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भगवान शिव एवं गंगा / प्रोफेसर महावीर सरन जैन

त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) में भगवान महेश अर्थात् शिव संहार के देवता हैं । शिव का शाब्दिक और आध्यात्मिक अर्थ है 'शुभ', 'कल्याण', 'मंगल', 'श्रेयस्कर' आदि। इस संदर्भ में भगवान शिव समस्त जगत के शुभ, मंगल,श्रेय और कल्याण के कारक हैं। भगवान शिव देव नहीं अपितु महादेव हैं। ब्रह्मस्वरूप हैं। सम्पूर्ण स्थावर जंगम संसार जिससे आच्छादित है –

"ॐ ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्याम् जगत्"।

नाम और महिमाः

शिव के अनेक वाचक हैं,भगवान शिव के अनेक नाम हैं :

1. रुद्र ( जो दुखों का निर्माण व नाश करता है)

2. पशुपतिनाथ ( पशु पक्षियों व जीवात्माओं के स्वामी)

3. अर्धनारीश्वर ( शिव और शक्ति का मिलन)

4. महादेव ( सभी देवों में श्रेष्ठ, महान ईश्वरीय शक्ति)

5. भोला( कोमल हृदय, दयालु एवं भक्तवत्सल)

6. लिंगम (सम्पूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक)

7. नटराज ( नृत्य के देवता)

8. गंगाधर (गंगा को अपनी जटाओं में धारण करने वाले) ।

द्वादश ज्योतिर्लिंगों के नाम भी शिव के ही वाचक हैं तथा उनके साथ शिव के महत्व की गाथाएँ भी जुड़ी हुई हैं। ये निम्न हैं –

1.ओंकारेश्वर ( मंगलकारी)

2. केदारनाथ ( हिमालय के केदार पर्वत के स्वामी)

3. घुश्मेश्वर (सती शिवभक्त घुश्मा के आराध्य होने के कारण घुश्मेश्वर महादेव के नाम से विख्यात)

4. त्र्यम्बकेश्वर ( तीन नेत्रों वाले ईश्वर)

5. नागेश्वर ( नागों को धारण करने वाले)

6. भीमशंकर ( भीमकाय स्वरूप में प्रकट होकर त्रिपुरासुर को पराजित करने वाले शंकर)

7. महाकालेश्वर ( शिव का प्रलयकर्ता का रूप)

8. मल्लिकार्जुन स्वामी ( अर्चना में अर्पित चमेली जैसे मिल्लका पुष्पों को ग्रहण करने वाले)

9. रामलिंगेश्वर ( लंका पर चढ़ाई करने के पूर्व भगवान राम द्वारा स्थापित एवं उपासित शिवलिंग)

10. विश्वनाथ ( शिव के त्रिशूल पर स्थित काशी अथवा वाराणसी में विश्व के नाथ)

11. वैद्यनाथ ( आयुर्वेद आचार्यों के नाथ)

12. सोमनाथ ( वह स्थान जहाँ शिव को प्रसन्न करने के लिए चंद्रमा ने रोहिणी के साथ स्पर्श लिंग की पूजा की अथवा अपने मस्तिष्क पर चंद्रमा को धारण करने वाले शिव)

उनके अनेक रूपों में उमा-महेश्वर, अर्द्धनारीश्वर, पशुपति, कृत्तिवासा, दक्षिणामूर्ति तथा योगीश्वर आदि अति प्रसिद्ध हैं।

अनेक ग्रंथों एवं लेखों में भगवान शिव के 1008 नामों का उनके अर्थों तथा व्याख्याओं सहित विवरण मिलता है। उपर्युक्त वर्णित नामों एवं रूपवाचकों के अतिरिक्त जो और नाम अपेक्षाकृत अधिक प्रसिद्ध हैं, वे अकारादि क्रम से निम्न हैं :

