शनिवार, 12 मार्च 2016

लघुकाय कवितायेँ / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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(१)

इतना हल्का हो जाऊं

कि टकराऊँ दीवालों से

चोट न लगे

इतना भारी रह सकूँ

कि कैसी भी हवा

मुझे अपनी ज़मीन से

उखाड़ न सके

पर ये वज़न – मध्यम

- बताओ, कहांसे लाऊँ

 

(२)

पुरावशेष समझ कर

स्मृतियों को सहेजा

नए आविष्कार गले लगाए

पर प्राप्त जो भी हुआ

– अनचाहा |

 

(३)

मिट्टी में

आकाश में

हवा,पानी और प्रकाश में

तुम्हारी देह-गंध

कहाँ कहाँ है?

कहाँ नहीं है

- तुम्हारी देह-गंध

 

(४)

तुमने

उजाला अपना

मेरे ऊपर उड़ेला

अपनी गंध बिखेर दी

लुटा दिया अपने

रूप और रस को....

न जाने कब

मन-पटल पर चित्र तुम्हारा

अंकित हो गया

– पता ही न चला !

 

(५)

तुम चुप रहीं

पर चुपचाप कितना बोल गईं

आँखें बंद थी तुम्हारी

पर कितना कुछ बता गईं

शब्द नहीं,

एक श्वास,

एक उच्छ्वास ही काफी है

 

(६)

कितना सामान

इकट्ठा कर लिया

कितने जज़्बात

सुरक्षित हैं मन में

- कुछ अंदर कुछ बाहर

कितना बचेगा /

बच पाएगा ?

 

(७)

बेशक -चाहीं थीं मैंने दीवारें

दीवारें,

जिनमें खिड़कियाँ और रोशनदान होते हैं

जो बनाती हैं घर

मैंने कब चाही थी वो दीवार

जो बांटे

और आरपार न देख सके !

 

(८)

एक दूरी बनी रहे

और हम निकट भी आ जाएं

लीन रहें,

और निजता भी कायम रहे

| छलना नहीं,

ये रचना की पृष्ठभूमि है

– एक से एकाधिक

एकाधिक से एक हो जाने की

 

(९)

ज़िंदगी के रंगीन टुकड़ों को जोड़कर

एक साफा बनाया था

सिरपर सजाने के लिए

भविष्य के सपनों से एक चोगा बनाया था

लपेटने के लिए

लेकिन धोखा खा गया

गत और अनागत

कुछ भी काम न आया

वर्तमान था, वो भी गुज़र गया

 

(१०)

तुमने अपने आँचल से

मेरा आईना साफ़ किया

लेकिन मैं अभी तक अपना चेहरा

देख नहीं सका

दर्पण साफ़ करते हुए

बीच में आ जाती हो तुम

 

(११)

क्यों दीवार से पीठ करे बैठी हो ?

चार ईंटों के बीच

देखो, एक झरोखा भी है

और कोई रख गया है

उसमें एक दीया

रोशनी तुम्हें बुलाती है

सुनो तो उसकी पुकार !

 

(१२)

समय बांधता है मुझे

और समय ही मुक्त भी करता है

घाव भरता है समय

और घाव भी समय ही देता है

समय में सना है हमारा पूरा वजूद

कुछ भी तो ऐसा नहीं जो समायातीत हो

तुम भी नहीं ...मैं भी नहीं

 

(१३)

उत्सर्ग किया है

इसी से उत्सव मनाने का अधिकार है तुम्हें

उत्सव झालर नहीं

रोशनी या झंडा नहीं

बेल-बूटा भी नहीं

बड़बोल नहीं है उत्सव

| उत्सव तो वो खुशी है

उत्सर्ग के सिरहाने

जो चुपचाप बैठ जाती है

--

-- डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०,एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद -२११००१

मो.-९६२१२२२७७८

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