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आया लोकगीतों और जसगीतों का पर्व / डॉ. सूर्यकांत मिश्रा

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चैत्र नवरात्रि पर विशेष

हिंदी मास चैत सुदी एकम हिंदू धर्मावलंबियों को अनेक पर्वों से जोड़ देती है। इस तिथि से हिंदी नव संवत्सर का प्रारंभ होता है। आदिशक्ति मां अंबे के नवरात्रों का भी यह प्रथम दिवस होता है। एक ओर जहां हम धर्म कर्म से जुड़ते है, वहीं दूसरी ओर नया वर्ष हमें नई ऊर्जा और संचार प्रदान करने वाला होता है। देवी मंदिरों से लेकर घरों तक में ज्योत जवारों की स्थापना जीवन में नये प्रकाश का संचरण कर जाते है। मां के उपासकों द्वारा 9 दिन की कठिन साधना वाला यह पर्व लोकगीतों और गीतकारों के लिए नई रचना के रूप में साहित्य के विकास को भी पर लगाने वाला होता है। देवी जस गीतों को झूम कर गाने की विधा उन लोगों के लिए नई प्रेरणा लेकर आता है, जो इस गीत से अछूते हुए है। यदि धार्मिक भावनाओं को देखना और समझना हो तो नवरात्र पर्व से बढक़र कोई दूसरा पर्व नहीं। मां पर अपार श्रद्धा रखने वाले भक्तों की अलग-अलग तरह की भक्ति अन्य लोगों को भाव विभोर कर जाती है। वर्ष में दो बार क्वांर एवं चैत्र माह में आने वाले नवरात्रों में जसगीतों के माध्यम से देवी आराधना विशेष गायन शैली एवं वाद्य कला का बेजोड़ नमुना मानी जा सकती है।

क्या है लोकगीतों की परंपरा

लोकगीत अथवा लोक गाताथों का विशेष महत्व नवरात्रि पर्व के दौरान या फिर दीपावली पर्व के दौरान स्पष्ट रूप से हमारे समक्ष आता है। आज कल के भोंडे गीतों के प्रदर्शन ने लोक गाथाओं और लोकगीतों पर खासा नकारात्मक प्रभाव डाला है। हमारी वर्तमान पीढ़ी लोक गाथाओं और लोकगीतों से पूर्ण रूप से विमुख है। लोकगाथाओं की शुरूआत कहां से और कैसे हुई, इसे प्रमाणिकता के साथ कह पाना असंभव है। इसके प्रमाणिक खोज का इतिहास अब तक अप्राप्त है। लोकगाथाओं की लिखित हस्तलिपि का भी सर्वथा अभाव ही है। यह माना जा सकता है कि मौखिक परंपरा द्वारा ही लोकगाथाओं ने लोकमत की अभिव्यंजना की होगी। यही कारण है कि यह अब तक रहस्य बना हुआ है। एक बात स्पष्ट है कि लोकगाथाओं की रचना सामूहिक रूप से किसी प्रदेश के लोग मिलकर ही करते है। यह कभी समाप्त न होने वाली परंपरा है, इसके प्रचार प्रसार पर आधुनिकता का प्रभाव पड़ सकता है। लोकगाथाओं के लिए जरूरी है कि वह किसी लोककथा से प्रत्यक्ष संबंध रखती हो। हमारे छत्तीसगढ़ प्रदेश की आंचलिक संस्कृति का दर्शन करना हो हो प्रचलित लोकगाथाओं से परचित होना जरूरी होगा। इन लोकगाथाओं में लोक विश्वास, लोक धर्म, आचार-संस्कार आदि के दर्शन सहज रूप से हो जाते है। बिलासपुर जिले में प्रचलित ‘लक्ष्मणजती’ (राजा बिसरा), महाकाव्य तथा ढोला मारू की गाथा, देवरों में प्रचलित ‘सीता राम नाईक की गाथा’, पनिकाओं में लोकप्रिय ‘बकावली’ लोकगीत तथा दुर्ग जिले में प्रचलित ‘लोरीकचंदा’ ऐसे महाकाव्य है, जिनके छत्तीसगढ़ के गौरवशाली अतीत का प्रतिबिंब दिखाई पड़ता है।

पूजी जाती है मां शीतला

हिंदू धर्म में अनेक गणों की पूजा का प्रावधान लगभग हर माह हम सबके सामने आता रहा है। इन सारे देवी-देवताओं में मां शीतला ही देवी का एक ऐसा स्वरूप है, जिसे ग्रामीण ग्राम्य देवी के रूप में पूजते आ रहे है, तो बड़े शहरों के लोग उन्हें नगर देवी के नाम में अपनी श्रद्धा का केंद्र बनाए हुए है। सामान्यत: निस्तारी कामों के लिए बनाए गए तालाब और सरोवरों के किनारे मां शीतला का मंदिर आवश्यक रूप से स्थापित देखा जा सकता है। मां की सवारी सिंह मंदिर के द्वार पर इस बात की जानकारी देता प्रतीत होता है कि मां शीतला अपने भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने यहां विराजी है। हमारे छत्तीसगढ़ प्रदेश में देवी भक्ति की महिमा का गान करने वाले लोक गीतकारों की कमी नहीं है। क्वांर और चैत नवरात्रि प्रारंभ होते ही मंदिरों सहित घरों एवं मां दुर्गा के पूजा पंडालों में जस गीतों की सुमधुर तान सभी को अपनी ओर आकर्षित करने लगती है। जस गीतों में पिरोई गई मां की शक्ति का वर्णन एकाएक असुरों के साथ मां जगदंबे की वीरता की कहानी लोगों के कानों में रस घोल जाती है। असुर वध का गीत रूप में ढोल मंजीरों की धुन में वर्णन भक्तों के रोंगटे खड़े कर देने वाला होता है। किस प्रकार मां अपने भक्तों के रक्षा के लिए असुरों का संहार कर सौम्य जीवन प्रदान किया गया, इसे भी पूरा मानवीय समाज आसानी से समझ सकता है।

