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नया लिहाफ में- बच्ची मिट्टी में बोये भाव जब अंकुरित हुए / समीक्षा / देवी नागरानी

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नया लिहाफ में- बच्ची मिट्टी में बोये भाव जब अंकुरित हुए

- देवी नागरानी

मानव मन लेखन की हर विधा का श्रेष्ठ प्रतिनिधि होता है जहां भावनात्मक ऊर्जा निरंतर शब्द स्वरुप नदी की तरह प्रवाहमान होती है। ऐसी ही ऊर्जा, प्रबल इच्छा, आत्मविश्वास और आत्म सम्मान के धनी, व सार्थक सृजक श्री रमाकांत शर्मा हम से रूबरू हुए हैं अपने कहानी संग्रह 'नया लिहाफ़' की अनगिनत कहानियों के साथ।

प्रस्तुत संग्रह में शामिल 20 कहानियों का विश्लेषण करते हुए उनमें उठाए गए व्यक्तिगत, परिवारिक एवं समाजिक प्रश्नों का उद्घाटन किया गया है। उनकी कई कहानियां अपने आसपास के पात्रों के संघर्षमय जीवन के भोगे हुए, जिये हुए दुखों और संघर्षों के बीच से उपजी हैं, और यही तत्व उनकी कहानियों की विषय वस्तु बन जाते हैं। विशेष बुनावट-कसावट की धरातल पर कहानी के किरदार, शब्द शिल्प के सौंदर्य से संवादों द्वारा मनोभावों की भाषा-परिभाषा के अंतर द्वंध को अभिव्यक्त कर जाते हैं।

हर कहानी के गर्भ से एक संदेशात्मक प्रस्तुति उपजती है जो मानव मन के हसरतों, चाहतों, अभिलाषाओं, व कृत्रिम नकाबों को फ़ाश करते हुए, उधेड़ते हुए हक़ीक़ी जज़्बे से जोड़ती है। मानव मन से जुड़े रिश्ते-नातों के कुछ छूए-अनछुए पहलुओं को उजगार करती हुई इन कहानियों में कहीं मानवता की धड़कन महसूस की जाती है, तो कहीं इंसानियत सांस लेती दिखाई देती है। संघर्षमय जीवन में जब कोई पास नहीं होता है तब पता चलता है कि उनका होना कितना अर्थपूर्ण व महत्वपूर्ण है। 'उसकी चिंता' नामक कहानी में जीवन के यथार्थ को कुछ इस तरह सामने लाया गया है कि उसके काल्पनिक होने की संभावना कहीं भी दिखाई नहीं देती। जब बेटा बाप की बीमारी के दौरान अपनी स्वार्थी मनोभावों की इच्छाओं का बोझ उनपर यूं लादते हुए कहता है -"पापा आप बुरा न मानना, पर आपको प्रैक्टिकल तरीका अपनाना चाहिए। अगर वसीयत करनी हो तो वह भी कर दीजिए।" दिल व दिमाग़ को झंझोड़ती हुई संबंधों की एक प्रभावशाली कहानी है। जहां पारिवारिक संबंध स्वार्थ की शिला पर टिके हों, वहाँ संबंधों का आधार अर्थ ही रह जाता है, संवेदना वहाँ शून्य हो कर रह जाती है-"पापा आप ताऊ जी की तरह तो नहीं करेंगे?" (ताऊ जी ने मरने के पूर्व वसीयत नहीं की थी और बाद में अनेक दुश्वारियां दरपेश आई थीं)

घर, परिवेश और आसपास की परिधि से जुड़ी जिंदगी के रहस्यों को उजागर करती हुई श्री रमाकांत शर्मा की कहानियां सरल, सहज और आकर्षक शिल्प से पाठक को निरंतर कथारस से सरोबार करती हैं। सामाजिक प्राणी जब अपने परिवेश के आसपास की परिधि के भीतर-बाहर की दुनिया से जोड़ता है तो जीवन की हकीकतों से परिचित होता है। दुख-सुख, धूप- छांव, पारिवारिक संबंध, रिश्तो की पहचान, अपने पराए की बीच के भ्रम जब टूटते हैं तो साफ-शफाक़ सोच पुरानी और नई तस्वीर को स्पष्ट देख पाती है। यह परिपक्वता तब ही हासिल होती है जब मानव उन पलों को जीता है, भोगता है। ऐसी ही पेचीदा पगडंडियों से गुजरते कहानी 'हिदायत' के पात्र अपने आप को व्यक्त करते हैं। कुछ सुना-अनसुना, कुछ कहा-अनकहा कहानी के पात्र की मनोव्रति व

