आलोकित करें अन्तस - डॉ. दीपक आचार्य

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संसार में आने के बाद इंसान की पूरी जिन्दगी दुनिया को देखने, जानने और समझने में लग जाती है और पूरी जिंदगी यही सब करने के बावजूद पूरी दुनिया का एकाध फीसदी से भी कम ही आनंद या उपभोग पा सकता है।

मनुष्यों में मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्ना वाली स्थिति होती है। कुछ लोग पूरी दुनिया के बारे में खबर रखना चाहते हैं और ताजिन्दगी इसी भ्रम में रहते हैं कि उन्हें पूरी दुनिया का ज्ञान है। कुछ लोग न अपने आपको जानना चाहते हैं, न दुनिया को, ये लोग उदासीन बने रहकर जैसे-तैसे टाईमपास करते हुए पूरी आयु खपा देते हैं और बिना किसी उपलब्धि के चले जाते हैं, जैसे आये थे।

बहुत से लोगों का स्वभाव होता है कि अपने काम से मतलब रखना, अपने दायरों में रहकर काम करना और अपने तथा अपनी दुनिया के बारे में भी जानकारी रखना। दुनिया में कहाँ क्या हो रहा है, कौन क्या कह या कर रहा है, इस बारे में ये ध्यान नहीं रखते। अपने हाल और खुद के कामों में मस्त रहते हैं।

एकाग्रता और कर्म के प्रति निष्ठा का इनका भाव इतना अधिक गहरा होता है कि इनके पास फालतू का दूसरा कुछ सोचने-समझने की फुर्सत तक नहीं होती। 

इन सभी प्रकार के लोगों का पूरा जीवन  अपने बारे में, जीवन और जगत के बारे में सोचने, प्रश्नों के उत्तर तलाशने और जिज्ञासाओं के शमन में गुजर जाता है। कुछ बिरले लोगों के लिए प्रश्नों और जिज्ञासाओं का समाधान हो जाने पर भीतरी आनंद का अनुभव होने लगता है और वे जीवन लक्ष्यों के साथ आनंद भाव को प्राप्त कर लिया करते हैं।

जबकि बहुसंख्य लोगों की जिन्दगी में अंतिम समय तक प्रश्नों और जिज्ञासाओं का समाधान नहीं हो पाता और ये अनुत्तरित प्रश्नों के साथ ही ऊपर पहुंच जाते हैं।

वास्तव में देखा जाए तो प्रश्नों के सटीक उत्तर मिल जाना और जिज्ञासाओं का सही वक्त पर  सही समाधान हो जाना ही ज्ञान की पूर्णता का प्रतीक है। प्रश्न और जिज्ञासाएं अपने आप में अंधकार हैं और जब तक ये व्याप्त रहते हैं इंसान कई प्रकार के अंधेरों और पाशों से जकड़ा रहता है।

वह अपनी जिज्ञासाओं को शांत करने तथा प्रश्नों के जवाब पाने के लिए उतावला और उद्विग्न बना हुआ भटकता फिरता है। श्रम, समय और धन खर्च कर सारे जतन करता रहता है। कई बार जवाब और समाधान के करीब भी पहुँच जाता है लेकिन पूर्ण सत्य और शाश्वत उत्तर के अभाव में फिर भटकने लगता है। 

इस मामले में ज्ञान और व्यवहार दोनों काम में आते हैं। समझदार और मेधावी लोग सत्य और यथार्थ को जान लेने के बाद प्रश्नों और जिज्ञासाओं के शंका-भँवर से मुक्त हो जाते हैं लेकिन पशुबुद्धि और निम्न बुद्धि लोग लाख समझाने, सटीक उत्तर मिल जाने और जिज्ञासाओं का समाधान कर दिए जाने के बावजूद संतुष्ट नहीं होते और उस दिशा में आगे बढ़ते चले जाते हैं जहां इन प्रश्नों और जिज्ञासाओं का जन्म होता है।

यह ठीक उसी तरह है कि किसी को कह दिया जाए कि आगे गहरी खाई और कूआ है, ध्यान रखें। तब समझदार इंसान उस रास्ते को छोड़ कर दूसरी राह तलाश लेता है कि लेकिन मूर्ख इंसान  यह देखने के लिए उधर चला ही जाएगा कि आखिर कैसा कूआ है, कैसी खाई है। और फिर वहां पहुंचकर ठोकर खा ही लेता है। तब कहीं जाकर वह सबक सीखता है।

होशियार और दूरदर्शी इंसान इतने समय में दूसरे कई काम करता हुआ अपने सफर को काफी आगे बढ़ा लेता है लेकिन मूर्ख और नासमझ लोग अपनी जिन्दगी का काफी कुछ हिस्सा इसी प्रकार की बेवकूफियों मेें खर्च कर देते हैं और अंत में पछताते ही रहते हैं। इनकी जिन्दगी इसी प्रकार के अंधकार से भरी रहती है।

इस अंधकार को दूर करने के लिए ही जरूरी है ज्ञान, माता-पिता, बड़े-बुजुर्गों और गुरुओं का मार्गदर्शन। जीवन में  प्रश्नों और जिज्ञासाओं से जो मुक्ति पा लेता है वही बुद्धत्व को प्राप्त कर सकता है।

इसलिए इनके समाधान पर ध्यान दें। ऎसा हो जाने पर अपना अन्तस आलोकित हो जाता है और इसका प्रभाव हमारी ज्ञानेन्दि्रयों-कर्मेन्दि्रयों, स्वभाव और व्यवहार सभी दिव्यत्व और दैवत्व के सौंदर्य का अनुभव कराने लगता है।  यह सिद्धावस्था और सहजावस्था के काफी करीब होता है।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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