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प्रश्न अभी शेष है - 10 / कहानी संग्रह / माँ-बेटी / राकेश भ्रमर

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(पिछले अंक से जारी…)   कहानी 10 मां-बेटी मालती अभी-अभी काम से लौटी थी...थकी-मांदी. कुछ देर लेटकर आराम करने का मन कर रहा था, परन्‍तु उसके...

(पिछले अंक से जारी…)

 

कहानी 10

मां-बेटी

मालती अभी-अभी काम से लौटी थी...थकी-मांदी. कुछ देर लेटकर आराम करने का मन कर रहा था, परन्‍तु उसके जीवन में आराम नाम का शब्‍द नहीं था. छोटा वाला भूखा-प्‍यासा था. दो साल का हो गया था, परन्‍तु अभी तक उसका दूध पीता था. खोली में घुसते ही वह उसके पैरों से लिपट गया और उसने उस अपनी गोद में उठाकर खडे-खड़े ही सीने से लगा लिया. फिर बैठकर वह उसे दूध पिलाने लगी थी सुबह उसे खोली में छोड़कर जाती थी. अपने दो बड़े भाइयों के साथ खोली के अंदर या बाहर खेलता रहता था. तब भाइयों के साथ खेल में व्‍यस्‍त रहने से न तो उसे भूख लगती थी, न मां की याद आती थी. दोपहर के बाद जब वह काम से थकी-मांदी लौटती तो छोटे को अचानक ही भूख लग जाती थी और वह भी अपनी भूख-प्‍यास की परवाह किये बिना या किसी और काम को हाथ लगाये बच्‍चे को अपनी छाती का दूध पिलाने लगती थी.

छोटा चभर-चभर उसका दूध पीता जा रहा था. वह खुद भूखी थी, परन्‍तु बेटे की भूख के आगे उसे अपनी भूख महसूस नहीं हो रही थी. तभी उसकी बड़ी लड़की काम से लौटकर आई. मालती ने ध्‍यान नहीं दिया. पूजा सहमते कदमों से खोली के अंदर घुसी थी. मां ने तब भी ध्‍यान नहीं दिया था. पूजा जैसे कोई चोरी कर रही थी, खोली के एक किनारे गई और हाथ में पकड़ी पोटली को कोने में रखी अलमारी के पीछे छिपा दियामां ने छोटू को अपने से अलग किया और उठने को हुई, तभी उसकी नजर बेटी की तरफ उठी और उसने पूजा को अलमारी के पीछे थैली रखते देख लिया. सहज भाव से पूछा- ‘‘क्‍या छिपा रही है तू वहां?'' पूजा अचानक ही चौंक गई और असहज आवाज में बोली- ‘‘कुछ नहीं मां.'' उसकी आवाज में ऐसी तेजी थी कि मालती एकबारगी चौंक गई. घूरकर बेटी को देखा. पूजा घबराई सी लग रही थी, जैसे उसकी कोई बहुत बड़ी चोरी पकड़ी गई हो. मां की आंखों के तेज को वह बर्दाश्‍त नहीं कर पाई और सिर झुकाकर खड़ी हो गइर्मालती को लगा, कुछ तो गड़बड़ है, वरना पूजा इस तरह क्‍यों घबराती. रोज तो आती थी और चहकती हुई मां के गले से लग जाती थी. आज ऐसा कुछ नहीं हुआ था. दबे पांव आई थी और सहमे-सहमे अलमारी की तरफ बढ़ी थी. कुछ न कुछ बात जरूर थी, जो पूजा अपनी मां से छिपा रही थी मालती अपनी बेटी के पास गई और उसकी आंखों में आंखें डालकर बोली, ‘‘क्‍या है, तू इतना घबराई हुई क्‍यों है? और यहां क्‍या छिपाया है?''

