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ख़ुशी की तलाश में / कहानी / वर्षा ठाकुर

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"ये रहा आपका टिफ़िन। " "आज क्या रखा है मेमसाहिब ने? " आलोक ने जूतों पर जल्दी से ब्रश फेरा। वक़्त का पाबन्द था। ऑफिस न...

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"ये रहा आपका टिफ़िन। "

"आज क्या रखा है मेमसाहिब ने? " आलोक ने जूतों पर जल्दी से ब्रश फेरा। वक़्त का पाबन्द था। ऑफिस निकलने में एक सेकंड इधर का उधर नहीं होता था।

"जो भी हो, उंगलियाँ चाटते रह जाएंगे। " ऐसा ही कुछ कहा करती थी सौम्या। अपनी पाक कला पर पूरा यकीन था उसे , और रोज़ लंचबॉक्स खाली भी तो आता था। उल्टा ज्यादा खाना रखना पड़ता था , कलीग्स भी एकाध रोटियाँ उड़ा लेते थे। और फिर आलोक कहता था " हाँ बाबा, सब लोग अपना डब्बा छोड़ मेरा हड़प लेते हैं। इतना अच्छा भी मत बनाओ कि मुझे खाने ही न मिले !" जब से शादी हुई थी , एक इसी बात का तो सुकून रहता था उसे कि पति को उसके हाथ का खाना बहुत पसंद था। और अब तो जब से बेटा स्कूल जाने लगा था , उसकी भी अलग फरमाइशें रहने लगीं थीं।

पर आज ऐसा कुछ नहीं हुआ। बस एक फीकी सी मुस्कान सौम्या के होंठों पर तैर गयी।

आलोक भी समझ रहे थे , चुपचाप टिफ़िन लेके निकल गए। जाने क्यों , आजकल वो पहले वाली बात नहीं रही थी। कुछ था जो सौम्या को अंदर से कचोटता जाता था , पिछले कुछ महीनों से। उसने आलोक से भी बात की थी इस बारे में, पर उनका रुख़ बहुत उत्साहजनक भी तो नहीं होता था , बस टाल देते थे। उनकी भी गलती नहीं थी , ऑफिस के काम से थकहार ही तो इतना आते थे कि और कोई झंझट मोल लेने का मन नहीं करता था। पर इस बेरुखी का सौम्या पर असर होना शुरू हो चुका था , ये बात भी उनसे छिपी नहीं थी।

सब कुछ ठीक चल रहा था, शादी के डेढ़ साल हँसते खेलते निकल गए थे और उसके बाद सौम्या की कोख में अर्श आ गया था। इतना नटखट और प्यारा था कि अगले दो साल तक सौम्या को साँस लेने की भी फुर्सत नहीं रहती थी। पर फिर जब अर्श का पास के स्कूल में प्लेग्रुप में दाखिला करवाया, तब से एक अजीब सी भावना या कहें कुंठा उसके मन में घर करने लगी थी। अब दिन के कुछ घंटे खाली मिलने लगे थे तो दिमाग भी चलने लगा था। वैसे तो ये घंटे काम करते करते कब निकल जाते उसे पता ही नहीं चलता , खाना बनाना, लॉन्ड्री, घर ठीक करना , सूखे कपड़े प्रेस करके सहेजना , उसके बाद थोड़ा चाय बनाके बैठती ही थी कि स्कूल बस आने का वक़्त हो जाता था। फिर दौड़भाग शुरू, जो अर्श को नहला धुलाके खाना खिलाके खुद तीन बजे लंच से निपटने के बाद बिस्तर पर सुस्ताने पर ख़त्म होती थी। शाम को फिर पाँच बजे से खटपट शुरू।

पर दिक्कत ये थी कि ये जो भी 'काम' था, वो अब सौम्या को काम जैसा नहीं लगता था , इसे करने से संतुष्टि नहीं मिलती थी। जब से थोड़ा बहुत वक़्त मिलने लगा था , आस पास देखती थी कि हर कोई उसकी नयी पुरानी सहेली कुछ न कुछ जॉब करती थी, अपने पैरों पर खड़ी थी। जिनका शुरू से जॉब करने का कोई इरादा नहीं था वो भी स्कूल टीचर या दूसरी नौकरी कर रही थीं। और इन सबसे होता ये था कि उनके हाथ में खुद की कमाई होती थी जिसे वो अपने हिसाब से बेरोकटोक खर्च कर सकती थीं। नए नए फैशन के कपडे, ट्रेंडी ज्वेलरी और सैंडल्स, हैंडबैग्स, गॉगल्स , और ये सब पहनके अपने कलीग्स के साथ घूमना फिरना , अपनी खुद की लाइफ जीना और उसकी पिक फेसबुक पर डालना और ढेरों लाइक्स और कमेंट्स के बीच व्यस्त रहना , यह सब कितना हैपनिंग लगता था। उनके पास कितना कुछ होता था करने के लिए, बताने के लिए। और एक वो थी , काम भी उनसे अधिक खटाऊ करती थी और ज़िन्दगी भी उनसे उबाऊ लगती थी। फेसबुक के पुराने स्कूली दोस्त हों या आस पड़ोस की हमउम्र सहेलियाँ किसी सर्किल में वो जगह तक नहीं बना पाती थी। और यही बात अब उसे परेशान करने लगी थी। एक हीनभावना घर कर गयी थी, जो दिन पर दिन बढ़ती जाती थी । इसका असर बच्चे की परवरिश पर भी पड़ने लगा था। टीचर्स भी तो कामकाजी मम्मियों को अधिक भाव देती थीं। उनके समय का मोल समझती थीं , और उसके समय का तो कोई मोल ही नहीं था।

