रचनाकार में खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

प्राची अप्रैल 2016 : हमारी विरासत / तीन कहानियाँ / महावीर प्रसाद द्विवेदी

SHARE:

हमारी विरासत जन्मः 15 मई, 1864, दौलतपुर, रायबरेली (उ.प्र.) मृत्युः 21 दिसम्बर, 1938 कृतित्वः द्विवेदीजी ऐसे साहित्यकार थे, जो बहुभाषावि...

हमारी विरासत

जन्मः 15 मई, 1864, दौलतपुर, रायबरेली (उ.प्र.)

मृत्युः 21 दिसम्बर, 1938

कृतित्वः द्विवेदीजी ऐसे साहित्यकार थे, जो बहुभाषाविद् होने के साथ ही साहित्य के इतर विषयों में भी समान रुचि रखते थे. उन्होंने सरस्वती पत्रिका का अठारह वर्षों तक संपादन कर हिन्दी पत्रकारिता में एक कीर्तिमान स्थापित किया था. आधुनिक हिन्दी कहानी उन्हीं के प्रयासों से एक साहित्यिक विधा के रूप में मान्यता प्राप्त कर सकी थी. वे भाषाशास्त्री, अनुवादक, रचनाकार, वैयाकरण, इतिहासज्ञ, अर्थशास्त्री होने के साथ-साथ विज्ञान में भी गहरी रुचि रखनेवाले थे. यहां हम उनकी तीन कहानियां दे रहे हैं. संपादक

तीन कहानियां

image

महावीरप्रसाद द्विवेदी

 

राजकुमारी हिमांगिनी

र्वत के सबसे ऊंचे शिखर पर राजकुमारी हिमांगिनी ने अपना घर बनाया. संसार के साधारण जीवों के पास रहना, या उनके साथ हंसना-खेलना उसे जरा भी पसंद न आया. ‘‘सुंदरता और गोरेपन में मैं अपना सानी नहीं रखती; फिर में राजकुमारिका हूं. तब भला क्यों मैं मामूली लोगों के पास बैठना पसंद करूं? संसारी जीवों की संगति मुझे जरूर अपवित्र कर डालेगी.’’ इस तरह अपने मन में सोच-विचारकर वह पहाड़ों की तरफ चली. वहां सबसे ऊंचे पहाड़ की चोटी पर वह जा बैठी. वहां रहते उसे कई युग बीत गए. अपनी चमक-दमक और रूप-रंग के गर्व से फूली नहीं समाई.

चिरकाल तक वह वहीं सर्वांग शीतल अवयवों और सुंदरता के मद से मतवाली रही.उसका समय का रूप सफेद कमल के समान सुंदर वस्त्र धारण किए हुए नई वधू के रूप को भी मात करता था. पर वहां एकांत में अकेली रहते-रहते वह ऊब उठी. धीरे-धीरे उसे दूसरे की संगति की चाहत हुई. कुछ दिनों में, क्रम-क्रम से, उसकी उत्सुकता बढ़ गई. उसने विवाह करना चाहा. पर उसके पाणिग्रहण का सौभाग्य प्राप्त हो किसे? उसे खुद ही न मालूम था कि कौन ऐसा भाग्यवान् युवक है जिसे उसका यौवन-रत्न प्राप्त हो सकेगा. मारूत महाराज, पवन देव, झकोर सिंह इत्यादि राजों और राजकुमारों ने उसके साथ अनेक प्रेमलाप किए; हर प्रयत्न से उसका चित्त अपनी ओर आकर्षित करना चाहा, पर सब व्यर्थ हुआ. उनमें से एक को उसने पसंद न किया. उसकी समझ में उन सबका प्रेम दो ही चार दिनों का था. ऐसे कच्चे प्रेमियों को कौन कुमारिका अपना सर्वस्व दे डालने का साहस करेगी?

जलदेन्द्र बहादुर सिंह तक हिमांगिनी के प्रेम के भिखारी हुए. उन्होंने उसके पास कई दूतियां भी भेजीं. उन्होंने उसकी विरह-कथा की कहानियां, खूब नमक-मिर्च लगाकर, कही. वे अपने साथ पहनने-ओढ़ने की कुछ चीजें भी उपहार के तौर पर लाईं. उनको हिमांगिनी अब तक धारण किए हुए हैं. पर जलदेन्द्र भी उसे पसंद न आए. पुरुषत्व के गुणों की उनमें जरा कमी नजर आई. पुरुष वह है जिसमें शक्ति भी हो, कठोरता भी हो, धैर्य भी हो और समय पर दुःख, क्लेश या दूसरों की दो-चार बातें सहने का भी सामर्थ्य हो. इन सब गुणों के न होने से हिमांगिनी ने उसकी भी प्रार्थना स्वीकार न की. क्या करे? बेचारी चुपचाप अपने घर बैठी रही. उसका भव्य वेश, उसका रूप-लावण्य और उसका गर्वव्यंजक चेहरा देखने लायक था. पर यौवन की ऊष्मा उसमें न थी; उसका बदन ठंडी बर्फ के समान ठंडा था. इसी से उसे देखकर तबीयत खुश नहीं होती थी; जान पड़ता था कि उसका शरीर निर्जीव है.

यथासमय वसंत ऋतु आई. बादल जहां के तहां उड़ गए. आसपास साफ हो गया. इतने में अनायास एक बड़ा ही सुरूपवान् और गौरवर्ण युवा पहाड़ की चोटी पर दिखाई दिया. अहा, उसकी मुसकान जादू से भरी हुई थी. उसे देखते हिमांगिनी का दिल हाथ से जाता रहा. जानते हो वह कौन था? उस नवयुवक का नाम था भुवन भास्कर सिंह. राजकुमारी हिमांगिनी ने अभी अच्छी तरह उसे देखा भी न था कि वह उसके हाथ बिक-सी गई. अपना शरीर, उसका मन, अपना प्राण, अपना सर्वस्व, सभी उसने उसे दे डाला. प्रेमोन्माद की गर्मी से व्याकुल होकर वह सहसा पीली पड़ गई. ऐसा पीलापन उसमें पहले कभी नहीं देखा गया था. पाण्डु और कमला रोग का रोगी भी इतना पीला नहीं पड़ जाता. उसका पत्थर के समान सख्त कलेजा भीतर-ही-भीतर पिघल उठा. उसकी आंखों से आंसू की झड़ी लग गई. उसकी अजब हालत हो गई. एक प्रकार के आतंक, भय और घबराहट ने उसको घेर लिया. वह कांपने-सी लगी. उसके सजीव होने और चलने-फिरने की शक्ति रखने का यह पहला चिह्न था.

