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रचना और रचनाकार (५) - रामकुमार वर्मा का रहस्यवाद / सुरेन्द्र वर्मा

                        डॉ. रामकुमार वर्मा का रहस्यवाद
                                  डा,सुरेन्द्र वर्मा  
                                     
डॉ. रमकुमार वर्मा के रहस्यवाद के बारे में जब भी हम चर्चा करते हैं तो सर्वप्रथम हमें उनका शोध-ग्रंथ, कबीर का रहस्यवाद, ध्यान में आता है. इस पुस्तक में उन्होंने मुख्यतः कबीर की कविता में रहस्यवादी तत्वों की विवेचना की हैं. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि रहस्यवाद क्या है, उसके स्वरूप और स्वभाव को कैसे निर्धारित किया जा सकता है.
एक बार यदि हम रहस्यवाद के स्वभाव को समझ लेते हैं तो किसी भी कवि के काव्य में
रहस्यवादी तत्वों की पहचान करना करना सरल हो जाता है. रामकुमार वर्मा ने कबीर के साथ यही किया, और यही पद्धति डॉ.वर्मा के काव्य में रहस्यवाद को समझने के लिए भी सर्वश्रेष्ठ होगी. हम इस प्रपत्र में डॉ. वर्मा के संदर्भ में मुख्यत: रहस्यवाद की प्रकृति को समझने की चेष्टा करेंगे.
     ‘केशव कह न जाय का कहिए’. मनुष्य चिरकाल से ही उस अज्ञात सत्ता की खोज में लगा है जो इस चराचर विश्व का नियमन करती प्रतीत होती है. इस शक्ति का आभास तो होता है कि कोई न कोई ऐसी सत्ता जो अन्य सभी अस्तित्ववान जीव-अजीवों का अधिष्ठान हो, होना तो बेशक चाहिए किंतु निश्चित रूप से यह कह पाना बहुत कठिन है कि उसका स्वरूप है क्या, और उसतक पहुँच पाने का मार्ग क्या है! अज्ञात को जानने की यही उत्कट भावना रहस्यवाद है. रहस्य वह है कि जिसके बारे में हम जानते है कि वह है, लेकिन क्या है, कैसा है, यह नहीं जानते. रामकुमार वर्मा अपनी एक कविता में कहते हैं –        
          
                  
                   मार्ग से परिचय नहीं है, किंतु परिचित शक्ति तो है
                    दूर हो आराध्य चाहे, प्राण में अनुरक्ति तो है.

