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प्राची अप्रैल 2016 : हास्य-व्यंग्य धारावाहिक उपन्यास एक गधे की वापसी कृश्न चन्दर

हास्य-व्यंग्य

धारावाहिक उपन्यास

एक गधे की वापसी

कृश्न चन्दर

पहली किस्त

र्शकण और श्रोताओं! मैं न रूसियों का राकेट हूं, न अमरीकियों का पाकिट हूं, न गली हबशखां फाटक हूं; न मैं रमता जोगी न्यारा हूं न कोई बनावटी सय्यारा हूं, न किसी फिल्मी हीरोइन का प्यारा हूं, न किसी लखपती की आंख का तारा हूं-मैं महज एक गधा आवारा हूं, जिसे बचपन की गलतकारियों के कारण अखबार पढ़ने की आदत पड़ गई थी. जो न कविराज गुरनामदास के हिदायतनामे से दूर हुई, न प्यारी बहन जी के इलाज से गई. अखबार पढ़ते-पढ़ते मैं इन्सानों की बोली बोलने लगा और कूट राजनीति की बातें करने लगा. इसी कारण मैंने अपना प्यारा वतन बाराबंकी छोड़ा और डंकी बनकर दिल्ली के एक धोबी से नाता जोड़ा. धोबी को अचानक एक मगरमच्छ ने खा लिया और मुझे धोबी की विधवा पत्नी और अनाथ बच्चों के निर्वाह के लिए बड़े-बड़े अफसरों की सेवा में निवेदन करने पर विवश कर दिया गया. मैं अर्जी लेकर दफ्तर-दफ्तर घूमा और मिनिस्टर-मिनिस्टर पहुंचा और पहुंचते-पहुंचते एक दिन सीधा पंडित नेहरू की कोठी पर जा पहुंचा. पंडित नेहरू से संयोगवश जो मेरा इण्टरव्यू हो गया, उसने मुझे प्रसिद्धि के आसमान पर पहुंचा दिया. लोग मुझे घरों और क्लबों में बुलाने लगे. गलियों और बाजारों में मेरा जूलूस निकालने लगे. एक सेठ ने समझा कि मैं कोई खुदाई फौजदार हूं या कोई करोड़पति ठेकेदार हूं, जिसने ऊपर से एक मासूम गधे का भेस धारा है और अंदर ही अंदर बहुत बड़ा ठेकेदार है. वह बहुत मिन्नत-समाजत करके मुझे अपने घर ले गया. अपनी फर्म का हिस्सेदार बनाने लगा, अपनी सुंदर लड़की से मेरी शादी रचाने लगा और हाई सोसायटी में मुझे घुमाने लगा.

मैंने बहुत इंकार किया, मना किया. बताया-मैं यूं तो ज्ञान भार से लदा हूं किंतु दरअसल एक गधा हूं! किंतु वह लालच का अंधा मेरी बात पूरी सुनने से पहले अनसुनी कर देता था और अपनी हांके जाता था और मेरी आवभगत किए जाता था.

कुछ महीने तो बड़े ऐशोआराम से कटे, किंतु जिस दिन उस लालची सेठ को पता चला कि मेरे पास न कोई परमिट है न कोटा, उसी दिन वह बेपेंदी का लोटा मुझे मारने पर तुल गया और कमरा बंद करके उसने और उसकी लड़की ने मार-मारकर मेरा भुरकस निकाल दिया और मुझे सख्त घायल करके बाहर सड़क पर निकाल दिया.

छः मास तक मैं जानवरों के अस्पताल में पड़ा जीवन और मृत्यु के बीच लटकता रहा. पीड़ा की अधिकता से कराहता रहा. इंसानों की बेहिसी (हृदयहीनता) और गधों की बेबसी पर रोता रहा. किंतु ईश्वर को मेरा जीना स्वीकार था और मेरे लिए जिंदगी का जहर पीना जरूरी था. इसलिए मैं अच्छा हो गया. स्वस्थ होते ही अस्पताल के दयालु डॉक्टर ने मुझे अपने ऑफिस में बुला लिया और मेरी पीठ पर दो सेर घास लादकर कहा-

‘‘तुम्हारे लिए यह दो सेर घास काफी है, बाकी ईश्वर दाता है. अब तुम यहां से चले जाओ और मेरा दो हजार का बिल चुकाते जाओ.’’

मैंने कहा, ‘‘डॉक्टर साहब, मैं एक पढ़ा-लिख गधा नाकारा हूं. इसलिए गरीब और आवारा हूं. मैं जब तक जीऊंगा, आपके जानोमाल की दुआएं दूंगा. पर इस बिल का भुगतान नहीं कर सकता.’’

डॉक्टर, जिसका नाम राम अवतार था और जो अपने काम में बड़ा होशियार था, मेरी विवशता समझकर मुस्करा दिया और बिल को वापस अपनी जेब में डालते हुए बोला, ‘‘तो मेरा यह कर्ज तुम पर बाकी रहा. अब अगर वाकई तुम कर्ज देना चाहते हो तो सीधे बम्बई चले जाओ.’’

‘‘बंबई?’’ मैंने पूछा.

‘‘हां’’, डॉक्टर बोला, ‘‘पश्चिमी भारत में एक नगर आबाद है, जो सब नगरों का उस्ताद है. उसका नाम बंबई है. तुम सीधे वहां चले जाओ और काम करके मेरा कर्ज चुकाओ.’’

मैं स्वयं दिल्ली में नहीं रहना चाहता था. दिल्ली-जिसने मेरे प्रसिद्धि की ऊंचाई देखी थी और जो अब मेरे पतन की नीचाइयां देख रही थी-अब मुझे एक आंख न भाती थी. इसलिए मैंने डॉक्टर की सलाह मान ली और बंबई जाने की ठान ली.

दिल्ली से मैं रेल की पटरी के किनारे-किनारे हो लिया और मथुरा पहुंचा, क्योंकि मुझे मथुरा के पेड़े खाने का शौक था. किंतु मथुरा में मुझे पेड़ों के बजाय पंडों के डंडे खाने को मिले और मैं वहां से जान बचाकर सीधा ग्वालियर पहुंच गया. उद्देश्य यह था कि तानसेन की समाधि पर जाऊं और उस महान् संगीतकार के सामने अपना शीश नवाऊं कि जिसके नाम से भारत में शास्त्रीय संगीत की प्रतिष्ठा कायम है. और यह तो सब लोग जानते हैं कि आजकल भारत में केवल दो प्रकार के लोग शास्त्रीय संगीत पसंद करते हैं. एक तो तानसेन-से श्रद्धालु, दूसरे गधे; वर्ना सारी दुनिया रेडियो सीलोन सुनती है.