हिमांगिनी ने अपने पीले और मुरझाए हुए चेहरे को ऊपर उठाया और कांपते हुए होंठों के बीच से निकलनेवाली लड़खड़ाती हुई आवाज से उस नवयुवक से उसने वार्तालाप आरंभ किया. प्रेम-विह्वल होने पर बलवान् पुरुषों की भी अक्ल ठिकाने नहीं रहती. फिर अबला स्त्रियों की क्या कथा? इस अवसर पर संकोच और सलज्जता ने हिमांगिनी को प्रगल्भता के भरोसे अपने घर का रास्ता लिया. तब प्रगल्भता के समझाने-बुझाने पर उसे बोलने का साहस हो आया. उसने मुसकुराते हुए भुवन भास्कर से इस प्रकार प्रार्थना की-

‘‘हे मनोहरी युवक, तुम चाहे जो हो; तुमने मेरे धैर्य का सर्वथा नाश कर दिया. मुझे यहां रहते अनेक युग हो गए. अब तक मैं यहीं एकांत में चुपचाप अपनी आयु क्षीण करती रही. मैं आज तक यह न जान सकी कि किस तरह अपनी उम्र आराम से काटूं. आज तुम्हारे सुंदर मुख-कमल की ओर एक ही बार निहारने से मैंने यह चीज पा ली जिसकी खोज मुझे हजारों वर्ष से थी. मैं आपकी हो चुकी. मैंने इसी क्षण से अपना हृदय आपको दे डाला. मैं अपना सर्वस्व आपको अर्पण कर चुकी. मुझ पर अब आप दया करें. मेरी तरफ सकरुण दृष्टि से देखिए. मैं एक अनाथ, निराश्रय, निराश चिर-कुमारिका हूं. मेरा जीवन आज तक बिलकुल ही नीरस, निष्फल और कड़वा रहा. अब आप उसे सरस, सफल और मधुर कर देने की कृपा कीजिए.’’

यह सुनकर भुवन भास्कर ने शिष्टता और प्रेमपूर्ण कोमल वचनों से इस प्रकार उत्तर दिया-

‘‘स्वच्छ, निष्कलंक और सुंदर कुमारिके. तुम्हारी कांति, तुम्हारे रूप-रंग और तुम्हारे टटकेपन ने मुझे प्रसन्न किया; तुम्हारे एकांतवास ने मुझे खिन्न किया; पर तुम्हारे ठंडे और कठोर स्वभाव ने मुझे मार ही डाला. आज तक तुमने अपना जीवन उदासीनता और एकांतवास में बुरी तरह काटा. प्रेम और जीवन के तत्त्व पर तुमने जरा भी विचार नहीं किया. उदासीनता और एकांतवास को तुमने इसलिए स्वीकार किया कि प्रेम से तुम पीड़ित आ गई थी; या जीवन से तुम निराश हो गई थी. घमंड में आकर तुमने एकांतवास पसंद किया. दुनिया की नाट्यशाला में होनेवाले हजारों तरह के प्रेम-पूर्ण अभिनयों से दूर भागकर यहां, इस पहाड़ की चोटी पर, सबसे अलग रहने के इरादे से, तुम आ बैठी. क्या तुम नहीं जानती कि पहाड़ों का प्रेम वृक्ष के मधुर फल चखने को नहीं मिलते? प्रेम में उष्णता है; तुममें शीतलता. प्रेम प्रवाही है-वह बहकर अपने पात्र तक पहुंचता है. तुम जड़ हो, हजार प्रयत्न करने पर भी तुम अपनी जगह नहीं छोड़ती. फिर, तुम्हीं कहो, इस दशा में, किस प्रकार तुम किसी की प्रेमपात्र हो सकती हो?

‘‘अगर तुम मेरी वधू होना चाहती हो, मेरे प्रेम की प्रियतम पात्र बनना चाहती हो; तो तुम भी मेरे समान हो जाओ. उस उष्णता प्राप्त करो; अपने कड़ेपन को छोड़ी; प्रवाही बन जाओ; इन सुनसान पहाड़ों से नीचे उतरकर बस्ती में चलो. यदि तुम मेरे सुख-दुःख में शामिल होने की इच्छा रखती हो तो जो काम मैं करता हूं वही तुम भी करना सीखो. मैं आकाश को प्रकाशित करता हूं; तुम पृथ्वी को अपने लावण्य से प्रकाशित करती हुईं उसमें नरमी पैदा करो. उसे सरसब्ज और उपजाऊ बनाओ. तुमने अपने पास जो अनमोल चीजें छिपा रखी हैं उनको, राह में, जो कोई तुम्हें मिले, उसे, परोपकार करने के इरादे से, देती जाओ. सांसारिक भार को उठा लो. उसके सुख-दुःख में और हानि-लाभ में शामिल हो जाओ. सबसे हेल-मेल रखो और अपने पवित्र आचरण से सबको पवित्र करो.’’

इस प्रकार सम्भाषण करके भुवन भास्कर ने कुमारी हिमांगिनी का चुंबन बड़े ही प्रेम से किया. उसके स्पर्श से हिमांगिनी को परमानंद हुआ और वह तत्काल अपने प्रेमी की आज्ञा पालन करने के लिए प्रस्तुत हो गई. वह वहां से कूद पड़ी और ऊंची-ऊची पहाड़ियों और घाटियों को पार करके पहाड़ के नीचे उतर आई. वहां से वह उछलती-कूदती आगे बढ़ी. उसने अपने दिल में ठान लिया कि जब तक मैं सागर सिंह के दर्शन न कर लूंगी तब तक मैं हरगिज बीच में कहीं न ठहरूंगी.

हिमांगिनी ने अपना प्रण पूरा कर दिखाया, इसलिए उस पर प्रसन्न होकर सायंकाल, सागर सिंह के यहां आकर भुवन भास्कर ने यथाविधि उसका पाणिग्रहण किया. तब से हिमांगिनी वहीं रहने लगी. हर रोज रात को, अपनी प्रेमी भुवन भास्कर से मिलकर परमानंद का अनुभव करने लगी.

 

महारानी चन्द्रिका और भारतवर्ष का तारा

क बार, सायंकाल, रानी चन्द्रिका अपनी सभा में अपने रत्नजटित सिंहासन पर विराजमान थीं. उनके सारे सभासद और अधिकारी अपने-अपने स्थान पर बैठे हुए सभामंडप की शोभा बढ़ा रहे थे. सभासदों के चारों ओर अनंत तारागण अपने-अपने तेज से एक अद्भुत प्रकाशमयी छटा फैला रहे थे. क्रम-क्रम से राज्य के काम अधिकारियों द्वारा किये जाने लगे. महारानी सब कामों की समीक्षा करती हुई विचारपूर्वक आज्ञा भी देने लगीं. उसी समय अकस्मात् एक चमकीली वस्तु दूर अंधेरे से निकलती हुई देख पड़ी और धीरे-धीरे सभा की ओर बढ़ने लगी. जब वह सभामंडप के निकट आ गई तब यह जाना गया कि वह एक धीमी ज्योतिवाला तारा था. उस तारा ने आकर महारानी को दंड प्रमाण किया और प्रमाण करके हाथ जोड़े और सिर झुकाये वहीं वह उनके सामने खड़ा हो गया.

महारानी ने पूछा, ‘‘तुम कौन हो?’’

उसने कहा, ‘‘मैं आप ही की प्रजा में से एक व्यक्ति हूं. मुझे ‘भारतवर्ष का तारा’ कहते हैं.’’

