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दीमक होती जा रही है किताबी पीढ़ी / डॉ. दीपक आचार्य

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हमें सिर्फ किताबों से ही मतलब है, दुनिया में और किसी से नहीं। हमें किताबें पढ़ना ही आता है उसके सिवा कुछ भी काम न हमारे घर वालों ने सिखाया है, न हमें आता और न हम कुछ कर पाने का माद्दा रखते हैं।

हमसे कोई भी कुछ दूसरा काम नहीं करवा सकता, चाहे हमारी अपनी दिनचर्या से संबंधित हो, घर-परिवार, समाज या अपने क्षेत्र से। हमारे जीवन में इससे बड़ी एकाग्रता और क्या होगी कि हम केवल किताबों में घुसे रहते हैं या मोबाइल अथवा कम्प्यूटर में।

तकरीबन नई पीढ़ी की यही हालत सर्वत्र दिखाई देती है। अब हमने व्यक्तित्व विकास का सीधा सा अर्थ यही लगा लिया है कि पढ़ाई और कमाई।  पैसे कमाने, संसाधन जमा करने और अपने आपको प्रतिष्ठित कहलाने का शौक ही सबके सामने रह गया है।

जबकि व्यक्तित्व विकास का अर्थ केवल किताबी ज्ञान या नौकरी नहीं है बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में आत्मनिर्भरता पाना और अपने अकेले के बूते पूरी की पूरी जीवनचर्या का बेहतरी के साथ निर्वाह करना है।

लेकिन ऎसा नहीं हो पा रहा है इस कारण हम लोग अपने व्यक्तित्व का आंशिक विकास ही कर पाएं हैं । ऎसे में समाज और देश हमसे कैसे उम्मीदें रख सकता है। हम खुद के काम ही नहीं कर पा रहे हैं, दूसरों की सेवा, परोपकार या सामाजिक सरोकारों के लिए परिश्रम की बातें बेमानी लगती हैं।

हमारी नई पीढ़ी के रोजमर्रा की जीवनशैली को हम देखें तो रोना आ सकता है। हो सकता है कि कुछ लोग अपने पारिवारिक संस्कारों और मर्यादाओें में पले-बढ़े होने के कारण साफ-सुथरेपन के हामी हों, अनुशासन बरतने वाले हों, अपने रोजमर्रा के काम खुद करने वाले हों और अपने कामों के लिए दूसरों पर आश्रित न हों। मगर ऎसा बहुत कम देखने में आ रहा है।

पढ़ाई-लिखाई में हम इतने डूबे हुए हुए हैं कि सारे कामों को हमने गौण मान लिया है। यहां तक कि समय पर नहाना-धोना और ध्यान, कपड़े धोना, अपने कक्ष की साफ-सफाई, लोक व्यवहार, घर-परिवार वालों की सेवा-सुश्रषा आदि से लेकर उन सभी कामों में हम फिसड्डी साबित हो रहे हैं जो एक सामान्य आदमी बड़ी ही अच्छी तरह कर सकता है।  हम केवल किताबों और कम्प्यूटरों-मोबाइल में ही रमे हुए दुनिया तलाश रहे हैं।

सब तरफ यही हालात दिखाई दे रहे हैं। हम चाहे कितने ही किताबों में घुसे रहें, नेटवर्क के जंजाल में उलझें रहें मगर यह सब व्यर्थ है यदि हम एक सामान्य इंसान के रूप में अपने काम ही नहीं कर सकें।

कल्पना करें कि कुछ दिन हमें ऎसे स्थान पर रहना पड़े जहां हमारी सेवा-चाकरी के लिए कोई हाजिर न हो, कुछ भी तैयार न मिले। तब हमारी स्थिति कैसी होगी, इस बारे में हमें खुद को आत्मचिन्तन करना चाहिए।

कोई इस स्थिति की गंभीरता को समझें या नहीं  मगर यह सत्य है कि केवल किताबों और कम्प्यूटरों के भरोसे जीवन को पूर्णता के साथ जिया नहीं जा सकता।

व्यक्तित्व उसी का पूर्ण है जो जीवन के हर कर्म के प्रति ज्ञान और अनुभव रखता है और इसका उपयोग करना जानता है, खुद के लिए भी, समाज और देश के लिए भी।

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- डॉ. दीपक आचार्य

9413306077

dr.deepakaacharya@gmail.com

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