1.अघोरनाथ

6.काशीनाथ

11.जटाधर

16.भैरव

2.आशुतोष

7.कैलाशनाथ

12.त्रिपुरारी

17.भोलानाथ

3.ईशान

8.गिरीश

13.त्रिलोचन

18.शंकर

4.उमेश

9.गौरीनाथ

14.नीलकंठ

19.शम्भू

5.कामेश्वर

10.चन्द्रशेखर

15.भूतनाथ

20.शशिधर

पुराणों में वर्णित शिवस्तुति में उनके अनेक ऐसे नाम भी मिलते हैं जो जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ अथवा ऋषभदेव के लिए भी प्रयुक्त होते हैं :

वृषभ, वृषभध्वज, वृषांक, दिगम्बर, दिग्वस्त्र, दिग्वास, जटी, चारुकेश, जटा-भार-भास्वर, ऊर्ध्वरेतेसु, ऊध्वेन्द्र, तपोमय, शान्त, इन्द्रियपति, अक्षोभ्य, अहिंसचैकितान, ज्ञानी-वज्रे-संहनन, पिच्छिकास्त्र।

डॉ. हीरालाल जैन ने शिव-रुद्र एवं जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव अथवा वृषभनाथ अथवा आदिनाथ की समानता के अनेक प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। ( देखें – रचना और पुनर्रचना, पृष्ठ 172 – 175, डॉ. भीमराव अम्बेदकर विश्वविद्यालय, आगरा, (नवम्बर, 2000))।

वेद में इनका नाम रुद्र है। यह व्यक्ति की चेतना के अर्न्तयामी हैं । इनकी अर्द्धांगिनी (शक्ति) का नाम पार्वती है और इनके पुत्र स्कन्द और गणेश हैं । भगवान शिव का परिवार केवल पत्नी पार्वती एवं पुत्र स्कंद एवं गणेश तक ही सीमित नहीं है; एकादश रुद्राणियाँ, चौसठ योगिनियाँ तथा भैरव आदि इनके सहचर और सहचरी हैं।

भगवान शिव के रूप :

पंचमुखी महादेव के पाँच मुखों के नाम हैं – (1) ईशान (2) तत्पुरुष (3) वामदेव (4) अघोर (5) सद्योजात।

सर्वव्यापी शिव को पृथ्वी में शर्व, जल में भव, अग्नि में पशुपति, वायु में ईशान, आकाश में भीम, सूर्य में रुद्र, सोम अर्थात् चंद्रमा में महादेव और यज्ञक्रिया में उग्र मूर्ति रूप में दिखाया जाता है। इन्हें अष्टमूर्तियाँ कहा जाता है।

शिव महायोगी हैं। निराकार रूप में इनकी पूजा लिंग के रूप में होती है । शैव मत में वे सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति हैं । शिव और शक्ति में अद्वैत है। शिव के हृदय में शक्ति का और शक्ति के हृदय में शिव का वास है। चंद्र और चाँदनी जिस तरह से अभिन्न हैं, उसी तरह से शिव-शक्ति भी अभिन्न हैं। जिस प्रकार वैष्णव पुराणों में विष्णु के दश (10) अवतारों की गाथाएँ वर्णित हैं, उसी प्रकार शैव पुराणों में शिव-शक्ति अथवा शिव-पार्वती के दश अवतारों की गाथाएँ निबद्ध हैं। इनके नाम हैं : (1) महाकाल-महाकाली (2) तारण-तारा (3) बाल-बालभुवनेशी (4) षोडश-षोडशी (5) भैरव-भैरवी (6) छिनमस्त-छिनमस्ता (7) धूमवान-धूमवती (8) बगलामुख-बगलामुखी (9) मातंग-मातंगी (10) कमल-कमला।

द्वादश ज्योतिर्लिंगः

देश में बारह ज्योतिर्लिंग प्रसिद्ध हैं जिनके दर्शन की कामना प्रत्येक शिवभक्त को रहती है। इन 12 ज्योतिर्लिंगों में से 9 की स्थिति निर्विवाद है। इनके नाम हैः

1. सोमनाथ (गुजरात में वेरावल के पास)

2. महाकालेश्वर (मध्यप्रदेश के उज्जैन नगर में)

3. ओंकारेश्वर (मध्यप्रदेश में इंदौर नगर के पास)

4. केदारनाथ (उत्तराखण्ड के रुद्रप्रयाग नगर से 86 किलोमीटर दूर। गौरीकुण्ड से 14 किलोमीटर की पद यात्रा।

