शुक्रवार, 25 मार्च 2016

रचना और रचनाकार (१०) / जगदीश गुप्त / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

कवि वही जो अकथनीय कहे – डॉ जगदीश गुप्त

भारत-भारती से सम्मानित, नई-कविता के प्रणेता एवं प्रमुख कवि, इलाहाबाद में परिमल के संस्थापक सदस्य, चित्रकार, कला-समीक्षक तथा पुरातत्ववेत्ता डॉ जगदीश गुप्त नई-कविता के एक महत्वपूर्ण स्तम्भ थे. वे हिंदी रचना जगत के उन वरिष्ठ लेखकों में से एक थे जिनका व्यक्तित्व कई रचनाकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है. दारागंज में उनका निवास प्रयाग के साहित्य सेवियों के लिए तीर्थ था.

डॉ जगदीश गुप्त का जीवन एक सतत संघर्ष का जीवन था. सृजन की असीम ऊर्जा ने उन्हें कभी चुप नहीं बैठने दिया. हृदय रोग से वे 10-12 वर्ष तक पीड़ित रहे लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी. लहरों से लड़ते रहे. हाथ पैर मारते रहे - इस विश्वास के साथ कि यदि तट तक नहीं भी पहुंच पाए तो भी सतत संघर्ष करते रहना भी मंज़िल को प्राप्त करना ही है.- ‘सच हम नहीं, सच तुम नहीं, सच है सतत संघर्ष ही.’

अज्ञेय द्वारा सम्पादित जब तारसप्तक निकला तो उसमें रघुवीरसहाय, सर्वेश्वर दयाल, और जगदीश गुप्त के साथ-साथ धर्मवीर भारती भी नदारद थे. ये सभी कवि वस्तुतः जिस प्रयोगवाद की अज्ञेय की वकालत कर रहे थे, स्वयं भी उसी मार्ग को अपनाए हुए थे. अतः इन कवियों ने अज्ञेय को प्रयोगवाद का प्रणेता मानने से इंकार कर दिया और एक नई ज़मीन तलाश की जिसका परिणाम नई कविता आंदोलन के रूप में सामने आया. ‘नई- कविता’ पत्रिका के माध्यम से, जिसके आठ अंक डॉ जगदीश गुप्त ने सम्पादित किए, नई-कविता स्थापित की गई. डॉ जगदीश गुप्त ने हिंदी काव्य को एक नई पहचान दी. अपनी असीम लगन और परिश्रम से वे अंतिम समय तक नई कविता को समर्पित रहे.

डॉ जगदीश गुप्त को ‘शब्द-दंश’ की टीस सदैव सालती रही. उनका यह काव्य संग्रह 1959 में प्रकाशित हुआ था. 40 साल बाद उसका नया संस्करण आया. तब मैंने उसे दोबारा पढा मैंने महसूस किया कि ये कविताएं आज भी ताज़ी हैं क्योंकि इनका कथ्य मानव विभीषिका है जो उत्तरोत्तर बढ़ती ही गई है, घटी नहीं. डॉ जगदीश गुप्त ने यह दंश वैयक्तिक, सामाजिक, आर्थिक आदि, अनेक स्तरों पर अनुभव किया. –

देश पूरव में – अभागा भूख से कोई मरा

मौत भी क्या खूब/जो खत्ती मरे उनपर

न रखकर दॉंत/नर भूखों की खिंची

सूखी आंत पर गीधी.

शब्द-दंश की खलिश, शीर्षक से ‘शब्द-दंश’ पुस्तक पर मेरी समीक्षा पढकर डॉ जगदीश गुप्त ने मुझे लिखा, जिगर के पार हो गया तीर खलिश की बात ही क्या.!

डॉ गुप्त का कहना था, कवि वही जो अकथनीय कहे! पता नहीं इसके वे क्या अर्थ लेते थे, लेकिन एक बात स्पष्ट है कि उनके यहां कविता यथार्थ का कथन भर नहीं थी. उस कथन से परे कवि की जो गहरी अनुभूति है और जो सामान्य भाषा में कही नहीं जा सकती, कविता उस अकथनीय अनुभूति को अभिव्यक्त करती है. कवि उसे कहता नहीं वह अपनी कविता में उसे केवल, यदि विट्गैंस्टाइन की पदावली इस्तेमाल करें, दर्शाता भर है.