तानसेन की समाधि पर बड़ा सन्नाटा था. एक कोने में दो मुजाविर पड़े ऊंघ रहे थे. जमीन पर बासी हारों की पत्तियां बिखरी पड़ी थीं. थोड़ी दूर पर कुछ भेड़-बकरियां फिल्मी ‘प्लेबैक’ गानेवालियों की तरह मिमियां रही थीं. संगीत-सम्राट् की समाधि की बुरी दशा देखकर मेरे दिल को बहुत दुःख हुआ और मैंने वहीं चारों घुटने टेककर स्वर्गीय उस्ताद की सेवा में दण्डवत् होकर माथा टेका और फिर सिर उठाकर शुद्ध झंझोटी में एक ऐसी जोरदार तान लगाई जिसने अर्धनिद्रित मुजाविरों को झिंझोड़ दिया है. वे जागकर मेरी ओर आश्चर्य से देखने लगे और बजाय इसके कि लोग मेरे जौके सलीम बल्कि जौके-अकबर की दाद देते, जिसके सहारे मैंने स्वर्गीय उस्ताद की आत्मा को प्रसन्न करने का प्रयत्न किया था, वे लोग पंजे झाड़कर मेरे पीछे पड़ गए और मुझे डंडे मार-मारकर उन्होंने वहां से भी भगा दिया.

मैं डंडे खाकर इतना बेमजा न हुआ था जितना यह सोचकर बेमजा हुआ कि अब इस देश में आर्ट और कल्चर का भगवान् ही मालिक है, जहां एक पक्के गाने वाला दूसरे पक्के गाने वाले को अपनी श्रद्धांजलि भी भेंट नहीं कर सका. अतः मैंने जोर की दुलत्ती झाड़ी और रास्ते में खाई देखी न खाड़ी, सीधा बंबई आकर लिया-

यहां पर घीसू घसियारे ने मुझ पर दया की और मुझको अपने मकान पर बांध लिया. घीसू घसियारा था बड़ा बेचारा, क्योंकि उसके बच्चे थे ग्यारह. वह घास का एक गट्ठा अपने सिर पर लादता था और चार मेरी पीठ पर, और रोज पहुंच जाता था जोगेश्वरी में दूध बेचने वाले ग्वालों के पास, जो उसकी घास के गट्ठे खरीद लेते थे ओर उसे उसके मूल्य दे देते थे, जिसे लेकर वह सीधा जोसफ डिसूजा की झोंपड़ी में जाता था और जाते ही एक पव्वा ठर्रे का चढ़ाता था और अपने दोस्त रमजानी और करनैल सिंह टैक्सी-ड्राइवर से गप्प लड़ाता था.

मैं झोंपड़ी के बाहर नारियल के पेड़ों के नीचे हरी-हरी घास चरता था और शुक्र करता था कि आखिर मुझे आराम की जिंदगी मिली. बंबई में आकर मैंने इंसानों की बोली त्याग दी थी, क्योंकि अनुभव ने मुझे बता दिया कि इंसानों की दुनिया में वही लोग प्रसन्न रह सकते हैं जो गधे बनकर रहें. बुद्धिमान का यहां गुजारा नहीं, क्योंकि अच्छा परामर्श किसी को प्यारा नहीं, इसलिए मैं इंसानों की बोली से हजर (अरुचि) करने लगा और जानवरों की जिंदगी बसर करने लगा; जैसे बंबई में वे सब लोग बसर करते हैं जिनके लिए पैसा ही प्यारा है और जिन्हें केवल अपना ऐशो-आराम दुलारा है.

छः महीने में मैं हरी-हरी घास खाकर खूब मोटा हो गया. मेरी काली खाल चिकनी हो गई और मेरी अयाल पर सेहत का रंग चमकने लगा और मैं एक सुंदर गधा बन गया, जिस पर कोई भी गधी मुग्ध हो सकती थी. और यह तो कोमलांगियों की कमजोरी है कि वे सदा सुंदर गधों पर मुग्ध होती हैं. चिकनी खाल पर उनकी जान जाती है चाहे उसके अंदर भुस ही भरा हो.

इधर कुछ अर्से से दो-तीन गधियों ने मुझ पर डोरे डालने शुरू किए, किंतु इनमें जो सबसे अधिक कोमल और मादक भाव-भंगिमा वाली थी वह मुझसे बिल्कुल बातचीत नहीं करती थी. इसलिए मेरा दिल बार-बार उसकी ओर खींचा चला जाता था और एक विचित्र-सा आकर्षण मेरे दिल में उसके प्रति अनुभव होता था. उसके कान लंबे, पतले, सुडौल और सुनहरे बालों वाले थे; और जिस तरह वह अपने छोटे-छोटे सफेद दांतों से हरी दूब चरती थी, उस पर मेरा दिल लोट-पोट हो जाता था. वह दूसरी भूखी-चटोरी गधियों के समान घास पर पिल नहीं पड़ती थी, बल्कि बड़े धैर्य से एक ग्रास खाकर अलग हो जाती थी और बुरी घास को सूंघकर अरुचि से छोड़ देती थी. इससे मालूम होता था कि वह कितनी अत्यन्त श्रेष्ठ और ऊंचे परिवार की गधी है, जो केवल मनोरंजन के लिए गधों के इस झुंड में जोजफ डिसूजा की झोंपड़ी के बाहर, नारियल के पेड़ों के नीचे चरने के लिए चली आती है. भूख अमीरों के लिए एक बढ़िया मनोरंजन है, गरीबों के लिए महत्त्वपूर्ण आवश्यकता है.

एक दिन अवसर पाकर मैं उसके निकट चला गया. वह नारियल के एक झुंड के नीचे अकेली घास चर रही थी और अजब शान से अपनी दुम हिला रही थी. मैंने उसके निकट जाकर धीरे से कहा, ‘‘ऐ सुंदरी, कब तक हमसे नजरें चुराओगी. जरा इधर तो देखो अपने आशिक की तरफ.’’

‘‘हिश्ट.’’ वह अपने नथुने फुलाकर बड़ी घृणा से हिनहिनाई.

‘‘आखिर ऐसी भी उपेक्षा क्यों? मैं भी एक गधा हूं.’’ मैंने कहा.