5. विश्वनाथ (उत्तरप्रदेश के वाराणसी नगर में)

6. त्र्यम्बकेश्वर (महाराष्ट्र में नासिक जिले में गोदावरी के उद्गम-स्थल के पास)

7. रामलिंगेश्वर (तमिलनाडु में रामेश्वरम् में)

8. घुश्मेश्वर (महाराष्ट्र में औरंगाबाद जिले में दौलताबाद स्टेशन से 20 किलोमीटर दूर)

9. श्री सैलम-मल्लिकार्जुन (आंध्रप्रदेश के कुरनूल जिले में घने जंगलों के बीच स्थित)

अन्य तीन ज्योतिर्लिंगों की भौगोलिक स्थिति के बारे में निम्न दावेदार हैं और प्रत्येक स्थान के गाइड एवं पंडित-पुरोहित अपने-अपने पक्ष में प्रमाण प्रस्तुत करते हैं :

10. भीमशंकर – (अ) महाराष्ट्र में पुणें के पास सह्याद्रि पर्वत पर

(आ) उत्तराखंड में काशीपुर के पास मोटेश्वर मंदिर

11. वैद्यनाथ – (अ) झारखंड के देवघर में स्थित

(आ) महाराष्ट्र के बीड़ जिले में परभणी रेलवे जंकशन के पास परली में

(इ) हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में पालमपुर से लगभग 14

किलोमीटर दूर बैजनाथ मंदिर

12. नागेश्वर - (अ) गुजरात में जामनगर जिले में द्वारका के पास नागेश्वर मंदिर

(आ) उत्तराखंड में अल्मोड़ा से 36 किलोमीटर दूर जागेश्वर मंदिर

(इ) महाराष्ट्र के हिंगोली जिले में औंधा नागनाथ मंदिर

पंच तत्त्वों में व्यक्तः

भगवान शिव सर्वव्यापक हैं। दक्षिण भारत में भगवान शिव की सर्वव्यापकता को व्यक्त करने के लिए उन्हें जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी और आकाश – इन पाँचों तत्त्वों में व्यक्त किया गया है। इस दृष्टि से तमिलनाडु में तिरुचिरापल्ली में जल या नीर(जंबूकेश्वरार या जम्बूकेश्वर), तिरुअन्नामलै में अग्नि (अन्नामलियार या अरुणाचलेश्वर), कांचिपुरम में पृथ्वी (एकंबरेश्वर), चिदंबरम् में आकाश (नटराज), तथा आंध्र प्रदेश में तिरुपति से 36 किलोमीटर की दूरी पर श्री कालहस्ति में वायु (श्री कालहस्तीश्वर स्वामी) के शिव मंदिर प्रसिद्ध हैं।

महाशिवरात्रिः

महाशिवरात्रि शिवत्व का जन्म दिवस है। मान्यता है कि भगवान शिव इस दिन ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए थे। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। यह पर्व महाकाल शिव की आराधना का महापर्व है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन पारणा करने पर उपासक को समस्त तीर्थों के स्नान का फल प्राप्त होता है। शिवरात्रि का उपवास नहीं करने पर वह जन्म-मरण के चक्र में घूमता रहता है। शिवरात्रि का व्रत करने वाले इस लोक के समस्त भोगों को भोगकर अंत में शिवलोक में जाते हैं। महामृत्युंजय मंत्र शिव आराधना का महामंत्र है जो पारलौकिक, मानसिक एवं भौतिक तीनों प्रकार की व्यथाओं, संतापों, पाशों से मुक्त कर देता है।