‘‘कुछ नहीं मां, कुछ नहीं...'' पूजा की घबराहट और ज्‍यादा तीव्र हो गई. वह अलमारी से सटकर इस तरह खड़ी हो गई कि मालती पीछे न देख सके. मालती ने जोर से पकड़कर उसे परे धकेला और तेजी से अलमारी के पीछे रखी पोलीथी न की पोटली उठा ली. हड़बड़ाहट में मालती ने थैली को खोला और उसके अंदर रखे सामान को देखकर भौंचक्‍की रह गई. उसका दिल बेतहाशा धड़क उठा. उसकी अपनी सांसें थमती सी लगीं. लगा कि वह चकराकर गिर पड़ेगी. उसने अपने हाथों से अलमारी को थाम लिया और धीरे-धीरे सरकती हुई नीचे बैठ गई. पोटली का सामान थैली के अंदर से सांप की तरह फन काढ़े उसे डरा रहे थे... बे्रसरी, पैंटी, लिपिस्‍टिक, क्रीम, पाउडर और तेल की शीशी... क्‍या उसकी बेटी जवान हो गई थी ? उसने फिर अचकचाकर अपनी बेटी को गौर से देखा...उसे अपनी आंखों पर विश्‍वास नहीं हुआ. उसकी बेटी जवान तो नहीं हुई थी, परन्‍तु जवानी की दहलीज पर कदम रखने के लिए बेचैन हो रही थी उसका दिल बेचैन हो गया. गरीबी में एक और मुसीबत... बेटी की जवानी सचमुच मां-बाप के लिए एक मुसीबत बनकर ही आती है, खासकर उस गरीब की बेटी की, जिसका बाप जिन्‍दा न हो. उसकी सांसें कुछ संयत हुई तो बेटी से पूछा, ‘‘किसने दिया यह सामान तुझे?'' मां की आवाज में कोई गुस्‍सा नहीं था, बल्‍कि एक हताशा और बेचारगी भरी हुई थी. उसकी आवाज एक ऐसी रोती हुई औरत की आवाज थी, जो दुनिया की सारी तकलीफें झेलते हुए भी जीने का हौसला बरकरार रखे हुए थी मां की कातर करुण रुलाई पर पूजा को अपनी मां के ऊपर तरस आ गया. वह बहुत छोटी थी और अभी इतनी बड़ी या जवान नहीं हुई थी कि दुनिया की सारी तकलीफों के बारे में जान सके. फिर भी वह इतना समझ गई थी कि उसने कुछ गलत किया था, जिसके कारण मां को इस तरह रोना पड़ रहा था. वह भी रोने लगी और मां के पास बैठ गई. बेटी की रुलाई पर मालती थोड़ा संयत हुई और उसने अपने ममता भरे हाथ बेटी के सिर पर रख दिए. उसके हाथ धीरे-धीरे उसके खुरदरे बालों पर रेंगने लगे. दोनों का दर्द एक था, दोनों ही औरतें थी और औरतों का दुःख साझा होता है. भले ही दोनों आपस में मां बेटी थीं, परन्‍तु वह दोनों एक दूसरे के दर्द से न केवल वाकिफ थीं, बल्‍कि उसे महसूस भी कर रही थीं. ममता की सिसकियां कुछ थमी तो उसने बताया, ‘‘मां, मैं ले नहीं रही थी.

उसने जबरदस्‍ती मुझे दिया था.''

‘‘किसने?'' मां ने उत्‍सुकता से पूछा.

‘‘गोकुल सोसाइटी के चार सौ एक नंबर वाले साहब ने...''

‘‘वो... कांबले ने...'' मालती हैरान रह गई।

‘‘हां, मां, वह मुझसे रोज गंदी-गंदी बातें करता है. मैं कुछ नहीं बोलती तो मुझे पकड़कर चूम लेता है.'' पूजा जैसे अपनी सफाई दे रही थी मालती ने गौर से पूजा को देखा. वह दुबले-पतले शरीर की सांवले रंग की लड़की थी, कुल जमा तेरह साल की... शरीर में ऐसे अभी कोई उभार नहीं आए थे कि किसी मर्द की नजरें उस पर गड़ जाएं. बस वह जवानी की देहलीज पर कदम रखने की तैयारी कर रही थी. बदन में थोड़ा बहुत परिवर्तन आने लगा था, जिसे अगर ध्‍यान से न देखा जाए तो पता भी नहीं चल सकता था कि वह जवानी की ओर हौले-हौले कदम बढ़ा रही थी, परन्‍तु अभी से औरतखोर मर्दों की नजरें उस पर गड़नी शुरू हो गई थीं. हाय रे जमाना... छोटी-छोटी बच्‍चियां भी मर्दों की नजरों से सुरक्षित नहीं हैं. पलक झपकते ही उनकी हैवानियत और हवस की भूख का शिकार हो जाती हैं. मालती को अपने दिन याद आ गए... बहुत कड़ुए दिन. वह भी तब कितनी छोटी और भोली थी. उसके इसी भोलेपन का फायदा तो एक पुरुष ने उठाया था और वह समझ नहीं पाई थी कि वह लुट रही थी, प्‍यार के नाम पर... परन्‍तु प्‍यार कहां था वह? वह तो वासना का एक घृणित खेल था, जिसमें वह अपनी पूरी मासूमियत के साथ लिप्‍त हो गई थी. नासमझ उम्र का वह ऐसा खेल था, जिसमें एक पुरुष उसके अधपके शरीर को लूट रहा था और वह समझ रही थी वह स्‍त्री-पुरुष का प्‍यार था. वह एक ऐसे पुरुष द्वारा लुट रही थी जो उससे उमर में दुगुना-तिगुना ही नहीं बाप की उमर से भी बड़ा था, परन्‍तु औरत-मर्द के रिश्‍ते में उम्र बेमानी हो जाती है और कभी-कभी तो रिश्‍ते भी कलंकित हो जाते हैं.

