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श्रद्धा सुमन - पवन दीवान : राजनीति के संतों के बीच संत की राजनीति / हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन

 

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कभी सोचा नहीं था कि उसने कि वह राजनीति में आयेगा। लोग राजनीति में कुछ पाने के लिये आते हैं। किसी को पद , किसी को पैसा , तो किसी को मान चाहिए। पर जो बहुत बड़े पद में हैं , जिसके पास बहुत अधिक पैसा है , या जो समाज में बहुत सम्मानित हैं वे सभी मिलकर किसी के सामने नतमस्तक हो रहें हो , उस शख्स को किस चीज की लालसा।

खो जाने की फितरत जिसमें होती है , वही तो संत होता है। संत कभी ईश्वर की भक्ति में खो जाता है कभी जनता जनार्दन की सेवा में। घिसें पिटे लुटे जनता के दर्द भरे जख्मों को बहुत करीब से देखा था सुखदेवधर दीवान के पुत्र पवन दीवान ने। एक ओर मन ईश्वर की साधना में तल्लीन होता तो दूसरी ओर वाणी और तन जनता की सेवा के लिये बेताब। और रास्ता बन ही गया। इमर्जेंन्सी ने राजनीति का द्वार खोल दिया। वे राजनीति करने नहीं घुसे से इसमें। वे तो केवल राजनीति कैसे की जानी चाहिए , यह बताने आये थे राजनीति के दलदल में। पर दलदल तो दलदल होता है , वह चेहरा नहीं पहचानता , न ही अपने से अलग होने देता किसी को। फिर भी कमल के फूल की तरह कीचड़ में खिला हुआ था वह। दलदल में था पर दलदल का छींटा नहीं। यह अलग बात थी कि दलदल से वह भी बाहर नहीं निकल सके।

मंत्री , सांसद , केबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त राजनीतिज्ञ अपने लिए ही नहीं बल्कि सात पीढ़ियों के लिए बना जाता है धन दौलत। पर पवन दीवान जी सरपंचों के बराबर नहीं जमा कर सके। क्या उन्हें किसी ने आफर नहीं किया ? क्या उनको कोई काम के एवज में भेंट पूजा लाकर नहीं देता था ? या क्या किसी का काम उनके द्वारा नहीं होता था ? या किसी का काम वे कराना नहीं चाहते या उनको काम कराने नहीं आता था ?

