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महाकाल की पूजा का महापर्व, महाशिवरात्रि / डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

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7 मार्च महाशिवरात्र पर विशेष

 

सनातन धर्म और भगवान शिव का नाता अनादि काल से प्रत्यक्ष रूप में सामने आता रहा है। आज पूरे भारत वर्ष सहित दुनिया के अनेक देशों में आदिदेव भगवान शंकर के मंदिरों का पाया जाना या समुद्र तल पर बहुतायत में पाये जाने वाले शिवलिंग इस बात का प्रमाण है। कुछ माह पूर्व जामा मस्जिद के एक मौलवी द्वारा यह कहा जाना कि हमारे पूर्वज सनातन धर्म को मानने वाले थे और आदिदेव शंकर हमारे भगवान थे। इस कथन ने बड़ा बवाल मचा दिया था। इस बात का इंकार नहीं किया जा सकता है कि निर्माण के दौरान खुदाई में भी भगवान शंकर की भग्नावशेष मूर्तियां प्राचीन काल को भगवान शिव की आराधना से जोड़कर देखते रहा है। अखंड भारत वर्ष में क्षेत्रीयता के आधार पर अलग-अलग देवी देवताओं के पूजा का इतिहास मिलता है, किंतु भगवान भोलेनाथ ही एक ऐसे सर्वव्यापक देव है, जिन्हें अखंड भारत वर्ष के साथ विदेशों में भी पूजा जाता है। भगवान शिव शंकर की आराधना रूद्रावतार के रूप में की जाती है। हमारे धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि भगवान शिव ने ही अपनी प्रचंड शक्ति और ज्योति के बल पर अन्य देवी-देवताओं को अस्त्र शस्त्र प्रदान कर तेजस्वी और यशस्वी बनाया।

पंचमुंख और दस भुजा से करते है भक्तों की रक्षा

हिंदू धर्म ग्रंथों में सहज एवं ग्रंथ प्रसन्न होने वाले देवों में सर्वप्रथम भगवान शिव का ही नाम लिया जाता है। शास्त्रों में इनके पंचमुखी रूप का वर्णन भी मिलता है। पांच मुखों और दस भुजाओं से अपने भक्तों को शक्ति और संबल प्रदान करने वाले हलाहल भोलेनाथ शिव शंकर से रूपों का वर्णन भी बड़ा अद्भुत है। पूर्व-पश्चिम, उत्तर और दक्षिण तथा उर्द्धवमुखी भगवान रूद्र की पूजा अलग-अलग मुखाभिभाव में अलग मान्यता के रूप में की जाती है। भगवान भोलेनाथ के पूर्वमुखी मंदिर अथवा पूर्वमुखी मूर्ति की आराधना वायुतत्व के रूप में की जाती है। इसी तरह पश्चिम मुखी डमरूधर को पृथ्वी तत्व के रूप में पूजा जाता है। उत्तर दिशा की ओर मुख किये शिवजी के मंदिरों में उनकी स्तुति जल तत्व के रूप में की जाती है। दक्षिणेश्वर अथवा दक्षिण दिशा की ओर निराहते नीलकंठ आदिदेव की पूजा तेजश तत्व के रूप में की जाती है। भगवान शिव की ऐसी मूर्ति जो आकाश की ओर निहार रही हो, उसे आकाश तत्व के रूप में पूजा जाता है। हमारे ग्रंथ इस बात को स्पष्ट करते है कि चारों दिशाओं के अलावा ऊपर की ओर भी भगवान शिव की शक्ति का ही संचार हो रहा है। यह भी माना जाता है कि शिवजी के इन्हीं पांचों रूपों की शक्ति ने पूरे जगत का निर्माण किया है। रूद्रावतार भगवान भोलेनाथ ही इस भूलोक के सृजनकर्ता माने जाते है। यह भी माना जाता है कि उपर्युक्त वर्णित पंचतत्वों की उत्पत्ति भी सदाशिव की ही देन है। विश्व की रचना उसका संरक्षण और अंत में संहार का कार्य करने वाले भगवान शंकर को इसी कारण ब्रहा, विष्णु और रूद्र की संज्ञा दी जाती है।

मनोकामना के अनुसार करें मंत्र का जाप

भगवान भोलेनाथ यूं तो ‘ऊं नमः शिवाय’ पंचाक्षरी मंत्र से ही अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर कृपा बरसाने लगते है। किंतु अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए भक्त अलग-अलग मंत्रों से भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न कर सकते है। मनोवांछित फल की प्राप्ति के लिए त्रिनेत्रधारी डमरूधर भगवान भोलेनाथ की भक्ति इस मंत्र से की जानी चाहिए।

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय, भस्मांग रागाय नमःशिवाय।

मंदाकिनी सलीलचंदन चर्चिताए, नंदीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय।।

मंदारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय तस्मै म काराय नमः शिवाय।