‘‘प्रेम में हर आदमी गधा हो जाता है,’’ उसने ऐसे कंटीले स्वर में मुझसे कहा कि मैं एक क्षण के लिए चुप हो गया.

वास्तव में वह बेहद हाजिर जवाब गधी थी. मालूम होता था कि अच्छी शिक्षा पाई है. मैंने सोचा-अगर इससे मेरी शादी हो जाए तो जिंदगी संवर जाए, वर्ना आम गधों की ऐसी गधियों से शादी होती है जिन्हें घास चरने और बच्चे जनने के सिवा कोई काम नहीं आता. किंतु यह तो बड़ी विदुषी है और कर्तव्यपरायण ज्ञात होती है. ईश्वर ने इसे सौंदर्य के अतिरिक्त सुरुचि भी प्रदान की है. अरे! इसके साथ तो पिक्चर भी देखी जा सकती है. जरा सोचो तो हमारे बच्चे कितने तीव्रबुद्धि के होंगे! बिल्कुल गधे तो न होंगे.

मैंने उसकी ओर गर्दन बढ़ाकर कहा, ‘‘डार्लिंग!’’

उसने ऐसे जोर की दुलत्ती झाड़ी कि यदि मैं तत्काल ही अपनी गर्दन न मोड़ लेता तो शायद मेरी आंख ही फूट जाती. मैं घबराकर पीछे हट गया. उसके नथनों से चिनगारियां निकल रही थीं. वह अग्निमय दृष्टि से मुझे ताकती हुई बोली, ‘‘एक घसियारे के गधे होकर मुझसे प्रेम करते हुए तुम्हें शर्म नहीं आती.’’

मैंने घबराकर कहा, ‘‘तुम कौन हो?’’

वह बोली, ‘‘मैं विक्टर ब्रूगांजा की गधी हूं, जो जोजफ डिसूजा का ‘बॉस’ है और दस भट्ठियों का मालिक है. गोरेगांव से दूर-दूर तक उसका ठर्रा बिकता है. और मैं तुम्हारी तरह घास नहीं लादती हूं. शराब के केवल चार पीपे गोरेगांव से लादकर यहां जोगेश्वरी जोजफ डिसूजा के झोंपड़े तक पहुंचा देती हूं. फिर शाम को खाली पीपे वापस लेकर जाती हूं. तुम्हारी तरह दिन-भर

गधों की तरह मेहनत नहीं करती हूं.’’

‘‘क्या बात है बेटी?’’ अचानक पास ही से एक आवाज आई, और मैंने देखा कि पकी आयु की उजली किस्म की एक

गधी उस जवान गधी के निकट आ गई है.

‘‘कुछ नहीं अम्मा!’’ जवान गधी ने कहा, ‘‘यह गधा मुझसे प्रेम करने चला है. जरा सुनो तो इसकी बात.’’

पकी आयु की गधी ने मुझे सिर से पांव तक देखा और बोली, ‘‘तुम कौन हो?’’

मैंने बताया.

सुनकर बोली, ‘‘तुम्हारा-हमारा क्या मेल! तुम हिंदू हो, हम ईसाई....कहां के रहने वाले हो?’’

‘‘यू.पी. का.’’

‘‘लो, तुम यू.पी. के, हम महाराष्ट्र के, तुम्हारा-हमारा क्या जोड़?...कौन जाति हो?’’

‘‘गधों की भी जाति होती है?’’ मैंने पूछा.

‘‘वाह! क्यों नहीं होती? जो मालिक की जाति होती है वहीं उसके गुलाम की जाति होती है, वही उसका धर्म होता है. हम जानवर लोग तो अपने मालिक के रुतबे से पहचाने जाते हैं. हम वही सोचते और करते हैं जो इंसान करता है.’’

‘‘हालांकि मैंने जो अक्सर इंसानों को जानवरों की तरह सोचते और करते देखा है, बड़ी बी?’’ मैंने नम्रता से कहा.

बड़ी बी को मेरी बात पसंद आई. बोली, ‘‘तुम समझदार मालूम होते हो. अच्छा, यह बताओ कि अगर मैं अपनी बच्ची की शादी तुमसे करने पर तैयार हो जाऊं तो तुम मेरी बच्ची को कहां रखोगे और क्या खिलाओगे?’’

‘‘रखने का कोई विशेष स्थान तो नहीं है, घीसू घसियारे के यहां. वह मुझे रात को घर के बाहर जामुन के पेड़ से बांध देता है. बल्कि प्रायः खुला ही छोड़ देता है ताकि मैं इधर-उधर घास चरकर अपना पेट भर लूं.’’

‘‘तो वह तुम्हें घास नहीं डालता क्या?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘तो इसका मतलब है कि अगर मेरी बच्ची की तुम्हारे साथ शादी हो जाए तो उसे भी घास नहीं मिलेगी?’’

‘‘प्रेम में घास क्या करेगी? इकबाल ने कहा-‘बेखबर कूद पड़ा अतिशे-नमरूद में इश्क.’ बड़ी बी, इश्क तो इश्क है और घास घास है. मुझे देखो, इश्क भी करता हूं और घास भी खाता हूं. और कभी-कभी जब घास भी नहीं मिलती तो केवल इश्क खाता हूं कव्वाली गाता हूं-‘यह इश्क-इश्क है इश्क-इश्क.’ बड़ी बी, तुम मेरी मानो, अपनी बेटी को मेरे हवाले कर दो. घास का क्या है? यह दुनिया बहुत बड़ी है. कहीं न कहीं घास मिल ही जाएगी.’’

‘‘जी नहीं,’’ बड़ी बी बड़ी कठोरता से बोली, ‘‘मैं अपनी मासूम बच्ची की तुमसे हर्गिज-हर्गिज शादी नहीं करूंगी. जबकि न बाप का पता न मां का. न धर्म ठीक, न जाति दुरुस्त. जिसका कोई ठौर-ठिकाना नहीं, रहने के लिए कोई स्थान नहीं, खाने के लिए घास नहीं, ऊपर से पढ़े-लिखे आदमियों की तरह बात करते हो.’’

मैंने गर्वपूर्ण शब्दों में कहा, ‘‘हां, मैं अखबार पढ़ सकता हूं पर इसमें क्या बुराई है?’’