दार्शनिक वार्ता में ‘कथनीय’ और ‘अकथनीय’ में प्रायः अंतर किया गया है. भार-

तीय चिंतक, के सी भट्टाचार्य ने ‘वाच्य’ (speakable) और ‘अवाच्य’ (unspeakable) में भेद किया था. इसी तरह लुडविग विट्गैंस्टाइन ने भी कथनीय (sayable) और अकथनीय (unsayable) में अंतर किया. लेकिन भट्टाचार्य से असहमत होते हुए उन्होंने अकथनीय को दर्शन के क्षेत्र से बहिष्कृत कर दिया. विट्गैंस्टाइन के अनुसार कथनीय वह है जिसे कहा जा सके. जिसे हम अपने कथन में प्रस्तुत कर सकें. हम अपने कथन में वस्तु-स्थितियां प्रस्तुत कर सकते हैं, लेकिन ज़ाहिर है कथन और वस्तु-स्थितियों के बीच जो तार्किक साम्य है, वह कथनीय नहीं है. उसे केवल ‘देखा जा सकता है’ उसे किसी कथन में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता. अकथनीय के और भी अनेक क्षेत्र हो सकते हैं. उदाहरणार्थ, कविता कवि की अनुभूतियों की अभिव्यक्ति है और ये अनुभूतियां कवि की अपनी निजी अनुभूतियां होती हैं. इन्हें ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर सकना असम्भव है. ये शब्दातीत हैं, फिर इनकी अभिव्यक्ति कैसे सम्भव हो! जगदीश गुप्त के अनुसार कवि तो वही है जो इन अकथनीय अनुभूतियों को कह सके. पर सारे के सारे साधारण कथन केवल

वस्तुस्थितियों को चित्रित करते हैं, अनुभूतियों का चित्रण नहीं करते. उनका चित्रण शायद सम्भव भी नहीं है. कवि वही है जो इन अनुभूतियों को अपनी कविता में कुछ इस तरह व्यक्त कर सके कि वह अनुभूति पाठक के पल्ले पड़ जाए.

कविता, एक शब्द में कहें, अनुभूतियों और वस्तुस्थितियों का कथन नहीं करती. उसका यह काम भी नहीं है. वह तो कवि की अनुभूतियों को कविता में कुछ इस तरह पिरोती है कि वे ‘दर्शाई’ जा सकें. कविता कुछ कहती नहीं है. वह कोई कथन नहीं होती पर यदि कोई इस बात पर आग्रहशील है कि जो कहा नहीं जा सकता अनिवार्यतः निरर्थक है तो बेशक कविता भी निरर्थक है. कोई भी वैज्ञानिक उसे सत्यापित नहीं कर सकता. कविता में व्यक्त अनुभूतियों का अपना चरित्र ही ऐसा है कि वे न तो किसी कथन में रूपांतरित की जा सकती हैं और न ही उनका सत्यापन सम्भव है. कविता इस प्रकार अकथनीय कहती है- अकथनीय को दर्शाती है. It shows.

डॉ जगदीश गुप्त ने हिंदी काव्य समीक्षा में शायद पहली बार अकथनीय और कथनीय के बीच अंतर किया था. यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है. यह कविता के क्षेत्र को परिभाषित करता है. कविता की पहचान कराता है.

डॉ गुप्त ने अकथनीय को केवल कविता के माध्यम से ही अभिव्यक्ति नहीं दी, बल्कि अपने रेखांकनों के ज़रिए भी उसे व्यक्त किया. चित्रों में उकेरा है. उन्होंने अपनी अधिकांश अनुभूतियां कविताओं और चित्रों में साथ-साथ पिरोई हैं. चित्र के साथ कविता और कविता के साथ चित्र. कभी चित्र तो कभी कविता. उनकी अनुभूति कौन सा रूप धारण करेगी वे स्वयं नहीं जानते थे. दोनों ही क्षेत्र उनके लिए अकथनीय को दर्शाने का प्रयास हैं.

surendraverma389@gmail.com

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