महारानी ने अपने सभासदों से पूछा, ‘‘क्या तुममें से कोई इसे पहचानता है?’’ यह सुनकर एक सभासद ने उत्तर दिया कि ‘‘हां, अब मैंने इसे पहचाना. जब यह यहां आया तब मुझे ऐसा भासित हुआ कि मैंने कभी इसे पहले देखा है, परंतु मैं इसे पहचान न सका. अब नाम बतलाने पर मैंने इसे पहचाना. मैंने तो समझा था कि अब कभी इससे भेंट न होगी; परंतु सौभाग्य से आज यह मुझे फिर दिखलाई दिया.’’

महारानी ने तब उससे पूछा, ‘‘तुम अब तक रहे कहां?’’ उसने कहा, ‘‘मैं अस्त हो गया था.’’ महारानी ने फिर पूछा, ‘‘अच्छा बतलाओ तो ऐसा क्यों हुआ.’’ यह सुनकर उस तारा ने कहा, ‘‘आप इस बात को अवश्य जानती होंगी कि अब भारतवर्ष में युधिष्ठिर, विक्रम और भोज के समान राजा, शंकर, जैमिनी और भास्कर के समान विद्वान् और कालिदास, भवभूति और श्रीहर्ष के समान कवि नहीं उत्पन्न होते. हिमालय से लेकर कन्या कुमारी तक चाहे जितना ढूंढ़िए, कहीं भी, प्राचीन समय के जैसे महात्मा नहीं दिखलाई देते, जो सत्य ही को अपना धन समझें, देश-प्रीति ही को अपना सर्वस्व समझें, और देशभाषा ही को अपनी माता समझें. इसलिए, हे देवी! आप ही विचारिए, कि जहां इस प्रकार का एक भी महानुभाव नहीं वहां के तारा की अस्त हो जाने के सिवा और क्या गति हो सकती है?’’

यह सुनकर महारानी चन्द्रिका ने बड़े आश्चर्य से पूछा, ‘‘क्या कारण है जो प्राचीन काल के जैसे महात्मा अब वहां नहीं उत्पन्न होते?’’ उस तारा ने शोकपूरित शब्दों में उत्तर दिया, ‘‘इसका कारण प्रत्यक्ष है. वहां कौशल्या के समान माता, सीता और द्रौपदी के समान पत्नी, गार्गी, मैत्रेयी और लीलावती के समान विदुषी स्त्रियां अब नहीं होतीं. अतएव आश्चर्य नहीं जो भारतवर्ष में रहने वालों का अधःपात हो जाए.’’

महारानी चन्द्रिका को यह सुनकर महाखेद हुआ और उन्होंने फिर पूछा, ‘‘क्या कारण है जो इस प्रकार की स्त्रियां अब वहां नहीं पाई जातीं?’’ उत्तर में उस तारा ने निवेदन किया, ‘‘इसका कारण महारानी को मुझसे अधिक ज्ञात होना चाहिए, क्योंकि यह एक ऐसी बात है जो स्त्रियों ही से संबंध रखती है. जिस समाज में स्त्रियों को शिक्षा नहीं दी जाती, उनका बात-बात में निरादर होता है, उनकी अभिलाषाओं को पूर्ण करने की ओर प्रायः कोई भी ध्यान नहीं देता, यहां तक कि उन्हें अकारण ताड़ना तक दी जाती है, उस समाज में सीता अथवा द्रौपदी के समान स्त्रियों के उत्पन्न होने की कोई कैसे आशा कर सकता है. इस प्रकार की सामाजिक दुर्दशा भारतवर्ष में बढ़ती ही गई और मेरा तेज धीरे-धीरे कम होता गया. अंत में एक दिन ऐसा आया कि मुझे अस्त हो जाना पड़ा.’’

‘‘अच्छा, यह तो बतलाओ कि तुम्हारा उदय किस प्रकार हुआ?’’

‘‘महारानी ने सुना होगा कि इस समय भारतवर्ष में कुछ सच्चे समाज-सुधारकों का जन्म हुआ है. उन्होंने स्त्री-शिक्षा की ओर ध्यान देना आरंभ किया है, और उस देश के निवासी क्रम-क्रम से अपनी भूल पर पछताने भी लगे हैं. अब स्त्रियों को शिक्षा भी कहीं-कहीं मिलने लगी है. यही कारण है जो मैंने अपना पहला प्रताप थोड़ा-सा प्राप्त किया है. यदि स्त्री-शिक्षा की ओर लोगों का ध्यान इसी प्रकार बना रहा तो मुझे आशा है कि कुछ दिनों में मैं अपना पूरा तेज प्राप्त करके भारतवर्ष में प्रकाशित हूंगा.’’

यह सुनकर महारानी चन्द्रिका ने उसके सिर पर अपना हाथ रखा और आशीर्वाद दिया कि ईश्वर करे, शीघ्र ही, तुम भारतवर्ष रूपी आकाश में अपने पूरे प्रकाश से पूर्ण होकर उदय होओ.

 

तीन देवता

मेरा नाम वररुचि है. जो एक बार भी किसी अच्छे पंडित के पास बैठा होगा, वह मुझे भली-भांति जानता होगा कि मैं महापंडित हूं. मेरी पंडिताई का हाल ही से समझ लीजिए कि मैंने व्याकरण-

संबंधी एक बहुत बड़ा ग्रंथ बनाया है. यह सब इसलिए कहता हूं कि जिसमें तुमको मेरी बात पर विश्वास आवे. तुम कहीं यह न समझने लगो कि यह एक कहानी है. कहानी नहीं है. सच्ची घटना है. जो कुछ मैं आज तुमसे कहना चाहता हूं उससे मेरी

प्राणधिका पत्नी ही से संबंध है. इसलिए तुम्हीं कहो, कौन ऐसा मूर्ख होगा जो अपनी ही घरवाली के झूठे कलंक कहने बैठेगा? यह घटना यद्यपि हजारों वर्ष की पुरानी है, तथापि इसकी सत्यता में संशय नहीं. वह वृत्तांत उसी समय लिखा गया था. मैं उसे ही तुम्हारे मनोरंजन के लिए सुनाता हूं. अपनी ओर से मैं कुछ न कहूंगा. लो, सुनो.

लड़कपन में मैं अपने दो साथियों के साथ गुरुकुल में विद्या पढ़ता था. मेरे एक साथ का नाम विष्णु और दूसरे का इन्द्रदत्त था. मेरे गुरू विन्ध्याचल से थोड़ी दूर पर विन्ध्यनगर में रहते थे. उनका नाम विद्याविभूति था. हम तीनों बड़े परिश्रम से पढ़ते थे. जब मेरी अवस्था कोई आठ वर्ष की थी तभी मैं विद्या विभूतिजी के पास भेज दिया गया था. मेरे पिता का शरीरांत हुए, उस समय चार वर्ष हो चुके थे. घर पर केवल मेरी वृद्ध माता थीं. वे मुझे प्राणों से अधिक चाहती थीं. मेरी भी यही इच्छा रहती थी कि शीघ्र ही मैं पंडित हो जाऊं और किसी राजा के आश्रय में रहकर स्वयं सुखी होऊं और माता को भी सुखी करूं. मेरे गुरू मुझे बहुत चाहते थे. मैं भी उनकी हृदय से सेवा-शुश्रूषा करता था. उनकी कृपा से मैं शीघ्र ही सब शास्त्रों में पंडित हो गया. मुझे पूरा पंडित होने में 12 वर्ष लगे. अर्थात् जब मैं 20 वर्ष का हुआ तब मैंने विद्या की भी समाप्ति कर दी और उसके साथ ही अपने लड़कपन की भी समाप्ति. मैं युवा हुआ.