‘‘यह तो बहुत बुरी बात है,’’ बड़ी बी जलकर बोली, ‘‘आजकल हिन्दुस्तान में जितने पढ़े-लिखे गधे हैं, सब क्लर्की करते हैं या फाका करते हैं. तुम्हीं बताओ, तुमने आज तक किसी पढ़े-लिखे ठीक आदमी को लखपती होते देखा है? न भैया, मैं तो अपनी बेटी की किसी लखपती से शादी करूंगी. चाहे वह बिल्कुल अनपढ़, घामड़ गधा ही क्यों न हो.’’

मुझे उस गधी की मूर्खतापूर्ण बातों पर बड़ा क्रोध आया. किंतु चूंकि मामला इश्क का था, इसलिए मैं जहर का घूंट पीते हुए उसे फिर से समझाने की कोशिश करने लगा-

‘‘देखो अम्मा, आजकल नया जमाना है. इस जमाने में

धर्म, जाति-पाति को कोई नहीं पूछता. हम सब हिन्दुस्तानी हैं, हम सब गधे हैं-बस, इतना ही सोच लेना काफी है. यह प्रश्न राष्ट्रीय एकता का है.’’

‘‘अमीर और गरीब में राष्ट्रीय एकता कैसी? तुम्हारी समस्याएं अलग, हमारी समस्याएं अलग. हमारे स्वार्थ अलग, तुम्हारे स्वार्थ अलग. हमारा जीवन-स्तर अलग, तुम्हारा जीवन-स्तर अलग. और फिर हम तो हिन्दुस्तानी भी नहीं. हमारी तो नस्ल भी तुमसे अलग है. मेरी बच्ची के दादा, खुदा उन्हें करवट-करवट जन्नत बख्शे, विशुद्ध अंग्रेजी गधे थे और मेरी मां फ्रांसीसी नस्ल की थी और तुम बड़े बेसुरे, बेकार, काले हिन्दुस्तानी गधे हो और चले हो मेरी बेटी से इश्क जताने! खबरदार, जो मेरी बेटी की तरफ आंख उठाकर भी देखा! दोनों आंखें फोड़ डालूंगी!’’

यह कहकर बड़ी बी ने मेरी तरफ पीठ करके इतने जोर की दुलत्ती झाड़ी कि मैं घबराकर वहां से भाग खड़ा हुआ और डिसूजा की झोंपड़ी के सामने आकर दम लिया और उस दिन से संकल्प किया कि अब कभी प्रेम नहीं करूंगा, क्योंकि प्रेम करने के लिए केवल इतना ही पर्याप्त नहीं है कि आदमी कवि-स्वभाव रखता हो; प्रेम करने के लिए यह भी बहुत आवश्यक है कि आदमी को दो वक्त की घास भी प्राप्य हो, वरना कोई औरत घास नहीं डालेगी.

इसलिए मैंने उस परियों-सी सुंदर गधी से प्रेम करने का विचार त्याग दिया और अपने जीवन को केवल घास लादने पर लगा दिया, जोकि हर गधे का भाग्य है.

खुल जाना आरे कालोनी का बंबई में और भूखे मरना जोगेश्वरी के ग्वालों का. घीसू घसियारे का बेच देना अपने गधे को. और बयान नई मुसीबतों का.....

दिन बड़े आराम से गुजर रहे थे. घास लादना, घास खाना और खूंटे पर जाकर सो जाना. जिंदगी इससे सादा और क्या हो सकती है और इसी दुनिया में अधिकांश लोग इससे अधिक चाहते भी क्या हैं. इस निर्दयी आसमान की चाल को क्या कहिए कि मेरी कुछ दिनों की यह शांति भी उसे सहन न हुई. पहली मुसीबत यह आई कि गवर्नमेंट ने जनता के लिए बंबई में खालिस दूध सप्लाई करने के लिए एक बहुत बड़ी डेयरी ‘आरे कालोनी, के नाम से चालू कर दी. समस्त आपत्तियां इसी प्रकार नेक इरादों से आरंभ होती हैं. अब भला बंबई में खालिस दूध की किसे आवश्यकता थी. बंबई के वीर निवासियों ने स्वतंत्रता-संग्राम का सारा युद्ध ईरानियों की चाय और ग्वालों का आधा दूध और आधा पानी पीकर लड़ा, जीता और जिंदा रहे. उनके लिए खालिस दूध प्राप्य करने का अर्थ इसके अतिरिक्त और क्या हो सकता था कि उन्हें व्यर्थ में ही निरंतर संघर्ष और लड़ाई के लिए उकसाया जाए. अतएव जिस दिन से बंबई में आरे कालोनी की नींव पड़ी, उसी दिन से संयुक्त महाराष्ट्र का किस्सा भी शुरू हो गया. आखिर आम लोगों को खालिस दूध पिलाकर वे और क्या आशा कर सकते हैं.

यह ईरानियों की चाय ही थी जो महाराष्ट्र और गुजरात में तालमेल पैदा किए हुए थी, वरना दूध तो सदा विभाजित करता है. पहले तो पंजाब को ही ले लीजिए. दूध पीने के अभ्यस्थ थे, इसलिए विभाजन हो गया. अपराध दूध का था और अपराधी ठहराया जाता है बेचारे अंग्रेजों को. हालांकि साहब, दूध में ऐसी शक्ति है कि यदि आप कुछ न करें, उसे कुछ घंटों के लिए किसी बर्तन में अकेला छोड़ दें तो स्वयं ही विभाजित हो जाएगा. दूध का दूध अलग, पानी का पानी अलग. मानव के इतिहास में इस प्रकार की छोटी-छोटी बातों में बड़ी दूर के परिणाम निकले हैं. उदाहरण के लिए-सोचिए कि यदि मुहम्मद बिन कासिम ने हिन्दुस्तान के बजाय चीन पर हमला किया होता तो आज पाकिस्तान चीन में होता. यदि नेपोलियन पानीपत में पैदा हुआ होता तो वाटरलू की लड़ाई में अंग्रेजों की विजय न होती. यदि कोलंबस की नाव समुद्र में डूब जाती तो अमरीका का कभी पता न चलता और बेचारा कोलंबस अपने मुंह से गालिब का यह मिसरा दोहराता, ‘डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता.’

इसी कारण मैं भी कहता हूं कि यदि आरे कालोनी न बनती तो महाराष्ट्र का पृथक् प्राप्त भी न बनता. यह केवल दूध का अपराध है, दूध जो विभाजित करता है.