पर वो करती भी तो क्या ? नौकरी करने का ख्वाब भी तो कभी देखा नहीं था। गृह विज्ञान से बी ए करके अपने नए घरोंदे को सजाने संवारने के ही तो ख्वाब देखे थे। उसकी सहेलियों का भी तो वही हाल था , सबको सजने सँवारने, नए नए व्यंजन बनाने , मेहँदी के नए डिज़ाइन सीखने, घर को अपनी कलाकारियों से सजाने में ही तो मज़ा आता था। साथ में पढ़ाई भी चलती रहती थी जिसमें वो बाकियों से अपेक्षाकृत बेहतर रहती थी। हिंदी और संस्कृत में तो उसके सबसे ज्यादा नंबर आते थे।

और आज वही सहेलियां वक़्त निकालके बी एड कर लीं , स्कूल में पढ़ाने लगीं या खुद का कुछ छोटा मोटा पार्लर , बुटीक वगैरह खोल लीं। बस वही पीछे रह गयी। करने को कितना कुछ था दुनिया में , पर आलोक तो बस चाहते थे कि वो पूरा वक़्त उन्हें और बेटे को ही दे। पता नहीं क्यों वो उसे सपोर्ट नहीं कर रहे थे। कहीं ऐसा तो नहीं कि वो पुराने ख्यालात के हों, उसका अपने पैरों पर खड़े होना उन्हें पसंद न हो। बस उसे अपनी मुट्ठी में कैद रखना चाहते हों , अपने पैसों पर आश्रित।

पिछले हफ्ते उसने आलोक से साफ़ साफ़ बात करने की कोशिश की, उनकी सीधी सीधी राय जानने की। और तब जो आलोक ने कहा उससे उसे कुछ कुछ उनकी मनोदशा समझ में आई। आलोक ने पूछा था कि नौकरी करना चाहने की सबसे अहम वजह क्या है, पैसा है या सिर्फ सहेलियों की देखादेखी करनी है , और या फिर सच में दिल से कुछ कर दिखाने की चाह है , क्योंकि एक बेटा होने के बाद तो उसका वक़्त बहुत कीमती हो गया है , और इस वक़्त को कहीं और लगाने से पहले तो अच्छे से सोचना पड़ेगा। सौम्या सोच रही थी, कहाँ कीमती है उसका वक़्त , कौन भाव देता है उसे या उसके घर गृहस्थी के कामों को। पर कुछ समझा नहीं पायी आलोक को, कि ठहरे हुए पानी में कंकड़ मारना क्यों ज़रूरी हो चला था।

और इसी बात से उसका मन खराब सा रहता था। गाहे बगाहे उसकी खीझ अब बाहर दिखने लगी थी। चेहरे पर वो सुकून , वो हर्ष नहीं रहता था। और आलोक समझ गए थे कि अब बात ऐसे नहीं बनेगी।

और शनिवार की शाम जब आलोक ऑफिस से जल्दी घर को निकले तो मन में प्लान था कि बीवी बच्चे को लेके मूवी देखने जायेंगे, पर दरवाजा खुलते ही जो देखा उससे दिल ऐसा टूटा कि मन में बनाया प्लान मन में ही कैंसिल हो गया। सौम्या की आँखें लाल थीं , समझ में आ रहा था कि कितना रोई होंगी। अब बात उसके बूते से बाहर हो चली थी।

रात को सौम्या अर्श को सुलाके सरदर्द का बहाना करके करवट लेकर सो गयी , और आलोक अँधेरे में एकटक

कुछ देख रहा था और सोच रहा था। एक बिगड़ रही बात बनानी थी। न चाहते हुए भी, ओखली में सर डालना था।

आलोक को महिलाओं के नौकरी करने से कोई दिक्कत नहीं थी। उसके खुद के ऑफिस में अलग अलग पदवियों में कितनी ही महिलाएं थीं। रुचिका को ही ले लो , उसकी कॉलीग। बचपन से अफसर बनने की लगन थी , जब बाकी लड़कियाँ गुड़ियों से खेलती थीं तो ये किताबों में डूबी रहती थी। और आज जब सच में सरकारी अफसर बन गयी थी तो कितनी खुश , कितनी संतुष्ट रहती थी। बच्चे होने के बाद भी घर बैठने का मन नहीं करता था उसका। कार्यस्थल में जो संतुष्टि मिलती थी उससे उसकी गृहस्थी की गाड़ी भी बढ़िया चलती रहती थी। पति भी उसकी लगन को देखके पूरा सहयोग देते थे।

