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बर्फ / कहानी / सुशांत सुप्रिय

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पिताजी के भीतर एक अकेलापन रहता है । सुबह की धूप में चमकता हुआ । रात की चाँदनी में दमकता हुआ । बारिश में नहाता हुआ । ठंड में सिकुड़ता - सिमट...

पिताजी के भीतर एक अकेलापन रहता है । सुबह की धूप में चमकता हुआ । रात की चाँदनी में दमकता हुआ । बारिश में नहाता हुआ । ठंड में सिकुड़ता - सिमटता हुआ ।

उदासी में बिलखता हुआ । पिताजी के भीतर एक अकेलापन रहता है ।

पर वे अपने अकेलेपन के साथ अकेले नहीं होते । वे उससे ढेर सारी बातें करते हैं । अक्सर उसके कानों में फुसफुसाते हैं । कभी-कभी कोई भूला हुआ उदास गीत भी गुनगुना कर उसे सुनाते हैं । पर हमारे पास आते ही वे बर्फ हो जाते हैं ।

अक्सर पिताजी काठ की कुर्सी पर बैठे-बैठे काठ हो जाते हैं । उनकी आँखें शून्य में अटक जाती हैं । ज़रूर वे अपने अकेलेपन से कोई कोई बात कर रहे होंगे ।

मैं चाहता हूँ कि उनके अकेलेपन के ताल में एक पत्थर फेंकूँ ।

" पिताजी..."

पत्थर ' गुड़ुप् ' से ताल में डूब जाता है । कोई लहर नहीं उठती ।

मैं चाहता हूँ कि उनके अकेलेपन के ताल में मछलियाँ तैरें ।

" पिताजी, मौसम विभाग कह रहा है इस साल खूब बारिश होगी । "

पिताजी का ताल जम कर ठोस हो गया है ।वहाँ की सारी मछलियाँ बरसों पहले मर चुकी हैं ।

पिताजी काठ की कुर्सी पर काठ-से बैठे हैं । अपने भीतर के शून्य में खोए

हुए । वहाँ केवल उनका अकेलापन है । हममें से कोई वहाँ नहीं जा सकता । उन तक नहीं पहुँच सकता । वे हमारे बीच होते हुए भी यहाँ नहीं हैं ।

पिताजी शुरू से ऐसे नहीं थे । वे बेहद हँसमुख थे । जीवन से भरे हुए । उनके जीवन के आकाश में भी इंद्रधनुष थे । उनके जीवन के बाग़ में भी फलों से लदे हुए पेड़ थे । कोयलों की कूक थी । उनके जीवन में भी फुलवारी थी । तितलियाँ थीं । जुगनू थे । चाँदनी थी । उनकी आँखों में भी हरियाली थी ।

तब बड़े भैया जीवित थे । माँ बड़े भैया के हत्या के सदमे से नहीं मरी थीं ।

मँझले भैया ने बदला लेने के लिए हत्यारों को नहीं मारा था । वे आजीवन कारावास नहीं भुगत रहे थे । दीदी की शादी नहीं टूटी थी और वे वापस घर नहीं लौट आई थीं ।

तब सारा आकाश हमारा था । अलाव गर्माहट देती थी । भुनी हुई मूँगफलियाँ खाने में मज़ा आता था । बारिश में भीगना अच्छा लगता था । शाम को दफ़्तर से लौट कर बड़े भैया अक्सर किशोर कुमार के गीत गाते थे । मँझले भैया काठ की मेज़ पर साथ-साथ तबला बजाते थे । मैं ख़ुशी से नाच उठता था और दीदी कैमरे में हमारी तस्वीरें कै़़द कर रही होती । पिताजी उन दिनों खुल कर हँसते थे । माँ रसोई में से गर्मा-गर्म पकौड़े ले आतीं । और साथ में ' डंकन ' की ' डबल डायमंड ' चाय । पिताजी को चाय पीने का बड़ा शौक़ था । वे ख़ुद बढ़िया-से-बढ़िया चाय ख़रीद कर लाते । चाय पीने के बाद पिताजी और बड़े भैया शतरंज की बाज़ी लगाते । मैं , मँझले भैया और दीदी ताश खेलने लगते । माँ चश्मा लगाकर ' कल्याण ' उठा लेतीं । वे भी क्या दिन

थे ।

" पिताजी, चाय ले लीजिए ।" दीदी शाम की चाय बना लाई है ।

पिताजी के अकेलेपन के ताल में बर्फ जम गई है । हड्डियों को जमा देने वाली ठंडी, ठोस बर्फ । वहाँ अब लहरें नहीं उठतीं । ज्वार नहीं आता । सिहरन नहीं होती ।

" पिताजी, दीदी चाय लाई है ।"

अगर मैं ड्रिलिंग-मशीन ले कर इस बर्फ में छेद कर दूँ तो ?