शिव और शक्ति का मिलन गतिशील ऊर्जा का अन्तर्ज्ञात से एकात्म होना है। लौकिक जगत में लिंग का सामान्य अर्थ चिह्न होता है जिससे पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसक लिंग की पहचान होती है। शिव लिंग लौकिक के परे है। इस कारण एक लिंगी है। आत्मा है। शिव संहारक हैं। वे पापों के संहारक हैं। लय की निर्मति के लिए प्रलय करते हैं। अवरोधक गलित एवं पलित तत्वों का विनाश कर नव जीवन प्रदान करते हैं। महाशिवरात्रि जागृति का पर्व है। यह आत्म स्वरूप को जानने की रात्रि है। यह स्वयं के भीतर जाकर अथवा अंतश्चेतना की गहराइयों में उतरकर आत्म साक्षात्कार करना है। काल के इस क्षण की सार्थकता शिव सायुज्य प्राप्त करने में है; शिवमय हो जाने में है। शक्ति माया नहीं है, मिथ्या नहीं है, प्रपंच नहीं है। इसके विपरीत शक्ति सत्य है। जीव और जगत भी सत्य है। सभी तत्वतः सत्य हैं। सभी शिवमय हैं। शिव और शक्ति भाषा के धरातल पर भेदक हैं; भिन्न हैं। तत्वतः एक के ही दो रूप हैं। अभिन्न हैं। विश्वदृष्टि से देखने पर, सृष्टि और संहार की दृष्टि से देखने पर, उन्मेष और निमेष को लक्ष्य करके देखने पर, शिव और शक्ति पृथक प्रतीत होते हैं। चिदंश शिव भाव और आनन्दांश शक्ति भाव तत्वतः परस्पर मिले हुए हैं; अभिन्न हैं।(आदिनाथं महासिद्धं शक्तियुक्तं जगद् गुरुम्।)।

भगवान शिवः विरोधी भावों का सामंजस्य एवं सामरस्य

शिव में परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य देखने को मिलता है। शिव के मस्तक पर एक ओर चंद्र है, तो दूसरी ओर महाविषधर सर्प उनके गले का हार है।। वे कामेश्वर या अर्द्धनारीश्वर होते हुए भी कामजित हैं, वीतरागी हैं। गृहस्थ होते हुए भी श्मशानवासी हैं। सौम्य तथा आशुतोष होते हुए भी भयंकर रुद्र हैं। महाभारत का अध्ययन करने पर हमें शिव के परस्पर विरोधी गुणों का उल्लेख मिलता है। महाभारत के अनुशासन पर्व में ही निम्न विरोधी गुणों के प्रसंग देखे जा सकते हैं : (1)स्थिर/जंगम (2) गोचर/अगोचर (3) सुरूप/विरूप (4) सत्/असत् (5) व्यक्त/अव्यक्त (6) पर/अपर (7) सूक्ष्मात्मा/महारूप (8) गुह्य/अगुह्य।

पुराणों में भी शिव के विरोधी गुणों के उल्लेख प्राप्त हैं : (1) विष्णुरूपिन् / रुद्ररूपिन् (2) वरदाता / दण्डदाता (3) क्षर / अक्षर (4) द्रष्टा / दृष्य (5) व्याप्य / व्यापक (6) विश्व / विश्वेश्वर (7) कूटस्थ /कूटवर्जित (8) एक /अनेक (9) भोक्ता /भोग्य (10) स्थूल / सूक्ष्म (11) मूर्त / अमूर्त (12) सौम्य / कराल।

शैवागमों में भी शिव के विरोधी गुणों का प्रतिपादन मिलता है : (1) प्रमेय / अप्रमेय (2) प्रमाता / प्रमेय (3) कार्य / कारण (4) विश्वमय / विश्वोत्तीर्ण (5) अन्तर्मुख / बहिर्मुख (6) सर्व / सर्वातीत (7) वाच्य / वाचक (8) स्थूल / सूक्ष्म (9) व्याप्य / व्यापक (10) गोचर / अगोचर (11) चित् / अचित् (12) नित्य / अनित्य।

शिव परिवार भी इससे अछूता नहीं हैं। उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी का समभाव देखने को मिलता है। वे स्वयं द्वंद्वों से रहित सह-अस्तित्व के पोषक एवं समरसता के प्रतीक हैं।

भगवान शिव जटाजूटधारी हैं। शिव की मूर्तियों में जटायें समान रूप से प्रदर्शित नहीं हैं। नटराज के तांडव नृत्य को प्रदर्शित करने वाली मूर्तियों में केश-पाश (जटायें) खुले हुए, बिखरे हुए तथा उड़ते हुए दिखाये जाते हैं। इसके विपरीत अन्य प्रकार की मूर्तियों में जटायें बँधी हुई दिखाई जाती हैं। इस अंतर के क्या प्रतीकार्थ हैं।

