सोमवार, 21 मार्च 2016

होली में हँसी खिसियाई / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

 

होली में खिसियाई बैठी है हँसी | क्या करे बेचारी, जिसे देखो उसी को छेड़ रहा है | रंग डालो, चलो कोई बात नहीं है, थोड़ी-बहुत छेड़-छाड़ भी क्षम्य है लेकिन यह क्या, हंसी का तो चीर-हरण ही करने को उतारू हो गए हैं लोग ! बेचारी दबी-सकुचाई कहीं एक कोने में बैठी होली पर अपने भाग्य को रो रही है |

हंसी, ठिठोली, मज़ाक़, दिल्लगी, आदि सभी एक ही परिवार की बहिनें हैं. बड़े प्रेम से हिल-मिल कर रहती हैं | लेकिन होली आई नहीं कि सभी इधर-उधर छिपती फिरती हैं | कहीं सामने पड़ गईं तो पता नहीं क्या बुरा हाल कर दिया जाए ! माना, हंसी भी एक खेल है | आदमी हंसी-हंसी में खेलता है और खेल-खेल में हँसता है | होली भी हँसी-खेल का ही तो रूप है |लेकिन होली आते ही सारी खेल-भावना धरी की धरी रह जाती है | हंसी की बजाय हांस की फाँस चुभोने में कोई चूकता नहीं | हंसी में खिसी हो जाती है | हँसी को इतना तंग किया जाता है, इतना तंग किया जाता है कि बेचारी खिसिया जाती है | आदमी भूल जाता है कि यदि वह हंस सकता है (और ज़ाहिर है, आदमी ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो हँस सकता है) तो वही, चाहे तो हंसी को ज़ब्त भी कर सकता है | सामान्यत: जब जब हँसी-ठट्टा बेलगाम होने लगता है, आदमी उसे आगे बढ़ने से रोक लेता है | लेकिन पता नहीं फागुन की हवा में वो कौन सी तासीर है जो आदमी की ज़ब्त के आड़े आ जाती है ! हंसी छूटती है यह देखकर ! हँसी हँसी में जोर ज़बरदस्ती होने लगती है | खुद बेचारी हँसी दहशत में आ जाती है |

होली आती नहीं कि पत्र-पत्रिकाओं के कोरे कागज़ काले करने के लिए स्वनामधन्य सम्पादकगण लेखकों के समक्ष तरह तरह के विषय उछालने लगते हैं और, जिन्हें वे “परिचर्चाएं” कहते हैं, आयोजित कर डालते हैं | ऐसी कुछ परिचर्चाओं की बानगी देखिए - अगर होली के दिन आपको साली अकेली मिल जाए तो ! पिछली बार होली के हुडदंग में ससुराल में सलहजों ने आपकी कैसी गत बनाई ? व्यंग्य लेखन में पत्नी की भूमिका ! होली पर अचानक सास का आ धमकना | बेचारी हँसी को इन बेदर्द मर्द-प्रश्नों से सामने न हंसते बनाता है न ही रोते | बिना रंग पड़े ही शर्म से वो लाल-लाल हो जाती है |

होली पर आँखों में ऐसा रंग करकराने लगता है कि खुद अपने ही मियाँ के सामने, पराया आदमी मानों अपना ही पति-सा दिखाई देने लगता है | सूझ ही नहीं पड़ता कि बिन्ना, मेरो घरवारो है कि तेरो घरवारो है ! जेठ बहू को भाभी-भाभी कहने लगते हैं | अपने सखाओं के संग-साथ तो इतनी भंग पी ली जाती है कि अंगिया तक ‘दरक” जाती है | जब होली में पूरे लोक का यह हाल है तो लोक-गीत ही भला कैसे बच पाएं !

होली के दिनों में कवि सम्मेलनों की भी खूब धूम रहती है और कवि सम्मेलनों की ये खुमारी होली के बाद भी कई दिन तक छाई रहती है | ये ‘कवि’ सम्मेलन होते हैं या कपि-सम्मेलन कहना मुश्किल हो जाता है| फिल्मी गानों की नक़ल और उनकी ही तर्ज़ पर गले-बाजी – बस देखते ही बनती है ! स्टेज पर सारे कपि एक दूसरी की पीठ खुजाने लगते हैं और रसिक जन आहें भरते भरते वाह वाह करने को मजबूर होते हैं | एक कविवर अपनी कविता में जब-जब कुत्ता शब्द का उच्चारण करते भौंकने लग पड़ते थे ! जगह जगह टेपा-सम्मलेन और मूर्ख सम्मलेन आयोजित होते हैं | बड़े बड़े विद्वान / अधिकारी / नेता आदि स्वयं को मूर्ख- शिरोमणि या टेपा-शिखर जैसी उपाधियाँ पाकर धन्य मानने लगते हैं | हंसी ‘छूट” जाती है |

होली में हंसी कहीं पैशाचिक अट्टहास तो कहीं कटाक्षों में परिवर्तित हो जाती है | उसका रूप विरूप हो जाता है| लट्ठ मार होली और ठट्ठा मार हंसी का जोड़, विद्रूप को जन्म देता प्रतीत होता है| वह स्वाभाविक सहज हंसी जो पहले बात बात पर आती थी होली में किसी बात पर नहीं आती | हंसी के नाम पर बड़ी आपा-धापी मच जाती है | होली के हुड़दंग में दंगे हो जाएं तो यह सहज संभाव्य है | कहाँ का विनोद और कहाँ की हँसी ! खिसियाई बैठी है हंसी |

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-सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड, इलाहाबाद (उ.प्र.) मो. ९६२१२२२७७८

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  1. बहुत ही सुन्दर रचना,हँसते-हंसते पेट दर्द करने लगा।मनीषा

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