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ललित साहू "जख्मी" की कविताएँ

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"तूने बनाया जख्मी"

तेरी आरजू लिए जी रहा हूं
तेरी आरजू लिए ही मर जाऊंगा

मेरी रुह भी ढूँढेगी सिर्फ तुझे
पर शायद ही मैं याद तुझे आऊंगा

मेरे हंसी ख्वाब जो तूने छिने
मैं वापस उसे कहां से लाऊंगा

मिट्टी का घर तोडा महल के लिये
मैं यादें किस मुंडेर अब बसाऊंगा

महफिलें छोडी मैंने ये सोचकर
खुशियों में गम मैं कैसे फैलाऊंगा

जिस गम का बोझ है मेरे नसीब में
किसी और को मैं क्या बताऊंगा

आज इतरा ले भले ही अपने हुस्न पे
खूबसूरती दिल की कभी दिखाऊंगा

कभी तो आयगी झुर्रियां चेहरे पर
उस वक्त भी तुझे मैं अपनाऊंगा

जा मुझसे दूर, बहुत दूर चली जा
पर मैं तो तुम्हें भुला ना पाऊंगा

मैंने तो कलम से यारी कर ही ली है
अपने जख्मों से मैं कविता बनाऊंगा

कभी थको तो मुड़ के देख लेना
मैं तुम्हारे पीछे खडा ही मिल जाऊंगा

तेरा दिया जख्म इस कदर भाया मुझे
कि मैंने ठाना अब जख्मी ही कहलाऊंगा

"मैं भी लिखता हूं"

सम्मेलन में शामिल हुआ समाज का हर वर्ग
परिचय बताया सबने जीविका पर दिये कुछ तर्क
कवि ने कहा मैं संसार को जगाता हूं
शब्दों को पंक्तियों में सजाता हूं
कभी पीडा लिखता दुखियों की
कभी अमन के गीत भी गाता हूं

आलोचना करने से कभी डरता नहीं
अंत: पीडा पर व्यंग्य बाण भी चलाता हूं
मैं अमर अमिट हूं किताबों में
पर विनम्र स्वभाव ही दिखाता हूं

ये और बात है जो बाते मैं कहता
उसे मैं खुद नहीं अपनाता हूं
स्वयं सुधर पाना मुश्किल मेरे लिए
किन्तु परिवर्तन का पाठ पढाता हूं

तब परिचय एक डॉ का हुआ
परिचय सुनने सभा मौन हुआ

डॉ ने कहा मैं भी लिखता हूं
पर हमेशा अस्पताल में दिखता हूं

डॉ ने मुस्कुराहट बिखेरी
मौन सभा की तंद्रा तोडी

मैं अपने जीवन से थक चुके
लाचार मरीजों को बचाता हूं
इस धरती का भाग्यविधाता
मैं ही तो कहलाता हूं

ये और बात है की
मैं रुपयों में भी बिकता हूं
मगर किस्मत की आखरी लकीर
सच मानिये मैं ही लिखता हूं

अब परिचय की बारी शिक्षक की आई
शिक्षक ने सारी तकलीफें गिनकर बताई

दस से चार एक दिन इतवार वाले जीवों मे
सबसे कमजोर प्राणी मैं ही दिखता हूं

ये और बात है की
छुट्टियों की भरमार मेरे नसीब में
और मोबाइल से मुहब्बत तक सब कुछ
मैं स्कूल में रहकर सीखता हूं

वेतन मिलता महिनों रुक कर
दुकानों में स्थायी खाता रखता हूं
मंहगाई की मार बीवी की फटकार खाके भी
मैं ही तो बच्चों का सुनहरा भविष्य लिखता हूं

किसान ने कहा मैं फसल लिखता हूं
साहूकार ने कहा मैं सूत और असल लिखता हूं
पटवारी ने कहा मैं नकल लिखता हूं
नेता ने कहा मैं दल बदल लिखता हूं

वकील ने कहा मैं युक्ति लिखता हूं
जज ने कहा मैं मुक्ति लिखता हूं
पुलिस ने कहा मैं भय लिखता हूं
सैनिक ने कहा मैं भारत मां की जय लिखता हूं

और सच तो ऐ है जनाब
इस धरा पर हर कोई लिखता है

जुआ दांव, बैसाखी पांव, लिखता है
हरियाली अपना पता गांव लिखता है
किनारा नांव, वृक्ष छांव लिखता है
अतिथि आगमन कौआ का कांव लिखता है

सूरज गरमी, तेज, प्रकाश लिखता है
समझो तो उमंग और आस लिखता है
नदिया लय, दरिया ठहराव लिखता है
प्रकृति समभाव, गरीबी अभाव लिखता है

अग्नि ताप, अपराध पाप लिखता है
श्रवण अपना ईश्वर मां बाप लिखता है
हनुमान राम का जाप लिखते है
वामन जग का दो कदम नाप लिखते है

जब दुनिया ही दो कदमों की है
बताओ हम किस लालच में पडे हुए
अहंकार से लबालब हम इतने क्यों
बताओ हम किससे कितने बडे हुए

कोख में तडपती बेटी...