बंबई के शरीफ लोग लगभग एक सौ वर्षों से ईरानियों की फीकी-सीठी चाय पीते चले आ रहे थे. अब उन्हें जो खालिस

दूध पीने को मिला तो उनका हाजमा बिगड़ गया. और जब जनता का हाजमा बिगड़ता है तो वह तरह-तरह की मांगें करने लगती हैं. ‘‘हमें महाराष्ट्र चाहिए. हमें काम चाहिए. हमें रोटी चाहिए और हर चीज उतनी ही सस्ती और बढ़िया चाहिए जितना कि आरे कालोनी का दूध है.’’

इसीलिए पुराने जमाने में जो लोग राज्य चलाते थे, वे जनता की किसी आवश्यकता को कभी पूरा नहीं करते थे. इससे जनता का हाजमा हमेशा ठीक रहता था. किंतु अब वह इतना बिगड़ चुका है कि किसी प्रलोभनपूर्ण वादे के चूर्ण से ठीक नहीं हो सकता.

आरे कालोनी के बन जाने से जहां एक तरफ लोगों का हाजमा बिगड़ा, वहां दूसरी तरफ निजी तौर पर दूध बेचने वाले ग्वालों की ‘गाहकी’ भी कम हो गई और सैकड़ों ग्वाले बेकार हो गए. उन्होंने अपना हर संभव प्रयत्न ‘गाहकी’ को कायम रखने के लिए कर डाला. कभी दूध का भाव कम किया और पानी अधिक मिलाया, कभी घास का भाव कम किया और घसियारे का जो दबाया. कभी पानी की मात्रा कम की और हानि अधिक उठाई. किंतु आरे कालोनी के सामने उनकी एक न चली. आरे कालोनी का दूध अधिक सर्वप्रिय होता गया और प्राइवेट व्यापार करने वाले ग्वाले अपने ऊंचे लाभ से हाथ धोने लगे. यदि वे बिल्कुल खालिस दूध बेचते और आरे-कालोनी से जरा कम दाम पर बेचते तो अब भी वे थोड़ा-सा लाभ कमा सकते थे. किंतु यह तो व्यापार के विरुद्ध है और हमारी जीवन-व्यवस्था में उस समय तक व्यापार नहीं हो सकता जब तक किसी एक चीज में किसी दूसरी चीज की मिलावट न की जाए. उदाहरणार्थ-दूध में पानी, साहित्य में उरयानी (नग्नता), आटे में बुरादा, घृणा में धर्म का लबादा, घी में तेल, शासन में रिश्वत का मेल; यह तो व्यापार का प्रथम नियम है.

जब ग्वालों का दूध बिकना बंद हो गया तो घीसू घसियारे की घास बिकनी बंद हो गई, और घर में घीसू घसियारे और बीबी-बच्चे के फाके लगने शुरू हो गए. स्थिति इस सीमा तक नाजुक हो गई कि एक दिन जोसफ डिसूजा की झोंपड़ी में घीसू घसियारे ने मुझे बेचने की सोच ली. यह तरकीब उसे रमजानी कसाई ने बताई थी.

कहने लगा, ‘‘अगर तुम इस गधे को मेरे हाथ बेच दो तो मैं तुम्हें इसके पच्चीस रुपये दे दूंगा.’’

जोजफ बोला, ‘‘हां, ठीक तो कहता है रमजानी. आजकल तुम्हारी घास कहीं नहीं बिक रही है. इसलिए तुम इस गधे को रखकर क्या करोगे? फिर सात रुपये मेरे बाकी हैं तुम पर. वे भी इसी रकम में कट जाएंगे.’’

मैं दरवाजे के निकट सरक आया और अत्यंत मौन होकर उनकी बातें सुनने लगा.

घीसू बोला, ‘‘इस बेचारे गधे का कोई खर्च तो है नहीं मुझ पर. खुद ही दिन में इधर-उधर से घास चरकर मेरे घर के बाहर आके पड़ा रहता है. दिन-भर मेरे बच्चे इसकी सवारी करते हैं. और एक-आध घास का गट्ठा बिक ही जाता है.’’

रमजानी बोला, ‘‘यह एक-आध गट्ठा तुम खुद अपने सिर पर लाकर बेच सकते हो. तुम खुद सोच लो. पूरे पच्चीस रुपये दूंगा. और वह भी दोस्ती में दे रहा हूं, वर्ना यह गधा तो पन्द्रह रुपये में भी महंगा है.’’

घीसू बोला, ‘‘तुम इस गधे को लेकर क्या करोगे?’’

रमजानी एक आह भरकर बोला, ‘‘इस दुनिया में जीना बहुत मुश्किल हो चला है. आजकल भेड़-बकरियां ऐसी दुबली-पतली आ रही हैं कि एक के अंदर से तीन सेर गोश्त भी मुश्किल से निकलता है. अब यह तुम्हारा गधा खासा हट्ठा-कट्ठा और मोटा-ताजा हो रहा है. इसका गोश्त बहुत ही बढ़िया निकलेगा.’’

‘‘तो तुम गधे का गोश्त बेचोगे!’’ घीसू ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘हां, बकरी के गोश्त में मिलाकर बेचूंगा.’’ रजमानी बोला.

‘‘बकरी के गोश्त में मिलाकर बेचोगे!’’ घीसू हैरत से चिल्लाया.

‘‘इसमें हैरत की क्या बात है?’’ रमजानी ने जरा गुस्से से कहा, ‘‘तुम्हारे ग्वाले क्या दूध में पानी मिलाकर नहीं बेचते?’’

घीसू ने फिर आंखें फाड़कर कहा, ‘‘मगर गधे का गोश्त लोगों को पता नहीं चलेगा?’’

‘‘यह तो अपने-अपने पेशे के गुर की बात है,’’ रमजानी बोला, ‘‘मैंने ऐसे-ऐसे उस्ताद देखे हैं जो बकरी के गोश्त में कुत्ते का गोश्त मिलाकर बेच देते हैं. मैं तो केवल गधे का गोश्त बेचूंगा. और फिर कीमे में तो कुछ पता ही नहीं चलता है.’’

मेरी टांगें भय से सुन्न हो गई थीं. ऐसा मालूम होता था जैसे किसी ने मेरी हर टांग के साथ चार-चार मन के पत्थर बांध दिए हैं. मैं छप्पर की दीवार के साथ दरवाजे के पीछे लगा यह बातचीत सुन रहा था, जिसमें मेरे जीवन और मृत्यु का निर्णय हो रहा था. मैं यह सुनना चाहता था कि आखिर घीसू क्या कहता है. एक बेजुबान जानवर ने इतने महीने उसके लिए प्राणप्रण से मेहनत की थी और बदले में घास का एक तिनका न लिया था. क्या इस इंसान के सीने में कृतज्ञता का एक रत्तीभर भाव न होगा?