और फिर अनगिनत महिलाएँ थीं जो स्टाफ लेवल में थीं। उनमें से कुछेक अपनी ही धुन में रहती थीं , आधा दिमाग घर में और आधा ऑफिस में रहता था। आये दिन कभी ये व्रत कभी वो पूजा के कारण देर से आना या जल्दी चले जाना। छुट्टियों का तो कोई हिसाब नहीं। ऐसी ही कुछेक महिलाओं को देखकर आलोक को खीझ होती थी।

आलोक का मानना था कि महिलाओं और खासकर माओं का वक़्त बहुत कीमती होता है , उसे न सिर्फ पूरी गृहस्थी संभालनी होती है बल्कि बच्चों की पढाई लिखाई और अच्छी परवरिश में अहम भूमिका निभानी होती है। ऐसे कीमती वक़्त का बलिदान अगर सिर्फ चंद पैसे और कमाने के लिए किया जाय तो वो उसे ठीक नहीं लगता था। हाँ अगर कोई बचपन से किसी ख्वाब को लेकर बड़ा हुआ है उसे वो पूरा करना चाहिए। अगर बचपन से ही सौम्या ने कुछ बनने के ख्वाब देखे होते तो बात अलग होती। फिर तो पढाई भी उसी हिसाब से हुई होती , काम में गंभीरता , संतुष्टि भी उसी हिसाब से आती। पर अब इस वक़्त अचानक से नौकरी के लिए बाहर निकलना , सिर्फ इसलिए कि दूसरे भी वही कर रहे हैं , ये उसे हजम नहीं हो पा रहा था। न उन्हें पैसों की कोई कमी थी और न ही सौम्या ने कभी करियर वुमन बनने के ख्वाब देखे थे। सब कुछ बिलकुल सही चल रहा था। वो अपने काम को पूरा वक़्त दे पाता था। बॉस उसके काम से सबसे अधिक खुश थे और उसकी तारीफ़ करते नहीं थकते थे। घर गृहस्थी की कोई फ़िक्र नहीं थी, सौम्या ने सब इतने अच्छे से संभाला हुआ था। वो तो उसकी तारीफ़ के पुल बाँधा करता था। और आजकल के जमाने में घर चलाना और बच्चे पालना कोई मज़ाक भी तो नहीं था। स्कूल की पढाई से लेके हर चीज़ में सब कुछ कितना डिमांडिंग होता जा रहा था।

लेकिन अब कोई उपाय नहीं रहा था। अगले दिन रविवार था। लंच के बाद जब बेटे की आँख लगी तो आलोक ने टॉपिक छेड़ा।

" स्कूल में पढ़ाना चाहती हो , है न ?"

"हाँ। और साथ में बी एड भी, प्राइवेट से । "

"कर पाओगी मैनेज ? कुक वगैरह रखनी पड़ेगी। "

"क्यों रखनी पड़ेगी? सुबह जाके दोपहर को तो आ जाउंगी , कोई नौ से पाँच की नौकरी थोड़ी होगी। "

"अच्छा ? ठीक है , शुरू करते हैं ढूंढना। पर प्लीज, हँसती रहा करो , मुझसे जो बनेगा मैं करूंगा बस तुम खुश रहो। "

सौम्या के होंठों पर मुस्कान तैर आई थी। वाकई बहुत प्यार करते थे आलोक उससे।

अगले दिन से उन्होंने तमाम स्कूलों की ख़ाक छाननी शुरू कर दी। बी एड की डिग्री नहीं थी तो थोड़ा मुश्किल तो था। लेकिन सौम्या की एक अच्छी बात ये थी कि उसकी हिंदी विषय में पकड़ बहुत अच्छी थी। आजकल शहरों में ऐसे हिंदी के ज्ञाता आसानी से नहीं मिलते थे। शुरूआती सैलरी काफी कम मिल रही थी , पर बाकी लोग भी तो ऐसे ही शुरुआत किये थे , फिर धीरे धीरे अनुभव और बी एड की डिग्री के बाद अच्छी खासी सैलरी मिलने लगती थी।

और अंत में एक पास के स्कूल में सौम्या ने पढ़ाना शुरू कर दिया। बी एड के फॉर्म भी भर दिए थे। सौम्या बहुत खुश थी , सब कुछ नया नया और अलग सा लग रहा था। जो भी दिक्कत आती थी उसका वो मिलकर इलाज़ निकालते थे। अब वो सुबह और जल्दी उठती थी। और क्योंकि बेटे का स्कूल जल्दी छूट जाता था तो उसको घर लाने और एकाध घंटा संभालने के लिए एक आया रख ली थी। फिर थोड़ी देर में तो सौम्या लौट ही आती थी।

स्कूटी उसके पास पहले से थी , उसी से आना जाना करती थी। नयी नौकरी का इतना जोश था कि कोई समस्या परेशान नहीं कर पाती थी। सुबह उठने में कोई आलस नहीं , शाम को खाना बनाने में कोई थकान नहीं। स्कूल की बाकी टीचर्स के साथ अच्छा ग्रुप भी बन गया था। सब लोग फेसबुक पर जुड़े थे। अक्सर बच्चों के साथ आउटिंग पर साथ में निकलते , शॉपिंग करते , कॉफ़ी पीते। ज़िन्दगी हैपनिंग हो गयी थी। सौम्या खुश रहती तो आलोक भी खुश रहता था। बेटे ने भी एडजस्ट कर लिया था , हालांकि आया के साथ उसे मज़ा नहीं आता था , स्कूल बस से उतरके मम्मा नहीं मिलती तो दुखी होता था , पर धीरे धीरे उसने इस बात को हजम कर ही लिया।