माँ अगर तू चाहे
मैं निराकार से साकार हो जाऊं
जो तूने मुंह मोडा
मैं कोख में ही बेकार हो जाऊं

ख्वाहिश महज इतनी
कि रौशन करुं तेरा घर आंगन
जलने से पहले जो बुझाया
मैं लापता घुपअंधियार हो जाऊं

माँ मुझे अब तो
सपनों से हकीकत हो जाने दे
दुनिया से ना डर
जन्म मेरा इस धरा पर हो जाने दे

माँ मैं हूं तेरे गर्भ में
मुझे भी दुनिया से रुबरु हो जाने दे
रिश्तों को पलभर जी लेने दे
कुदरती करिश्मों में मुझे खो जाने दे

माँ,,ओ,,मेरी मां
तू अकरस ही रोने क्यों लगी
सहला कर कोख में मुझे
आंचल अपना भिगोने क्यों लगी

माँ मैंने जो तुझसे मांगा
क्या वो मेरे हक का नहीं ?
तेरे आंसू क्यों कहते है
मेरा अस्तित्व इस जग का नहीं

जब दुनिया में नहीं लाना था
तो कोख में ही क्यूं लाई हो
मैं बेटी हूं जानने से पहले
क्यूं कहा? तुम मेरी ही परछाई हो

अब क्यूं चुभने लगी मां
मैं तेरे इस कोख को
कितने जन्म और तरसाओगी
मुझे अपनी गोद को

मां मुझे जल्दी मार
मुझे ईश्वर के पास जाना है
धरती का घोर अपराध
मुझे जल्द से जल्द उसे बताना है

अगर कर सके वो
तो अविलंब ही कुछ कर डाले
कहीं ऐसा ना हो कि
मांयें कोख सूनी अपनी कर डाले

"लिखूं भी तो क्या लिखूं"

अंधेरे में बैठकर
अपनी तन्हाई लिखूं
या किनारे बैठकर
सागर की गहराई लिखूं

बाजार में बैठकर
देश की मंहगाई लिखूं
या डोली में बैठकर
जाती बहन की बिदाई लिखूं

साथ चलती संगीनी
जीवन की परछाई लिखूं
या धुंधली यादें समेट कर
प्रेमिका की रुसवाई लिखूं

हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई
या और कोई धर्म लिखूं
भाई से भाई की मजहबी लडाई
या मानवता का शर्म लिखूं

गीत लिखूं गजल लिखूं
या कोई कहानी लिखूं
आंखों से टपकता मोती
या मरा आंखों का पानी लिखूं

वीर लिखूं हास्य लिखूं
या रति श्रृंगार लिखूं
माँ की आंचल का शीतल छांव
या पिता का दुलार लिखूं

फूलों की खुशबु तितलियों की रंगत
या भंवरों का संगीत लिखूं
"जख्मी" होते रिश्तों के बीच
मैं इंसानियत की जीत लिखूं

दंश

बंदर बांट चल रहा
ये किस्सा है अखबारों में
आतंक नंगा नाच रहा
गलियों और चौबारों में

शकुनी बन राजनेता करते
चौसर का खेल दरबारों में
मासूम रक्तों से हाथ सने
नहीं गिने जाते वो हत्यारों में

अपाहिज मानवता भी
नोटों के बिस्तर में सोती है
देख इंसानी कायरता
धरती मय्या भी रोती है

होता उपहास संविधान का
राजनीति की दुकानों पर
हत्यारों के खेप बन रहे
मजहब के कारखानों पर

खुशियों की शहनाईयां बजती
महलों और मीनारों में
बाहर बारूद का ढेर बिछाते
दफनाते शव कतारों में

अंधे नहीं संतरी सारे
पट्टी आंखों पर होती है
देख इंसानी कायरता
धरती मय्या भी रोती है

सीना चिरने की औकात नहीं
खंजर पीठों में घोंपे जाते हैं
और हमारी तोपें बन्दूकें
महज सलामी के काम आते हैं

दुश्मन सीमा पर झांक रहा
वो आंख दिखा कर भी जिंदा है
राजनीति की मृत संवेदना पर
वीर प्रहरी आज शर्मिंदा है

हद से गुजर जाते है दुश्मन
उनकी चाल शिखंडी होती है
देख इंसानी कायरता
धरती मय्या भी रोती है

कुछ नोची जाती सडकों पर
कुछ पेटों में मारी जाती है
लूटी अस्मत बहनों की
बार-बार दिखाई जाती है

मानवता की आड़ में
हैवानी शक्ल छुपाये जाते हैं
किस्सा दुर्योधन के द्यूत सभा की
अब तक दोहराये जाते हैं

संस्कारों की सजी अर्थी पर
पौरूष पांव पसारे सोती है
देख इंसानी कायरता
धरती मय्या भी रोती है ।।

रचनाकार - ललित साहू "जख्मी"
ग्राम - छुरा जिला - गरियाबंद (छ.ग.)
मो.नं - 9144992879

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