एक बार नगर में एक उत्सव हुआ. गुरू की आज्ञा से मैं भी उसे देखने गया. साथ में विष्णु और इन्द्रदत्त भी थे. वहां मैंने एक नवयौवना, दीर्घ-लोचना, शशांक-वंदना और गजेन्द्र-गमना कामिनी देखी. मैंने इन्द्रदत्त से पूछा, ‘‘यह कौन है?’’ उससे कहा, ‘‘विश्वकोश नामक ब्राह्यण की यह कन्या है. इसका नाम उपकोशा है.’’ उपकोशा को देखकर मैं प्रेम-परवश हो गया. मेरा मन मेरे हाथ से जाता रहा. चाह-भरी दृष्टि से मुझे अपनी ओर देखते देख उपकोशा ने अपनी सखी से कुछ पूछा. कुछ क्या, मेरा ही हाल पूछा. सखी ने उसके कान में कुछ कहा और कहकर मेरी ओर धीरे-से उंगली उठाकर वह मुसकुराई. मेरा परिचय पाकर उपकोशा ने भी प्रेम-भरी दृष्टि से मेरी ओर एक बार देखा. देखकर वह वहां से चल दी. मैं भी किसी प्रकार घर लौटा आया. कंदुक के समान सुंदर स्तनोंवाली, केहरि के समान क्षीण कटिवाली, लक्ष्मी के समान सुंदरी उस मनमोहनी के बिंबाधरों में वर्तमान सुधा-सलिल की प्यास से व्याकुल होने के कारण रात को मुझे नींद नहीं आई. बड़ी कठिनता से पिछली रात जरा आंख बंद हुई तो मैं क्या देखता हूं कि सफेद साड़ी पहने हुए एक दिव्य स्त्री मेरे सामने खड़ी है. उसने मुझसे कहा, ‘‘पुत्र! उपकोशा तेरी पूर्वजन्म की अर्धांगिनी है. मैं तेरे मुख में वास करनेवाली सरस्वती हूं. तू चिंता मत कर. तेरी व्याकुलता मुझसे नहीं देखी गई. इसीलिए मैं तुझे धैर्य देने के लिए प्रकट हुई हूं. तेरे रूप और तेरे गुणों पर मोहित होकर उपकोशा तुझे ही अपना पति करना चाहती है. शीघ्र ही तेरी इच्छा पूरी होगी.’’ इतना कहकर भगवती सरस्वती अंतर्धान हो गई.

प्रातःकाल मुझसे नहीं रहा गया. उस चकोर-नयनी को देखने की मुझे छटपटी पड़ी. मैं उसके घर की ओर चला. यहां पहुंचकर उसके पिता की फूल-वाटिका में इधर-उधर मैं घूमने लगा कि कहीं उसके दर्शन हो जाएं. मेरा मनोरथ सफल हुआ. घर की खिड़की में मलिन चंद्रमा का सा उदय हुआ. मेरे नेत्र उसी ओर दौड़ गए और उसके दर्शनों से कृतार्थ होने लगे. उपकोशा एक क्षण से अधिक वहां न ठहर सकी. लज्जा के वश होकर उसने अपना मुंह फेर लिया और मुझ पर वज्रपात-सा करके वह लोप हो गई. मेरे सारे शरीर में प्रचंड ज्वाला जलने लगी. मैं संताप से पीड़ित होकर गिरने ही को था कि उपकोशा की एक सखी वहां अकस्मात् आकर उपस्थित हुई. उसने मुझे गिरते देख मेरा हाथ पकड़ लिया. मैं संभल गया.

मेरी देशा पर उसने खेद प्रकट किया. उसने कहा, ‘‘उपकोशा की भी बुरी दशा है. जिस क्षण से उसने तुम्हें देखा है, काम ने अपने पैने बाणों की वर्षा उस पर आरंभ की है. उनसे उसकी किसी प्रकार कहीं भी रक्षा नहीं हो सकती. उनसे बचने का एक ही शिरस्त्राण है. वह आप हैं.’’ यह सुनकर मुझे बड़ा धीरज हुआ. मैंने कहा, ‘‘मेरी जो दशा है वह तुम देख ही रही हो. यदि तुम न आती तो शायद मैं भूमि पर मूर्च्छित होकर गिर पड़ता. जितना शीघ्र हो उतना ही उपकोशा-रूपी अमृतवल्ली के सेवन से मैं अपने शरीर का असह्य दाह शांत करना चाहता हूं. परंतु गुरुजनों की आज्ञा बिना अपना मनोरथ सफल करना मैं अपने लिए अकीर्ति का कारण समझता हूं. अकीर्ति से मर जाना अच्छा है. इसलिए तुम अपनी सखी के मन की बात उसके पिता से कहो; जिसमें वे मेरे गुरू की आज्ञा लेकर विधिपूर्वक विवाह का प्रबंध कर दें. ऐसा ही होने से मेरा और तुम्हारी सखी का कल्याण है.’’

सखी ने यह सब वृत्तांत उपकोशा की माता से कहा. माता ने उपकोशा के पिता से. पिता मेरे रूप, शील और विद्या आदि की बड़ाई सुन चुका था. इसलिए उसने इस बात को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया और मेरे गुरू विद्याविभूति की भी अनुमति प्राप्त कर ली. इस प्रकार मेरा उपकोशा के साथ विवाह निश्चय हो जाने पर मेरा साथ विष्णु कौशाम्बी से मेरी माता को ले आया. उसे वहां जाकर माता को लाने में दो दिन लगे. ये दो दिन मेरे लिए युग हो गए. इन दोनों की प्रतीक्षा में जो-जो मनोरथ मेरे मन में हुए और जो-जो मनोव्यथा मैंने सहन की, उसका अनुमान वे नहीं कर सकेंगे जिनको कभी इस प्रकार की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी. किसी प्रकार वह शुभ दिन आया और उपकोशा का पाणिग्रहण करके मैंने अपने मनोरथ सफल किए.