घीसू ने कहा, ‘‘यह गधा मुझसे और मेरे बच्चों से बहुत हिल गया है. उसकी जान लेने को मेरा जी नहीं चाहता. थोड़ी-सी और दो यार.’’

‘‘लो पियो,’’ रमजानी ने उसका गिलास भरते हुए कहा, ‘‘पर तुम उसकी जान कहां ले रहे हो? जान लेने वाला या रखने वाला वह ऊपर है’’ रमजानी ने खरपैल की छत की तरफ एक उंगली उठाकर कहा, ‘‘तुम तो गधे को खाली मेरे हाथ बेच रहे

हो.’’

करनैलसिंह ड्राइवर ने बात पलटकर कहा, ‘‘अबे, कल तू कहां गया था रमजानी? यहां नहीं आया.’’

‘‘भैया, मैं शकीलाबानो गढ़वाली की कव्वाली सुनने गया था. जालिम क्या गाती है!-अर्जे-नियाजे इश्क के काबिल नहीं रहा, जिस दिल पे हमको नाज था वो दिल नहीं रहा.’’

रमजानी पहले गुनगुनाता रहा. फिर जोर-जोर से गाने लगा. घीसू जोर-जोर से सिर हिलाने लगा और करनैलसिंह टीन का एक खाली डिब्बा बजाने लगा. मैंने इन्मीनान का सांस लिया. चलो, जिंदगी बच गई. आई हुई मौत टल गई. घीसू घसियारा नशे में बोला, ‘पच्चीस क्या, अगर कोई पच्चीस हजार भी दे तो भी अपना गधा न बेचूं.’’

‘‘यार; कौन तेरे गधे की बात करता है,’’ जोजफ जरा

क्रोध से बोला, ‘‘रमजानी का गाना तो सुनने दे.’’

मगर घीसू घसियारे को चिढ़ हो गई थी. वह जोर-जोर से अपना हाथ हिलाते हुए बोला, ‘‘कोई पच्चीस लाख भी दे तो भी मैं अपना गधा न दूं. इस गधे ने मेरी इतनी सेना की है, मेरी और मेरे बच्चों की, कि मैं इसे जिंदगी-भर अपने पास रखूंगा. कोई पच्चीस करोड़ भी दे तो यह गधा न दूंगा. घीसू घसियारे ने आज तक किसी की जान नहीं ली. यह हमारे धरम-सास्तर के खिलाफ है.’’

‘‘ले आया फिर बीच में अपना धर्म,’’ करनैलसिंह चिढ़कर बोला, ‘‘यार जोजफ, जल्दी से इसका गिलास भर दो.’’

‘‘कहां से भर दूं.’’ जोजफ क्रोध से बोला, ‘‘सात रुपये की पहले ही पी चुका है. कहां तक उधार दूंगा?’’

‘‘भर दो, भर दो,’’ घीसू जोर से चिल्लाया ‘‘वह भगवान् देने वाला है. कहीं न कहीं से तुम्हारा कर्ज भी उतार देगा.’’

‘‘जब उतार देगा तब और पी लेना,’’ जोजफ बोला, ‘‘अब मैं एक बूंद न दूंगा.’’

घीसू ने अपने खाली गिलास की तरफ देखकर रमजानी से कहा, ‘‘मेरा गिलास खाली है.’’

‘‘और खाली रहेगा,’’ जोजफ कठोरता से बोला.

‘‘एक रुपया दे,’’ घीसू ने रमजानी से कहा.

रमजानी ने जेब से पच्चीस रुपये निकालकर कहा, ‘‘एक नहीं पच्चीस देता हूं.’’

घीसू ने एक क्षण के लिए पच्चीस रुपयों की ओर देखा. एक क्षण के लिए रुका. फिर उसका हाथ हठात् पच्चीस रुपयों की ओर बढ़ गया. जल्दी से उसने रुपये जेब में डालकर कहा, ‘‘चलो,

गधा तुम्हारा हुआ. ले भैया जोजफ, अब तो शराब दे दे.’’

रमजानी मेरे गले में रस्सी डाले मुझे ले जा रहा था और लहक-लहककर गा रहा था-

अर्जे-नियाज-इश्क के काबिल नहीं रहा,

जिस दिल पे हमको नाज था वो दिन नहीं रहा.

अचानक मैंने कहा-

जाता हूं दाग-हसरते-हस्ती लिए हुए

हूं शम्मए-कुश्ता दरखुरे महफिल नहीं रहा.

एकाएक रमजानी ने चौंककर इधर-उधर देखा. मेरी तरफ देखा. फिर मुझे रस्सी से खींचते हुए आगे बढ़ गया. उसकी समझ में कुछ नहीं आया कि यह आवाज कहां से आई थी. उसके चेहरे पर मैंने भय की एक हल्की-सी झलक देखी. अब रात का झुटपुट बढ़ रहा था और अपने हृदय के भय को दूर करने के लिए रमजानी जोर-जोर से गाते हुए मुझे ले जा रहा था और दोहरा रहा था-

अर्जे-नियाज-इश्क के काबिल नहीं रहा,

जिस दिल पे हमको नाज था वो दिन नहीं रहा.

मैंने फिर कहा, जरा ऊंचे स्वर में-

मरने की ए दिल और ही तदबीर कर कि मैं,

शायाने दस्ते-बाजूए कातिल नहीं रहा.

रमजानी भय से थर-थर कांपने लगा. उसने इधर-उधर रास्ते में देखा. किंतु किसी को न पाकर रात के बढ़ते हुए अंधेरे में चिल्लाकर बोला-

‘‘कौन बोलता है?’’

मैंने कहा, ‘‘मैं हूं एक गधा.’’

‘‘तुम?’’ रमजानी की आंखें फटी की फटी रह गईं, ‘‘तुम एक गधे होकर इंसानों की बोली बोलते हो?’’

मैंने कहा, ‘‘मैंने संकल्प कर रखा था कि इंसानों की बोली कभी नहीं बोलूंगा. किंतु जब जान पर बन आती है और इंसान की कृतध्नता सामने आती है तो गालिब के साथ कहना भी पड़ता है-’’

दिल के हवाय-किस्ते-वफा मिट गई कि वां,

हासिल सिवाय हसरते-हासिल नहीं रहा.

