विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

प्राची अप्रैल 2016 : समीक्षा / अनुत्तरित सवालों के गीत / अरविंद अवस्थी

समीक्षा

अनुत्तरित सवालों के गीत

अरविंद अवस्थी

साहित्य की विधाओं में ‘गीत’ चिरंत्तन विद्या के रूप में मान्य है. गीत-मनीषियों का कहना है कि मनुष्य के पास जब भाषा नहीं थी तब भी वह पक्षियों के कलख, निर्झर के कलकल और हवा की सरसराहट के साथ गुनगुनाता जरूर रहा होगा. गीत उसके हृदय का स्पंदन है, उसकी स्वतः स्फूर्त चेतना है. गीत का महत्त्व कल भी था, आज भी है और कल भी रहेगा. कालखंड के अवरोधों, आलोचनाओं के बावजूद गीत की आभा बंद नहीं हुई है. अब कोई गमले में प्लास्टिक के फूल सजाकर अपने ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ाना चाहता है तो उसे मुबारक हो, किंतु इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि उपवन से गुलाब, गेंदा, जूही, चमेली के हंसते-खिलते-बतियाते, सुगंध उड़ाते फूलों की क्यारियां गायब हो गई हैं. होना भी नहीं चाहिए. काव्य जगत में गीत को सबसे

अधिक अनुशासनबद्ध रचना कहा जाता है. आज जगत में यदि सबसे अधिक उपेक्षित कुछ है तो वह अनुशासन ही है. मुनष्य ने अनुशासन को केवल किताबों या भाषणों में सीमित कर दिया है. जीवन और व्यवहार में अनुशासन को फटकने भी नहीं दिया जा रहा है. क्या घर, क्या स्कूल, क्या दफ्तर कहीं भी अनुशासन का अब वैसा सम्मान नहीं रह गया है. मनुष्य स्वच्छंदता पर उतर आया है. कुछ ऐसा ही ‘गीत’ के साथ भी हो रहा है.

गीतकार जयप्रकाश श्रीवास्तव का गीत संग्रह ‘परिंदे संवेदना के’ मनुष्य और मनुष्यता की पक्षधरता करता है. इस संग्रह के गीत अपने शीर्षक के अनुगामी हैं. गीतकार ने अपने गीतों के माध्यम से संवेदना के पंखों को उड़ान भरने का हौसला दिया है. ये गीत ध्वनि और अर्थ के सौंदर्य से ओतप्रोत हैं. गेयता और संप्रेषणीयता के धनी इन गीतों की पहुंच पाठकों तक आसानी से हो सकेगी ऐसा मेरा विश्वास है. प्रतीक और बिंब, रूपक और उपमा, भाव और शिल्प के ढांचे मजबूती से गढ़े गए हैं जो सुष्ठ़ु, प्रवाहमय और सौंदर्य से भरपूर हैं. उनके गीत सामाजिक सरोकारों और प्राकृतिक उपादानों के साथ समान रूप से तादात्म्य स्थापित करने में समर्थ हैं. बद से बदतर होते जाते हालातों के प्रति गीतकार की चिंता स्पष्ट झलकती है. वह इसके पीछे संवेदनहीन होते मनुष्य को ही जिम्मेदार ठहराता है. ऐसा माहौल रचता-बसता जा रहा है जिसमें अपराध प्रतिष्ठा का मानक बन बैठा है. अब कानून को अपने हाथ की कठपुतली बनाने वालों की तादाद बढ़ रही है. मंदिरों और पवित्र स्थानों पर शर्मनाक घटनाएं घटित हो रही हैं. कॉलोनियों से खतरे बढ़ते जा रहे हैं. बाबा लोग भगवान से ज्यादा ऐश्वर्य और भोगलिप्सा की ओर खींचे चले जा रहे हैं-‘‘प्रतिष्ठत अपराध/बिक चुकी है शर्म/हाथ में कानून/हो रहे दुष्कर्म/

मठाधीशों से सुरक्षित अब नहीं मूर्तियां/संवेदनाएं हुईं खारिज, पड़ी हैं अर्जियां..’’ (पृष्ठ 13)

ऐसा प्रतीत होता है कि गीतकार जयप्रकाश श्रीवास्तव का मन मध्यप्रदेश की वनस्थली और नर्मदा के तटों पर अनवरत चलता रहता है या यों कहें कि वहीं बसता है तो अधिक समीचीन होगा. बड़ी सफाई और नेकनीयती से प्रकृति का सहारा लेकर अपनी बात कह जाते हैं. सामाजिक संबंधों और रिश्तों में दिन-प्रतिदिन बढ़ती टूटन को वे यों दर्शाते हैं-‘‘संबंधों की सूखी नदियां/तट टूटे रिश्तों के/अपनेपन से ऊब गया मन/जमाखर्च बातों के/खालीपन डसता है उजले आदर्शों में.’’ (पृष्ठ 14)

सामयिक घटनाएं, मुद्दे या बदलते विचार जब भी किसी को चोटिल करते हैं तो गीतकार का हृदय कचोट उठता है. उसका संवेदनशील हृदय आंदोलित हो उठता है. चाहे वनों से निरंतर वृक्षों का कटते जाना हो या नदियों में बढ़ते प्रदूषण का खतरा हो, काले-गोरे का या धनी-निर्धन का भेदभाव हो, दफ्तरों में बढ़ते भ्रष्टाचार की घटनाएं हों या आत्महत्या करते किसानों की लाचारी. गीतकार इन सभी दुर्घटनाओं से आहत होता है और इसके

विरोध में मुखर गीतों का जन्म होता है.