शुरू-शुरू में पिताजी ने काठ होने के विरुद्ध संघर्ष किया था । बर्फ के जमने के ख़िलाफ़ अशक्त-सी ही सही , लड़ाई लड़ी थी । अपने-आप को किसी तरह बटोर कर उन्होंने माँ को दिलासा दिया था -- मैं मँझले को छुड़ा लूँगा । फिर वकीलों और कोर्ट-कचहरियों के चक्कर काटते हुए उनके जूते घिसने लगे थे । आस के कच्चे धागे टूट गए थे । मँझले भैया को सज़ा हो गई थी । बड़े भैया अब नहीं रहे थे । घर में मुर्दनी छा गई थी । पिताजी पत्थर हो गए थे । माँ ने बिस्तर पकड़ लिया था ।

बीच-बीच में पिताजी छटपटा कर अपनी सुन्नावस्था से निकलने की कोशिश करते । बीमार माँ के सिरहाने बैठ कर कहते-- " सुनती हो! छोटू है न अभी । सब ठीक हो जाएगा । " पर भीतर कहीं वे भी जान चुके थे कि अब सब ठीक कभी नहीं हो पाएगा । माँ की कातर आँखें भी यह जानती थीं ।

फिर एक शाम दीदी वापस लौट आई थीं । ससुराल वालों ने उन्हें निकाल दिया था । शादी के पाँच साल बाद भी वे उस घर को वारिस नहीं दे सकी थीं ।

जिस दिन मँझले भैया को सज़ा हुई थी उसी रात माँ ने आँखें मूँद ली थीं । हमेशा के लिए । पिताजी नहीं रोए थे । वे सुन्न हो चुके थे । उनके भीतर कुछ जम गया था ।

उस रात ओले पड़े थे और ख़ूब पानी बरसा था । एक काली बिल्ली बाहर बरामदे में ऊँची आवाज़ में रोती रही थी । मैंने उसे एक-दो बार खदेड़ा भी था पर वह हर बार वापस लौट आती थी । बिजली चली गई थी और मोमबत्ती की रोशनी में मृत पड़ी माँ का चेहरा डरावना लग रहा था । हम सब की परछाइयाँ दीवार पर प्रेतों-सी डोल रही थीं । मैं बार-बार मोमबत्ती जलाता पर बाहर की तेज़ हवा दरवाज़ों और खिड़कियों में से भीतर आकर बार-बार मोमबत्ती बुझा देती ।एक भीगा हुआ चमगादड़ खिड़की के रास्ते भीतर घुस आया था और दीवारों से टकरा-टकरा कर सिर धुन रहा था । बाहर किसी पेड़ पर एक उल्लू देर तक ' वोंक्, वोंक् ' करता रहा था । दीदी माँ के सिरहाने सिसक रही थी । मेरी आँखें भी रो-रो कर लाल हो गई थीं । पर पिताजी की आँखों में एक बूँद पानी भी नहीं था । वहाँ एक वीरान खंडहर था जहाँ शायद रिक्तता की आँधी साँय-साँय कर रही थी ।

सुबह हम माँ को जला आए थे । तब तक पिताजी के भीतर सब कुछ जम कर बर्फ हो चुका था ।

मेज़ पर रखी चाय ठंडी हो चुकी है ।

" पिताजी..."

यदि उनके अकेलेपन के ताल में दुख की काई जमी होती तो मैं उसे साफ़ कर देता । मैं उस ताल में से पीड़ा की गदा भी निकाल देता । पर वहाँ तो बर्फ जमी हुई थी । ठंडी और ठोस । अंटार्कटिका से भी ज़्यादा ।

पिताजी, अगर मैं वैज्ञानिक होता तो एक ' टाइम-मशीन ' बनाता । फिर हम सब पाँच साल पहले के समय में लौट जाते और समय की धारा मोड़ देते ।

तब बड़े भैया जीवित रहते । मँझले भैया को सज़ा नहीं होती । दीदी ससुराल से वापस नहीं आतीं । माँ सदमे से नहीं मरतीं । और पिताजी सामान्य लोगों की तरह हँसते और रोते । उनका अकेलेपन का ताल नहीं होता । और वहाँ बर्फ नहीं जमी होती ।

इस बीच और भी बहुत कुछ हुआ । चाचाजी ने मौक़ा पा कर गाँव का पुश्तैनी मकान और ज़मीन हथिया ली । पिताजी के इलाज के लिए बहुत कर्ज लेना

पड़ा । मुझे अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ कर क्लर्की करनी पड़ी...।

मेरे पास पिताजी को बताने के लिए बहुत कुछ है । पर वे अब मेरी बात नहीं सुन पाते । वे पास होकर भी बहुत दूर हैं । वे साथ होकर भी नहीं हैं ।

" पिताजी, भीतर चलिए । अँधेरा हो गया है ।"

दीदी ने बरामदे की बत्ती जला दी है । अँधेरा सरक कर थोड़ा दूर चला गया है । लेकिन ताक में है कि कब बत्ती बंद हो और वह लपक कर हमें दबोच ले ।

पिताजी जड़ हैं । वे काठ की कुर्सी पर जैसे काठ हो गए हैं । उनकी आँखें गाढ़े अँधेरे में टिकी हैं । ज़रूर वे अपने अकेलेपन से बातें कर रहे होंगे । मैं उनकी आँखों में देखता हूँ । वहाँ दूर तर ठोस बर्फ जमी हुई है ।

भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में जमी बर्फ भी बीच-बीच में पिघलने लगती है । मैं पूछना चाहता हूँ -- पिताजी की आँखों में जमी बर्फ कब पिघलेगी ? क्या आप बता सकते हैं?

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प्रेषकः सुशांत सुप्रिय

मार्फ़त श्री एच. बी. सिन्हा ,

5174, श्यामलाल बिल्डिंग ,

बसंत रोड, ( निकट पहाड़गंज ) ,

नई दिल्ली - 110055

मो: 8512070086

ई-मेल: sushant1968@gmail.com

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रचनाकार: बर्फ / कहानी / सुशांत सुप्रिय
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