कुछ दिन में मेरी माता इस संसार से चल बसीं. इसका पहले मुझे बहुत शोक हुआ. परंतु धीरे-धीरे वह कम हो गया और उपकोशा के साथ मैं आनंद से वहीं विन्ध्यनगर में रहने लगा. इस बीच में मेरे गुरू विद्याविभूति के अनेक शिष्य हो गए. उनमें एक का नाम पाणिनि था. वह मेरे गुरू की स्त्री की बड़ी सेवा करता था. मेरी गुरुवानी इसलिए उस पर बहुत प्रसन्न थीं. उन्होंने पाणिनि को तपस्या के लिए हिमालय पर्वत पर भेज दिया. उसने वहां जाकर घोर तपस्या की. उसकी तपस्या से शंकर प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे सब विद्याओं के प्रवेश का आदि-करण एक नया व्याकरण पढ़ाया. इस व्याकरण को पढ़कर और परम संतुष्ट होकर कई वर्ष पीछे पाणिनी हिमालय से उतरा. वहां से विन्ध्यनगर को आने में जितने प्रसिद्ध-प्रसिद्ध विद्यापीठ थे सबमें पाणिनि ठहरा. उसके साथ शास्त्रार्थ करने में किसी को यश नहीं मिला. इस प्रकार दिग्विजय करते-करते वह विन्ध्यनगर के समीप आ पहुंचा.

पाणिनि की विद्या का वृत्तांत सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ. पाणिनि जब विद्याविभूति के पास था तब वह सबसे अधम शिष्यों में गिना जाता था. इसलिए मुझे यह जानने का कौतूहल हुआ कि देखूं पाणिनि अब कितना विद्वान् हो गया है. जब वह विन्ध्यनगर को लौट आया और वहां उसने मेरी प्रशंसा सबके मुख से सुनी तब उससे स्वयं ही न रहा गया. इसलिए मुझे कुछ भी कहना न पड़ा. उसने आप ही शास्त्रार्थ के लिए मुझे ललकारा. नियत समय पर मेरा और उसका शास्त्रार्थ आरंभ हुआ. सात दिन तक यह शास्त्रार्थ बराबर होता रहा. आठवें दिन मैंने पाणिनि को परास्त किया. परास्त करने के साथ ही एक अद्भुत घटना हुई. आकाश में एक ऐसा घोर नाद हुआ कि उसके होते ही मैं अपना व्याकरण भूल गया! पाणिनि ने फिर शास्त्रार्थ आरंभ किया और क्रम-क्रम से उसने हम सबको जीत लिया!

अब मैं विन्ध्यनगर में मुंह दिखाने के योग्य न रहा. मैं बहुत ही लज्जित हुआ. इसलिए मैंने भी तप करना निश्चित किया. माता मेरी मर ही चुकी थी. केवल उपकोशा थी. उसको समझा-बुझाकर मैंने शंकर की आराधना के लिए हिमालय जाने की अनुमति ले ली. कुछ धन मेरे पास था. उसे मैंने उपकोशा के पास रखना उचित न समझा. इसलिए उसे मैंने सुवर्णगुप्त नामक महाजन के यहां रख दिया और कह दिया कि उपकोशा को जिस समय जितना धन अपेक्षित हो उतना वह देता जाए. इस प्रकार प्रबंध करके मैंने हिमालय जाने के लिए प्रस्थान किया.

उपकोशा पूरी पतिव्रता थी. दिन-रात वह मेरी मंगल-कामना किया करती थी. प्रतिदिन वह नर्मदा-स्नान करने जाया करती थी और सदा व्रत-उपवास भी किया करती थी. इन व्रतों और उपवासों को करने से वह बहुत ही दुबली हो गई. तथापि उसकी शरीर-शोभा कम नहीं हुई. प्रतिपदा का चंद्रमा क्षीण होने पर भी अच्छा लगता है. एक बार, वसंत-ऋतु में, वह स्नान किए सायंकाल घर आ रही थी कि मार्ग में पहले उसे राजा के पुरोहित ने, फिर न्यायाधीश ने और फिर मंत्री ने देखा. उपकोशा को देखते ही वे सब काम के बाणों का निशाना बन गए. वे अपना अधिकार, पद, धर्म सब क्षण में भूल गए. उपकोशा को अकेले आते देख मंत्री ने उसे मार्ग में सहसा रोका. उपकोशा का कलेजा कांपने लगा. परंतु वह बड़ी प्रत्युत्पन्नमति थी. उसकी बुद्धि बड़ी तीक्ष्ण थी. समय की बात उसे झट सूझ जाती थी. उसने कहा, ‘‘मंत्री जी! आपकी जो अभिलाषा है यह मेरी भी है. परंतु मैं कुलकामिनी हूं. पति मेरा विदेश में है. यहां एकांत में अकेले आपसे बातचीत करते यदि हमको कोई देख लेगा तो इसमें मेरी भी बदनामी होगी और आपकी भी. इसलिए आज तो मुझे व्रत है. कल रात को, आप, पहले पहर मेरे घर पधारें. वसंतोत्सव का समय है; सब लोग मेले के झमेले में रहेंगे; कोई आपको देख न सकेगा.’’ इसे मंत्री जी ने स्वीकार किया.

इस प्रकार मंत्री महाशय से छुट्टी पाकर ज्यों ही उपकोशा थोड़ी दूर आगे गई त्यों ही उसे मार्ग में पुरोहित देवता मिले. उन्होंने भी उसे रोका और अपना अनुराग प्रकट किया. उन्हें भी उपकोशा ने प्रेम-भरी बातों से प्रसन्न करके, दूसरे दिन-रात के दूसरे पहर अपने घर आने की कृपा करने के लिए उनसे निवेदन किया. पुरोहितजी को पुलकित करके कुछ दूर उपकोशा आगे गई ही थी कि न्यायाधीश जी ने, एक गली में, अपनी भुजवल्ली से उसे

बांधना चाहा. उपकोशा ने उनकी भी अभिलाषा पूर्ण करने का वचन देकर रात के तीसरे पहर अपने घर को पवित्र करने की प्रार्थना की. इस प्रकार इन तीनों प्रेमियों से छुटकारा पाकर वह किसी प्रकार घर पहुंची. यहां उसने अपनी सखी से मार्ग का सारा वृत्तांत कांपते हुए वर्णन किया. उसने कहा, ‘‘मेरी सुंदरता को धिक्कार है. जिस कुल स्त्री का पति घर पर नहीं है उसका मर जाना ही अच्छा है.’’ इस प्रकार खेद प्रकट करके और मेरा बारंबार स्मरण करके बीती हुई घटना को सोचती हुई उस रात उपकोशा निराहार ही पड़ी रही.

सबेरे पूजन-पाठ और ब्राह्मणों को दक्षिणा देने के लिए उपकोशा को कुछ धन की आवश्यकता हुई. इसलिए उसने अपनी सखी को सुवर्णगुप्त के पास भेजा कि वह मेरे रखे हुए धन में से कुछ ले आवे. सुवर्णगुप्त ने धन तो दिया नहीं परंतु उपकोशा के घर स्वयं आने की कृपा की. घर आकर एकांत में उपकोशा से उसने कहा, ‘‘सुंदरी! तुम्हारे स्मरण में मुझे निद्रा नहीं आती; भूख-प्यास जाती रही है; काम-काज में जी नहीं लगता; अतएव मुझे प्राणदान दीजिए. मेरा अंगीकार करके मेरी अभिलाषा पूरी कीजिए. जो कुछ धन तुम्हारे स्वामी का मेरे पास रखा है वहीं नहीं, मैं अपनी भी सारी संपत्ति तुम्हारे लिए देने को तैयार हूं.’’ इन बातों को सुनकर उपकोशा सूख गई; परंतु धीरज धरकर, उसी दिन, रात के चौथे पहर सुवर्णगुप्त को भी आने के लिए उसने निमंत्रण दिया.

