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मूर्तियों की भी तो सुनें - डॉ. दीपक आचार्य

(चित्र - ललित डॉट कॉम से साभार)

यों तो मूर्तियों से पूरा संसार भरा हुआ है। तरह-तरह की मूर्तियां विद्यमान हैं। कुछ लोग मूर्तिवत हैं और कुछ मूर्तियां जीवन्तता देती रही हैं। मूर्तियों के भी कई सारे भेद जमाने में दिखने लगे हैं। कुछ पूजनीय हैं, कुछ दर्शनीय हैं, कई प्राण प्रतिष्ठित हैं और ढेरों ऎसी हैं जिनमें प्राण तत्व का आभास तक नहीं होता।

कई प्राणहीन और खण्डित मूर्तियां पूजी जा रही हैं और बहुत सारी मूर्तियां उस कतार में खड़ी हैं जिन्हें प्रतिष्ठा और प्राणतत्व की तलाश है। कइयों का निर्माण जारी है और ढेरों हैं जो किसी न किसी कबाड़ में कपड़ा ढंके हुए अपने कल्याण का इंतजार कर रही हैं।

सड़कों-सर्कलों और चौराहों से लेकर राजपथों की मूर्तियां बिना बात के पूजी जा रही हैं और अपने आपको सिद्ध मानकर किसी को श्राप तथा किसी को वरदान देने में व्यस्त हैं।

अनेक मूर्तियां न व्यस्त हैं न पूजित हैं फिर भी अस्त-व्यस्त जरूर हैं। कुछ मूर्तियां तभी बोलती हैं जब पण्डे-पुजारी और उनके संरक्षक आका कुछ हिदायत देते हैं, इशारों में समझा जाते हैं और प्रसाद की लालच दिखा जाते हैं। तरह-तरह की इन मूर्तियों के बीच भगवान फंसा हुआ है जो कहीं जरूरत से ज्यादा पूजा जा रहा है और कहीं पूरी तरह उपेक्षित पड़ा हुआ है।

आजकल चमत्कारों का जमाना है। जो चमत्कार दिखाएगा, यह मूर्ख और अंधविश्वासी भीड़ उस तरफ भेड़ों की रेवड़ों की तरह  कतारों में चल पड़ती है। कोई बाबा झुनझुना बजाता है तो यह भीड़ उसकी ओर खिंची चली आती है।

भीड़ में शमिल हर आदमी को कुछ न कुछ चाहिए। हरेक की कोई न कोई इच्छा या भूख-प्यास है। जो इनका समाधान करने का शंख फूंकता है, यह पूरी की पूरी भीड़ उसकी तरफ चलने लगती है।

भीड़ में भगवान को पाने वाला शायद ही कोई होता होगा अन्यथा सारे किसी न किसी किस्म के याचकों से कम नहीं। हवाओं में महल बनाकर त्रिशंकु की प्रतिष्ठा करने में माहिर मूर्तियों की कहां कमी है।

इस देश में सिद्ध बाबाओं, चमत्कारिक महापुरुषों और धर्म के नाम पर डुगडुगी बजाने वाले सभी लोगों की भीड़ रही है जिनकी मौज मस्ती का राज ही यह भीड़ है।  यह भीड़ न हो तो भाड़ में चले जाएं सभी। कौड़ी के भाव न पूछे कोई।

सभी प्रकार की मूर्तियों की चर्चा के बीच यदि हम मन्दिरों में प्रतिष्ठित भगवान की मूर्तियों की ही बात करें तो हमें यह जानकर आश्चर्य होगा कि हमने मूर्तियों के महत्व तक को दरकिनार कर दिया है।

बहुत सारे मन्दिर हैं जिनमें प्राण प्रतिष्ठित सुन्दर मूर्तियाँ स्थापित हैं लेकिन मूर्ख भक्तों, कतिपय पुजारियों और धर्मज्ञान से वंचित पण्डों-पण्डितों की वजह से कृत्रिम श्रृंगार से इन मूर्तियों को इतना अधिक ढक दिया गया है कि पानीयों और श्रृंगार के बीच ममी मानकर लपेटा हुआ है।

