शुक्रवार, 25 मार्च 2016

एक औरत अजनबी / लघुकथा / अशोक बाबू माहौर

 

माँ ने अपनी कलाई घुमाई,दर्द कतई नहीं था। माँ को ऐसा लग रहा जैसे किसी ने जादू से पुराना दर्द गायब कर दिया हो और वह चमत्कार को नमस्कार करने लगी।

      "माँ मुझे बहुत भूख लगी है,खाना बना दो न,। "छोटे बच्चे ने जिद्द ठानी।

      "अलोक भैया माँ को क्यों परेशान करते हो ?देखो कितना दर्द है उनकी कलाई में। "नंदनी ने कहा।

अलोक अपनी जगह पर ठहर गया। वह बहन की बात भी टाल नहीं सकता और माँ को भी कराहते देख नहीं सकता। माँ ने अपनी कलाई का उपयोग किया अलोक के लिए खाना बनाया। यह सब देख नंदनी बोल उठी।

       "माँ अब आपकी कलाई में दर्द नहीं है,ये सब कैसे हुआ। "

       "छोड़ बेटी क्यों पूछती है ?"

       "नहीं,नहीं बताओ न माँ। "

दोनों बच्चे अडिग खड़े माँ से पूछने के लिए किन्तु माँ बताने से इंकार करती रही आखिर ऐसी कौन सी  दवाई थी जो वर्षों पुराना दर्द चुटकियों में हर ले गई। अंत में माँ को बताना ही पड़ा।

       "बता दूँगी बच्चों पहले आप स्कूल से पढ़ के जाओ। "

       " ठीक है माँ। "

यह कहकर बच्चे स्कूल चले गए। शाम का समय ठंडी हवाएं हलचल मचातीं। खिड़कियों के परदे उड़े जा रहे। किवाड़ चरचराते कभी अंदर,बाहर हो रहे। माँ ने धक्का मारकर कुण्डी लगा दी। थोड़ी सी चाय बनाई सामने रखे कप में परोस दी तथा कुर्सी पर विराजमान हो गई।

        "माँ अब बताओ न,आपने सुबह कहा था पहले पढ़ के आओ। "नंदनी धीमे स्वर में बोली।

        "बताती हूँ बेटी। "

        "रात जब मैं चारपाई पर लेटी थी। एक अजीब सा सपना आया,सपने में एक औरत अजनबी आई। वह शायद डॉक्टर थी ऐसा मुझे महसूस हो रहा था। " माँ ने चाय की चुस्की ली।

        "आगे क्या हुआ ?" अलोक बोल उठा।

        "बताती हूँ तुम मेरी जान के पीछे ही पड गए। "

        "उस अजनबी औरत ने मुझे देखा,नब्ज देखी कलाई टटोली,'आप ठीक हो जाएँगी। ' मेरा मन विचलित हुआ कही उन हकीमों की तरह रूपए न ऐंठ ले,इसलिए मैंने डर से कहा -'पहले नंदनी के पापा से पूछ लूँ कल आना। किन्तु वह औरत नहीं मानी पहले मुझे रुलाती रही बाद में हँसी के गोल गप्पे भी खिलाए। झट से मेरी कलाई पकड़ी झटके से दीवाल में दे मारी। मैं दर्द से कराह उठी आँसू तेज बह उठे। मैं औरत पर आग बबूला हो उठी। पता नहीं वह कहाँ गायब हो गई। सुबह जब मेरी आँख खुली तो दर्द गायब था। धन्यवाद उस अजनबी औरत का जिसने मुझे ठीक किया। "

         "माँ ये तो चमत्कार हो गया। "नंदनी बीच में ही बोली।

         "हाँ बेटी चमत्कार तो है पर वह औरत थी कौन ?"

         "कोई भी हो दर्द तो ठीक हो गया। " अलोक ने कहा।

         "नहीं बेटा जरूर कोई दिव्य देवी होगी,तभी तो सपने को हकीकत में बना दिया।" माँ ने समझाते कहा।

सुबह माँ ने मेवा मिष्ठानों के साथ देवी देवताओं की पूजा की। पंडित जी को बुलाकर हवन भी कराया। गरीबों को भोजन खिलाया तथा वस्त्र भी बाँटे।

 

                             -परिचय-

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अशोक बाबू माहौर

जन्म-10 :01 :1985 

साहित्य लेखन,विभिन्न साहित्यक विधाओं में संलग्न।

रचनाकार,स्वर्गविभा,हिन्दीकुंज,अनहद कृति, पुरवाई, पूर्वाभास  साहित्य शिल्पी साहित्य कुंज आदि हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।

ई-पत्रिका अनहद कृति की तरफ से 'विशेष मान्यता सम्मान २०१४-१५' से अलंकृति।

संपर्क-ग्राम-कदमन का पुरा,तहसील-अम्बाह,जिला-मुरैना (मध्य प्रदेश) 476111 

मो-09584414669 

ईमेल-ashokbabu.mahour@gmail.com

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