चारों प्रेमी अपने-अपने मन में मनोमोदक खाने लगे. इधर उपकोशा ने केशर-कस्तूरी आदि सुगंधित पदार्थों को मिलाकर बहुत-सा काजल तैयार कराया. उस काजल को एक कुंड में उसने भराया और उसी में बहुत-सा तेल डलवा दिया. उसी तेल से डूबे हुए चार कौपीन भी उसने तैयार कराए. यथासमय पहले पहर मंत्रीजी पधारे. उपकोशा बड़े आदर से उठकर मिली. परंतु उसने कहा-आपको पहले स्नान कर लेना चाहिए. बिना स्नान किए मैं आपको कैसे स्पर्श करूं?

मंत्रीजी ने स्नान करना स्वीकार किया. उपकोशा की दो सखियां उसे भीतर अंधेरे में ले गई. वहां उसके वस्त्राभूषण उतारकर उसको वही तेल और काजल से भीगा हुआ कौपीन उन्होंने पहनाया. स्नान के पहले सुगंधित पदार्थों का अभ्यंग (उबटन) लगाया जाता है. शरीर में वही उबटन लगाने के बहाने उन सखियों ने पूर्वोक्त कुंड की कालिख उसके शरीर में खूब मली. सखियां अभ्यंग कर ही रही थी कि पुरोहित देवता आ गए. उनका आगमन सुनकर सखियों ने कहा कि वररुचि के मित्र पुरोहित जी किसी काम से आए हैं. अतः आप इस संदूक के भीतर हो जाइए. एक लंबी-चौड़ी संदूक पहले ही से तैयार रखी गई थी. उसमें हवा जाने का मार्ग था; परंतु ऊपर से बड़ी मजबूत कुंडी लगी थी. इस प्रकार भय से बचने के लिए मंत्री को संदूक के भीतर चुपचाप बैठे रहने की सलाह देकर सखियों ने पुरोहित जी की भी पूर्ववत् सेवा आरंभ की. उनको भी उन्होंने वही कौपीन पहनाया और स्नान करने के पहले शरीर में उबटन लगाना आरंभ किया. तीसरे पहर न्यायाधीश जी का आगमन हुआ. उनको आया जान सखियों ने पुरोहित जी से कहा कि जान पड़ता है आपके आने का समाचार न्यायाधीश को मिल गया. इसीलिए वे आपको पकड़ने आए हैं. आप चुपचाप इस संदूक के भीतर बैठ जाइए. इस प्रकार पुरोहित को भी उसी संदूक में उन्होंने बंद किया. यथाक्रम न्यायाधीश के शरीर में भी उबटन-तेल लगने लगा.

इसी बीच सुवर्णगुप्त ने कृपा की. सखियों ने कहा, ‘‘सुवर्णगुप्त वररुचि की धरोहर देने आया है. वह कहीं आपको देख न ले. इसलिए आप झटपट छिप जाइए.’’ अतएव न्यायाधीश जी ने भी उसी संदूक में रक्षा पाई. उसमें अब तीन मनुष्य हो गए, परंतु उस अंधेरी कोठरी में वे परस्पर एक दूसरे को पहचान न सकते थे और चुपचाप कांपते हुए उसी में पड़े थे.

सुवर्णगुप्त के आने पर उपकोशा ने उसका बड़ा आदर किया और दीपक जलाकर उसी कोठरी में, जहां वह संदूक रखी थी, वह उसे ले गई. वहां उसने बड़ी नम्रता से अपना धन लौटा देने की सुवर्णगुप्त से प्रार्थना की. सुवर्णगुप्त ने कहा, ‘‘मैं पहले ही वादा कर चुका हूं कि जो कुछ धन तुम्हारे स्वामी का मेरे पास रखा है, मैं उसे ही नहीं, अपना भी धन देने को तैयार हूं.’’ जब सुवर्णगुप्त यह कह चुका तब संदूक की ओर उंगली उठाकर उपकोशा बोली, ‘‘हे संदूक के देवता! सुनो, सुवर्णगुप्त क्या कहते हैं. इनके वादे को भूल मत जाना.’’ यह कहकर उपकोशा ने दीपक बुझा दिया. सखियों ने पूर्ववत् बहाना बतलाकर सुवर्णगुप्त को कौपीन पहनाया और अभ्यंग आरंभ किया. थोड़ी ही देर में सबेरा हो गया. सुवर्णगुप्त के हाथ जोड़ने पर भी उसे उसके वस्त्राभूषण न मिले. सखियों ने उसकी गरदन में हाथ लगाकर जबरदस्ती उसे उसी दशा में घर से निकाल दिया. एक छोटा-सा कौपीन पहने और शरीर भर काजल लिपटाये हुए सुवर्णगुप्त शीघ्रता से अपने घर की ओर नंगा ही भागा. काले देव का सा उसका यह विलक्षण रूप देखकर कुत्ते, भूंकते हुए, उसके पीछे-पीछे दौड़े. वह बेचारा किसी प्रकार अपने घर पहुंचा. वहां अपने सेवकों से काजल धुलाते समय, लज्जा के मारे, मुंह तक उनके सामने वह न कर सका. दुराचारियों की यही दशा होती है.

दिन निकलते ही उपकोशा राजा प्रतापादित्य की सभा में पहुंची. वहां इस प्रकार बातचीत हुईं-

उपकोशा, ‘‘महाराज! सुवर्णगुप्त मेरे स्वामी का रखा हुआ धन हजम करना चाहता है. मैंने बहुत मांगा; परंतु वह नहीं देता.’’

राजा, ‘‘सुवर्णगुप्त को तुरंत हाजिर करो.’’

राजा की आज्ञा पाकर दो मनुष्य उसी क्षण दौड़े गए और सुवर्णगुप्त को ले आए. उसे सम्मुख खड़े देख राजा ने पूछा-

‘‘सुवर्णगुप्त! वररुचि की धरोहर तुम क्यों नहीं देते?’’

सुवर्णगुप्त, ‘‘महाराज! मेरे पास एक कौड़ी भी नहीं रखी; मैं दूं क्या? उपकोशा झूठ बोलती है!’’ वह उपकोशा पर जल रहा था; भला क्यों वह उसकी धरोहर स्वीकार करता!

राजा, ‘‘उपकोशा! तुमने सुना सुवर्णगुप्त ने क्या कहा? कोई तुम्हारा साक्षी है?’’

उपकोशा, ‘‘हां महाराज! मेरे तीन देवता साक्षी हैं. विदेश जाने के पहले मेरे स्वामी ने उन तीनों को संदूक में बंद कर दिया था. उन्हीं के सामने इस धूर्त ने धन का रखा जाना स्वीकार किया है. आप यदि चाहें तो उस बंदूक को मंगाकर उन देवताओं से पूछ लें.’’

