बुधवार, 23 मार्च 2016

रचना और रचनाकार (८) / नरेश मेहता के काव्य का वैष्णव व्यक्तित्व / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

तात्कालिकता के दबावों से मुक्त नरेश महता अपने समय के एक ऐसे कवि हैं जिन्होंने वैश्वविक चेतना को अपना संबल बनाते हुए कविता को उस भाव भूमि पर खडा किया जो इंद्रियातीत सत्य को स्पर्श करते हुए भी “मनुष्य से लेकर दूर्वा तक” तथा “चन्दन की कुटिया से लेकर गोबर के कंडे तक” की खोई गरिमा लौटाने के लिए सदा आतुर रही है |

नरेश मेहता को प्राय: एक वैष्णव कवि के रूप में जाना जाता है और यह बहुत हद तक उचित भी है | गांधी जी के लिए एक वैष्णव की पहचान इसमें है कि वह पराई पीड़ा के साथ समानुभूति रखे | “वैष्णव जन तो तेने कही जो पीर पराई जाने रे..” यह भजन गांधी जी का प्रिय भजन था | आज मनुष्य ने अपनी अस्मिता खो दी है | वह एक ऐसे निम्न स्टार पर उतर आया है जहां मनुष्यता के अपमान के सिवा उसके पास और कुछ नहीं है | नरेश महता इस अपमान का न केवल अनुभव करते हैं बल्कि उसे समाप्त करने का एक संकल्प भी लेते हैं |उनकी वैष्णवता में बेशक समर्पण है किन्तु इस समर्पण में दीं-हीनता नहीं है | वह कहते हैं –

ओमेरे दाता

दी है फकीरी तो देना संकल्प भी

उन्हें अकर्मण्यता नहीं, संकल्प चाहिए | वह संकल्प जो किसी के भी अपमान का निराकरण कर सके और जिसकी खोई हुई गरिमा को लौटा सके |

मनुष्य से लेकर दूर्वा तक के अपमानित मुख पर

मेरी वैष्णवता

मेरी कविता को लिखनी होगी

एक गरिमा

एक पवित्रता ...

परी पीड़ा के प्रति उनकी यह संवेदनशीलता ही वस्तुत: उन्हें एक वैष्णव कवि बनाती है |

नरेश महता की कविता अहं के समर्पण और उसके विस्तार की कविता है | एक सच्चे वैष्णव की तरह जहां एक और वह अपने सृष्टा के प्रति समर्पित हैं वहीं दूसरी और वह उसी के विराट फलक पर अहं के विस्तार के आकांक्षी भी हैं | अपने अहं का विस्तार कर उसे एक ऐसी उदात्त भाव-भूमि पर अवस्थित करते हैं जहां से उन्हें अपनी धरती “ऋचा” सी प्रतीत होती है और देवताओं की देहयष्टि “उपनिषदीय” लगाने लगती है, जहां उन्हें वृक्ष एक “वानस्पतिक श्लोक” सा दिखाई देने लगता है और हवा सरस्वती छंद (‘अनुष्टप’) गाती प्रतीत होती है | उनके काव्य में बार बार ‘गायत्री’, स्तोत्र’ ,’मन्त्र’, ‘यज्ञ’, ‘रास’ ‘लीलागान’, जैसे पदों की आवृत्ति उनकी किसी साम्प्रदायिक भावना को नहीं दर्शाती, बल्कि मनुष्य के और सृष्टि के प्रति उनके उदात्त भाव को अभिव्यक्त करती है | यह ऐसा उदात्त भाव है जहां उनकी वैष्णव धर्म-दृष्टि एक मानवीय काव्य-दृष्टि बन जाती है | वह सृष्टि को एक उत्सव की तरह, और उसके हर सोपान को प्रसन्न देखना चाहते हैं क्योंकि उनके अनुसार –

मनुष्य या दूर्वा

किसी के भी हंसते हुए मुख से बड़ी

न कोई प्रार्थना है

न कोई उत्सव

और न स्वयं ईश्वर ही |

गांधी जी कोई कवी नही न थे और नरेश महता का कोई ‘राजनैतिक अजेंडा कभी नहीं रहा’. फिर भी दोनों एक ही धरातल पर खड़े दिखाई देते हैं | परन्तु कवि की कसौटी यदि उसकी संवेदनशीलता है तो गांधी को नि:संदेह एक कवि कहा जा सकता है, और यदि राजनीति का अर्थ ‘संकल्प’ से है तो नरेश मेहता भी राजनीति से कभी विमुख नहीं रहे |