आज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि मनुष्य का आपस में विश्वास समाप्त होता जा रहा है. नजदीकी रिश्तों में भी दरारें साफ दिखने लगी हैं. बाप-बेटे, भाई-भाई, पति-पत्नी जैसे पाक रिश्तों में दाग लगने लगे हैं. आदमी इतना कामी हो गया है कि मासूमों के साथ बलात्कार की घटनाएं सुनने में आती हैं. इतना लोभी और स्वार्थी हो गया है कि बाप को पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दे रहा है. पूरी दुनिया कुरुक्षेत्र बनी हुई है-

हर जगह कुरुक्षेत्र है/महाभारत का

बर्फ-सी ठंडी है करुणा/आतंक आफत का

अब नहीं आकाश में हैं/मेघ छाते

फूटता संवेदना का कोई भी झरना

किसको कह दें/कौन है अपना (पृष्ठ 21)

कवि व नवगीतकार जय प्रकाश श्रीवास्तव अध्यापक भी हैं. अतः उनकी चिंता की परिधि में बच्चों का आना अत्यंत स्वाभाविक है. कोई भी कवि या लेखक अपने जीवनानुभवों को जितना ही समृद्ध बनाता है, उसकी अभिव्यक्ति में उतनी ही परिपक्वता, दक्षता, यथार्थता और रचनाशीलता के दिग्दर्शन होते हैं.

झूठे वादे करने वाली सरकारें, नारों से पटी दीवारें, लंगोटी में तन ढांके लोग, नमक और प्याज भी मुंह की पहुंच से दूर, गगन-चुंबी मंहगाई, उन्माद से भरे सत्ताधारी सफेदपोश, शोषण से मजबूर लाचार मजदूर-किसान, बेरोजगारों की लंबी कतारें आज देश की नियति बन चुके हैं. गीतकार की सूक्ष्मदृष्टि से कोई कोना छूटा नहीं है. उन्होंने सभी के दर्द को निकट से महसूस किया है फिर उसे वाणी दी है. वर्तमान परिवेश में ‘प्रेम’ शब्द अपनी. व्यापकता खो चुका है. यह उत्कृष्ट भाव आज मलिन हो चुका है-

हर सबक झूठा लगा/अधूरी प्रविष्टियां

बांच पाये नहीं अब तक/जिंदगी की चिट्ठियां

प्रेम के व्यवहार घृणा से चुके हैं

उजालों के गीत रातों में लिखे हैं (पृष्ठ 32)

गीत की भाषा सरल, सहज और संप्रेषणीय है. भावों के पुष्प कल्पना के धागों में इस तरह पिरोए गए हैं कि एक सुंदर गीत-माला तैयार हुई है. गीतकार ने शब्दों के प्रयोग में बड़ी सहज और सतर्क दृष्टि रखी है.

ऐसा नहीं है कि गीतकार ने दुःख-दर्द ही देखे हैं या उनकी मानसिकता ऐसी है कि उन्हें सब बुरा ही दीखता है. वे फूलों की सुंगध भी महसूस करते हैं, फसलों के खिले चेहरे देखकर मुस्काते हैं. सरसों, चना, अरहर की अच्छी फसल पर खुशियां मनाते हैं. शहर को परिभाषित करते हुए वे कहते हैं-

‘‘आंगन को तरस गए/शहर के मकान.’’ फिर लिपे-पुते और फुदकती गौरैयों वाले आंगन जहां हैं, उस गांव में आने का आमंत्रण देते हैं-

आना उस गांव/जहां लिपे-पुते आंगन में फुदकती है गौरैया...(पृष्ठ 41)

अपने अट्ठावन गीतों के माध्यम से गीतकार ने सामाजिक सरोकारों से जुड़े कई अहम सवाल उठाए हैं. प्रकृति की खूबसूरती को भी उकेरा है. जड़ों की ओर लौटने का आमंत्रण दिया है. यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि ये गीत हमारी संवेदनशीलता को बचाने की मुहिम में सशक्त आवाज हैं.

सम्पर्कः श्रीधर पाण्डेय सदन,

बेलखरिया का पुरा, मीरजापुर (उ.प्र.)-231001

मो. 08858515445

समीक्ष्य कृतिः ‘परिंदे संवेदना के’ (गीतसंग्रह)

गीतकारः जयप्रकाश श्रीवास्तव

प्रकाशकः पहले पहल प्रकाश, भोपाल (म.प्र.)

मूल्यः 150

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु बेनामी टिप्पणियाँ बंद की गई हैं (आपको पंजीकृत उपयोगकर्ता होना आवश्यक है) तथा साथ ही टिप्पणियों का मॉडरेशन भी न चाहते हुए लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

[facebook][blogger]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget