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रचना और रचनाकार (२०) वर्तमान काव्य- नई दृष्टि / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

इसमें कोई संदेह नहीं कि आज का काव्य एक नई दृष्टि लेकर आया है. उसने बहुत-कुछ कविता की परिभाषा ही बदल दी है.

एक समय था जब कविता एक सलीखे से कटी-छंटी-मंजी वस्तु हुआ करते थी. उसका अपना निश्चित कलेवर और रूपाकार होता था. वह निश्चित मात्राओं में –दोहों चौपाइयों आदि, में- लिखी जाती थी. छंद बद्ध थी. उसका रूप तो सुंदर और लुहावना था ही, उसकी विषय-वस्तु भी सौंदर्य का ही गुणगान करती थी –फिर वह चाहे स्त्री सौंदर्य हो या प्रकृति का सौंदर्य हो. वह कल्पना की उड़ाने भरती थी और धरती पर ज़रा कम ही टिक पाती थी. उसके बारे में अक्सर पूछा जाने लगा था कि कविता आखिर होती किस लिए है. वह किस मसरफ की दवा है!

बेशक कविता आज भी कोई उपयोगी वस्तु नहीं है. धूमिल कहते हैं –

कविता क्या है /कोई पहनावा है, कुरता पाजामा है

ना भाई ना /कविता शब्दों की अदालत में

मुजरिम के कटघरे में खड़े /बेकसूर आदमी का

हलफनामा है /क्या वह व्यक्तित्व बनाने की

चरित्र चमकाने की /खाने कमाने की चीज़ है

ना भाई ना /कविता

भाषा में /आदमी होने की तमीज़ है

(मुनासिब कार्यवाही)

उपर्युक्त पंक्तियां वर्तमान कविता को जो नई दृष्टि मिली है उसे पूरी तरह स्पष्ट कर देती है इन पंक्तियों का कलेवर परम्परागत कविता की तरह किसी छंद और लय में बंधा नहीं है. इसकी विषय-वस्तु प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन नहीं है. यह कविता को कपोल कल्पना से वंचित करती है और ना ही उसे कोई उपयोगी वस्तु ठहराती है. ये पंक्तियां स्पष्टतः कहती हैं कि ‘कविता-भाषा में आदमी होने की तमीज़ है.’

लगभग सभी साहित्यकारों और साहित्य-प्रेमियों की आज यह आम सहमति बन गई है कि वर्तामान काव्य किसी एकांत कक्ष में बैठकर कोरी कल्पना से नहीं रचा जा सकता. काव्य को उस धरातल पर उतरना पड़ेगा कि वह सामान्य-जन से मित्रता का भाव रख सके. कविता को तो हमारा भरोसेमंद साथी बनना है. काव्य हमारा वह अभिन्न मित्र है जो ललकार सके, डॉंट सके, हमारी कमियों पर कटाक्ष कर सके, हमें सपना दिखा सके – एक शब्द में, हमें इंसान बने रखने में मदद कर सके. एक बेहतर आदमी बनाने की दिशा में हमारे काम आ सके.

हमारे अंतर में जो अनेक उदात्त और अदूषित भावनाएं मंडराती हैं वे हमारे वाह्य क्रिया-कलापों में प्रायः मूर्तमान नहीं हो पातीं. आज की कविता उन्हें शब्दों के संगीत में अभिव्यक्ति प्रदान करती है, चारों ओर उसकी सुगंध पहुंचाती है. ये भावनाएं भले ही थोड़ी सी ही क्यों न हों, लेकिन वे मनुष्य की सार्थकता बनाए रखने के लिए ज़रूरी हैं. कुंवरनारायण कहते हैं –

कविता बहुत कुछ दे सकती है/क्योकि

बहुत कुछ हो सकती है कविता

ज़िंदगी में अगर हम जगह दें उसे

जैसे फूलों को जगह देते हैं पेड़

जैसे तारों को जगह देती है रात (दूसरा कोई नहीं)

वर्तमान में काव्य मनुष्य की ‘आत्मा की मातृभाषा’ है. एक साथ आत्मिक और मार्मिक. वह भावुकता के अतिरेक से मुक्त है, लेकिन बौद्धिक विकल्पों से बंधी भी नहीं है. उसमें वैचारिक तरलता है. उसमें विचार जल की तरह, सम्भावनाओ के बहाव की तरह, उपस्थित हैं. उसका जुड़ाव करुणा से है. करुणा की सम्वेदनशीलता और भाव-प्रवणता उसके गीतों में कोमल गांधार के स्वर जगाती है. वर्तमान काव्य मनुष्य को सतर्क करता है कि वह मुहब्बत और इंसानियत को भूल न जाए. कविता उन सबका आह्वान करती है जिन्होंने सम्वेदनशीलता को बचाए रखा है और जो अपनी मिट्टी और अपनी जड़ो को पहचानते हैं. बेशक आज का माहौल मुहब्बत के ख़िलाफ है. मानवी सम्वेदनाओं से रहित है, लेकिन कवि कामंना करता है –

कोई तो ऐसा दिन होगा

जब मेरे पीड़ा-सिक्त स्वर

उसके मन को भेद

मूर्च्छित प्रमथ्यु को जगाएंगे (धर्मवीर भारती)

आज की कविता मनुष्य को महामानव बनने के लिए नहीं उकसाती. महामानव तो मनुष्य की जद में आता ही नहीं. वह उससे ऊपर उठ जाता है. उसकी पहुंच से वह बाहर है. उसके लिए तो लघुमानव ही बने रहना काफी है –

हर मनुष्य बौना है/ लेकिन मैं बौनों में

बौना बनाकर रहता हूं /हारो मत

साहस मत छोड़ो/ इससे भी अथाह शून्य में

बौनों ने ही तीन पगों में धरती नापी.

स्पष्ट ही धर्मवीर भारती यहां वामन अवतार का ही संदर्भ दे रहे हैं. कविता का लघुमानव भी शक्ति और बुद्धि, करुणा और सम्वेदना से समृद्ध वामन ही तो है.

मनुष्य के अंदर उसकी मनुष्यता, आज के काव्य का यह दृढ विश्वास है, कभी मरती नहीं, इसे लगभग सभी कवियों ने गाया है. माहेश्वर तिवारी गाते हैं –

मुट्ठीभर हवा, हाथ भर यह आकाश

चोटों से लथपथ घायल इतिहास

सिमटा या बदल गया है लेकिन

छाती में धड़कता यक़ीन अभी बाक़ी है!

हम इतिहास में कितनी ही कुरूपता का सामना क्यों न करें, आखिर वह बलवों और युद्धों का रिकर्ड ही तो है. –लेकिन वहां भी कवि उन ‘छूटी हुई जगहों’ को अपनी पूरी संवेदना से चिह्नित करता है जहां चीख़ें उसे पुकारती है. विजय देव नारायण साही कहते हैं –

हमने अपने को इतिहासों के विरुद्ध दे दिया है

लेकिन तुम्हें जहां इतिहासों में छूटी हुई जगहें दिखें

और दबी हुई चीख़ का अहसास हो

समझना हम वहां मौजूद थे !

इतिहास में ही नहीं आज के सारे महौल में भी, मनुष्य फिकरापरस्ती और आतंक के साए में जी रहा है. कितनी अजब बात है कि

नहीं चुनी मैंने वह ज़मीन/ जो वतन ठहरी

नहीं चुना मैंने वह घर/ जो ख़ानदान बना

नहीं चुना मैंने वह मज़हब/ जो प्यार करना सिखाता है

नहीं चुनी मैंने वह ज़बान/ जिसे मां ने बोलना सिखाया

और अब मैं/ इन सबके लिए तैयार हूं –

मरने-मारने पर !

(फ़ज़ल ताबिश)

आज का कवि ताज्जुब करता है-

घास पर खेलता है एक बच्चा

पास बैठी मां मुस्कराती है

मुझे हैरत है क्यूं दुनिया

काबा और काशी जाती है ! (निदा फाज़ली)

वर्तमान काव्य हैवानियत और खूंरेज़ी के खिलाफ,और ऐसी ही नकारात्मक प्रवृत्तियों के बावजूद, एक सर्जनात्मक पहल है. धर्मवीर भारती को पुनः उद्धरित करना चाहूंगा –

भूख, खूरेज़ी, ग़रीबी हो मगर

आदमी के सृजन की ताक़त

इन सबों की शक्ति के ऊपर है

और कविता/ सृजन की आवाज़ है...

क्या हुआ दुनिया अगर/ मरघट बनी

अभी मेरी आख़िरी आवाज़ बाक़ी है

...कौन कहता है कि कविता मर गई है !

