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होलियाना व्यंग्य - देखे और दिखाए ! / सुरेन्द्र अग्निहोत्री

ख्याति और बदनामी एक सिक्के के दो पहलू हैं। एक न एक दिन बिना शुक्रिया कहे बिल्ली के भागों का छींका टूटता ही है मुलायम चाहे कितने ही कठोर रहे, माया को न भाये पर हम आये! यूपी की दम पर, यूपी ही पी सकता था सफलता का शरबत पर गुरबत की बात है। हमें लगभग बहिष्कृत कर दिया गया था। कामयाबी का कमाल किस का? रहस्य ही रहने दो! पंजाब से नेता रामूबालिया लाने की बात करने से पहिले गुजरात के मोदी, गोवा के पार्रिकर की नयी पारी इसी उर्वरा प्रदेश की देन है। हम आयात और निर्यात के मामले में सदा साक्षीभाव में रहते हैं। ईरानी लाये या तूरानी किसी को कौन रोक सकता है। उवैसी उब कर भले चले जाए पर हम किसी को ना नहीं कर सकते, आखिर देश के सबसे बडे सासंद भेजने बाले जो ठहरे!

खेल खेल में खिल गया अब तो कमल

हम जो कहे उस पर करो होगा अमल

उस पर करो होगा अमल चढ़े यही रंग

होली के हुड़दंग पर, चैपालो पर चंग।

ठिठक कर चल रहा ना जाने क्यों आज

कब तक पहने रहुँगा कांटों वाला ताज।

दिल्ली दरबार का मुगलिया हाल पूरी शान शौकत के साथ पूरे शबाब पर था। झाड़ फानूस से निकल रही रंगीन रोशनी में नहाया दरबार हाल में दरबारी अपनी-अपनी कुर्सियों पर होशियारी के साथ बैठे इंतजार कर रहे थे। कब दिल्ली दरबार के आका अपनी बिदेशिया कोट पैन्ट में मुस्कान के साथ अपनी कुर्सी पर सवार होते हैं। मोदीमोहनी कुर्सी के बगल अचानक एक कुसीँ लगाने की बात करते जनार्दन जय-जय कार करने लगे। दिल्ली दरबार के दरबारी सावधान की मुद्रा में अब तो आ जा परदेशिया टूटी न जाये आस, गाने लगे। जैसे फागुन चुपके से कान में मादकता की बात कह जाता है। वैसे ही दिल्ली दरबारियों के मन में एक दूसरे कुछ बातें कहने लगे । पटना की पटकनी ने सब कुछ अधूरा सा कर दिया है तिस पर कन्हैया कांव-कांव कर रहा है। रसरंग, होली का पर्व हो और रंग के साथ रस की बात अधूरी है। इमला और जुमला से अब काम चलने बाला नहीं जनता बुरा न माने, भूमण्डलीकरण के दौर में! किसान इस देश का अन्नदाता है इसीलिए खुद भूखों मर जाता है। किसान के लिए मंडी बनवा दी, रेट के लिए मुफ्त में इन्टरनेट और क्या बच्चे की जान लोगे,होली है कुछ हुरयाने का मौका मिला है बडे दिनों के बाद महाकवि पैरोड़ीदास ने आ के अलाप दिया-

नाचो-गाओ, यान, कि होली रंग-रंगीली।

मदनदेव के हाथ में सोहे फूल-कमान,

रंगों की बौछार से बुड्ढे हुए जवान,

कि होली रंग -रंगीली।

यह दिल्ली बुढि़या हुई, बुड्ढे इसके यार,

पर्व जवानी का

बना बुड्ढों का त्योहार। ’’

हरियारे कबीर के शब्दों में -

साझे की गति एक है

तरह-तरह के ठौर

अच्छा-अच्छा आपने

बुरा किसी की ओर! तभी एक दरबारी बोला पूर्वप्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में प्रिबीपर्स बंद करके राजे-राजवाड़ों का सफाया किया था। किन्तु पिछले एक दशक में भारतीय उद्योगपतियों ने राजे-राजवाड़ों की शान-शौकत और अय्याशी को भी मात कर दिया है। देश के सर्वोच्च पदों पर बैठे सत्तासीन लोगों से ज्यादा वेतनप्राप्त करना राजतंत्र और

लोकतंत्र देानेां का ही अपमान है। सरकार उद्योगपतियों पर क्यों मेहरबान है। बैंक के बैंक बैठने को है पर उन्हें बैठाने बाले बेईमानों के नाम तक बताने को तैयार नहीं है यह सभी समझ से परे है! महाकवि पैरोड़ीदास ने आ के अलाप दिया

‘‘होली से पहले हुआ होली का हुड़दंग,

इक-दूज को मल दिया सबने काला रंग।

इस भारत आज़ाद में सब का अपना भाग,

जनता की होली जले, नेता खेले फाग।

राजनीति के मंच पर सबने खेली फाग,

दर्पण जब सन्मुख धरा, सबके माथे दाग। ’’

विशिष्ट व्यक्तियों की जान की कीमत भी वही है जो एक आम आदमी की जान कीमत है। एक आम आदमी ही किसी व्यक्ति को विशिष्ट व्यक्तियों की कतार में शामिल करता है। यदि उसकी स्वयं की सुरक्षा नहीं हो पा रही है तो यह सारा आडम्बर औचित्यहीन है।

‘‘आज होलिका, खुश बहुत नेता सूसटनाथ,

लपक-झपक रोली मलें कोमल-कोमल हाथ।

ताऊ,होली आ गई, मल दाढ़ी पर रंग,

अब भी जो बाबा कहे, पकड़ मसल दे अंग।

के बोले ‘‘यह होलिका बुड्ढों का त्योहार,

इक दिन हमको भी मिले दरस-परस अधिकार। ’’

बालों की खिचड़ी पकी, काया पीसी दाल,

लेकिन जालिम दिल अभीसरस टमाटर लाल।

सत्ता की कुर्सी बनी तन-हित बिद्युत -यंत्र,

नस-नस में है संचरित च्यवनप्राशी मंत्र।

‘‘रथ -यात्रा की नीति से पहुँचे संसद-धाम,

पहुँचे सत्ता-शिखर पर,विनती यह, श्रीराम।

पदवी की चाहत नहीं, कह कवि कैदीराय,

घरवाली बिन घर नहीं, मनवा उड़-उड़ जाय। ’’

दिल्ली दरबार पदों में नाम तब्दीली से ही बदलाव लाएगा ! वादा तेरा वादा कहा गया इरादा सोच कर मन मायाबती हो रहा है। कब खुश कब उदास पता ही पडता है। स्वर्ण मृग के सपने रफूचक्कर हो गये,टैक्स के बोझ की जकड़ में कोमनमैन का पीपीएफ तक आ गया अब क्या करे? उन्नीस में जाना है और तेईस तक सारे गांव तक रोशनी ले जाने का बात कर कौनसे चांद तारे तोड़ कर ला रहे है हम देखेंगे और देख रहे है। जरा सोचो, अगर रोशनी पहुंच गयी तो क्या होगा?मगर आज हर एक को जानना होगा गांधी को कहाँ खोजूँ गुजरात में या गुजर चुकी बात में। जनता बेचारी पिद्दी बननी दुहाई हो दुहाई कहते मरियल आवाज में बोल रही-

मन की बात करते-करते मन दर्पण हो जाए

भले बुरे सारे कर्मों को देखे और दिखाए ।

 

-सुरेन्द्र अग्निहोत्री

ए-305, ओ.सी.आर.

विधान सभा मार्ग;लखनऊ

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