ऐसा नहीं था सब कुछ आसानी से हो गया था। कुछ चीज़ें ऐसी थीं जो धीरे धीरे , बिना आहट के बदल रही थीं। जैसे आलोक पहले कभी भी किसी पसंदीदा खाने की फरमाइश कर दिया करता था पर अब खुद को रोक लेता था। शाम को या देर रात को सौम्या को स्कूल के असाइनमेंट्स के लिए वक़्त निकालना पड़ता था। कहीं घूमने फिरने या नाते रिश्तेदारों की शादी वगैरह में जाने में अब सौम्या की छुट्टियाँ आड़े आ जाती थीं। प्राइवेट स्कूल में नौकरी करना आसान तो नहीं होता था। और इसीलिए सौम्या को जल्दी से बी एड करना था। इतना खटने के बाद कम से कम तनख्वाह तो अच्छी मिलती फिर।

और इस काम में आलोक ने उसका पूरा साथ दिया। बी एड की परीक्षा से पहले आलोक थोड़ी छुट्टियाँ ले लिया करता। सौम्या को एक कमरे में पढ़ने के लिए बंद कर देता और खुद बेटे को और घर संभालता। सौम्या अब आलोक का बदला हुआ रूप देख रही थी , जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी। लेकिन वो पूरी कोशिश

करती थी कि आलोक की उसकी तरफ से देखभाल में कोई कसर न रह जाए। खाना वही बनाती थी , कोई कुक नहीं रखी थी।

बीच बीच में काम, पढाई और घर का प्रेशर इतना ज्यादा ज्यादा हो जाता कि उसकी शक्ल में दिखने लगता। आलोक अंदर ही अंदर दुखी हो जाता पर उसको हतोत्साहित नहीं करता। अब जब कदम बढ़ चले थे तो मुकाम तक तो पहुँचना था। और यही सब का परिणाम था कि आलोक अब अपनी नौकरी में पहले की तरह खुद को झोंक नहीं पाता था। कहीं न कहीं तो उसको भी लकीर खींचनी पड़ती थी। उसके बॉस ये सब खामोश देख रहे थे।

ये सब बातें वो सौम्या को नहीं बताता था , बस करता जाता था। जाने क्यों अब ज़िन्दगी मशीन की तरह हो चली थी , दिन का हर पहर घडी के कांटे पर सवार होकर आता था , एक एक पल का हिसाब मांगता था। अगर बात पैसे की होती तो आलोक को ये कभी स्वीकार नहीं होता कि थोड़े से ज्यादा पैसे के लिए उनकी ज़िन्दगी से सुकून शब्द गायब हो जाए। सच तो ये था कि जितनी आमदनी बढ़ी थी उतना खर्चा भी बढ़ गया था, पेट्रोल का , आया का, और भी जाने क्या क्या। पर यहां बात थी सौम्या की इच्छा की। उसको तो नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

तो इस तरह दिन महीने गुजरते रहे। बेटा अब अधिकांश काम खुद से कर लेता था। एक अजीब सी परिपक्वता आ गयी थी सबमें। शहरी परिपक्वता।

कभी कभार आलोक के ऑफिस के गेट टूगेदर में जाना होता था। अधिकांश की बीवियाँ वर्किंग थीं तो अब सौम्या को भी अच्छा लगता था उनसे मिलना जुलना, अपनी खुद की ज़िन्दगी के बारे में बताना। बस एक इंसान जो अब पहले की तरह पेश नहीं आते थे वो थे आलोक के बॉस। जाने क्या बात थी। उनकी खुद की बीवी पहले पढ़ाती थी फिर तबियत ठीक नहीं रहने के कारण संभाल नहीं पायी और जॉब छोड़ दी। शायद इसी बात से जलते होंगे आलोक के बॉस, सौम्या मन ही मन सोचती।

बी एड का रिजल्ट आया और सौम्या की मुराद पूरी हुई। अब वो टीचिंग को गंभीरता से ले सकती थी , उसमें लम्बा करियर बना सकती थी। पढ़ाना उसे पसंद था , और हिंदी की जो क्लासेज वो लेती थी उनमें बच्चों को ट्यूशन जाने की ज़रुरत नहीं पड़ती थी। सब स्कूल में ही समझ आ जाता था। ये बात आलोक को भी अच्छी लगती थी। आस पास के बच्चे सौम्या मैडम को बहुत इज़्ज़त देते थे।

अब उसे थोड़ा सीनियर क्लासेज मिलने लगी थीं। पढ़ाने में ज्यादा संतुष्टि मिलती थी। और अपने फ्रेंड सर्किल में उसे 'हिंदी का विद्वान ' की उपाधि मिल चुकी थी। अक्सर ही माएं अपने बच्चों को उसके पास डाउट क्लियर करने भेज देती थीं।

