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होलियाना कविताएँ

सुशील शर्मा

(होली पर तीन कवितायेँ )

1.प्रिय तुम आना हम खेलेंगे होली

 

शातिरों के हाथों में जब तहजीब के खंजर दिखने लगें।

खूंरेज आँखों में जब शांति के मंजर दिखने लगें।

प्रिय तुम जब आना हम खेलेंगे होली।

साहित्य में संस्कारों का सैलाब जब दिखने लगे।

रिश्तों में जब संवेदना रिसने लगे।

प्रिय तुम जब आना हम खेलेंगे होली।

देह का विकल्प जब प्यार का संकल्प लगने लगे।

मन के मकरंद पर जब प्रेम का भँवर उड़ने लगे।

प्रिय तुम जब आना हम खेलेंगे होली।

शब्द जब सन्नाटों की जगह अर्थ अपने चुनने लगें।

विषधरों के फन जब अमृत घट भरने लगें।

प्रिय तुम जब आना हम खेलेंगे होली।

पाप के पाखंड का प्रायश्चित जब कर सको।

प्रेम के अंकुर का नवसृजन जब कर सको।

प्रिय तुम जब आना हम खेलेंगे होली।

 

2.सुनो प्रह्लाद

 

सुनो प्रहलाद कैसे लगाऊं तुम्हे रंग अबीर

घिरे हो तुम असंख्य होलिकाओं से।

क्या जला सकोगे इन्हे अपनी बुआ की तरह।

राजनीति में षड्यंत्र को होली को।

शिक्षा को सरे बाजार बेचती होली को।

गाँवों को उजाड़ शमशान बनाती होली को।

शहरों को कांक्रीट जंगल बनाती होली को।

पेड़ों पर आरी चलाती होली को।

नदियों को रेगिस्तान बनाती होली को।

किसान को मौत से मिलाती होली को।

बेटियों को क़त्ल कराती होली को।

टीवी चैनलों पर चीखती चिल्लाती होली को।

अपनी विचारधाराओं को दूसरे पर थोपती होली को।

रोटिओं के लिए बचपन को तड़पाती होली को।

अमीरों को सरताज ,गरीबों को रौंदती  होली को।

प्रतिभाओं को पीछे धकेलती होली को।

मिसाइलों ,परमाणु बमों से खेलती होली को।

खुशियों को बाज़ारों में बेचती होली को।

देश द्रोह के नारे लगवाती होली को।

सुनो प्रह्लाद इन होलिकाओं से कैसे मुक्ति पाओगे।

कैसे मारोगे देश के अंदर सुलगते दरिंदों को?

कैसे बचाओगे पंखो पर लटकते छात्रों को ?

कैसे सहलाओगे भूख से बिलबिलाई आँखों को  ?

कैसे रोकोगे सीमा पार के आतंकों को ?

कैसे रोक पाओगे पर्वतों पर पिघलती बर्फ को ?

कैसे सह पाओगे सर्द सहमी रातों को?

क्या रोक पाओगे स्याह अँधेरे में लुटती अस्मतों को?

क्या रोक पाओगे तुम रेत के लुटते किनारों को?

क्या रोक पाओगे सलीबों पर लटकते किसानों को ?

क्या रोक सकोगे संसद में राजनीति के हंगामें को ?

मुझे मालूम है तुम इन होलिकाओं से घिरे हो अभिमन्यु की तरह ।

फिर कोशिश करेंगी यह होलिकाएँ तुम्हे जलाने की।

अनंत वर्षों से तुम इन से बचते आ रहे हो।

क्या इस वर्ष भी  बच पाओगे ?

अगर इन से बच सको तो आना मेरे पास।

ले आना प्रेम का गुलाल।

हम खेलेंगे फगुनिया होली।

 

3.फागुन अब मुझे नहीं रिझाता है।

 

फागुन अब मुझे नहीं रिझाता है।

जबसे शब्द कोषों में प्यार की परिभाषा बदल गई।

जब से रंग भूल गए अपनी असलियत

जब से तुम्हारी मुस्कान कुटिल हो गई।

जब से प्यार के खनकते स्वर कर्कश हो गये।

तब से फागुन अब मुझे नहीं रिझाता है।

जब से रिश्तों में पैबंद लगने लगे।

जब से प्रेम के स्वर मंद पड़ने लगे।

जब से अयोग्यताओं का आलंगन होने लगा।

जब से स्पर्श की आकांक्षाओं का पालन होने लगा।

जब से प्रेम की परिधियाँ टूटकर बिखरने लगीं।

जब से घृणा की बेल बढ़ने लगी।

तब से फागुन अब मुझे नहीं रिझाता है।

जब से कोई साथ देने का वादा तोड़ गया।

जब मेरा मन मुझे नितांत अकेला छोड़  गया।

जब से शब्द अपने अनुबंधों से बिखरने लगे।

जब से आईने अपने प्रतिबिम्बों से मुकरने लगे।

तब से फागुन अब मुझे नहीं रिझाता है

archanasharma891@gmail.com

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दोहे रमेश के होली पर

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दिखे नहीं वो चाव अब, .....रहा नहीं उत्साह !

तकते थे मिलकर सभी, जब फागुन की राह !!

होली है नजदीक ही, बीत रहा है फाग !

आया नहीं विदेश से ,मेरा मगर सुहाग !!

पिया मिलन की आस मे, रात बीतती जाग !

बैठ रहा मुंडेर पर,......... ले संदेसा  काग !!

छूटे ना अब रंग यह, छिले समूचे गाल !

महबूबा के हाथ का,ऐसा लगा गुलाल !!

सूखी होली खेलिए, मलिए सिर्फ गुलाल !

आगे वाला सामने , कर देगा खुद गाल !!

पिचकारी करने लगी,... सतरंगी बौछार !

मीत मुबारक हो तुम्हे, होली का त्यौहार !!

देता है सन्देश यह ,.... होली का त्यौहार !

रंजिश मन से दूर कर,करें सभी से प्यार !!

करें प्रतिज्ञा एक हम,होली पर इस बार !

बूँद नीर की एक भी, करें नहीं बेकार !!

छोड पुरानी रंजिशें ,....काहे करे मलाल !

इक दूजे के गाल पर,.आओ मलें गुलाल !!

सच्चाई के सामने ,........गई बुराई हार !

यही सिखाता है हमें, होली का त्यौहार !!

सूना-सूना है बडा, .....होली का त्योहार !

ओठों पे मुस्कान ले, आ भी जाओ यार !!

दिखी नहीं त्यौहार में, शक्लें कुछ इस बार !

थी जिनकी मुस्कान ही, पिचकारी की धार !!

 

रमेश शर्मा (मुंबई)

९८२०५२५९४०.rameshsharma_123@yahoo.com

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एक टिप्पणी भेजें

बहुत सुन्दर

होली पर आपकी ये कविता...अदभुत रचना..प्रणाम

अनुपम कृति।।।
बहुत खूब।

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

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