‘‘लाहौर विला कूवत इल्ला-विल्ला.’’ रमजानी ने जोर से कहा और घबराकर उसने अपने हाथ से रस्सी छोड़ दी और फिर मेरी तरफ पीठ करके इस तेजी से भागा कि मैं उसे बुलाता ही रह गया ‘‘रमजानी भैया! ऐ रमजानी! जरा सुनो तो.’’

किंतु उसने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा और भय से पागलों की तरह से चीखता हुआ, कुछ पढ़ता हुआ, वहां से हवा हो गया.

मैं सिर झुकाकर धीरे-धीरे कदम रखता हुआ वापस चलने लगा और कुछ मिनट के बाद जोजफ के झोंपड़े के बाहर पहुंच गया. किंतु घीसू घसियारा उस समय वहां से जा चुका था और करनैलसिंह भी. इस समय अकेला जोजफ अपने झोंपड़े के बाहर लकड़ी के एक बेंच पर बैठा हुआ अंतिम जाम पी रहा था. उसने जब मुझे देखा तो लपककर आगे बढ़ा और मेरी रस्सी अपने हाथ में लेकर बोला, ‘‘रस्सी तुड़ाकर अपनी जान बचा लाए? मगर बचके कहां जाओगे मियां गधे? सुबह तुमको रमजानी के हवाले कर दूंगा.’’

यह कहकर मुझे नारियल के एक पेड़ से बांध दिया. मैंने अवसर देखकर जोजफ से कहा, ‘‘जोजफ!’’

‘‘हयं!’’ वह आश्चर्य से चीखा.

मैंने कहा, ‘‘चिल्लाने की जरूरत नहीं. तुम एक पढ़े-लिखे आदमी हो इसलिए मैं तुमसे बातचीत करता हूं और तुमसे कहता हूं कि मैं गधा ही बोल रहा हूं.’’

‘‘क्या मैं नशे में हूं?’’ जोजफ ने अपने-आपसे पूछा.

‘‘नशे में तो हो, किंतु यह बिल्कुल सच है कि इस समय तुम्हारा नशा नहीं बोल रहा, यह खाकसार बोल रहा है. बचपन में मैंने इंसानों की बोली सीखी थी.’’

यह कहकर मैंने जोजफ को अपनी थोड़ी-सी विपदा कह सुनाई. वह मेरा हाल सुनकर बोला, ‘‘गुड गॉड! बिल्कुल विश्वास नहीं आता. मगर अब तुम्हें अपने सामने बोलता सुन रहा हूं तो विश्वास करना पड़ता है कि तुम वही प्रसिद्ध गधे हो जिसने पंडित नेहरू से भेंट की थी. अब याद आया, मैंने उनके बारे में अखबारों से भी पढ़ा था. फर्माइए, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं?’’

मैंने कहा, ‘‘रमजानी के हाथों मेरी जान बचा सकते हो!’’

‘‘वह किस तरह?’’ जोजफ ने पूछा, ‘‘रमजानी ने पच्चीस रुपये में घीसू से तुम्हें खरीद लिया है.’’

‘‘पच्चीस रुपये में क्या तुम मेरी जान ले लोगे?’’

‘‘बम्बई में दादा लोग तो दस रुपये में जान लेने को तैयार रहते हैं और वह भी एक इंसान की जान. तुम तो एक गधे हो. हालांकि पढ़े-लिखे हो. पर इससे क्या होता है! विश्वयुद्ध में मैं एक सिपाही था. मैंने स्वयं अपनी आंखों देखा कि लाखों इंसानों को कुछ रुपयों की खातिर खून और आग की भट्ठी में झोंक दिया गया था. तुम तो महज एक गधे हो.’’

‘‘वे भी गधे थे,’’ मैंने अत्यंत कड़वे स्वर में कहा, ‘‘यदि हिसाब लगाओ तो युद्ध के मोर्चे पर इंसानों की जिंदगी भेड़-बकरियों से भी सस्ती बिकी है. हिरोशिमा के एक बम्ब ने कितनी लाख जानें ले ली हैं. जरा हिसाब लगाओ, पच्चीस रुपये प्रत्येक आदमी भी नहीं पड़े होंगे.’’

जोजफ बोला, ‘‘इस हिसाब से तो तुम्हें खुश होना चाहिए कि एक गधे की जिंदगी की कीमत एक इंसान की जिंदगी से ज्यादा पड़ रही है.’’

मैंने उसकी बात अनसुनी करके कहा, ‘‘उन लोगों ने बेकार में लाखों इंसानों को मशीनगनों से भून दिया. यदि वे उनका गोश्त बकरी के गोश्त में मिला के बेचते तो उन्हें अधिक लाभ होता. और लाभ ही तो वे चाहते हैं?’’

‘‘तुम कैसी भयानक बातें करते हो!’’ जोजफ चिल्लाया.

‘‘इतनी भयानक नहीं जितनी कि जिंदगी है, जिसमें पच्चीस रुपये के लिए एक के गले की रस्सी दूसरे के हाथों में थमा दी जाती है.’’

‘‘तुम क्या चाहते हो!’’

‘‘मैं जीवित रहना चाहता हूं,’’ मैंने रुंधे हुए स्वर में कहा, ‘‘मेरी तरह के करोड़ों लोग इस दुनिया में मौजूद हैं जो अत्यंत भोले और कायर और निरे गधे हैं किंतु हम सब जीवित रहने का अधिकार मांगते हैं. हममें से कोई अपने गले में रस्सी नहीं

चाहता.’’

‘‘खुदा के फौजदार न बनो,’’ जोजफ बोला, ‘‘सिर्फ अपनी बात करो.’’

‘‘मैं चाहता हूं कि तुम मुझे रमजानी से खरीद लो.’’

‘‘वाह! एक गधे की जान बचाने के लिए रमजानी को पच्चीस रुपये दे दूं-ऐसा गधा नहीं हूं मैं.’’ जोजफ बिगड़कर बोला.