इस दृष्टि से विचार करें तो शिव की जटायें ब्रहाण्ड के विभिन्न लोकों की प्रतीक हैं। खुले, बिखरे तथा उड़ते केश-पाश विभिन्न लोकों के पारस्परिक संतुलन-चक्र के बिखराव एवं ध्वंस होने के प्रतीक हैं। विभिन्न लोकों की लयबद्धता के नष्ट होने तथा सृष्टि की प्रलय-उन्मुखता के प्रतीक हैं। बँधी हुई जटायें विभिन्न लोकों के संतुलन-चक्र की प्रतीक हैं। सृष्टि के लय-विधान की प्रतीक हैं।

गंगाधर की जटाएँ:

इसके विपरीत गंगाधर की जटायें बँधी हुई हैं। गंगाधर की जटाएँ खुली हुई नहीं हैं। गंगाधर की जटाएँ बिखरी हुई नहीं हैं। गंगाधर की जटाएँ उड़ती हुई नहीं हैं। गंगाधर की जटाएँ विभिन्न लोकों के संतुलन-चक्र की प्रतीक हैं। सृष्टि के लय-विधान की प्रतीक हैं। इन्हीं जटाओं में स्वर्ग लोक से अवतरित होकर गंगा विहार करती है। गंगाधर की जटाओं के संस्पर्श से गंगा सामान्य जल-प्रवाह नहीं है। यह भगवान शिव की प्रकृत्यानुरूप हो जाती है। तीनों तापों की हरण कर्ता हो जाती है।

तीनों तापों का नाश करने वाली गंगा:

इस पौराणिक कथा का गहरा प्रतीकार्थ है कि स्वर्ग लोक से अवतरित होने के बाद तथा पृथ्वी-लोक में आने से पहले माँ गंगा भगवान शिव की जटाओं में विहार करती हैं। इसके बाद गंगा हिमालय के गोमुख में प्रकट होती हैं। स्वर्ग लोक और हिमालय की गंगा केवल देवताओं तथा सप्तर्षियों के लिए पूज्या हैं। राजा भगीरथ की अप्रतिम तपस्या और साधना से प्रसन्न ब्रह्मा जी के द्वारा स्वर्ग-लोक से पृथ्वी-लोक पर भेजी जाने वाली गंगा "भागीरथी" रूप में गंगोत्री पहुँचकर पृथ्वी की त्रय तापों को हरण करने के लिए अपनी प्रकृति को समन्वयवादिनी बना लेती है। जिस प्रकार भारतीय संस्कृति रूपी गंगा की रचना अनेक सांस्कृतिक धाराओं के मिलन से हुई है, उसी प्रकार गंगोत्री की भागीरथी का पहले माणा गाँव में अलकनन्दा से संगम होता है, इनका आगे चलकर विष्णु प्रयाग में धौली गंगा से संगम होता है, इसके बाद समाविष्ट एकीभूत धारा का नन्द प्रयाग में नन्दकरणी और कर्ण प्रयाग में पिण्डारी नदियों की धाराओं से संगम होते हुए रुद्र प्रयाग में केदारनाथ धाम से प्रवाहित होने वाली मंदाकिनी से संगम होता है। देव प्रयाग में आकर समस्त धाराएँ अपने अपने रूपों को गंगा में विलीन कर देती हैं। गंगा बनने के बाद ही गंगा लोक के मंगल का कारक हो जाती है। देवप्रयाग ही वह स्थान है जहाँ समस्त धाराएँ एकात्म हो जाती हैं। यह भगवान शिव की भाँति सृष्टि के लय-विधान का कारक हो जाती हैं। समस्त प्रकार के भेदों को मिटाकर अभेद-रूपा हो जाती हैं। समरसता की प्रतीक हो जाती हैं। जिस प्रकार भगवान शिव की आराधना का "महामृत्युंजय मंत्र" पारलौकिक, मानसिक एवं भौतिक तीनों प्रकार की व्यथाओं, संतापों, पाशों से मुक्त कर देता है उसी प्रकार ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को गंगा स्नान का पर्व "दशहरा" दस प्रकार के पापों का हरण कर लेता है। दशहरा = दसों पापों के हरण करने का पर्व। तीनों मानसिक, तीनों वाचिक और चारों शारीरिक पापों को हरण करने वाला पर्व।