मूर्ति होती ही इसलिए है कि उसकी अंग पूजा होती रहे, उसके दर्शन कर मूर्ति के स्वरूप के अनुरूप भाव पैदा होते रहें और जीव तथा मूर्ति के बीच एक आत्मीय तादात्म्य स्थापित हो, जिससे कि दोनों के मध्य दिव्य सेतु स्थापित होकर दैवीय तरंगों का प्रवेश हो और जीव को परमतत्व का अहसास हो, दिव्यता का संचरण हो तथा ईश्वरीय सत्ता से हमेशा-हमेशा के लिए जीव का अटूट रिश्ता जुड़ जाए।

मूर्तियां अपने आप में सुघड़, सुन्दर और आकर्षक होती हैं, तभी तो मूर्ति कही जाती है। हम जनता को दिखाने भर के लिए इनके वास्तविक स्वरूप को ढक दिया करते हैं और कृत्रिम लबादों से इतना अधिक लाद दिया करते हैं कि पता ही नहीं चलता कि मूर्ति का मूल स्वरूप क्या है।

कई मूर्तियों पर चांदी के वरक चिपकाते रहने की परंपरा है। इन मूर्ख पुजारियों और भक्तों तथा नासमझ अथवा लालची पण्डितों को यह पता नहीं है कि वरक मांसाहारी तत्व है जिसका प्रयोग कर वे आखिर क्या दर्शाना चाहते हैं।

इसी प्रकार पानीयों को चिपकाने की परंपरा विद्यमान है। इस वजह से कई मूर्तियों का असली स्वरूप दिखता ही नहीं, भगवान के नाम पर कोई मोटा-तगड़ा स्तंभ ही नज़र आता है और हम हैं कि इसी परंपरा में रमे हुए हैं।

कई मूर्तियां आत्मश्रृंगारित होती हैं। उनकी बनावट ही श्रृंगार से परिपूर्ण होती है, फिर भी भौतिक चकाचौंध से प्रभावित हम लोग आडम्बरों का इस्तेमाल करते रहते हैं। दरअसल भगवान की मूर्तियां अब दर्शनीय अधिक होने लगी हैं, पूजनीय या श्रद्धा भाव से भरी हुई कम।

खूब सारे मन्दिरों के कर्ता-धर्ता और धर्म के ठेकेदारों की हालत यह है कि उनके लिए मन्दिर किसी लाभकारी वाणिज्यिक प्रतिष्ठान या डेरे से ज्यादा कुछ नहीं है। इसलिए वे चाहते हैं कि चकाचौंध और आकर्षण बढ़े, लोगों की अधिक से अधिक भीड़ मन्दिरों का रूख करे ताकि आवक बढ़े और इसका इस्तेमाल पूजा-पाठ, अनुष्ठान, सेवा कार्यों की बजाय मन्दिर के भौतिक विकास के लिए पत्थरों, लोह-लक्कड़, ईंटों और सीमेंट पर खर्च होता रहे ताकि मन्दिर प्रसिद्धि के साथ मुद्रार्जन का केन्द्र भी बनता रहे।

यही मनोवृत्ति है जिसकी वजह से आज मन्दिर तो प्रसिद्ध हो रहे हैं, पर्यटन केन्द्र भी बनते जा रहे हैं लेकिन मूर्तियां व्यथित हैं, कुलबुला रही हैं, धर्म श्रद्धा और दिव्यता का  ह्रास होता जा रहा है।

मन्दिरों को धर्मशास्त्रों के अनुसार चलाएं, अंधश्रद्धा या स्वार्थपूर्ण लक्ष्यों को पाने के लिए नहीं। मन्दिरों को जीवंत, दिव्य और आत्मशांति का केन्द्र बनाएं। तभी भगवान भी खुश रह सकते हैं और उनके असली भक्त भी।

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- डॉ. दीपक आचार्य

941330677

dr.deepakaacharya@gmail.com

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