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बाल कहानी / झूठ के पैर नहीं होते / गोवर्धन यादव

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एक राजा था. संतान न होने की वजह से वह बहुत दुखी रहने लगा था. उसने कितने ही जप-तप किए,सब निष्फ़ल गए. एक दिन संयोग से देवर्षी नारद उसके दरबार में आ पहुंचे. उसने ऋषि का स्वागत करते हुए अपने आसन पर बिठाकर चरण पखारे और तरह-तरह से सेवाएं की. प्रसन्न ऋषि जब जाने लगे तो उसने हाथ जोड़कर विनती की कि बिना संतान के उसका जीवन नरक बन चुका है. यदि आप कृपा पूर्वक कोई उपाय बताएं जिससे उसका मनोरथ पूर्ण हो सके.

देवर्षि ने उसे शिव की आराधना करने की सलाह दी और यह भी बतलाया कि उसे किस तरह से शिव को प्रसन्न करना चाहिए.

राजा ने अपना मनोरथ सिद्द करने के लिए शिव की कड़ी आराधना की. उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिव उसके सामने प्रकट हो गए और वर मांगने को कहा. राजा ने बड़े ही विनीत भाव से पुत्र प्राप्ति के लिए वर मांगा. शिवजी ने प्रसन्न होकर वरदान दिया कि उसके दो पुत्र होंगे. दोनो ही रूपवान-गुणवान होंगे, दोनो की शकल-सूरत भी एक सी होगी. विश्व में उनका बड़ा नाम होगा. इतना कहकर शिव अंतर्ध्यान हो गए.

कुछ समय पश्चात उसके यहां दो पुत्रों ने जन्म लिया. उसने बड़े बेटे का नाम सच और छॊटॆ का नाम झूठ रख दिया. बड़ा पुत्र तो सही सलामत था लेकिन दूसरे के पैर नहीं थे. छोटॆ पुत्र के पैर नहीं होने से उसे अपार दुख तो हुआ, लेकिन यह सोचकर संतोष कर लिया करता कि निःसंतान मरने से अच्छा हुआ कि उसकी संताने तो हुईं.

बच्चे अब बड़े होने लगे थे. राजा नहीं चाहता था कि उसका एक बेटा जो बिना पैरों के पैदा हुआ है, इसकी खबर उसके प्रजाजनो को लगे. अतः उसने अपने कक्ष में इस तरह का इन्तजाम कर रखा था कि भूल से भी वे उस कक्ष के बाहर न निकल सकें. वे बार-बार उस कक्ष से बाहर जाने की जिद करने लगे. राजा को एक उपाय सूझा. उसने उनके कपड़े इस तरह बनवाये जो उनकी लम्बाई से कुछ ज्यादा थे. जब वे चलते तो उनके पैर दिखाई नहीं देते थे. लेकिन एक समस्या और भी थी कि दोनो की शक्ल-सूरत एक जैसी थी. उनकी सही पहचान के लिए राजा ने बड़े बेटे के लिए सफ़ेद और छोटे बेटे के लिए काले रंग का अंगरखा बनवा दिया. अब वे आसानी से राजमहल के भीतर और बाहर जा सकते थे.

बड़ा बेटा अपने नाम के अनुरुप सदा सत्य बोलता. उसका स्वभाव भी मिलनसार था, अतः दरबारी उसकी बहुत इज्जत किया करते थे, जबकि छॊटा बहुत ही उद्दंड और लमप्ट था. बात-बात में लोगों से पंगा लेना, झगड़ा-झासा करते रहना उसके स्वभाव में था. लोग उससे सामना लेने से भी बचते थे. वे राजा से शिकायत करने से भी डरते थे कि पुत्र-मोह में राजा उन्हें सजा न दे दे. छोटे को अपने बड़े भाई की लोकप्रियता से कुढ़न होने लगी थी. वह आए दिन कोई न कोई छल-प्रपंच खड़ा करने से भी नहीं चूकता था ताकि उसकी बदनामी हो सके, लेकिन वह अपने प्रयास में कभी सफ़ल नहीं हो पाया.

एक दिन झूठ ने एक नया ‍षड़यंत्र रचते हुए सच से कहा कि क्यों न हम शिकार खेलने जंगल चलें. काफ़ी दिनों से वे राजमहल से बाहर भी नहीं निकल पाए थे. सच को सुझाव अच्छा लगा. उसने शिकार पर चलने की हामी भर दी. शिकार की तलाश में वे जंगल-जंगल भटकते रहे,लेकिन कोई भी शिकार उनके हाथ नहीं लगा.

पास ही एक नदी बहती थी. उन्हें प्यास भी लग आयी थी. दोनों ने नदी का शीतल जल पीकर अपनी प्यास बुझाई और एक पेड़ के नीचे विश्राम करने लगे. चिलचिलाती धूप से उनका और भी हाल बुरा होने लगा था. गर्मी की तपन से बचने के लिए झूठ ने अपने बड़े भाई को सलाह देते हुए कहा कि क्यों न हम नदी में नहा लें, बड़ी राहत मिलेगी.

सच ने उसका कहा मान लिया. अब दोनों ने अपने-अपने वस्त्र उतारकर पेड़ के नीचे रख दिए और नदी में उतर गए.

मौका पाकर झूठ नदी से बाहर निकला और अपने बड़े भाई के सफ़ेद वस्त्र पहनकर राजमह्ल लौट आया. सच जब नदी के बाहर निकला तो उसने अपने छोटे भाई को आवाज लगाई. कोई उत्तर न पाकर जैसे ही वह अपने वस्त्र उठाने के लिए आगे बढ़ा, उसके वस्त्र नदारत थे. काले कपड़ों का लबादा एक ओर पड़ा हुआ था. सारा माजरा उसके समझ में आ गया था कि उसके साथ धोखा हुआ है.

काला लबादा पहनकर वह राजमहल लौटना नहीं चाहता था. बस केवल एक ही रास्ता शेष बचा था उसके पास. वह घने जंगल की ओर निकल गया और फ़िर कभी लौटकर राजमहल नहीं पहुंचा.

इस घटना के बाद से यह कहावत चल पड़ी कि सच हमेशा नंगा होता है, इसलिए वह खुलकर सामने नहीं आता, जबकि झूठ सफ़ेद कपड़े पहनकर, बिना पांव के चलते हुए सब जगह आराम से पहुंच जाता है.

-- गोवर्धन यादव

103 कावेरी नगर ,छिन्दवाडा,म.प्र. ४८०००१
07162-246651,9424356400

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