सीनियर क्लासेज मिलने से अब सौम्या की ज़िम्मेदारियाँ बढ़ चुकी थीं। पहले से ज्यादा काम का बोझ रहता था , बोझ भी ऐसा कि किसी और को थमाया न जा सकता। छुट्टियाँ मिलने में बहुत मशक्कत होती थी। कभी अचानक आलोक या अर्श की तबियत बिगड़ जाए या कोई और ज़रूरी काम आ जाए , मायके ससुराल से कोई रिश्तेदार आ जाएँ तो सौम्या की हालत खराब हो जाती थी। जितनी जिम्मेदारियाँ हाथ में थीं उनसे थोड़ी भी अधिक हो जाती तो सौम्या की तबियत पर असर पड़ने लगता। इसलिए अब आलोक की ज़िद से उसे कुक को रखना पड़ा। आलोक के लिए उसके हाथ के खाने से ज्यादा ज़रूरी उसकी तबियत का ध्यान रखना था। खा लेंगे जो भी कुक बनाएगी , इतना बुरा तो नहीं बनाएगी कि गले से नीचे न उतरे।

और इस तरह सब कुछ इतना नपा तुला सा रहता , दिनचर्या जैसे छोटे छोटे कालखंडों में बँट गयी हो और वो एक एक करके बीतते जा रहे हों , बीतते जा रहे हों। ज़िन्दगी जैसे एक दनदनाती ट्रेन बन गयी थी जो हर छोटे बड़े स्टेशन को पीछे छोड़ती जा रही थी , जाने किस मंज़िल की ओर। थोड़ी देर किसी छोटे स्टेशन पर सुकून से रूककर उसकी हवा में साँस लेने का , चाट पकोड़े खाने जैसी छोटी छोटी खुशियों का भी वक़्त नहीं रहा था।

अर्श का पढ़ाई का बोझ बढ़ने लगा था , होमवर्क और अन्य असाइनमेंट्स मिलने शुरू हो चुके थे। सौम्या और आलोक दोनों को मिलकर उसके लिए वक़्त निकालना पड़ता था। और कभी कभी व्यस्तता के कारण कोई चीज़ रह जाती तो अर्श को मैडम की डाँट भी खानी पड़ जाती।

पर जो हो रहा था , वो ठीक हो रहा है या नहीं ये सोचने के लिए भी सौम्या के पास वक़्त नहीं था। ऐसी ही तो होती है सबकी ज़िन्दगी। सब लोग ही तो दौड़भाग रहे हैं , मैनेज कर रहे हैं। और कोई ऑप्शन थोड़े ही है आजकल। स्टैंडर्ड ऑफ़ लाइफ तो मेन्टेन करना ही पड़ेगा।

उस शाम आलोक की तबियत थोड़ी खराब सी थी। बुखार जैसा तो नहीं था पर वो बिस्तर पर आँखें बंद कर निढाल पड़ा था। शनिवार था तो कोई ख़ास समस्या नहीं थी ,अर्श के होमवर्क के लिए एक और दिन था। सौम्या ने तुलसी वाली चाय और हल्का नाश्ता बनाकर आलोक को दिया। थोड़ी देर बाद वो भी कॉपीज़ चेक करने में व्यस्त हो गयी। काम तो निपटाना ही था। अर्श पर निगरानी रखना भी एक चुनौती था, थोड़ा माँ बाप का ध्यान इधर से उधर हुआ नहीं कि टीवी या वीडियो गेम शुरू हो जाता था।

अगले दिन सुबह सुबह मालिनी जी का फ़ोन आ गया। आलोक के बॉस की बीवी थीं, उसके हाल चाल पूछ रही थीं। सौम्या को थोड़ा अजीब लगा , उसके बॉस ने खुद फ़ोन न करके बीवी से क्यों करवाया ? पर उसने उनको बताया कि उसकी तबियत अब ठीक है और ज़रुरत हो तो डॉक्टर को दिखा देंगे।

थोड़ी देर बाद उसकी सहेली सीमा का भी फ़ोन आया। उसके भी पति ऑफिस में आलोक के साथ थे और वो भी वही पूछ रही थी। अब तो सौम्या का दिमाग घूम गया था। उसने सीधे सीधे सीमा से पूछ लिया कि उसे कैसे पता चला। सीमा ने बताया कि कल ऑफिस की पार्टी में वो दिखी नहीं इसलिए पूछ लिया।

सौम्या हैरान थी। कल शाम को ऑफिस की पार्टी थी और आलोक ने उसको बताया तक नहीं। वो आलोक के कमरे में पहुँची। वो अब तक सो रहा था। ऐसा लगता था मानो उसका शरीर बरसों की थकान का आज हिसाब ले रहा था। सौम्या ने उसे डिस्टर्ब करना ठीक नहीं समझा।

कुछ महीनों से आलोक को शारीरिक थकान सी रहती थी , और कंधे भी दुखने लगते थे बीच बीच में। उसने बोला भी था डॉक्टर को दिखाने के लिए। पर व्यस्त दिनचर्या के बाद ये बात आई गयी हो जाती थी। डॉक्टर के पास जाना उनकी खण्डों में विभाजित ज़िन्दगी में तब तक जगह नहीं बना पाता था जब तक शरीर टूटकर जवाब न दे दे। और आज शायद वही दिन था।