शिवाय गौरी बदनाजवृंद सूर्याय दक्षाध्वर नाशकाय।।

श्री नीलकंठाय वृषभध्वजाय तस्मै शि काराय नमः शिवाय।

अवंतिकायम् विहितावतारं मुक्ति प्रदानाय च सज्जनानाम।।

अकालमृत्यौ परिरक्षानार्थम् वंदे महाकाल महासुरेशम्।।

इसी तरह निरोग रहने अथवा स्वास्थ्य लाभ प्राप्ति के लिए शिवजी के अधोलिखित मंत्र का जप लाभकारी होता है।

सौराष्ट्रदेशे विशदे अतिरयै ज्योर्तिमयं चंद्रकला वतंसम।

भक्ति प्रदानाय कृपा वतीर्णमं तं सोमनाथनम शरणम प्रपद्धे।

भगवान भोलेनाथ की सपरिवार पूजा के समय उस निमित्त की जा रही पूजा फल प्राप्ति हेतु भक्तों को इस मंत्र का जप करना चाहिए।

ऊं ब्रह ज्ज्ञानप्रथमम पुरस्ताद्विसमितः सुरूचो बेन आवः।

स बुधन्या उपमा अस्य विष्टा सतश्र्व योनिमस्तश्र्व विवः।।

शिव शद की व्याया गूढ रहस्य लिए है

शिवशद का व्याया अलग-अलग रूपों में की जाती है। इसे बड़ी आसानी के साथ समझ पाना कठिन है। शास्त्र कहते है कि पंचमुखी शिव को ही अघोररूपी शिव की संज्ञा दी जाती है। भूत नाथ अथवा भुतेश्वर महादेव भी इसी रूप का नाम है। ‘पंचतत्व मिली बना शरीरा’ भी इसी पंचमुखी शिव स्वरूप का सार है। अग्नि, वायु, जल, आकाश और पृथ्वी से मिलकर ही मानव शरीर का निर्माण हुआ है, यह भी शाश्वत सत्य है कि भगवान शिव एवं उनकी शक्ति ही सर्वत्र व्याप्त है। शिव शद में से यदि ई का मात्रा का विलोप कर दिया जाए तो वह केवल शव ही बचता है। इसके ठीक विपरीत शव में ई की जुड़ते ही वह शिव बन जाता है। मनुष्य का शरीर शव और शिव दोनों स्थितियों के बीच समय काटता रहता है। यदि मनुष्य अपने शरीर में निहित शक्ति को पहचान लें और अपने आचरण में ढाल ले तो वह शिव की शक्ति बन जाती है। हमारी अपनी भुल और अज्ञानता ही हमें गलत आचरणों के कारण ही शव के सामान बना देती है। अघोरेश्वर शिव के गले में मृत्यु रूपी विषैले सर्प लिपटे होते है, किंतु उनकी अंदर का अमृत तत्व के कारण सर्पो के विष का प्रभाव उन पर नहीं पड़ता है। अमृत का तात्पर्य ज्ञान तत्व से लगाया जाता है।

भगवान शिव का शत्रुहन्ता रूप भी दे रहा संदेश

हमारे शास्त्र कहते है कि भगवान भोलेनाथ का ही एक रूप शत्रुहंता भी है। इस स्वरूप का अर्थ है, अपने अंदर के शत्रु भाव को मारना। आज पूरे विश्व में कलह का एकमात्र कारण एक दूसरे से शत्रुभाव रखना ही है। भगवान भोलेनाथ का यह संदेश की अपने अंदर के भाव को निर्मल करना ही मनुष्यता का प्रतीक है, आज बड़ा प्रासंगिक महसूस होता है। इतना ही नहीं भगवान भोले शंकर ही ऐसे देव है, जिन्होंने अपने भक्तों को सारे व्यसन खुद पर अर्पण कर उसे छोड़ देने का संदेश दिया है। हम उज्जैन के महाकाल मंदिर में देखते है कि भक्तगण भगवान को मदिरा अर्पित करते है, यहां तक तो ठीक है, उसे प्रसाद रूप में ग्रहण करना सर्वथा निषिद्ध है। ऐसे भी हमारे धर्म ग्रंथ कहते है कि शिव पर अर्पित कोई भी सामग्री फल अथवा मिठाई जो भोग रूप में चढ़ाई गई तो उसे भक्तगण ग्रहण न करें। इसलिए भगवान शिव की पूजा में तीन भाग प्रसाद अलग अलग चढ़ाया जाता है। एक भाग पर भक्तों का अधिकार होता है, दूसरे पर पंडित का तो तीसरा भाग जो सीधे भगवान भोलेनाथ को अर्पित किया जाता है, उसे गाय को खिला दिया जात है। इसे हम इस रूप में भी ले सकते है कि शरीर को मद की स्थिति में लाने वाली भांग, गांजा, मदिरा, धतुरा, अफीम आदि हमारे शरीर की बड़े शत्रु है इन्हें समाप्त करने ही भगवान भोलेनाथ ने शत्रुहंता का रूप ग्रहण किया।

 

 

(डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

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