यह सुनकर राजा को आश्चर्य और कुतूहल दोनों एक ही साथ हुए. उसने उस संदूक के लाये जाने की आज्ञा दी. कुछ देर में सात-आठ आदमी उसे बड़ी कठिनता से उठाकर सभा में लाये. उसके बीच सभा में रखी जाने पर उपकोशा बोली-

‘‘हे देवता! इस धूर्त ने मेरे स्वामी का धन लौटाने का वादा तुम्हारे सामने किया है. तुमको यह बात स्मरण होगी. अतः उसे तुम सत्य-सत्य राजा के सामने कहो. यदि न कहोगे तो मैं या तो इसी सभा में तुम्हें खोल दूंगी या तुमको संदूक समेत जला दूंगी.’’ यह सुनकर उस संदूक के भीतर के तीनों मनुष्य बहुत ही भयभीत हुए. उन्होंने धीरे-धीरे कहा, ‘‘सुवर्णगुप्त झूठा है; उसने वररुचि की धरोहर अवश्य रखी है और उसे वापस देने का वादा भी किया है.’’ यह सुनकर सुवर्णगुप्त ने राजा और उपकोशा से क्षमा मांगी और वररुचि का सारा धन देकर झूठ बोलने और धोखा देने के अपराध में राजा की आज्ञा से बहुत-सा धन-दंड भी उसने दिया.

यह हो चुकने पर राजा ने उपकोशा की अनुमति से सभा में वह संदूक खुलवाई. खोलने पर वे तीनों पुरुष काजल से लिपटे हुए उसके भीतर से निकले! सबने उन्हें पहचाना. उनके रूप को देखकर सारी सभा के पेट में हंसते-हंसते बल पड़ गए. राजा ने उपकोशा से उसका वृत्तांत पूछा. उपकोशा ने उनका सारा चरित वर्णन किया. उनकी दुःशीलता का वृत्तांत सुनकर राजा प्रतापादित्य बहुत क्रुद्ध हुआ. उसने उन तीनों का सर्वस्व छीनकर उनको अपने देश से निकाल दिया. उपकोशा को राजा ने, उस दिन से अपनी बहन माना और उसे बहुत-सा धन और वस्त्रालंकार देकर विदा किया.

कुछ दिन बाद मैं शंकर को प्रसन्न करके और उनसे इच्छानुकूल वर पाकर घर लौट आया. आकर मैंने उपकोशा की चतुरता और उन तीन पुरुषों की दुःशीलता का वृत्तांत सुना. उपकोशा के पतिव्रत पर मैं अतिशय प्रसन्न हुआ और उस दिन से फिर मैं उससे एक घड़ी भर के लिए भी जुदा नहीं हुआ.

अपनी प्रियतमा उपकोशा के इस अद्भुत चरित को मैंने अपने मित्र सोमदेव से लिख रखने के लिए कहा. उसने इसी क्षण इसे लिख लिया. वही मैंने आज यहां पर तुम्हें सुनाया है. तुमको मेरी शपथ है, इसे सच समझना.

COMMENTS

BLOGGER

विज्ञापन

----
.... विज्ञापन ....