तब वह भी अपनी बेटी की तरह दुबली-पतली सांवली-सी थी. आज जब वह पूजा को गौर से देखती है तो लगता है, जैसे वही पूजा के रूप में खड़ी है. वह बिलकुल उसका प्रतिरूप थी. जब वह अपनी बेटी की उमर की थी, तब चोगले साहब के घर में काम करती थी. वह शादीशुदा था, दो बच्‍चों का बाप, परन्‍तु एक नंबर का लंपट... उसकी नजरें हमेशा मालती के इर्द-गिर्द नाचती रहती थीं. जिस कमरे में काम करती, उसी कमरे में आ जाता और उससे मीठी-मीठी बातें करता. चोगले की बीवी किसी स्‍कूल में पढ़ाती थी, सो वह सुबह जल्‍दी निकल जाती थी. साथ में उसके बच्‍चे भी चले जाते थे. बीवी और बच्‍चों के जाने के बाद मालती उस घर में काम करने जाती थी. चोगले तब घर में अकेला होता था. पहले तो काफी दिनों तक उसने मालती की तरफ कोई ध्‍यान नहीं दिया और कभी कोई ऐसी बात नहीं कही, जिससे लगे कि वह उसके बदन का भूखा था. शायद उसे बच्‍ची समझता था. वह काम करती रहती थी और काम खत्‍म होने के बाद चुपचाप घर चली आती थी. परन्‍तु जब उसने तेरहवीं में कदम रखा और उसके सीने में कुछ नुकीला सा उभार आने लगा, तो अनायास ही एक दिन चोगले की नजरें उसके शरीर पर गड़ गईं. वह मैले-कचैले कपड़ों में रहती थी, झाड़ू-पोंछा करने वाली लड़की और कैसे रह सकती थी. कपड़े धोने के बाद तो वह खुद गीली हो जाती थी और तब बिना अन्‍तर्वस्‍त्रों के उसके बदन के अंग पारदर्शी शीशे की तरह चमकने लगते थे. ऐसे मौके पर चोगले की नजरों में एक प्‍यास उभर आती और उसके पास आकर पूछता था - ‘‘मालती तुम गीली हो गई हो, भीग गई हो. पंखे के नीचे बैठकर कपड़े सुखा लो.'' और वह पंखा चला देतामालती बैठती नहीं, खडे़-खड़े ही अपने कपड़े सुखाती. चोगले उसके बिलकुल पास आकर सटकर खड़ा हो जाता और अपनी काया से उसे ढंकता हुआ कहता, ‘‘तुम्‍हारे कपड़े बिलकुल पुराने हो गए हैं.''

‘‘जी...!'' वह संकोच से कहती.

‘‘अब तो तुम्‍हें कुछ और कपड़ों की भी जरूरत पड़ती होगी?'' मालती उसका आशय नहीं समझती और मुलुर-मुलुर उसको देखती रहती. वह एक कुटिल हंसी हंसकर कहता, ‘‘संकोच मत करना, मैं तुम्‍हारे लिए नए कपड़े ला दूंगा. वो वाले भी...!'' मालती की समझ में फिर भी नहीं आता. वह अबोध भाव से पूछती, ‘‘कौन से कपड़े...?''