शुक्लपक्षस्य दशमी ज्येष्ठेमासि द्विजोत्तम। हरते दशपापानि तस्माद् दशहरा स्मृता।।

दशहरा पर्व पर गंगा स्नान का प्रतीकार्थ है। इसकी सार्थकता व्यक्ति के केवल अपनी काया को गंगा की धारा में नहलाना नहीं है, इसकी सार्थकता चित्त और मन की वृत्तियों के निर्मलीकरण में है। इसकी सार्थकता गंगा को समस्त प्रदूषणों से मुक्त करने में सहभागी बनने के लिए संकल्पित होने में है। समस्त सामाजिक विषमताओं को मिटाने के लिए और गंगा की भाँति लोकमंगल के लिए कृतसंकल्पित होने का पर्व है। गंगा भगवान शिव की जटाओं का संस्पर्श पाकर सामान्य जल-धारा नहीं रह जातीं। इसके विपरीत "ब्रह्मद्रवस्वरूपा" हो जाती हैं। कामना है कि निर्मल गंगा लोक चेतना की उदात्त वृत्तियों के उन्मेष का कारक सिद्ध हो। लोक में जितना भी संताप है, मेरे-तेरे का द्वन्द है, सम्प्रदायों का तनाव है, वह इस पावन पवित्र धारा के आचमन मात्र से निर्मूल सिद्ध हो। लोक का कल्याण हो। इतिहास इसका साक्षी है कि जो भी जहाँ से आया, वह गंगा की निर्मलता का भक्त हो गया। उर्दू के प्रसिद्ध शायर इकबाल की निम्न पंक्तियाँ प्रमाण हैं –

"ऐ ओबेरोदे गंगा! वह दिन है याद तुझको।

उतरा तेरे किनारे, जब कारवाँ हमारा।।

(हे गंगा के पवित्र जल! तुझे वह दिन याद है जबकि तेरे किनारे हमारा दूर देश से आगत हमारा कारवाँ उतरा था)।

जिस प्रकार देवप्रयाग में अनेक धाराएँ समाहित समरस होकर एकात्म हो जाती हैं, उसी प्रकार हमारी गंगा माँ सामाजिक समरसता का कारक बने। सबके सुख और कल्याण की चेतना-धारा बने।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।।

गंगा विश्वजनीन लोक के मंगल और आनन्द का आधार:

गंगा विश्वजनीन लोक के मंगल और आनन्द का आधार है। जगत के प्राणी मात्र की पीड़ा और वेदना का हरण करने वाली तथा समस्त प्रकार के सुखों की प्रदाता है।

"गंगा सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला।।" (श्रीरामचरितमानस)

मेरी कामना है कि समस्त मनीषी-गण गंगा की पवित्र जल-धारा को, जो औद्योगिक कल-कारखानों के प्रदूषण से आवृत्त कर दी गई है, उसे उसके स्वरूप में लाने के भागीरथ प्रयास में सहभागी बने तथा गंगा को किसी सम्प्रदायिक भावना के दायरों में बाँधने के कुटिल-षड़यंत्रों को निर्मूल करें। चूँकि गंगा सकल लोक के मंगल का आधार है, इस कारण निर्मल गंगा अभियान की सार्थकता इसमें है कि हम सबकी गंगा हम सबमें इस भावना की जागृति का हेतु बने कि हम सब विश्व-रूपी-जहाज पर सवार सहयात्री हैं। गंगा हम सबके चित्त को उदार बनाए जिससे भारतीय ऋषियों की वाणी चरितार्थ हो सके कि –

"अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्। उदार चरितानाम् तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।"

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

सेवानिवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान

123, हरि एन्कलेव, बुलन्दशहर – 203001

mahavirsaranjain@gmail.com

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