जिस क्रमिक विकास को देख रहा है, वह उसे ही अपनी दुनिया समझ बैठा है। उसे माता-पिता के अलावा अन्य रिश्तों की जानकारी ही नहीं है, बाकि रिश्तों को छोड़ भी दे तो सीमित परिवार में भाई या बहन की रिश्तों को समझने में कठिनाई पैदा की है। होली का पर्व एक ऐसा पर्व है जो होलिका दहन के महत्व से शुरू होकर रंगों की बौछार पर जाकर समाप्त होता है। होली क्यों जलाई जाती है? घर के बुजुर्ग, दादा-दादी, नाना-नानी द्वारा क्यों अपने बच्चों सहित नाती-पोतों के सिर से पैर तक विभिन्न साधनों से नजरे उतारकर अग्नि प्रज्ज्वलित किया जाता है? यह सब एकल परिवार में रहते हुए संभव नहीं है। उन्हें संयुक्त परिवार में जो संस्कार मिलते है, वे सबके बीच रहकर जिस संस्कार को अंगीकार करते है, और त्यौहारों की परंपरा को आगे बढ़ाते है, उसके लिए जरूरी है कि बच्चों को पर्व के संस्कार सिखाए जाए। साथ ही रंगों की उपादेयता ही समझाई जाए। रंग गुलाल उड़ाए जाने के बाद जब सब एक ही रंग में रंग जाते है, तब जो समाज सामने आता है, वह भेदभाव और ऊंच नीचे के विचारों से कहीं दूर होता है। यही है रंगों का असली महत्व और होली का असली संदेश।

रिश्तों के रंग गाढ़े करती है होली

होली एक ऐसा पर्व है जो हर रिश्तें की गांठ को मजबूती देते हुए रंगों में डुबो देती है। बच्चे इसे पिचकारी और गुब्बारों का मजा लेते हुए याद रखते है। किशोर उम्र के लोगों का उमंग तो बसंत पंचमी से ही उमडऩे लगता है और वे होली जलाने लकडिय़ों का ढेर लगाने लगते है। युवा वर्ग का उत्साह मित्र मंडली में अलग-अलग आयोजन के रूप में उल्लास बिखेरता दिखाई पड़ता है। घर परिवार में मां, चाची, ताई, बुआ सभी मिलकर पर्व का उत्साह पकवानों के रूप में सजाने जुटी होती है। कुछ बड़े उम्र के लोगों का हस परिहस भी रंग गुलाल और फाग मंडली के रूप में पर्व के महत्व को बढ़ाता दिखता है। पर्व पर होने वाली हल्की फुल्की और कहीं कहीं बड़ी बदनामी करने वाली हरकतें भी अब पुलिस व्यवस्था के चलते काफी नियंत्रण पर है। होली का पर्व सभी के जीवन को सतरंगी रंगों में डुबा कर आनंद विभोर कर दे यही हमारी कामना है।

 

(डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

मो. नंबर 94255-59291

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