 

चोगले उसके कंधे पर हाथ रखकर कहता, ‘‘देखो, अब तुम छोटी नहीं रही, बड़ी और समझदार हो रही हो. ये जो कपड़े तुमने ऊपर से पहन रखे हैं, इनके नीचे पहनने के लिए भी तुम्‍हें कुछ कपड़ों की जरूरत पड़ेगी, शायद जल्‍द ही...'' कहते-कहते उसका हाथ उसकी गर्दन से होकर मालती के सीने की तरफ बढ़ता और वह शर्म और संकोच से सिमट जाती. इतनी समझदार तो वह हो ही गई थी और चोगले की मेहनत रंग लाई. धीरे-धीरे उसने मालती को अपने रंग में रंगना शुरू किया. चोगले की मीठी-मीठी बातों और प्रलोभनों में मालती बहुत जल्‍दी फंस गई. घर का सूनापन भी चोगले की मदद कर रहा था और मालती की चढ़ती हुई जवानी, शरीर में होने वाले परिवर्तनों के प्रति उसकी जिज्ञासाएं, उसकी मासूमियत और भोलापन, सबने ऐसा गुल खिलाया कि मालती जवानी के पहले ही पे्रम के सारे रंगों से वाकिफ हो गई थी. तब मालती की मां ने उसमें होनेवाले परिवर्तनों के प्रति उसे सावधान नहीं किया था, न उसे दुनियादारी से अवगत कराया था, न पुरुष के भेष में छिपे भेड़ियों के बारे में उसे किसी ने बताया था. भेद तब खुला था, जब वह गर्भ से रह गयी और उसका पेट बढ़ने लगा था. सबसे पहले उसकी मां को पता चला था. वह उल्‍टियां करती तो मां को शक होता, परन्‍तु वह इतनी छोटी थी कि मां को अपने शक पर भी यकीन नहीं होता था. यकीन तब हुआ जब उसका पेट तनकर बड़ा हो गया. मां ने मार-पीटकर पूछा, तब बड़ी मुश्‍किल से उसने चोगले का नाम बताया. बड़े लोगों की करतूत सामने आई, परन्‍तु तब चोगले ने भी उसकी मदद नहीं की थी और दुत्‍कारकर उसे अपने घर से भगा दिया था बाद में एक नर्सिंग होम में ले जाकर मां ने उसका गर्भ गिरवाया था अपना अतीत याद करके मालती रो पड़ी. भय से उसका दिल कांप उठा, क्‍या भाग्‍य उसकी बेटी के साथ भी वही करने जा रहा था, जो उसके साथ हुआ था. गरीब लड़कियों के साथ ही ऐसा क्‍यों होता है कि वह अपना बचपन भी ठीक से नहीं बिता पातीं और जवानी के तमाम कहर उनको झेलने पड़ते हैंउसने अपनी बेटी को गले से लगा लिया. जो कुछ उसके साथ हुआ था, वह अपनी बेटी के साथ नहीं होने देगी. अपनी जवानी में तो उसने बदनामी का दाग झेला था, मां-बाप को दुश्‍वारियां दी थीं. यह तो केवल वह या उसके मां-बाप ही जानते थे कि किस प्रकार उसका गर्भ गिरवाया गया था और किस प्रकार गांव जाकर उसकी शादी की गई थी और फिर कई साल बाद कैसे वह अपने मर्द के साथ वापस मुंबई आई थी और अपने मां-बाप के बगल की खोली में किराए पर रहने लगी थी.