     सत्ता का स्वभाव अपरिचित है, उसे जानने की, उसे आत्मसात करने की, लेकिन एक उत्कट अभिलाषा है, पर वहां तक पहुंचा कैसे जाय वह मार्ग भी तो नहीं मालुम. वह जिसे दर्शनशास्त्र में अद्वैतवाद कहा गया है, रामकुमार वर्मा के अनुसार, मानों रहस्यवाद का प्राण है. अद्वैत-दर्शन के अनुसार ब्रह्म ही सत्य है. सार्विक अविद्या और अज्ञान, जिसे माया कहा गया है, के चलते दृश्यमान जगत सत्य भासित होता है, पर है यह वस्तुतः मिथ्या. ब्रह्म सत्य जगत् मिथ्या. ब्रह्म और आत्मा में कोई अंतर नहीं है. यह अंतर केवल दृष्टिगत होता है. इस अंतर को समाप्त करके ही आत्मा अपनी वास्तविक स्थिति में अवस्थित होती है. जब आत्मा स्वयं में ब्रह्म की अनुभूति प्राप्त कर लेती है तो ब्रह्म और जीव का ऐक्य हो जाता है. ब्रह्म और जीव, आत्मा और परमात्मा, की इसी आत्मानुभूति (ब्रह्मानुभूति) को रहस्यवाद कहा जा सकता है.
     पर अद्वैत-दर्शन और रहस्यवाद में थोड़ी भिन्नता है. जब आत्मा और ब्रह्म की सत्ता में कोई द्वैत नहीं रहता तो निःसंदेह इसे अद्वैतानुभूति कहा जा सकता है. किंतु रहस्यवाद में आत्मा, विश्वात्मा में पूरी तरह विलीन नहीं हो जाती. वह विश्वात्मा (ब्रह्म) से ऐक्य स्थापित कर उसका एक प्रकार से मौन आस्वादन करती है. यह आत्मा और परमात्मा का ऐक्य तो है किंतु एकीकरण नहीं है. रामकुमार वर्मा कहते हैं, एकीकरण की भावना अद्वैत में है, ऐक्य की भावना रहस्यवाद में. रहस्यवाद में आत्मा ब्रह्म से ऐक्य स्थापित करने के बावजूद अपनी निजी पहचान बनाए रखती है. रहस्यवाद में आत्म-अस्तित्व का पूर्ण विनाश नहीं हो पाता. मिलाप की स्थिति में यह भावना बनी रहती है कि मै मिल रहा हूं. व्यक्तित्व का अभिज्ञान करते हुए भी मिलाप की आनंदानुभूति रहस्यवाद की अभिव्यक्ति है. यह एक ऐसा मिलाप है जिसमें आत्मा परमात्मा के गुणों को प्रकट करने लगती है. जिस प्रकार आरम्भिक अवस्था में आग और लोहे का एक टुकड़ा- ये दोनो मित्र हैं पर आग से तपाए जाने पर टुकड़ा भी लाल होकर अग्नि का रूप धारण कर लेता है – तब उस लोहे के टुकड़े में वस्तुओं के जलाने की वही शक्ति आ जाती है जो आग में है. ऐसे में यदि लोहे का लाल टुकड़ा आग से अलग भी रख दिया जाए तो भी वह आग का स्वरूप रखकर अपने चारों ओर आग फेंकता रहेगा. आत्मा परमात्मा ऐक्य में भी आत्मा के स्वाभाविक गुण लुप्त हो जाते हैं और परमात्मा के गुण प्रकट होने लगते हैं. रहस्यवाद की यह चरम उपलब्धि है. (कबीर का रहस्यवाद, पृ. 42-43)
     “सब्बे सारा णिपंट्टति”
      रहस्यवाद वस्तुतः एक अयथार्थ नामकरण है. मिसनोमर है. यह न तो किसी गुप्त विद्या (रहस्य) का द्योतक है और न हीं यह कोई सिद्धांत अथवा वाद है. यह तो अपरोक्ष –मानों प्रत्यक्षतया आंखों देखा- अव्यवहित ईश्वर का बोध है, साक्षात्कार है. यह अज्ञात की शास्त्रीय खोज नहीं करता –ईश्वरानुभूति प्रदान करना इसका अभीष्ट है. यह अनुभूति ऐंद्रिक, बौद्धिक या भौतिक न होकर अतींद्रीय, तर्क-बुद्धि से परे और आध्यात्मिक है. तर्कातीत होते हुए भी, तर्क विरुद्ध नहीं है. इसमें संज्ञान और भावना का एक अद्भुत समंवय है. फिर भी कुल मिलाकर यह ज्ञान-प्रधान न होकर भाव-प्रधान है. शब्द, रहस्यवाद, से हमें ध्वनित होता है मानों यह कोई सिद्धांत या शास्त्र हो, किंतु ऐसा नहीं है. वस्तुतः यह तो रहस्याभूति है. यह अनुभूति अव्याख्यायित, अकथनीय और अनिर्वचनीय है. इसका केवल आस्वादन किया जा सकता है, और वह भी मौन रहकर. यह आस्वादन गूंगे का गुण है. कोई भी शब्द इसके निकट नहीं पहुँच सकता. जैन ग्रन्थ, आचारांग, कहता है –सब्बे सरा णिपंट्टति –

          सब स्वर लौट आते हैं
--           वहां बुद्धि काम नहीं करती
           और सारे तर्क धरे के धरे रह जाते हैं
           न सुगंध है न दुर्गंध
           न सर्दी न गर्मी
           न शब्द, न रूप, न रस, न स्पर्श है वहां
           वह अनुपमेय
           अमूर्त, पदातीत है, वीत है
           तभी तो वहां से अपंग
           सब स्वर लौट आते हैं....
                            (आचारंग,5/123-140)