चेचक रोग को दूर करती है मां शीतला

भारतीय धर्म शास्त्रों में स्कंद पुराण के अनुसार मां शीतला चेचक रोग के रोगी को ठीक करने तपते शरीर को आनंद प्रदान करता है। शास्त्र के अनुसार मां का वाहन गर्दभ अथवा गदहा है। मां शीतला अपने एक हाथ में कलश दूसरे में सुपा, दूसरे में झाड़ू तथा चौथे में नीम के पत्ते धारण किए होती है। चेचक रोग में मां के द्वारा धारण किए गए कलश सुप, झाडु तथा नीम पत्तों का विशेष महत्व है। चेचक रोग से पीडि़त युवक-युवती रोग से तपते हुए अपने वस्त्रों को फेंक देते है, सुप से रोगी को हवा की जाती है, झाडु़ से रोगी के घाव फुट जाते है, नीम के पत्ते घावों को सड़ऩे और पकने नहीं देते। इसी तरह रोगी को ठंडा जलप्रिय होता है। अत: कलश का महत्व सबसे ज्यादा है। आयुर्वेद में यह भी माना जाता है कि गर्दभ अथवा गदहे की लीद लेपन से चेचक के दाग मिट जाते है। ऐसी मान्यता है कि शीतला माता के संग ‘ज्वरा सुर’ अर्थात ज्वर का दैत्य, ‘ओलैचंडी बीबी’ अर्थात हैजे की देवी, ‘घेटुकर्ण’ अर्थात त्वचा रोग के देवता एवं ‘रक्तवती’ अर्थात रक्त संक्रमण की देवी भी विराजमान होती है। मां शीतला के हाथों में धारित कलश में दाल के दाने के रूप में शीतल स्वास्थ्यवर्धक एवं रोगाणु नाशक जल होता है। स्कंद पुराण में मां की आराधना हेतु शीतलाष्टक स्त्रोत दिया गया है, जिसके करने से मां शीघ्र प्रसन्न होती है। हमारे शास्त्रों में ऐसे भी उल्लेख मिलते है कि शीतलाष्ट स्त्रोत की रचना स्वयं भगवान शिव द्वारा की गई थी। मां शीतला को प्रसन्न करने शास्त्रों में निम्न मंत्र का उल्लेख किया गया है-

वन्देअहंम शीतलादेवीं रासभस्थांदिगम्बरां।

मार्जनी कलशोयेतां सूर्पालंकृतमस्तकामं।।

 

बस्तर में प्रसिद्ध है चैत्र फेस्टिवल डांस

छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक एवं धार्मिक धरा में बस्तर का अपना अलग स्थान रहा है। बैगा भील एवं गोंड़ जातियों की परंपरा पूर्ण रूप से धर्म पर टिकी दिखाई पड़ती है। दशहरा पर्व भी बस्तर में अपने अलग रंग में रंगा होता है। इसी तरह बस्तर जिले की गोंड़ जाति द्वारा चैत्र के माह में किया जाने वाला नृत्य ‘चैत्र फेस्टिवल डांस’ के रूप में प्रसिद्धि पा चुका है। वरिष्ठजनों की माने तो चैत्र नृत्य प्राय: फसल कटने के बाद मां अन्नपूर्णा की आराधना करते हुए धन्यवाद स्वरूप किया जाता है। इस नृत्य के आयोजन के लिए गोंड़ जाति के लोग एक स्थान पर एकत्रित होकर अगली फसल के लिए झुमते और झिरकते हुए मां अन्नपूर्णा से प्रार्थना करने की मुद्रा में दिखाई पड़ते है। बड़े ही शालीन विचारों और साफ चरित्र वाले गोंड़ जाति के स्त्री-पुरूष साथ मिलकर वृत्ताकार, अर्धवृत्ताकार या फिर सीधी लाईन में खड़ी होकर नृत्य की भाव भंगिमा तैयार करते है। सभी नृत्य करने वाले स्त्री-पुरूष एक दूसरे के हाथ की कलाई पकडक़र न टूटने वाली कड़ी तैयार करते है। मोर पंखों को अपने सिरों पर सजाए अलग अलग वेशभूषा में गले में मोतियों की माला पहने नर्तक एक ही अलग ही दृश्य का आभास कराते है। संगीत की धुन में थिरकने वाले सभी नर्तक अपने पैरों को इस प्रकार जमीन पर थापा के रूप में पटकते है कि वह संगीन के साथ संगत कर सके। उक्त अवसर पर प्राय: शहनाई, टिमकी, टपरी, ढोलक आदि वाद्य यंत्रों का प्रयोग संगीत की धुन के लिए किया जाता है।

 

(डॉ. सूर्यकांत मिश्रा)

जूनी हटरी, राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

मो. नंबर 94255-59291

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