नाश्ता बनाते हुए सौम्या के मन में अनगिनत सवाल आते जा रहे थे। बहुत अकेला महसूस कर रही थी। मन करता था लम्बी छुट्टी ले ले और खूब आराम दे आलोक को , खूब सुकून दे। जो उससे संभव हो वो करे। पर सेशन के बीच में लम्बी छुट्टियाँ ही तो मिलने की दिक्कत थी। और अभी तो गर्मी की छुट्टियों में देर थी।

तो क्या अब उसका परिवार बीमार भी उसकी छुट्टियों के हिसाब से हुआ करे ? ये तो संभव नहीं। और जो बात संभव नहीं उसका क्या हल निकाला जाय ? आखिर क्यों ये ज़िन्दगी हमारे नहीं बल्कि हम इसके इशारों पर चलते हैं? खुद को उस भट्टी में झोंक देते हैं जिसमें झुलसे जाने वालों की लम्बी कतार तो दिखती है पर उसकी वजह नहीं । कहीं ऐसा तो नहीं कि हमें खुद नहीं पता हमें ज़िन्दगी से क्या चाहिए।

दोपहर को वो डॉक्टर के पास गए। डॉक्टर ने उन्हें कुछ टेस्ट्स करवाने को कहा, और बहुत ज्यादा स्ट्रेस न लेने की सलाह दी।

शाम को मालती जी आई थीं उससे मिलने और आलोक की खबर लेने। अकेली आई थीं मतलब साफ़ था उन्हें सौम्या से कुछ बात करनी थी। उसने दो कप चाय और पकोड़े बनाये और दोनों ड्राइंग रूम में बैठ गए। आलोक अंदर आराम कर रहा था।

"कुछ वक़्त से सोच ही रही थी तुमसे मिलने का। आज सोचा मिल ही आऊँ। "

"जी अच्छा किया आपने। "

" कैसा चल रहा है सब कुछ ? कल पार्टी में मिली नहीं। बाकी सबकी खबर उधर ही ले लेती हूँ न। "

"जी जैसा सबका चल रहा है वैसा ही ! नौकरी, घर , बच्चे। सब कुछ इतना चैलेंजिंग होता है। पर दोनों मिलकर संभाल लेते हैं। यही अच्छी बात है। आलोक पूरा सपोर्ट करते हैं। "

"हम्म। ये तो बहुत अच्छी बात है। मुझे बहुत अच्छा लगता है तुम लोगों को देखकर। पहले तो आलोक को देखकर यकीन ही नहीं होता था कि उसका ये भी एक रूप हो सकता है। सबको लगता था उसको बस काम से प्यार है। बहुत पैशनेट था वो काम के लिए। "

"था ? "

"नहीं अब भी होगा , पर पहले इनके साथ था तो कुछ अलग ही था। इनके मुँह से मेरा नाम काम और आलोक का ज्यादा निकलता था। तुमको तो पता होगा न , वो सैटेलाइट लॉन्च प्रोजेक्ट के बारे में। "

मतलब अब आलोक के बॉस बदल गए थे? सौम्या को ज्यादा कुछ पता नहीं रहता था आलोक के ऑफिस के काम के बारे में। थोड़ा तकनीक और रिसर्च से जुड़ा था इसलिए शायद आलोक समझाना भी नहीं चाहता था। ऑफिस की बात ऑफिस में छोड़ आता था।

" बहुत चैलेंजिंग प्रोजेक्ट था। और जब इन्होने अपनी टीम में आलोक को शामिल किया तो बहुत खुश हुआ था वो। उसके बाद से तो जैसे इनका और आलोक का अलग ही दौर शुरू हो गया था। बहुत पैशनेट थे दोनों उस प्रोजेक्ट के लिए। "

"जी। "

"ऐसा जूनून आमतौर पर देखने को नहीं मिलता। लोग तो सिर्फ पैसे कमाने , घर चलाने के लिए नौकरी करते हैं , पर काम के जूनून के लिए काम करना ! ये लोग एक बार ऑफिस घुस जाते तो फिर दुनिया जहान भूल जाते , काम में डूब जाते। कभी कभी लगता कि ये नमूना मुझे ही मिलना था पति के रूप में , पर फिर बहुत गर्व भी हो आता था। आखिर हर कोई भी तो इनकी तरह नहीं होता। काम को खुदा नहीं मानता, उसकी पूजा नहीं करता । "

सौम्या खामोश सुन रही थी।

" मैं भी पहले नौकरी करती थी। पता ही होगा तुमको।"

"जी, सुना था। कौन से स्कूल में ?"