-----****-----

|नई रचनाएँ_$type=complex$count=6$page=1$va=0$au=0

|कथा-कहानी_$type=complex$au=0$count=6$page=1$src=random-posts$s=200

|हास्य-व्यंग्य_$type=blogging$au=0$count=6$page=1$src=random-posts

|लोककथाएँ_$type=complex$au=0$count=6$page=1$src=random-posts

|लघुकथाएँ_$type=list$au=0$count=5$com=0$page=1$src=random-posts

|काव्य जगत_$type=complex$au=0$count=6$page=1$src=random-posts

|बच्चों के लिए रचनाएँ_$type=complex$au=0$count=6$page=1$src=random-posts

|विविधा_$type=complex$au=0$va=0$count=6$page=1$src=random-posts

 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अखिलेश सोनी अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अजित वडनेरकर अजीत प्रियदर्शी अजीत भारती अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनमोल विचार अनामिका अनामी शरण बबल अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनिल जनविजय अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनुज खरे अनुपम मिश्र अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरपाल सिंह आयुष्कर अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अशोक शुक्ल अश्विनी कुमार आलोक आई बी अरोड़ा आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष आशुतोष शुक्ल इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी इन्द्रमणि उपाध्याय इन्द्रेश कुमार इलाहाबाद ई-बुक ईबुक ईश्वरचन्द्र उपन्यास उपासना उपासना बेहार उमाशंकर सिंह परमार उमेश चन्द्र सिरसवारी उमेशचन्द्र सिरसवारी उषा छाबड़ा उषा रानी ऋतुराज सिंह कौल ऋषभचरण जैन एम. एम. चन्द्रा एस. एम. चन्द्रा कथासरित्सागर कर्ण कला जगत कलावंती सिंह कल्पना कुलश्रेष्ठ कवि कविता कहानी कहानी संग्रह काजल कुमार कान्हा कामिनी कामायनी कार्टून काशीनाथ सिंह किताबी कोना किरन सिंह किशोरी लाल गोस्वामी कुंवर प्रेमिल कुबेर कुमार करन मस्ताना कुसुमलता सिंह कृश्न चन्दर कृष्ण कृष्ण कुमार यादव कृष्ण खटवाणी कृष्ण जन्माष्टमी के. पी. सक्सेना केदारनाथ सिंह कैलाश मंडलोई कैलाश वानखेड़े कैशलेस कैस जौनपुरी क़ैस जौनपुरी कौशल किशोर श्रीवास्तव खिमन मूलाणी गंगा प्रसाद श्रीवास्तव गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर ग़ज़लें गजानंद प्रसाद देवांगन गजेन्द्र नामदेव गणि राजेन्द्र विजय गणेश चतुर्थी गणेश सिंह गांधी जयंती गिरधारी राम गीत गीता दुबे गीता सिंह गुंजन शर्मा गुडविन मसीह गुनो सामताणी गुरदयाल सिंह गोरख प्रभाकर काकडे गोवर्धन यादव गोविन्द वल्लभ पंत गोविन्द सेन चंद्रकला त्रिपाठी चंद्रलेखा चतुष्पदी चन्द्रकिशोर जायसवाल चन्द्रकुमार जैन चाँद पत्रिका चिकित्सा शिविर चुटकुला ज़कीया ज़ुबैरी जगदीप सिंह दाँगी जयचन्द प्रजापति कक्कूजी जयश्री जाजू जयश्री राय जया जादवानी जवाहरलाल कौल जसबीर चावला जावेद अनीस जीवंत प्रसारण जीवनी जीशान हैदर जैदी जुगलबंदी जुनैद अंसारी जैक लंडन ज्ञान चतुर्वेदी ज्योति अग्रवाल टेकचंद ठाकुर प्रसाद सिंह तकनीक तक्षक तनूजा चौधरी तरुण भटनागर तरूण कु सोनी तन्वीर ताराशंकर बंद्योपाध्याय तीर्थ चांदवाणी तुलसीराम तेजेन्द्र शर्मा तेवर तेवरी त्रिलोचन दामोदर दत्त दीक्षित दिनेश बैस दिलबाग सिंह विर्क दिलीप भाटिया दिविक रमेश दीपक आचार्य दुर्गाष्टमी देवी नागरानी देवेन्द्र कुमार मिश्रा देवेन्द्र पाठक महरूम दोहे धर्मेन्द्र निर्मल धर्मेन्द्र राजमंगल नइमत गुलची नजीर नज़ीर अकबराबादी नन्दलाल भारती नरेंद्र शुक्ल नरेन्द्र कुमार आर्य नरेन्द्र कोहली नरेन्‍द्रकुमार मेहता नलिनी मिश्र नवदुर्गा नवरात्रि नागार्जुन नाटक नामवर सिंह निबंध नियम निर्मल गुप्ता नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ नीरज खरे नीलम महेंद्र नीला प्रसाद पंकज प्रखर पंकज मित्र पंकज शुक्ला पंकज सुबीर परसाई परसाईं परिहास पल्लव पल्लवी त्रिवेदी पवन तिवारी पाक कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बालगीत बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष सिंह रावण राहुल कुमार राहुल सिंह रिंकी मिश्रा रिचर्ड फाइनमेन रिलायंस इन्फोकाम रीटा शहाणी रेंसमवेयर रेणु कुमारी रेवती रमण शर्मा रोहित रुसिया लक्ष्मी यादव लक्ष्मीकांत मुकुल लक्ष्मीकांत वैष्णव लखमी खिलाणी लघु कथा लघुकथा लतीफ घोंघी ललित ग ललित गर्ग ललित निबंध ललित साहू जख्मी ललिता भाटिया लाल पुष्प लावण्या दीपक शाह लीलाधर मंडलोई लू सुन लूट लोक लोककथा लोकतंत्र का दर्द लोकमित्र लोकेन्द्र सिंह विकास कुमार विजय केसरी विजय शिंदे विज्ञान कथा विद्यानंद कुमार विनय भारत विनीत कुमार विनीता शुक्ला विनोद कुमार दवे विनोद तिवारी विनोद मल्ल विभा खरे विमल चन्द्राकर विमल सिंह विरल पटेल विविध विविधा विवेक प्रियदर्शी विवेक रंजन श्रीवास्तव विवेक सक्सेना विवेकानंद विवेकानन्द विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी विष्णु नागर विष्णु प्रभाकर वीणा भाटिया वीरेन्द्र सरल वेणीशंकर पटेल ब्रज वेलेंटाइन वेलेंटाइन डे वैभव सिंह व्यंग्य व्यंग्य के बहाने व्यंग्य जुगलबंदी व्यथित हृदय शंकर पाटील शगुन अग्रवाल शबनम शर्मा शब्द संधान शम्भूनाथ शरद कोकास शशांक मिश्र भारती शशिकांत सिंह शहीद भगतसिंह शामिख़ फ़राज़ शारदा नरेन्द्र मेहता शालिनी तिवारी शालिनी मुखरैया शिक्षक दिवस शिवकुमार कश्यप शिवप्रसाद कमल शिवरात्रि शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी शीला नरेन्द्र त्रिवेदी शुभम श्री शुभ्रता मिश्रा शेखर मलिक शेषनाथ प्रसाद शैलेन्द्र सरस्वती शैलेश त्रिपाठी शौचालय श्याम गुप्त श्याम सखा श्याम श्याम सुशील श्रीनाथ सिंह श्रीमती तारा सिंह श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंगी श्वेता अरोड़ा संजय दुबे संजय सक्सेना संजीव संजीव ठाकुर संद मदर टेरेसा संदीप तोमर संपादकीय संस्मरण संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018 सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सतीश कुमार त्रिपाठी सपना महेश सपना मांगलिक समीक्षा सरिता पन्थी सविता मिश्रा साइबर अपराध साइबर क्राइम साक्षात्कार सागर यादव जख्मी सार्थक देवांगन सालिम मियाँ साहित्य समाचार साहित्यिक गतिविधियाँ साहित्यिक बगिया सिंहासन बत्तीसी सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध सीताराम गुप्ता सीताराम साहू सीमा असीम सक्सेना सीमा शाहजी सुगन आहूजा सुचिंता कुमारी सुधा गुप्ता अमृता सुधा गोयल नवीन सुधेंदु पटेल सुनीता काम्बोज सुनील जाधव सुभाष चंदर सुभाष चन्द्र कुशवाहा सुभाष नीरव सुभाष लखोटिया सुमन सुमन गौड़ सुरभि बेहेरा सुरेन्द्र चौधरी सुरेन्द्र वर्मा सुरेश चन्द्र सुरेश चन्द्र दास सुविचार सुशांत सुप्रिय सुशील कुमार शर्मा सुशील यादव सुशील शर्मा सुषमा गुप्ता सुषमा श्रीवास्तव सूरज प्रकाश सूर्य बाला सूर्यकांत मिश्रा सूर्यकुमार पांडेय सेल्फी सौमित्र सौरभ मालवीय स्नेहमयी चौधरी स्वच्छ भारत स्वतंत्रता दिवस स्वराज सेनानी हबीब तनवीर हरि भटनागर हरि हिमथाणी हरिकांत जेठवाणी हरिवंश राय बच्चन हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन हरिशंकर परसाई हरीश कुमार हरीश गोयल हरीश नवल हरीश भादानी हरीश सम्यक हरे प्रकाश उपाध्याय हाइकु हाइगा हास-परिहास हास्य हास्य-व्यंग्य हिंदी दिवस विशेष हुस्न तबस्सुम 'निहाँ' biography dohe hindi divas hindi sahitya indian art kavita review satire shatak tevari undefined
नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3788,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,326,ईबुक,182,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2744,कहानी,2067,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,484,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,129,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,86,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,309,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,326,बाल कलम,23,बाल दिवस,3,बालकथा,48,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,8,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,16,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,224,लघुकथा,806,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,305,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,57,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1879,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,637,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,675,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,51,साहित्यिक गतिविधियाँ,180,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,51,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: प्राची अप्रैल 2016 : हमारी विरासत / तीन कहानियाँ / महावीर प्रसाद द्विवेदी
प्राची अप्रैल 2016 : हमारी विरासत / तीन कहानियाँ / महावीर प्रसाद द्विवेदी
https://lh3.googleusercontent.com/-Xh86rCqn6T4/Vx3gtc3Q58I/AAAAAAAAtQE/Z6tHqAx-JAU/image_thumb%25255B3%25255D.png?imgmax=800
https://lh3.googleusercontent.com/-Xh86rCqn6T4/Vx3gtc3Q58I/AAAAAAAAtQE/Z6tHqAx-JAU/s72-c/image_thumb%25255B3%25255D.png?imgmax=800
रचनाकार
http://www.rachanakar.org/2016/04/2016_25.html
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2016/04/2016_25.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय खोजें सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