मंगलवार, 15 मार्च 2016

नौटंकीबाज होते हैं गुरु कहने वाले - डॉ.दीपक आचार्य

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गुरु या गुरुजी शब्द में जाने क्या नैसर्गिक दोष या दैत्यगुरु शुक्राचार्य का श्राप है कि जो यह शब्द कहता है वह नकली श्रद्धा ही अभिव्यक्त करता है। जो-जो गुरुजी कहकर संबोधित करते हैं उनमें अधिकांश लोग गुरुजी के प्रति श्रद्धा, आदर-सम्मान और मर्यादाओं का पालन नहीं करते और अन्ततोगत्वा धूर्त, मक्कार और चालबाज सिद्ध होते हैं।

यह कोई कोरी कल्पना या कयास नहीं है बल्कि गुरु या गुरुजी के रूप में आदर्श जीवन जीने वाले तकरीबन सभी विद्वानों का कथन  है जो उन्होंने गुरुजी कहने वाले अपने तथाकथित शिष्यों के स्वभाव और जीवन व्यवहार के गहराई से मूल्यांकन के बाद अनुभव किया है और इसके बाद ही सार रूप में यह निष्कर्ष सबके सामने रखा है। 

यह बीमारी आज की नहीं बल्कि सदियों पुरानी है तभी तो कहा जाता है कि - गुरु गुड़ रह गए और चेले शक्कर हो गए। हालांकि शिष्य को अपने से अधिक सामथ्र्यवान और यशस्वी बनाना और देखना हर गुरु चाहता है और उसे यह देख कर अपार खुशी का अहसास होता है कि उसकी शिक्षा-दीक्षा सफल हुई है।

गुरु हमेशा चाहता है कि उसका शिष्य उससे भी अधिक लम्बी लकीर खींचे ताकि शिष्य को यश प्राप्त हो और गुरु को गौरव। अध्यापन पेशे से संबंधित गुरु हों या जीवन के किसी भी ज्ञान मार्ग, प्रशिक्षण और व्यवहार मार्ग से संबंधित गुरु, सभी को आदर-सम्मान देना शिष्य का प्राथमिक कर्तव्य है।

बहुत सारे लोग आज भी हैं जो गुरु को गोविन्द से भी बढ़कर मानते हैं और उतनी ही श्रद्धा अभिव्यक्त भी करते हैं मगर दूसरे लोगों के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता।  गुरु से जब तक काम हो, सीखना हो, शिक्षा-दीक्षा पानी तो तब तक गुरु, और उसके बाद कौन किसका गुरु, सब अपने-अपने गुरु हैं।

इन लोगों के लिए गुरु अपने स्वार्थ पूरे करने की कामचलाऊ मशीन से ज्यादा कुछ नहीं। आजादी के बाद गुरु शब्द का जितना मान घटा है वह शोचनीय ही है। जिस तरह के शिष्य उसी अनुपात में गुरु भी होते जा रहे हैं। गुरुत्व का कोई सा चिह्न न हो, तब भी गुरु।

बड़े-बड़े लोग अपने आपको गुरु या गुरुजी के रूप में स्थापित कर दिया करते हैं और कालान्तर में उनका उपनाम ही गुरु या गुरुजी होकर रह जाता है। गड़बड़ दोनों तरफ से है। यह भी देखने में आता है कि जिन लोगों को आपस में स्वार्थ पूर्ति का नेटवर्क स्थापित करना हो, वे एक-दूसरे के गुरु हो जाते हैं। लोग आश्चर्य में पड़ जाते हैं कि - कौन गुरु कौन चेला।

गुरु का अर्थ सर्वांगी व्यक्तित्व विकास करने वाला है। और शिष्य से तात्पर्य सम्पूर्ण समर्पण करने वाला।  दोनों पक्षों में ऎसा नहीं हो पा रहा। एकाध काम भी जिससे निकलवाना होता है, कराना होता है उसे हम गुरु कहकर संबोधित कर दिया करते हैं।

सामने वाला इस एक ही शब्द को सुन मुग्ध हो उठता है और यह मान लेता है कि वह शिष्य बन गया। बहुत सारे लोगों ने गुरु या गुरुजी शब्द को हथियार मान लिया है। इन लोगों के लिए एक गुरु से काम नहीं चलता। अपनी जिन्दगी में जिससे भी स्वार्थ पूरे होने की उम्मीद हो या जो जायज-नाजायज कामों में सहयोगी या अभयदाता बन जाता है वह स्वाभाविक रूप से गुरु का दर्जा पा लेता है।

वर्तमान में तथाकथित शिष्यों की हालत ये हो गई है कि ये उल्टे-सीधे काम करते हुए बुराई का सारा ठीकरा अपने-अपने गुरु पर फोड़ दिया करते हैं। उधर गुरुओं को शिकायत रहती है कि उन्होंने जिन शिष्यों को तैयार किया, जो काम निकलवाने या शिक्षा-दीक्षा के वक्त उन्हें गुरुजी-गुरुजी कहकर पुकारते रहे, वे सारे आज दुष्ट, कृतघ्न और मर्यादाहीन हो चुके हैं वहीं ढेरों ऎसे थे जो अपने आपको बताते तो शिष्य थे मगर धोखेबाज ही निकले, काम निकलवाने के बाद मुँह फेर लिया। कई गुरुओं को मलाल है कि जिस-जिस ने उन्हें गुरु कहकर पुकारा, उसने धोखा ही दिया है। 

कुल मिलाकर सार यही है कि गुरु या गुरुजी शब्द के नाम पर बहुत से लोग या तो छलावा करने के आदी हो गए हैं अथवा अपने स्वार्थ के लिए औरों को भरमाने के। गुरु और शिष्य दोनों असली हों तब तो दोनों को अपनी मर्यादाओं का पालन करना चाहिए अन्यथा यथा गुरु तथा शिष्य और यथा शिष्य तथा गुरु वाली बात चरितार्थ होनी ही है। समस्त गुरुओं और उनके शिष्यों को प्रणाम करना नहीं भूलें, ये लोग समाज और देश की धरोहर हैं।

- डॉ.दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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