आज उसका मर्द इस दुनिया में नहीं था. चार बच्‍चे उसकी और उसकी बेटी की कमाई पर जिन्‍दा थे. पूजा के बाद तीन बेटे हुए थे, परन्‍तु तीनों अभी छोटे थे पिछले साल उसका मर्द फैक्‍टरी में दुघर्टना में जाता रहा. वह असहाय हो गई थी मर्द की मश्‍त्‍यु के बाद ही उसने अपनी बेटी को घरों में काम करने के लिए भेजना शुरू किया था. उसे क्‍या पता था कि जो कुछ उसके साथ हुआ था, एक दिन उसकी बेटी के साथ भी होगा. जमाना बदल जाता है, लोग बदल जाते हैं, परन्‍तु उनके चेहरे और उनके चरित्र कभी नहीं बदलते. कल चोगले था, तो आज कांबले...! कल कोई और आ जाएगा. औरत के शरीर के भूखे भेड़ियों की इस दुनिया में कहां कमी थी असली शेर और भेड़िये धीरे-धीरे इस दुनिया से विलुप्‍त होते जा रहे थे, परन्‍तु मानवरूपी शेर और भेड़िये दुगुनी तादाद में पैदा होते जा रहे थे मालती के पास आमदनी का कोई और जरिया नहीं था. मां-बेटी की कमाई से पांच लोगों का पेट भरता था. क्‍या करे वह? पूजा का काम करना छुड़वा दे, तो आमदनी आधी रह जाएगी. घरों में झाड़ू-पोंछा करने और बर्तन-कपड़े धोने से एक अकेली औरत की कमाई से किस तरह पांच पेट पल सकते थे मालती अच्‍छी तरह जानती थी कि वह अपनी बेटी की जवानी को किसी तरह भी मानवरूपी भेड़ियों के जबड़ों से नहीं बचा सकती थी, न घर में न बाहर. फिर भी उसने पूजा को समझाते हुए कहा, ‘‘बेटी, अगर तू मेरी बात समझ सकती है, तो ठीक से सुन... हम गरीब लोग हैं, हमारे शरीर को भोगने के लिए यह अमीर लोग हमेशा घात लगाए रहते हैं. इसके लिए वह तमाम तरह के लालच देते हैं. हम लालच में आकर फंस जाते हैं और उनको अपना शरीर सौंप देते हैं. गरीबी हमारी मजबूरी है, तो लालच हमारा अभिशाप, जिसके चलते हम दुःख और तकलीफ उठाते हैं. हम गरीबों के पास इज्‍जत के नाम पर कुछ नहीं होता. अगर मैं तुझे काम पर न भेजूं और घर पर ही रखूं, तब भी तो खतरा टल नहीं सकता. चाल में भी तो आवारा, टपोरी लड़के घूमते रहते हैं. अमीरों से मैं तुझे बचा लूंगी, परन्‍तु इस खोली में रहकर इन गली के आवारा कुत्‍तों से तू नहीं बच पाएगी. खतरा सब जगह है, बता तुझे दुनिया की गंदी नजरों से बचाने के लिए मैं क्‍या करूं?'' और वह जोर से रोने लगी. गरीब, मजलूम औरत इसके सिवा क्‍या कर सकती थी पूजा ने अपने आंसुओं को पोंछ लिया और मां का हाथ पकड़कर बोली, ‘‘मां, तुम चिंता मत करो. अब मैं किसी की बातों में नहीं आऊंगी, किसी का दिया हुआ कुछ नहीं लूंगी. केवल अपने काम से काम रखूंगी. हां, कल से मैं कांबले के घर काम करने नहीं जाऊंगी. कोई और घर पकड़ लूंगी.''

 

‘‘देख, हमारे पास कुछ नहीं है, पर हमारी समझदारी ही हमारी तकलीफों को कुछ हद तक कम कर सकती है. अब तू सयानी हो रही है. मेरी बात समझ गई है. मुझे विश्‍वास है कि अब तू किसी के बहकावे में नहीं आएगी.'' पूजा ने मन ही मन सोचा, हां, वह अब समझदार हो गई थी.

