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' कला प्रेमी ' / लघुकथा / विरेंदर वीर मेहता

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बर्बादी का सामान लिये पुलिस से बचता हुआ वो, अपने बचाव के लिये उसके घर में आ घुसा था। कमरे में लगी तस्वीरों से कोई कला प्रेमी लगने वाला वो अपाहिज शख्स अपनी बैसाखी पर खुद को संभाल पाने से पहले ही उसकी 'गन' की जद में आ चुका था।

दीवारों पर सजी तस्वीरों में देश के विभाजन की एक तस्वीर देख वो एकाएक बेचैन हो गया और अनायास ही उसका गुस्सा नफरत बन शब्दों में ढल गया। "हमें चंद टुकड़े जमीं के भीख में देने वालों, तुम्हारी बर्बादी ही हमारा मकसद है।"

"बेटा ! कितनी पीढ़ियों तक दामन में नफरत लिये ये बर्बादी के खेल खेलते रहोगे।" अपाहिज ने उसे देखते हुए कुछ संजीदगी से कहा।

"जब तक नामोनिशां न मिटा दे तुम्हारी हस्ती का।"

"असंभव है पुत्र, यहां कदम कदम पर मां के लाल रक्षा की अलख जगाये बैठे है।"

"दो-चार दिन अलख जगाकर पूरे वर्ष सोने वालों का देश! ये बचायेंगें ?" मन की कलुषता ने अट्ठाहस शुरू कर दिया।

"निस्संदेह पुत्र, ये कृष्ण की भूमि है जहां दुश्मन प्रेम को न समझ पाये तो विध्वंस का मार्ग भी अपना लिया जाता है।" अपाहिज शख्स ने उसके पीछे लगी कृष्णा जी की तस्वीर की ओर हाथ बढ़ा इशारा करते हुए अपनी बात कही।

कहे गए शब्दों ने दुश्मन की क्रोधाग्नि को प्रज्वलित कर दिया और नफरत में पागल हो उसने पीछे पलट तस्वीर को नष्ट करने का प्रयास किया। और यही वो क्षण था, जब अपाहिज की बैसाखी ने हरकत की और दुश्मन के गन थामे बाजू पर एक जबदस्त चोट ने उसे नाकारा कर दिया।..........

बाजी पलट चुकी थी और गन अब कलाप्रेमी के हाथ में थी। दुश्मन की भयभीत आँखें अब कृष्णाजी के साथ लगी एक पुरानी तस्वीर पर जा टिकी थी जिसमें कलाप्रेमी शख्स फौजी वर्दी पर मैडल लगाये शान से खड़ा हुआ था।

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