     रामकुमार वर्मा के शब्दों में कहें तो, यह रहस्यानुभूति इतनी अलौकिक होती है कि संसार के शब्दों में उसका स्पष्टीकरण असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है. यह एक ऐसा गुलाब है जो किसी बाग़ में नहीं लगाया जा सकता, केवल उसकी सुगंध ही पाई जा सकती है. वह एक ऐसी सरिता है जिसे किसी गहन वन में नहीं देख सकते, वरन् कल- कल नाद करते हुए सुन सकते हैं. कहने का तात्पर्य यह है कि संसार की भाषा इतनी ओछी है कि उसमें हम पूर्ण रूप से रहस्यवाद की अनुभूति प्रकट नहीं कर सकते.
                                           (कबीर का रहस्यवाद, पृ. 44)
    “प्रेम का तार”
    रहस्यानुभूति बहुत कुछ प्रेमानुभूति की तरह है. सारा रह्स्यवादी काव्य इसीलिए प्रेम प्रधान है. परम सत्ता से मिलन की उत्कट अभिलाषा वस्तुतः आत्मा की उसके प्रति
प्रेम-विह्वलता ही है. रामकुमार वर्मा कहते हैं, रहस्यवाद में प्रेम का आदि स्थान है तो आत्मा और परमात्मा के मिलने की इच्छा क्यों ना उत्पन्न हो! प्रेम ही दोनों के मिलन का कारण है, (पृ. 73). यहां स्पष्ट ही प्रेम का मतलब हृदय की साधारण-सी भावुक स्थिति नहीं है. यह तो अंतरंग की सूक्ष्म प्रवृत्ति है जिससे अंतर्जगत् अपने सभी अंगों का मेल बहिर्जगत् से कर लेता है. यह वह घनीभूत भावना है जिससे जीवन का विकास सदैव उन्नति की ओर होता है. यह एक उदात्त, दैवी और आध्यात्मिक प्रेम है.
     माता-पिता, पिता-पुत्र, मित्र-मित्र आदि, सम्बंधों मे निःसंदेह प्रेम तो है किंतु इसमें स्नेह की प्रधानता होती है. ये सम्बंध शांत, ठंडे सम्बंध हैं. सरलता, दया, सहानुभूति आदि, कोमल भावनाओं से ये ओतप्रोत हैं. इनमें न उत्तेजना है न मादकता. किंतु जब आराध्य की खोज की जाती है तो हृदय में एक प्रकार की हलचल मच जाती है. इंद्रियां मतवाली होकर उसे ढूँढने लगती हैं. ऐसे प्रेम में शांति की बजाय एक प्रकार की विह्वलता आ जाती है मन में आकर्षण, मादकता, अनुराग आदि की प्रवृत्तियाँ और अंतर्प्रवृत्तियाँ जाग्रत हो जाती हैं. रामकुमार वर्मा ऐसे मादक, विह्वल और शांत प्रेम की पूर्णता बस एक ही सम्बंध में देखते हैं और वह है पति-पत्नी का सम्बंध. रहस्यवाद में - फिर चाहे वह भारतीय मूल का हो या सूफी मत का - आत्मा और परमात्मा के प्रेम की पूर्णता ही परम साध्य है. इसीलिए रहस्यवाद इस आध्यात्मिक प्रेम को पति-पत्नी सम्बंध के रूप में देखता है. इसमें मादकता तो है किंतु स्वार्थ और वासना का पूर्ण अभाव है. यह वह प्रेम है जिसमें सारी इंद्रियां और आकर्षण, मादकता और अनुराग की प्रवृत्तियाँ स्वाभाविक रूप से परमात्मा की ओर अग्रसर होने लगती हैं जैसे. ढाल पाकर पानी वेग से बहने लगे. जब तक एक प्राण में दूसरे प्राण के घुलमिल जाने की उत्कट इच्छा नहीं होती, प्रेम में पूर्णता आ ही नहीं सकती. मिलन की प्रतीक्षा में रात स्वयं आंख की पुतली बन जाती है –
               जो प्रतीक्षा में पली वह बात क्या तुम जानते हो,
               आंख की पुतली बनी वह रात क्या तुम जानते हो!

रहस्यवादी कवि को प्रकृति में भी यदा-कदा अपने आराध्य की छबि सहज ही दिख जाती है -
  तू नव बसंत मै श्री बसंत/ तरुओं के तन की तू उमंग/ मैं पल्लव का परिधान वृंत.
   
या फिर, -
  तारे नभ में अंकुरित हुए/ जिस भांति तुम्हारे विविध रूप/ मेरे मन में संचरित हुए. 

यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि रहस्यवादी कवि प्रकृति के सौंदर्य का स्वतंत्र रूप से रसास्वादन न करके उसमें हमेशा अपने आराध्य का सौंदर्य देखता है, छायावाद में प्रकृति के वैभव को स्वतंत्र रूप से चित्रित किया जाता है. मोटे तौर पर रहस्यवाद के प्रसंग में छायावादी दृष्टि इसी बिदु पर मेल नहीं खाती.
     अंत में एक बात और. सरसरी नज़र से देखने में रहस्यवाद हमारे मन में कुछ ऐसी छाप छोड़ता है कि मानो अपनी आध्यात्मिकता के कारण वह सामान्य मनुष्य से और उसके क्रिया-कलापों से बिल्कुल कटा हुआ है. किंतु कदाचित ऐसी बात नहीं है. गंगा प्रसाद विमल ने ठीक ही कहा है,-  रामकुमार वर्मा तो, इस संदर्भ में, नवरहस्यवादी हैं क्योंकि रहस्यवाद का आधार समकालीन इतिहास का मानववाद और नवमानववाद है. रहस्यवादी होते हुए भी रामकुमार वर्मा मानववादी हैं. यह विरोधाभास नहीं है, जैसा कि लोगों को लगता है अपितु यह एक दूसरे के पूरक परिमाणिक शब्द हैं जो उनकी रचनाओं को समझने में सहयोग देते हैं. रामकुमार वर्मा निश्चय ही रहस्यवादी हैं, कितु वे निश्चय ही मानववादी भी हैं –यह बात समझने की है. उनका मानववाद प्रकृत्या नैतिक और रहस्यात्मक सत्ता में आस्था रखने वाला मानववाद है जो मनुष्य के समर्पित भाव को व्यक्त करता है. (देखें, एक दीपक किरण कण हूं, पृ. 152).
     रामकुमार वर्मा के रहस्यवाद में यदि मानववादी तत्व समाहित न होता तो वे शायद ही ग्राम-देवता को नमस्कार कर पाते –
                       हे ग्राम-देवता! नमस्कार!
                       सोने चांदी से नहीं किंतु
                       तुमने मिट्टी से किया प्यार
                       हे ग्राम-देवता! नमस्कार!
          (कृतिका से)
                                      (

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