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जिंदगी / लघुकथा / विरेंदर वीर मेहता

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"भाई ! जरा चौक वाले डॉक्टर के क्लीनिक चलना है।" कहते हुए वो दोनों बाते करते हुए रिक्शे में बैठे गए।
"इनकी बातों से लग रहा है जैसे पति; पत्नी से सहमत नहीं है पर इसका मन रखने के लिए साथ चला आया है।" यही सब सोचते हुए रिक्शेवाले ने रिक्शे को चौक वाले रस्ते पे डाल दिया।
धूप से बचने के लिए एक हाथ में छाता और दूसरे हाथ से छाती को दबाये साथ बैठे पति को लक्ष्य कर पत्नी कह रही थी। "अब उम्र के ढलते दौर में जब बीमार शरीर हर घड़ी परमात्मा के बुलावे के डर के साथ जी रहा है, ऐसे में भी हर पत्नी की तरह मैं भी जग से सुहागन ही विदा होना चाहती हूँ लेकिन....।"
"वो ठीक है, पर देख बुधिया! मेरी बीमारी पर अब पैसा लगाना पानी में रेत डालने जैसा ही है।" पति ने उसकी बात को बीच में ही काट दिया।
"कैसी बात करते हो जी! डॉक्टर ने कहा है कि इस दवाई से तुम बिलकुल ठीक हो जाओगे।" उसने पति को हौसला देने की कोशिश की।
"कैसी दवाई कैसा डॉक्टर? अब अमरता का वरदान तो लेकर आये नहीं, ये तो बस तेरे प्यार का अमृत है बुधिया! जो मुझे जिंदा रखे हुए है।" पति के होठों पर फीकी हँसी आ गयी।
रिक्शेवाला भी अपनी किसी बात को याद कर मुस्कराने लगा।
इधर बुधिया भी पति की बात पर मुस्कराई पर जल्दी ही गंभीर भी हो गयी। "न जी ये तो हमारा मोह है जो हम जिंदगी से जुड़े बैठे है।"
"मोह ही सही लेकिन हम बूढ़ों का साथ बना रहे तो अच्छा, वर्ना बच्चों द्वारा छोड़े हम बूढ़ों में से एक साथी के चले जाने के बाद तो जिंदगी श्राप ही बन जानी है।" पति भी गंभीर हो गया।.........

करड़...करड़... करता रिक्शा अचानक ही रुक गया।
"क्या हुआ ?" पति-पत्नी ने सम्मिलित आवाज में पूछा।
"कुछ नहीं बाऊजी, जरा चैन उतर गयी है।" रिक्शावाला नीचे उतर चैन चढ़ाने में लग गया।
"हां भई !"  रिक्शेवाले की ओर देखते हुए पति कहने लगा। "दोनों पहियों में से किसी की भी कड़ी उतर जाए तो रिक्शा बेचारा चलेगा भी कैसे ?"
"हाँ बाऊजी! जिंदगी और रिक्शे में शायद यही फर्क होता है।" कहता हुआ रिक्शे वाला अनायास ही फूट फूट कर रोने लगा।

'विरेंदर वीर मेहता'

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