शनिवार, 26 मार्च 2016

श्री पूर्णाशंकर पण्ड्या का महाप्रयाण आदर्श कर्मयोगी की अपूरणीय क्षति - डॉ. दीपक आचार्य

 

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शुक्रवार शाम का एक समाचार शोक संतप्त कर गया। समाचार मिला - शिक्षाविद् श्री पूर्णाशंकर पण्ड्या नहीं रहे।  शिक्षा, समाजसेवा, धार्मिक गतिविधियों और जन कल्याण से लेकर इंसानियत के हर मोर्चे पर उनका योगदान किसी न किसी रूप में रहा है। 

अस्सी वर्षीय पूर्णाशंकर पण्ड्या समााजिक सेवा कार्यों में हमेशा अग्रणी रहे। दो माह पूर्व पाँव फ्रेक्चर हो जाने की वजह से उनका घर से बाहर निकलना संभव नहीं हो पा रहा था लेकिन घर बैठे ही अपने अनुभवों और मार्गदर्शन देने की श्रृंखला अंतिम समय तक जारी रही।

उनका नहीं रहना किसी ण्क व्यक्ति का महाप्रयाण नहीं है बल्कि देश के उन चुनिन्दा बुद्धिजीवियों में शुमार उस हस्ती का खोना है जो जीवन में उच्च आदर्शों और सिद्धान्तों के साथ जिये, अपने स्वाभिमान को बरकरार रखा और किसी के आगे झुके नहीं।

पारदर्शी और हृदयस्पर्शी व्यक्तित्व ऎसा कि उनकी सरलता, सहजता और सादगी का हर कोई कायल रहा। एक बार जो उनके सम्पर्क में आया, हमेशा के लिए उनका मुरीद हो गया।   ठेठ देहाती व्यक्तित्व के धनी और जमीन से जुड़े श्री पण्ड्या के जीवन में कोई क्षण ऎसा नहीं रहा जब उनमें अहंकार का छोटा सा कतरा भी कभी देखा गया हो।

सामान्य शिक्षक से लेकर शिक्षा विभाग के शीर्ष अधिकारी तक उनका समग्र व्यक्तित्व किसी महापुरुष से कम नहीं था। आज जहां पूरी दुनिया पैसों और भौतिक विलासिता के पीछे भाग रही है, जाने किन-किन बड़े-बड़े लोगों की जी हूजूरी करती रहती है फिर भी आत्मतोष प्राप्त नहीं कर पाती लेकिन पण्ड्याजी इसके अपवाद थे।

उन्होंने  पूरी जिन्दगी ईमानदारी के साथ कर्मयोग का निर्वाह किया और यह दर्शा दिया कि वास्तव में विद्या विनय भी देती है और स्थितप्रज्ञता भी। आत्म आनंद भी देती है और शाश्वत शांति भी। वाणी का माधुर्य इतना  कि हर बात अनुभवों के रस में पग कर बाहर निकलती, आनंद देती और मन में गहरे तक असर कर जाती।

मन-वचन और कर्म में समानता उनके व्यक्तित्व का अहम् गुण था। देश और दुनिया में इंसानियत की प्रतिमूर्ति कहे जाने वाले बिरले लोगों में उन्हें शामिल माना जा सकता है जो आत्मप्रचार से दूर रहने की वजह से प्रकाश में भले न आए हों मगर सच्चे इंसानों के हृदय में उनकी अमिट छाप रही है और यही वजह है कि श्री पण्ड्या को हर कोई आदर-सम्मान एवं श्रद्धा प्रदान करते हुए उनका सान्निध्य पाकर अपने आपको धन्य मानता रहा है।

धरती से सच्चे, आदर्शवादी और सिद्धान्तों के पक्के, स्वाभिमानी और लोक कल्याण के स्रष्टा पूर्णाशंकर पण्ड्या का चले जाना वागड़, राजस्थान और देश के लिए  ही अपूरणीय क्षति नहीं बल्कि दुनिया ने भी उन्हें खो दिया है क्योंकि ऎसे बिरले लोग अब बहुत कम रह गए हैं। स्व. पूर्णाशंकर पण्ड्या के प्रति भावभीनी श्रद्धान्जलि।

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