‘‘तुम मेरी बात पूरी सुन लेते, फिर कुछ कहते,’’ मैंने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘इसमें तुम्हारा ही लाभ है. यदि तुम मुझे रमजानी से खरीद लोगे तो मैं तुम्हारा ठर्रा बिना तलाशी के माहिम क्रीक पुलिस चौकी के पार पहुंचा दिया करूंगा. अब तक तुम इस काम के लिए इंसानों से काम लेते रहे जो कभी न कभी पुलिस के हाथों पकड़े जाते हैं. उन्हें सजा हो जाती है और तुम्हारी शराब पकड़ी जाती है. किंतु यदि तुम इस काम के लिए मुझे नौकर रख लोगे तो मैं तुमसे वायदा करता हूं कि पुलिस एक बार भी मुझे न पकड़ सकेगी.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘बहुत आसान काम है. किंतु इसके लिए तुम्हें अपना एक अड्डा बांद्रा में और माहिम क्रीक के बाहर माहिम के इलाके में कायम करना पड़ेगा.’’

जोजफ बोला, ‘‘तुम इसकी चिंता मत करो. वहां पहले से कई अड्डे मौजूद हैं हमारे.’’

मैंने कहा, ‘‘तो फिर तो इस प्रस्ताव पर कार्य करना अत्यंत सुगम है और मुझे आश्चर्य है कि आज तक किसी स्मगलर को ऐसी बढ़िया तजबीज क्यों न सूझी!’’

जोजफ ने बेचैनी से कहा, ‘‘अब तुम बातें न करो. जल्दी से अपना प्रस्ताव समझाओ.’’

‘‘प्रस्ताव बहुत आसान है. तुम केवल इतना करो कि सुबह-सुबह मुझे जोगेश्वरी से बांद्रा के अड्डे तक ले जाओ.’’

‘‘अच्छा.’’

‘‘फिर वहां सुबह-सबेरे निहार-मुंह मेरे खाली मेदे को शराब से भर दो गले तक. मेरे मेदे आतों में कई गैलन शराब समा सकती है. इसलिए जब हलक तक शराब भर जाए तो मुझे माहिम क्रीक तक ले जाकर छोड़ दो. वहां से मैं स्वयं धीरे-धीरे एक आवारा अनाथ गधे की तरह चलता हुआ पांच मिनट में पुलिस चौकी पार कर जाऊंगा. पुलिस को एक क्षण के लिए भी संदेह न होगा कि इस गधे के पेट में इतने गैलन शराब भरी हुई है. वे तो केवल इंसान और उसके कपड़ों की तलाशी लेते हैं. किंतु एक नंगे गधे पर, जिस पर कपड़े का एक चीथड़ा तक नहीं है, उन्हें कैसे शक होगा? अतः मैं प्रत्येक दिन पुलिस चौकी से बिना किसी भय के सुरक्षित गुजर जाया करूंगा.’’

‘‘फिर?’’

‘‘फिर माहिम के अड्डे पर पहुंचकर तुम मेरे गले में रबर की नली डालकर पम्प के द्वारा शराब निकाल लिया करना और अपने ग्राहकों में बांट दिया करना.’’

‘‘क्या मेरे ग्राहक गधे के पेट से निकली शराब पीना पसंद करेंगे?’’

मैंने कहा, ‘‘मूर्ख हुए हो. जो लोग गंदी मोरियों में दवाई हुई बोतलों और गंदे-सड़े पीपों की शराब पीते हैं, जो लोग साइकिल की नली और पुरानी ट्यूबों में ले जाई गई शराब डकार जाते हैं, उन्हें एक गधे की आंतों से निकली शराब पीने में क्या एतराज होगा! सुबह-सबेरे मेरा भूखा खाली मेदा बहरहाल गली-सड़ी ट्यूबों से तो अधिक साफ-सुथरा होगा.’’

‘‘और तुम्हें नशा नहीं होगा क्या?’’

‘‘पांच मिनट में नशा क्या होगा. माहिम क्रीक पार करने में पांच मिनट से अधिक न लगेंगे. यूं सोचो कि मेरा पेट एक पेट्रोल ले जाने वाली लारी का बड़ा ड्रम है. बांद्रा रिस्क फिलिंग स्टेशन है. बांद्रा पर तुम इस ड्रम को भर देते हो, माहिम पर खाली करा लेते हो. बहुत बढ़िया, आसान, सस्ता, लाभदायक सुरक्षित और साइण्टिफिक सुझाव है.’’

‘‘गॉड ब्लेस यू.’’ जोजफ ने एक मिनट सोचने के बाद कहा. फिर उसने प्रसन्नता से दोनों बांहें गले में डाल दीं. ‘‘क्या तरकीब बताई है तुमने! एक स्मगलर गधा!...पुलिस कयामत तक शक नहीं कर सकती!...होली क्राइस्ट!...मैं तो एक ही साल में लखपती हो सकता हूं.’’

प्रसन्नता के आधिक्य से जोजफ मेरा मुंह चूमने लगा. ‘‘अब तो मैं जरूर लखपती बन जाऊंगा. अब तो मैं पच्चीस क्या, सौ रुपये देकर रमजानी से तुम्हें खरीद लूंगा.’’

वह इसलिए कि पहले मैं महज एक गधा था और अब मैं एक लाभदायक सुझाव हूं. और जब इंसान को लाभ दिखाई देने लगे तो वह एक गधे का मुंह भी चूम सकता है.

‘‘अंदर आ जाओ,’’ जोजफ ने मेरी रस्सी खींचते हुए कहा, ‘‘मैं तुम्हें बाहर नारियल के पेड़ के नीचे बांधने का खतरा मोल नहीं ले सकता. संभव है तुम्हें सर्दी लग जाए. तुम्हारे बदन पर तो एक कपड़ा तक नहीं है.’’

मैंने कहा, ‘‘दुनिया में करोड़ों बेघर गधे नंगे या अधनंगे खुले आसमान-तले सोते हैं.’’

‘‘अजी गोली मारो उन गधों को! मैं तो आज तुम्हें अपने छप्पर के अंदर सुलाऊंगा.’’

‘‘किंतु छप्पर के अंदर तो बड़ी गर्मी होगी.’’ मैंने इठलाते हुए कहा.

‘‘मैं आपके लिए छत का पंखा खोल दूंगा, डंकी सर!’’ जोजफ ने मुझसे बड़े गिड़गिड़ाते हुए कहा और फिर बड़े प्यार से मेरी गर्दन सहलाता हुआ वह मुझे छप्पर के अंदर ले गया.

क्रमशः

अगले अंक में.....

शुरू होना स्मगलिंग के धंधे का, और पार कर जाना गधे का माहिम क्रीक को आसानी से, और पड़ जाना हाथों से सेठ भूरीलाल के, और बयान माहिम के सह्वेबाजों का....

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