" स्कूल में नहीं , इनकी ही कलीग थी मैं। हम दोनों ने एक ही बैच में ज्वाइन किया था। "

"ओह! ये मुझे नहीं पता था। पर आपने इतनी अच्छी नौकरी छोड़ दी ? " सौम्या हैरान थी।

" हाँ। इनके पैशन के बारे में मुझे पहले से पता था। मानकर ही चलती थी कि जब परिवार की ज़िम्मेदारियाँ बढ़ जाएँगी तो मैं इनके काम पर इसका कोई असर नहीं आने दे पाऊँगी। तो हमारे बीच में ये बात पहले से क्लियर थी कि घर बच्चा होने के बाद मैनेज नहीं पायेगा तो मैं नौकरी छोड़ दूँगी। और वही हुआ , बच्चा हुआ तो मुझे वक़्त कम पड़ने लगा। उसकी परवरिश के साथ कोई कोम्प्रोमाईज़ नहीं करना चाहती थी। एक बार बड़ा हो जाए तो फिर सोचूंगी नयी इनिंग के बारे में। जहाँ भी मौका मिले। "

"पर आपने इतने साल इतनी मेहनत की , पढाई की, अफसर बनीं , उसके बाद नौकरी छोड़ने का मन?"

"पढाई कभी बेकार नहीं जाती। पढ़ाई से हम सिर्फ थ्योरी नहीं सीखते , ये पूरा प्रोसेस हमें खुद पर यकीन करना, स्वावलम्बी बनना सिखाता है। ऐसी जगह खड़ा करता है जहाँ कोई हमें हलके में न ले सके। महिलाओं को तो इस मुकाम तक आना बहुत ज़रूरी है जहाँ वो किसी भी विषम परिस्थिति का सामना कर सकें, हर हाल में इज़्ज़त के साथ जी सके। पति कमा रहा हो और पत्नी घर संभाल रही हो ये तो होता ही आया है, पर कल को भगवान् न करे परिस्थितियां बदल जाएँ, कुछ हो जाए तो कम से कम पत्नी बाहर निकलके इज़्ज़त से कमा सके, इतनी शिक्षा तो हर लड़की को मिलनी ही चाहिए, उसमें कुछ फायदे नुकसान वाली बात थोड़ी है। और एक पढ़ी लिखी स्त्री अपने बच्चों से लेके आस पास के ज़रूरतमंद लोगों को भी तो पढ़ा सकती है। एक सार्थक योगदान दे सकती है समाज में। "

"पर आजकल तो महिलाओं का घर बैठना ही मुश्किल है। हर कोई जॉब करके अपनी खुद की लाइफ जीना चाहती है , अपने शौक पूरे करना चाहती है। और समाज में इज़्ज़त भी उन्ही की है , उनके वक़्त की कद्र होती है , पुरुषों की नज़र में उनका कद हाउसवाइव्स से ज्यादा ऊँचा होता है। अब तो हाउसवाइव्स में एक कुंठा घर कर रही है , उन्हें बाहर निकलना ही पड़ता है काम के लिए वरना उनका ठीक ठाक सोशल सर्किल भी नहीं बन पाता। अलग थलग पड़ जाती हैं। "

"हम्म ! तुम भी तो पहले हाउसवाइफ़ थी। क्या तुम्हारे पास बहुत खाली वक़्त होता था? खासकर बेटा होने के बाद ?"

"नहीं तो ! साँस लेने की फुर्सत नहीं होती थी। घर को कितना सलीके से रखती थी , आलोक को सब कुछ व्यवस्थित मिलता था। बेटे की पढाई लिखाई सब करवाती थी। घर सम्भालना कोई आसान काम थोड़ी है , फुल टाइम जॉब है ये भी , बस कोई कद्र नहीं है इसकी। "

"तो फिर ऐसा क्या हुआ कि तुमने अपने वक़्त को दूसरी तरफ झोंक दिया ? क्या अब तुम वक़्त का बेहतर सदुपयोग कर पा रही हो?"

"जी आप मुझे ये सवाल क्यों पूछ रही हैं? मैं अकेली क्या करती ? जो चलन चल पड़ा है , जिस लाइफस्टाइल की आजकल डिमांड है उसे मैं अनदेखा कैसे कर सकती ? मैंने ये सब आलोक और अर्श के लिए ही तो किया है। अर्श की टीचर्स मुझे ज्यादा तवज्जो देती हैं और इसलिए अर्श को ज्यादा अटेंशन मिलती है , आलोक के फ्रेंड सर्किल में हम लोग पहले से ज्यादा बैटर ऑफ हैं। ये सब मैंने इन दोनों के लिए ही तो किया , इनके अलावा तो मैं कुछ सोच भी नहीं सकती। " सौम्या थोड़ी रुआँसी हो चली थी।

"आई एम सॉरी सौम्या , इफ आई हर्ट यू। तुमने जो किया सबके भले के लिए किया। आलोक और अर्श को तो तुमपर गर्व होगा , तुमने इस उम्र में और इतनी जिम्मेदारियों के साथ पढ़ाई भी पूरी की और घर से निकलकर अपने पैरों पर खड़े होकर भी दिखाया। मैं बस यही कहना चाहती हूँ कि कभी कभी जिन खुशियों के लिए हम भागदौड़ रहे होते हैं , वो चौराहे की किसी दूसरी राह पर हमारा इतंजार कर रही होती हैं। हमें दो पल रूककर सही राह पकड़ने के लिए थोड़ा वक़्त देना पड़ता है। वरना तो हम दौड़ते ही रहेंगे और ख़ुशी कभी मिलेगी ही नहीं। "

"मतलब?"

