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जो जलता है उसे और जलाओ - डॉ. दीपक आचार्य

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ज्वलनशील होना अपने आप में ऊर्जावान होने का प्रतीक है जो यह सिद्ध करता है कि हमारे भीतर उष्मा भरी हुई है। यह अलग बात है कि हम इस ऊर्जा का उपयोग नकारात्मक करें या सकारात्मक कार्यों के लिए।

यह हमारी बुद्धि, विवेक और अनुभवों पर निर्भर है। जड़ मूर्ख, झूठन पर पलने वाले, ईष्र्यालु और नालायक लोग हमेशा इस ऊर्जा को नकारात्मक कामों में खर्च करते हुए अपने आपको ऊर्जावान समझते रहते हैं और अंत में ऊर्जाहीन होकर अधमरे से पड़े रहते हैं, न कोई पूछता है, न कोई इनकी परवाह करता है।

सकारात्मक सोच वाले लोग राग-द्वेष और अपने-पराये से दूर रहकर श्रेष्ठ और रचनात्मक कर्म में लगे रहते हैं, इन लोगों की ऊर्जा निरन्तर बहुगुणित होती रहती है और ईश्वर भी इन पर इसलिए कृपा बरसाता रहता है क्योंकि ये लोग ईश्वरीय काम करते रहते हैं।

भगवान भी हम इंसानों से यही चाहता है कि उसके कार्य करें और ईश्वरीय विचारों एवं दिव्य कार्यों को आगे से आगे बढ़ाते चलें। जो उसके कार्यों में विश्वास रखता है उसे परमात्मा और अधिक ताकत देता है और जिन्दगी भर उसकी ऊर्जाओं को उत्तरोत्तर बढ़ाता रहता है।

पर आजकल सब जगह उन लोगों की भरमार है जो नकारात्मक सोचते हैं।  ईष्र्या रखते हैं। जिनसे इनका कोई संबंध या लेन-देन नहीं होता, उसके बारे में भी सोचते हैं, निंदा करते हैं और नुकसान पहुंचाने के लिए षड़यंत्रों में रमे रहते हैं। 

ऎसे लोगों का जन्म ही दूसरों को हैरान-परेशान करने और जमाने भर में प्रदूषण फैलाने के लिए होता है। ये लोग विशिष्ट प्रकार से निर्मित होते हैं। इनके माँ-बाप की शालीनता, विनम्रता, धीर-गंभीरता और जीवन माधुर्य जितना अधिक उच्च स्तर का होता है उसी के विलोमानुपात में ये निकम्मे, नालायक और नुगरे होते हैं। पता नहीं भगवान का यह कैसा न्याय है जहां आम के पेड़ से नीम, गिलोय और करेला तक पैदा कर डालता है।

जिधर देखो, उधर आजकल एक ही जुमला सर्वाधिक बार सुनाई पड़ता है। हर कोई दूसरे के बारे में कहता है - वो मुझसे जलता है, वो मुझसे जलती है।  आदमी अब दियासलाई होता जा रहा है।

बहुसंख्य लोग जलने वाले हैं। किसी न किसी से हर कोई जलता है और किसी न किसी को जलाता भी है। संसार में दो ही तरह के लोग रह गए हैं जलने-जलाने वाले और शांतचित्त रहकर अपना काम करने वाले।

जलने और जलाने का दौर संसार में नहीं होता तो अब तक मुर्दों का जमघट लग जाता । जो जलता है उसकी आत्मा पहले ही मर चुकी होती है तभी तो वह बुरा-भला और ज्ञान -बुद्धि- विवेक से भरा नहीं सोच कर केवल जलता रहता है।

जलता वही है जो खुद के बूते कुछ नहीं कर पाता है इसलिए छोटी-छोटी चिंगारियों से अपनी जिन्दगी को रौशन बनाए रखना चाहता है। जलने वाले लोगों को शांत न करें, उन्हें जलने दें।

यों भी हमारे यहां लकड़ियों की कमी होती जा रही है। क्यों न लकड़ियों के सहारे जलने की स्थिति प्राप्त कर लें उससे पहले ही जलाते रहें ताकि ये जलने वाले जलते रहें और इन्हें भस्मीभूत करने के लिए लकड़ियों की जरूरत कम पड़े। यह पर्यावरण चेतना और वृक्षों के प्रति प्रेम भी होगा।

जलने वाले जलने के ही लिए पैदा हुए हैं। इन्हें जलाने में कोई कसर बाकी नहीं रखेंं। जो जलता है वह साँप जैसा होता है। सांप के बारे में कहा गया है कि इसे कभी भी अधजला नहीं छोड़ना चाहिए। वरना भयंकर अनिष्ट कर सकता है। इसीलिए लोग सांप को पूरी तरह जलाकर ही दम लेते हैं।

यही भाव जलने वालों के लिए भी लागू होता है। जो इंसान किसी और पर किसी भी कारण से जलता है उसमें जरूर किसी नाग या नागिन की छवि दिखेगी। सर्प अपने आप में ईष्र्या का प्रतीक है।  इसलिए जो जलने वाले हैं उन पर रहत न खाएं। रोजाना उन्हें जलाते रहें। इन लोगों की गति-मुक्ति का इससे बेहतर और सरल कोई और उपाय है ही नहीं।

आज से ही प्रण लें, जो जलने वाले हैं उन्हें जलाते रहें। इन लोगों को जब तक जलाया जाता रहेगा, तब तक हम भी रोशनी पाते रहेंगे और जमाना भी। और वह भी मुफत में।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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