जबतक इंसान और इंसानियत है कविता बेशक ज़िंदा रहेगी. काव्य में आदमी अकेला नहीं है. उसका बंधुत्व, उसके सामाजिक सरोकार कविता में बोलते है. अज्ञेय जिन्हें हम प्रायः एक व्यक्तिवादी कवि के रूप में जानते हैं और जो सदा नदी के एक अनन्य द्वीप की तरह अलग-थलग अपनी अस्मिता बनाए रखने में गर्व महसूस करते हैं,

वे भी दीपक के माध्यम से व्यष्टि को समष्टि के लिए सौंप देते हैं –

यह दीप अकेला स्नेह भरा

है गर्व भरा मदमाता

पर इसको भी पंक्ति को दे दो!

अज्ञेय काव्य में नई राहों के अंवेषक थे. तार-सप्तक के बाद की कविता कई धाराओं में बंट गई –कलेवर और कथ्य दोनो ही दृष्टिकोणों से. कविता की एक धारा काव्य रूपों को नकारते हुए गद्य-कविता की ओर बढ गई. अब तो गद्य-कविता का एक आंदोलन-सा ही चल पड़ा है. लय और छंद-विहीन यह कविता मार्मिक सम्वेदनाओं और प्रमाणिक अनुभूतियों की उपस्थिति में अपनी पहचान बनाती है. रूप और आकार से लगता ही नहीं यह कविता है. कथ्य और कव्य-गुण की विद्यमत्ता ही इसके लिए काफ़ी है. इसमें अर्थ और अनुभव का एक प्रकार का अद्वैत देखने को मिलता है. इसकी साधारण सामान्य भाषा इसे और भी आकर्षक बनाती है. इस प्रसंग में रघुवीर सहाय की एक छोटी सी कविता देखें –

आज फिर शुरू हुआ जीवन /आज मैंने एक छोटी सी

सरल सी /कविता पढी/ आज मैंने सूरज को डूबते

देर तक देखा/ जी भर मैंने/ शीतल जल से स्नान किया

आज एक छोटी सी बच्ची आई/ मेरे कंधे चढी

आज मैंने आदि से अंत तक/ एक पूरा गान किया

अलंकार और छंद ऐसी कविताओं में नदारद हैं और यदि हैं भी तो नाम-मात्र.

लेकिन कविता की एक दूसरी धारा, जिसे नवगीत कहा गया है, उसकी ओर मुड़ गई. नव-गीत में छंद और लय छूटी नहीं है, लेकिन उसे छूट है. इसमें जहां भी छंद कथ्य के आड़े आया, नव-गीतकारों ने उसकी परवाह नहीं की. इन कवियों ने दोहे भी लिखे, ग़ज़लें और गीत भी लिखे. और कुछ इस तरह लिखे कि उन्हें गुनगुनाया जा सके. इनके लिए काव्य शब्दों का संगीत है और यह ठीक वैसे ही है जैसे संगीत सुरों का काव्य है. लेकिन इसके संगीत में एक खुरदुरापन भी है. यह सलीखे से कटा-छंटा नहीं है. खादी के कपड़े की तरह कभी इसमें सांठ पड़ जाती है तो कभी कोई रंग धूमिल पड़ जाता है तो कोई गहरा हो जाता है. लेकिन इस खुरदरेपन का भी अपना एक सौंदर्य है. यह सौंदर्य उस प्रमाणिक सम्वेदना से उभरता है जिसे कविता में अभिव्यक्ति मिली है.

वर्तमान कविता की एक तीसरी धारा कलेवर से नहीं बल्कि अपने कथ्य से जानी जाती है. इसमें दलित कविता है जो आक्रामक रूप से दलितों का पक्ष लेती है, और नारी सशक्तिकरण की कविताएं हैं. ये अपनी-अपनी अलग पहचान बनाने में सफल हुई हैं.

वस्तुतः आज काव्य की विषय वस्तु में वे सभी विषय सम्मिलित हैं जो मनुष्य की करुणा और सम्वेदनशीलता को स्पर्श करते हैं. वर्तमान काव्य इस अर्थ में अधिक उदार और उदात्त है. अधिक मानवीय है. आज सिर्फ एक दरवाज़े का मकान या सिर्फ एक खिड़की का कमरा नहीं है. राजकुमार कुम्भज के शब्दों में कहें तो वर्तमान काव्य में ‘हज़ारों फूल, हज़ारों खिड़कियों, दरवाज़ों के खिलने, खिलाने, खुलने की छूट विद्यमान है.’

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