नरेश मेहता के लिए कविता केवल शब्द नहीं हैं| वह कविता के परे कविता ढूँढ़ते हैं -

शब्द पर जाकर खड़े मत रहो शब्द का उल्लंघन करो कविता है

अथवा

कविता में शब्द सरोवर में डूबी सीढ़ी है जहां हम समाप्त होते हैं और सरोवर आरम्भ होता है

जिस प्रकार नरेश मेहता कविता के परे वास्तविक कविता की तलाश करते हैं, उसी तरह उस भावातीत जगत की भी तलाश करते हैं जो इन्द्रियानुभव के परे है लेकिन जो हमारे अनुभवों का अधिष्ठान है और उन्हें (अनुभवों को) संभव बनाता है | इसकेलिए उन्हें सृष्टि के पार किसी रहस्यमय लोक में जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती | वह सृष्टि के राग में ही अपनी वैयक्तिकता को लय कर देते हैं और उसी की विशाल स्वरलिपि में स्वयं को बजने देते हैं |

कभी अपनी वैयक्तिकता को इतनी विशाल स्वर लिपि में बजने दो बंधु और देखो कि इस पृथ्वी को स्वर्ग बनाने के लिए कैसा अनुष्ठान संपन्न हो रहा है |

वह इसलिए “अपनी आयु की वास्तविक गंध फूल को सौंप देना चाहते हैं ताकि वह मेरे पुण्यों की मयूरपंखी उत्सवता बन सूर्य के धूप मुकुट की जयकार बने |” मनुष्य होने का अर्थ ही उनके लिए है ---

एक रास का आरात्रिक सम्पन्न होना (क्योंकि आखिर) मनुष्य का रास पुरुष ही (तो) देश काल में यात्रा कर रहा है !

नरेश मेहता समकालीन-तत्कालीन के द्वैत में न पड़कर काल के निरंतर संगीत को सुनाने की कोशिश करते हैं और सृष्टि का रहस्य जानने के लिए वे अपने उत्सव पुरुष को उसमें विलीन कर देते हैं |

जिस तरह कविता को जानने के लिए कविता से परे जाना ज़रूरी है और सृष्टि का भाव समझाने के लिए भावातीत होना आवश्यक है , उसी तरह इतिहास में पैठ के लिए इतिहास का संक्रमण करना अनिवार्य होता है |

गांधी जी ने कभी कहा था सत्य इतिहास का संक्रमण कर जाता है (ट्रुथ ट्रान्सेंड्स हिस्ट्री) | यहाँ इतिहास से उनका तात्पर्य उस क्रूर, बर्बर और अमानवीय इतिहास से है जो राजा-महाराजाओं के आपसी संघर्ष को रिकार्ड करता है | ऐसा इतिहास उनके अनुसार सामान्य जीवन-धारा की गाथा नहीं हो सकता, बल्कि उसका अपवाद होता है | लेकिन हम केवल अपवाद को ही वास्तविक इतिहास समझ बैठते हैं | सामान्य जीवन-धारा, वह किसी भी काक की क्यों न हो, प्रेम और सौहार्द्य के बल पर आगे बढ़ती है – हम उसपर ध्यान नहीं देते | हम गुर करें तो निश्चित ही हम यह पावेंगे कि हिंसक युद्धों के इतिहास के बावजूद खुला आकाश और खुली धूप बची रहती है और सुगंध लुटाती हवाएं बदस्तूर प्रवाह्वान रहती हैं |

नरेश जी ने अपनी कृतिं “पिछले दिनों नंगे पैर” में मध्यकालीन इतिहास की बर्बरता का एक ऐसा ही दस्तावेज़ प्रस्तुत किया है | वह वहां इतिहास के भयावह अन्धकार के बीच उजाले की उपस्थिति और संभावना का एक विश्वस्त अनुमान लगाते हुए, उसका एक निर्भय आकलन करते हैं | इस तरह वह बर्बर इतिहास के अँधेरे से न केवल बाख निकलते हैं बल्कि महलों, बारादरियों और दालानों में खिली धूप को छू लेते हैं –

पिछले दिनों, नंगे पैरों किलों महलों बारादरियों में चलते हुए भी दिल जाता रहा बार बार आकाश या उसका कोई टुकड़ा नीली सुगंध देता यहाँ वहां छूती रही धूप झरिया में टूटी टूटी ये महराबें लिखती दालानों में खिली खिली घेरे रही |

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डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद -२११००१

मो. ९६२१२२२७७८

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