बर्ताव से झाँकता है। मन के मंथन के बाद पाठक को वही कुछ अनकहे-अनसुने संवाद शब्दों की सार्थकता में कुछ उनके ही मनोभावों से महसूस होते हैं-"मैं उन्हें कैसे बताता कि बिना चश्मे के ही मेरी आंखे खुल गई थी और सब कुछ स्पष्ट हो चुका था।"

कहानी मनुष्य की अनुभूति मनोदशाओं का पूरा दस्तावेज है। पात्रों का परस्पर निबाह और निर्वाह कहानी को गति और गहराई प्रदान करता है। लेखक जब डूब कर लिखता है तो कल्पना और यथार्थ का भेद मिटाने लगता है। जो रचना यथार्थ में जितनी निकट होती है वह उतनी ही प्रभावशाली और अविस्मरणीय होती है। रमाकांत कि लिखी अन्य कहानियां ''नया लिहाफ़, अनावृत, ला मेरी फीस, आखिर वो आ गए', धर्मयुद्ध, बहस, किसे श्रेय दूँ, और खाली कोना' पढ़ते यह अहसास होता है कि उन कहानियों की भूमिकाएं जीवन की सच्चाई से ओत प्रोत हैं और कहानी के किरदार अपने खट्टे-मीठे तजुरबो को सरल शब्दों में बयान कर पाने में सक्षम हैं।

लेखक ने पात्रों के भीतर के द्वंद्व को बड़ी गहराई से महसूस किया है, जिया है। कथा का प्रवाह कहीं बोझिल नहीं होता, यही कारण है चिर परिचित कथानक वाली कहानियाँ हमें अपने साथ गहराइयों में ले डूबती है, और कहीं न कहीं न केवल हमें जड़ से जोड़ती है बल्कि एक कारगर सोच से सजी ज़मीन तलाशने में हमारी मदद करती हैं। शायद यही कारण है कि हर कहानी में हम खुद को मौजूद पाते हैं और हर कहानी हमारे अंदर मौजूद होती है।

साहित्य एकांत साधना के अतिरिक्त अटूट निष्ठा और समर्पण भी चाहता है। सुना है छोटा व्यक्तित्व कभी महान कृति की सृष्टि नहीं करता। इस वेदना से निकलते हुए यही कहूँगी कि श्री रमाकांत जी के व्यक्तित्व एक अहम पहलू उनकी विनम्रता, सहनशीलता एवं साफ़गोई है। यही उनकी बड़े होने की सशक्त कड़ियाँ हैं। जब रचना धर्मिता में संवेदना का संचार होता है तब कहीं रचनाकार अंदर की दुनिया को बाहर से जोड़ता है, अपने मन की बंधी हुई गांठों और परतों को सरलता से उधेड़ पाता है।

पाठक के मन को छूने वाली कहानियों का यह संग्रह पठनीय व संग्रहणीय है। आशावादी संभावना के साथ मेरी अनेक शुभकामनाएं इस संवेदनशील लेखक श्री रमाकांत जी के लिए इन शब्दों में-----

बंदगी का मेरी अंदाज़ जुदा होता है

मेरा काबा मेरे सजादे में छुपा है ! आमीन

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देवी नागरानी,

९-D कॉर्नर व्यू सोसाइटी, १५/३३ रोड, बंदर, मुंबई ५०. फ़ोन ९९८७९२८३५८. dnangrani@gmail.com

कहानी संग्रह : नाया लिहाफ़, लेखिक:रमाँकांत शर्मा, पन्नेः १७६, मूल्य: रु.२२५. प्रकाशक: आधार प्रकाशन, चित्रकूल (हरियाणा)

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