उन्हें कितनी बार किन किन ने आफर नहीं किया। उनमें से अनेकों ने उन्हें भेंट पूजा भी अर्पित किया। उनके बोलने से ही कई काम हो जाते रहे। वे हर किसी का काम कराना भी चाहते और उन्हें काम कराने का हर एक तरीका भी ज्ञात था। पर इन सबके बाद भी , आज उनके जाने के बाद उनकी सम्पत्ति के नाम पर कुछ नहीं। केवल काले रंग की गाड़ी और किरवई का फार्म हाऊस जैसा घर। दरअसल वे सिर्फ संत थे और राजनीति के संतों ने उन्हें ऐसा पटक कर रखा था कि न वे उठ पा रहे थे , न बैठ पा रहे थे। वास्तव में उनके नाम से कितनों ने आफर स्वीकार कर अपनी दुनिया बना ली। अनेकों फर्जी चेले बनकर भेंट पूजा पर हाथ मार लिया। उनके द्वारा कराये गए काम की कीमत कोई और वसूल ले जाता रहा। रही बात अवैध तरीके से काम का , उनने कभी इस्तेमाल नहीं किया। पर उनके नाम को मरते तक भुनाते रहे हैं लोग। वे राजनीति के खेल में असफल खिलाड़ी रहे , जिसे कभी क्रिकेट खेलने को भेजा जाता , कभी हाकी। कभी खो के मैदान में खेलते दिख जाते , तो कभी कबड्डी में। फिर से , कुछ दिन बाद क्रिकेट में बल्ला थामें खड़े हो जाते। जिस खेल में उतरते , स्वभाववश उसी में खो जाते। क्रिकेट में आते , बैटिंग अच्छी जमने लगती , तो अम्पायर से बोलकर उन्हीं के साथी खिलाड़ी एल. बी. डब्ल्यू . आउट करा देते , अन्यथा मैन आफ दी मैच उन्हें ही मिलता , हो सकता है अगले मैच में कप्तान बना दिए जायें। कबड्डी में होते तो अच्छे से अच्छे रेडर को कैच कर लेते , पर वहां भी इन्हे ही फाऊल करार दे दिया जाता। हाकी में गोल मारने के वक्त समय समाप्ति की सीटी बजवा दी जाती। कुल मिलाकर यही , कि सभी अपनी टीम में , अपने गेम में , इन्हें शामिल करने को उत्सुक रहता , पर जीत को इनके प्रयास का नाम देना कोई नहीं चाहता। केवल “ बऊरते ” थे लोग इन्हें। उसके बाद इनको पूछने वाले का अभाव पैदा कर दिया जाता। १९७७ में खूब खेले , पर मैन आफ दी मैच का खिताब कोई और ले गया। १९८०. में उनकी अपनी हाकी की टीम ने गोल करते समय , समय समाप्त हो जाने का इशारा करवा दिया। १९८२ में कबड्डी में घुस गए। अनेकों बार अपने ही खिलाड़ियों ने फाऊल कराया। भोपाल से लोग आकर इनके चरण छूकर गुरू बन जाने का वचन ले लेते और खेल छोड़ देने का धीरे से वादा भी। पर मैदान के भीतर इनकी मौजूदगी , उनके (?) इशारों पर मैच चलवाने के लिए भी जरूरी ही था। छत्तीसगढ़ बन जाने पर इन्हें झुनझुना पकड़ाकर मैदान के अंदर बाहर किया जाने लगा। निराश होकर फिर क्रिकेट की ओर मुड़ चले। मैच की बारी आयी तो लोगों ने नाम ही काट दिया अंतिम एकादश से। कबड्डी की तरफ फिर मुड़े , वहां बलपूर्वक रेड भी करवाया और कैच भी , जैसे मैच खतम , पानी तक के लिए पूछना बंद कर दिया। फिर क्रिकेट का दामन थाम लिया। पर अब बैटिंग से तौबा कर ली थी। फकत मैच देखते रहे और कुछ नहीं।

वास्तव में राजनीति ने इन्हें साहित्य का नाम देकर फटक दिया , तो दूसरी ओर साहित्य ने प्रवचन समझ उपेक्षित किया , वहीं प्रवचन ने राजनीति कहकर अनदेखा किया। ये सभी के थे पर इनका कोई नहीं हुआ। यहीं वे फेल थे। संत राजनीति नहीं कर सकते , दुनिया में इससे अधिक अच्छा उदाहरण कहीं नहीं दिया जा सकेगा।

उनकी खासियत थी वे भी अन्य संतों की तरह , अपने काम में खो जाते थे , पर उसमें डूबे कभी नहीं। उनके अनेक शुभचिंतक थे जो उन्हें दलदल में खिले नहीं रहना देना चाहते थे , उन्हें बाहर निकाल केवल और केवल ईश्वर के चरणों की पूजा चाहते थे। परंतु दलदल इतना विशाल था कि किसी का हाथ उन तक पहुंच नहीं पाया। 71 साल के पवन नाम के इस कमल की ताजगी देखते ही बनती , पर उनके भीतर मौजूद जनता की पीड़ा की घुटन ने अंदर ही अंदर खोखला कर दिया था। ईश्वर से कोई बात कहां छिपी रह सकती है , वे हकीकत जानते थे , मुरझाकर गिर जाने से पूर्व खुद ही तोड़कर अपने चरणों में रख लिया और समाप्त कर दी उनकी जीवन यात्रा। आज वे नहीं खोये , हमने खोया। अबकी बार हमें उबारते उबारते डूब गए। विनम्र नमन है संत और उनकी कार्यों को।

हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन , छुरा

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