मां-बेटी ने एक दूसरे को ऐसी नजरों से देखा, जिनमें विश्‍वास कम, अविश्‍वास ज्‍यादा था. मालती अच्‍छी तरह जानती थी कि यह केवल दिलासा देने वाली बातें थी और पूजा भी इतना तो जानती थी कि अभी तो वह जवानी की तरफ कदम बढ़ा रही थी. पता नहीं आगे क्‍या होगा? कौन जानता है? बरसात का पानी और लड़की की जवानी कब बहक जाए और कब किधर से निकल जाए, किसी को पता नहीं चलता. पूजा अभी बहुत छोटी थी. पूर्ण यौवन तक आते-आते न जाने कितने रास्‍तों से उसे गुजरना पडे़गा? ऐसे रास्‍तों से जहां बाढ़ का पानी भरा हुआ है और वह अपनी पूरी होशियारी और सावधानी के साथ भी न जाने कब किस गडढे में गिर जाए. दोनों ही जानती थीं कि जो वह सोच रही थीं, वही सच नहीं था या जैसा वह चाह रही हैं, उसी के अनुसार जीवन चलता रहेगा, ऐसा भी नहीं होने वाला था जीवन की अपनी गति होती है, उसकी गति और प्रकृ‍ति को कोई नहीं बांध पाया है. वह अपने ही हिसाब से सभी मनुष्‍यों को संचालित करता है. मनुष्‍य प्रकृ‍ति के दास हैं, न कि अपने मन के दिन बीतते रहे. मालती अपनी बेटी की तरफ से होशियार थी, उसकी एक-एक हरकत पर नजर रखती. उन दोनों के बीच में संवाद का सिलसिला कम था, परन्‍तु असंवादों के जरिए ही वह दोनों एक दूसरे की भावनाओं को जानने और समझने का प्रयत्‍न करतीं. परन्‍तु जैसे-जैसे बेटी बड़ी हो रही थी, वह और ज्‍यादा समझदार होती जा रही थी. अब वह बड़े सलीके से रहने लगी थी और उसे अपने भावों को छिपाना भी आ गया था. उसके रूप का निखार ध्‍यानी, ज्ञानी और संत पुरुषों को बहकाने के लिए काफी था । इधर काफी दिनों से पूजा के रंग-ढंग में काफी परिवर्तन आ गया था. वह अपने बनने-संवरने में ज्‍यादा ध्‍यान देती, परन्‍तु इसके साथ ही उसमें एक अजीब गंभीरता भी आ गई थी. ऐसा लगता था, जैसे वह किन्‍हीं विचारों में खोई रहती होघर के काम में मन नहीं लगता था, सोचते-सोचते वह जैसे सो जाती और मालती को उसे झिंझोंड़कर चेतन दुनिया में लाना पड़ता था.

 

मालती ने एक दिन पूछ ही लिया, ‘‘बेटी, मुझे डर लग रहा है. कहीं तेरे साथ कुछ हो तो नहीं गया?'' पूजा जैसे सोते हुए चौंक गई हो, ‘‘क्‍यों...क्‍याकृ...? नहीं तो...!''

‘‘मतलब, कुछ न कुछ तो है.'' उसने बेटी के सिर पर हाथ रखकर कहा पूजा के मुंह से बोल न फूटे. सिर झुका लिया. मालती समझ गई, ‘‘अब कुछ बताने की जरूरत नहीं है. मैं सब समझ गई हूं, पर एक बात तू बता, जिससे तू प्‍यार करती है, वह तेरे साथ शादी करेगा?'' पूजा की आंखों में एक अनजाना-सा भय तैर गया. उसने फटी आंखों से अपनी मां को देखा. मालती उसकी विस्‍फारित आंखों में फैले डर को देखकर खुद सहम गई. उसे लगा, कहीं न कहीं कोई बड़ी गड़बड़ है. डरते-डरते पूछा, ‘‘कहीं तू पेट से तो नहीं है?'' पूजा ने ऐसे सिर हिलाया, जैसे जबरदस्‍ती कोई पकड़कर उसका सिर हिला रहा हो. अब आगे कहने के लिए क्‍या बचा था. मालती ने अपना माथा पीट लिया. बेटी को झिंझोंडकर हिला दिया और उसके सीने के कपड़ों को नोचती हुई जमीन पर गिर गई. न वह चीख सकती थी, न रो सकती थी, न बेटी को मार सकती थी उसकी बेबसी ऐसी थी जिसे वह किसी से बयान भी नहीं कर सकती थी. जो वह नहीं चाहती थी, वहीं हुआ. उसके जीवन में जो घट चुका था, उसी से बेटी को आगाह किया था. ध्‍यान रखती थी कि बेटी नरक में न गिर जाए. बेटी ने भी उसे आश्‍वासन दिया था कि वह कोई गलत कदम नहीं उठाएगी, परन्‍तु जवानी की आग को दबाकर रख पाना शायद उस के लिए संभव नहीं था. किसी के लिए भी संभव नहीं होता. हम केवल झूठे भ्रम में जीते हैं, परन्‍तु अपनी इन्‍द्रियों को वश में नहीं कर पाते. मरी हुई आवाज में उसने बस इतना ही पूछा, ‘‘किसका है, ये पाप...?'' पूजा ने पहले तो नहीं बताया, जैसा कि आमतौर पर लड़कियों के साथ होता है. जवानी में किए गए पाप को वह छिपा नहीं पातीं, परन्‍तु अपने प्रेमी का नाम छिपाने की कोशिश जरूर करती हैं. हालांकि इसमें भी वह सफल नहीं होती हैं, मां-बाप किसी न किसी तरीके से पूछ ही लेते हैंपूजा ने जब उसका नाम बताया तो मालती को सहसा विश्‍वास नहीं हुआ. उसने चीखकर पूछा, ‘‘तू तो कह रही थी कि कांबले के यहां काम छोड़ देगी, फिर ये कैसे हुआ?''