"मतलब अपनी प्राथमिकताएं हमें खुद निर्धारित करनी हैं। हमारे परिवार की खुशियाँ किस चीज में हैं ये पडोसी नहीं तय कर सकता। ये हमें ही तय करनी हैं , आपस में बात करके , एक दूसरे के जज्बे को, रुझान को ध्यान में रखकर। "

"एक बात पूछूँ मालती जी ?"

"बिलकुल पूछो। "

"आलोक के बारे में आजकल सर क्या बताते हैं आपको ? कुछ तो बताते होंगे। "

" आलोक कुछ वक़्त से प्रोजेक्ट में पूरी तरह इन्वॉल्व नहीं हो पा रहा था। ऊपर से प्रेशर बहुत था डेडलाइन का , तो इन्होंने एक और कॉलीग को जोड़ लिया था टीम में। आलोक की प्रॉब्लम हम समझ रहे थे इसलिए कुछ बोला नहीं , ज्यादा प्रेशर भी नहीं डाल सकते उसपर। सरकारी नौकरी है , ज्यादा टेंशन नहीं। प्रोजेक्ट में अब भी है वो , बस थोड़ा साइडलाइन हो गया है। उसने अपनी प्राइओरिटीएस को ध्यान में रखा , और इन्होने अपनी। "

तो आलोक ने चुपचाप ज़हर का घूँट पी लिया था। अपने पैशन , अपने जूनून का क़त्ल कर दिया था उसके शौक की खातिर। अंदर ही अंदर घुटते रहे इतने साल ? क्या मालिनी जी की बात सच थी, वो दोनों जिन खुशियों के लिए दौड़े जा रहे थे वो किसी दूसरे मोड़ पर उनका इंतज़ार कर रही थीं ?

"अब मुझे निकलना होगा। ये ऑफिस से घर लौटते ही होंगे। "

"संडे को भी ऑफिस?"

"प्रोजेक्ट बहुत क्रिटिकल स्टेज में है। अब इनका मन संडे को भी घर में नहीं लगता! और हाँ , मेरी बात का बुरा मत मानना , जो कहा तुम्हें छोटी बहन समझकर कहा। "

"जी! आप बड़ी हैं, आपने हमसे ज्यादा दुनिया देखी है। आप हमें राह नहीं दिखायेंगी तो कौन दिखायेगा। "

मालिनी जी ने सौम्या को गले से लगा लिया। सौम्या की आँखें अब भी नम थीं।

रात को सौम्या बहुत देर तक सोचती रही , नींद नहीं आ रही थी। आलोक अब तक अपनी मनोदशा से बाहर नहीं आ पाया था। डिनर करके चुपचाप वापस सो गया था। करवट बदलकर सौम्या देर तक आलोक को निहारती रही।

अगले दिन सौम्या ने स्कूल से इस्तीफ़ा दे दिया। कुक सरिता को भी छुट्टी दे दी। सरिता उदास मन से निकल रही थी कि उसने टोका।

"तुम्हारी बेटियाँ स्कूल जाती हैं?"

"जी जाती हैं , पर अबके छुड़वा लूंगी । स्कूल में मास्टर रहते नहीं और ट्यूशन पढ़ाने के हमारे पास पैसे नहीं। इससे अच्छा काम में हाथ बँटा देंगी कुछ। "

"हम्म , स्कूल से मत निकालना। शाम को मेरे पास भेज दिया करना दोनों को पढ़ने के लिए। बेटा खेलने जाता है तो मैं फ्री रहती हूँ। "

"पर दीदी आप को पैसे कहाँ से दूँगी? काम तो आपने छुड़वा दिया। "

" पैसे नहीं लूंगी , तुम्हारी बच्चियाँ पढ़ें लिखें , इज़्ज़त की रोटी खाएं यही मेरी फीस होगी। "

आलोक भीतर से सब सुन रहा था।

एक साल बाद आलोक के प्रोजेक्ट का सफल परीक्षण हुआ। प्रक्षेपण के बाद टीवी पर खुशी से झूमते एक दूसरे से गले मिलते वैज्ञानिकों में आलोक भी दिख रहा था, ठीक अपने बौस के बगल में। उसके चेहरे पर वही खुशी थी जो बीच में कहीं खो सी गयी थी।

सौम्या को मालती जी की कही बात याद आ गयी, “ कभी कभी जिन खुशियों के लिए हम भागदौड़ रहे होते हैं , वो चौराहे की किसी दूसरी राह पर हमारा इतंजार कर रही होती हैं।“

उधर सरिता की दोनों बेटियाँ अव्वल दर्जे में पास हुई थीं।

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शिक्षा: बी ई (इलेक्ट्रिकल)

पेशा: पी एस यू कंपनी में अधिकारी

(मेरी कुछ रचनाएं विभिन्न वेब पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं पर मुख्यतः मैं अपने ब्लौग में लिखती हूँ। रचनाकार में "बोस साहब और उनका घोड़ा" प्रकाशित हो चुकी है।)

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रचनाकार: ख़ुशी की तलाश में / कहानी / वर्षा ठाकुर
ख़ुशी की तलाश में / कहानी / वर्षा ठाकुर
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