‘‘मां, मैंने तुमसे झूठ बोला था. मैंने उसके यहां काम करना नहीं छोड़ा था मैं उसकी मीठी-मीठी और प्‍यारी बातों में पूरी तरह भटक गई थी. मैं किसी और घर में भी काम नहीं करती थी, केवल उसी के घर जाती थी. वह मुझे खूब पैसे देता था, जो मैं तुम्‍हें लाकर देती थी कि मैं दूसरे घरों में काम करके ला रही हूं; ताकि तुम्‍हें शक न हो.''

‘‘फिर तू सारा दिन उसके साथ रहती थी ?'' पूजा ने स्‍वीकृ‍ति में सिर हिला दिया. ‘‘मरी, हैजा आए, तू जवानी की आग बुझाने के लिए इतना गिर गई. अरे, मेरी बात समझ जाती और तू उसके यहां काम छोड़कर दूसरों घरों में काम करती रहती तो शायद किसी को ऐसा मौका नहीं मिलता कि कोई तेरे शरीर से खिलवाड़ करके तुझे लूट ले जाता. काम में मन लगा रहता है तो इस काम की तरफ लड़की का ध्‍यान कम जाता है. पर तू तो बड़ी शातिर निकली... मुझसे ही झूठ बोल गई.'' पूजा अपनी मां के पैरों पर गिर पड़ी और सिसक-सिसककर रोने लगी, ‘‘मां, मैं तुम्‍हारी गुनाहगार हूं, मुझे माफ कर दो. एक बार, बस एक बार... मुझे इस पाप से बचा लो.'' मालती गुस्‍से में बिफरकर बोली, ‘‘जा न उसी के पास, वह कुछ न कुछ करेगा. उसको लेकर डाक्‍टर के पास जा और अपने पेट के पास को गिरवा कर आ...''

‘‘मां, उसने मना कर दिया है. उसने कहा है कि वह पैसे दे देगा, परन्‍तु डाक्‍टर के पास नहीं जाएगा. समाज में उसकी इज्‍जत है, मान-मर्यादा है. कहीं किसी को पता चल गया तो क्‍या होगा, इस बात से वह डरता है.''

‘‘वाह री इज्‍जत और मान-मर्यादा... एक कुंआरी लड़की की इज्‍जत से खेलते हुए इनकी मान-मर्यादा कहां चली जाती है? मैं क्‍या करूं, कहां मर जाऊं, कुछ समझ में नहीं आता.'' मालती ने गुस्‍से और नफरत के बावजूद भी पूजा को परे नहीं किया, उसे दुत्‍कारा नहीं. बस गले से लगा लिया और रोने लगी. पूजा भी रोती जा रही थी दोनों के दर्द को समझने वाला वहां कोई नहीं था, न उनके दर्द को दूर करने वाला.

.. उन्‍हें खुद ही अपने हालातों से निपटना था और उनके परिणामों को झेलना था मन को शान्‍त करने के बाद मां उठी और कपड़े लत्‍ते तथा अन्‍य जरूरी सामान समेटकर फटे-पुराने बैग में भरने लगी. बेटी ने उसे आश्‍चर्य से देखा. मां ने उसकी तरफ देखे बिना कहा, ‘‘तू भी तैयार हो जा और बच्‍चों को तैयार कर ले. गांव चलना है. यहां तो तेरा कुछ हो नहीं सकता. इस पाप से छुटकारा पाना है. इसके बाद गांव में किसी लड़के से तेरा ब्‍याह कर देंगे.''

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नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3830,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,335,ईबुक,191,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2770,कहानी,2095,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,485,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,820,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,307,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1907,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,644,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,685,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,54,साहित्यिक गतिविधियाँ,183,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,68,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: प्रश्न अभी शेष है - 10 / कहानी संग्रह / माँ-बेटी / राकेश भ्रमर
प्रश्न अभी शेष है - 10 / कहानी संग्रह / माँ-बेटी / राकेश भ्रमर
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